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जनरेशन वेब-2
भारतीय शहरों में रहनेवाले बच्चे शहर के अखबारों का नाम भले न जानते हों लेकिन उनको इंटरनेट की मायावी दुनिया के बड़े सोशल नेटवर्किंग साईटों के नाम बखूबी पता है. टाटा कंसल्टेन्सी सर्विसेज (TCS) द्वारा किये गये एक सर्वे में यह बात सामने आयी है कि बड़े शहरों में 93 प्रतिशत बच्चे ऐसे हैं जो सोशल नेटवर्किंग साईट्स के बारे में जानते हैं.
भारतीय कृषि पर अमेरिकी कब्जे की कहानी
भारत का आर्थिक विकास भी एक विडंबना की तरह ही आया है. आर्थिक वृद्धि, भारी संख्या में पैदा हो रही तकनीकि क्षमता से लैस नौजवान पीढ़ी लेकिन अनुसंधान और अध्ययन की उसी मात्रा में कमी ने भारत को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए सबसे सुविधाजनक स्थान के रूप प्रस्तुत कर दिया है. इसमें भी खेती विकास का नया आधार है. भारत में भले ही इसका महत्व कम हो रहा हो लेकिन अर्थव्यवस्था का मूल आधार खेती ही है, इसे कम से कम दुनिया की बहुराष्ट्रीय कंपनियां समझने लगीं हैं. लेकिन उनकी इस समझ और पहल का एक आधार और है. एग्रीबिजनेस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा लाभ का माध्यम भी है. रोग और रोग का निदान निश्चित रूप से दुनिया का सबसे अधिक लाभ कमानेवाला उद्योग बना हुआ है. ...गोत्र की गली में प्रेम का जनाजा
हरियाणा में गोत्र विवाद फिर सुर्खियों में हैं. कुछ दिन पहले चर्चा में आये झज्जर के गाँव ढराना के रविंदर और शिल्पा के विवाह के बाद शुरू हुए विवाद की आंच अभी ठंडी पड़ी भी नहीं थी की २२ जुलाई को शाम के वक्त नरवाना के पास एक गाँव में एक ही गोत्र में शादी करने वाले युवक को मौत के घाट उतार दिया. ये अलग बात है की ये युवक पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायलय से सुरक्षा और कानूनी अधिकार लेकर अपनी पत्नी को लेने उसके घर चला गया था. इसकी ये गुस्ताखी इसे इतनी महंगी पड़ी की की इसे पीट पीट कर मौत के घात उतार दिया गया. पहले से ही चर्चा में चल रहे हरियाणा के लोगों को रुढिवादिता के मामले में ये फिर से एक कला धब्बा बन गया....जंगल काटकर 'फारेस्ट' का निर्माण
दिल्ली के दक्षिणी सिरे पर बसा हरियाणा का सूरजकुण्ड इलाका बिल्डरों की नयी पनाहगाह के रूप में उभरा है. दिल्ली के बड़े बिल्डर अपेक्षाकृत हरे भरे इस इलाके की हरियाली को करोड़ों में सौदा कर रहे हैं. सूरजकुण्ड से आगे फरीदाबाद के लिए चलते हैं तो सड़क के दोनों ओर जारी निर्माण कार्य देखकर आप हतप्रभ रह जाएंगे. जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, पहाड़ों को मनमाने तरीके से तोड़ा जा रहा है और दिनभर सैकड़ों ट्रक यहां से निकलनेवाले "मलबे" को यहां से सूदूर फेंकने का काम कर रहे हैं. हरियाली को हटाकर खुशहाली का दावा करनेवाले बिल्डरों में ओमेक्स प्रमुख है जिसका बहुचर्चित फारेस्ट प्रोजेक्ट यहीं आकार ले रहा है. ...बोरे में बंद बलात्कारी
29 अप्रैल, शनिवार की शाम सोनाचूड़ा बाजार में चहल-पहल जल्दी ही खत्म हो गयी. शाम के 6 बजे से ही खेजुड़ी सीमा क्षेत्र से बम के धमाके सुनाई पड़ रहे हैं. बाजार में माइक से संदेश दिया जा रहा है- रात में तुलाघाट की तरफ से हमला हो सकता है. रात के नौ बज रहे हैं और बंदूक आकाश में छेद कर रहे हैं. बापी मैती आज सुबह घर के पिछवाड़े शौच करते वक्त बम के झटके से झुलस गये हैं. भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति के सोनजूड़ा संयोजक निशिकांत मंडल आज रात किसी संभावित हमले के खतरे से अपने अतिथि को सुरक्षित रखना चाहते हैं....राजस्थान भाजपा में अरुणोदय
दिसंबर 2008 के विधानसभा चुनावों में सरकार गंवाने के बाद, लोकसभा चुनाव में औधे मुंह गिरे राजस्थान भाजपा नेतृत्व के बीच मचे घमासान को आखिर आलाकमान ने एक युवा को जिम्मेदारी सोंपकर मुंह छिपाने की कोशिश की है लेकिन इससे ये नहीं कहा जा सकता कि प्रदेश के भाजपा संगठन में सब कुछ ठीक ठाक हो जाएगा। चुनावों में हुई हार की जिम्मेदारी लेते हुए प्रदेश अध्यक्ष ओम माथुर ने इस्तीफा तो दे दिया लेकिन उनका ये कहना कि ´चुनावों में हार के लिए वो अकेले ही जिम्मेदार नहीं है दूसरे लोगों को भी नैतिकता के आधार पर पद छोड़ देने चाहिऐ´महारानी को भी निशाना बनाया है।...दंगों की राजनीति कांग्रेस ने शुरू की- जरनैल सिंह
देश विदेश में सूचनाओं से जुड़े किसी व्यक्ति के लिए जरनैल सिंह शायद ही अपरिचित नाम हो. दिल्ली दंगों के मसले पर चिदंबरम पर जूता फेंककर उन्होंने न केवल राजनीति को जनता के प्रति जवाबदेह बनाने का संदेश दिया बल्कि मीडिया को भी मुद्दों पर पत्रकारिता करने के लिए प्रेरित किया. जरनैल सिंह जिस जज्बे और मुद्दे को लेकर पत्रकारिता में आये थे उसी जज्बे और मुद्दे के कारण वे पत्रकारिता से छुट्टी पर भेज दिये गये. उनका वह जज्बा और मुद्दा क्या है, कांग्रेस के बारे में वे क्या सोचते हैं और वे अब क्या करेंगे जैसे अनेकों सवालों पर विस्फोट न्यूज नेटवर्क ने उनसे बात की....ताकि फिर न हो कोई और कंधमाल
पिछले साल उड़ीसा के कंधमाल जिले में `ईसाई समुदाय´ के विरुद्ध हुए दंगों की वजह से देश को बहुत बदनामी झेलनी पड़ी। पोप बेनेडिक्ट ने इन दगों पर रोम में कड़ी प्रतिक्रिया दी। इटली की सरकार ने भारतीय राजदूत को तलब कर सफाई मांगी, योरुपीयन यूनीयन ने अलग से शोर मचाया एवं अमेरिका के अंतराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग ने इन दंगों की जांच के लिए भारत आने की इजाजत मांगी जो उसे अभी तक नही दी गई है। भारतीय चर्च ने भी मौके का लाभ उठाते हुए देश भर के कैथोलिक स्कूलों को बंद कर सरकार को ब्लैकमैल करते हुए झुकने पर मजबूर कर दिया। आखिर यह सब क्यों किया गया?...दिन भर काम, मजूरी 700 ग्राम
यह एक और रिपोर्ट है जो भारत के आदिवासी क्षेत्रों की हकीकत से हमें रूबरू कराता है. छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के आदिवासी बहुल जिलों में आदिवासियों और बंधुआ मजदूरों के बारे में हुए इस अध्ययन में साफ कहा गया है कि इन इलाकों में बंधुआ मजूरी बदस्तूर जारी है. इन इलाकों में दिन भर काम कराने के बाद भी मजदूरी के नाम पर 700 ग्राम धान देकर टरका दिया जाता है. ...लालगढ़ की लड़ाई का सच-2
लालगढ़ में जो भी हुआ वह कुछ दिन या कुछ महीनों के असंतोष और शर्मिंदगी का परिणाम नहीं था बल्कि सरकार द्वारा लंबे समय से हाशिये पर लाये गए दबे कुचले आदिवासियों की नाराजगी का इजहार था. इसलिए कहा जा सकता है कि लालगढ का आंदोलन मौजूदा व्यवस्था, शर्मनाक जिंदगी, पुलिस बल के अत्याचार और अन्याय के खिलाफ एक नए तरह के आंदोलन का आगाज था. लालगढ के आंदोलनकारियों ने जिन तरीकों का उपयोग किया उसे देखने से लगता है कि उन्होनें नंदीग्राम के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा था. दूसरी किश्त-...अदालत का एक फैसला इंसानियत के खिलाफ
भारतीय न्याय व्यवस्था के इतिहास में इससे प्रतिगामी फैसला शायद दूसरा दिखाई न दे जो किसी समूह या संस्था के पक्ष में नहीं बल्कि पूरी इंसानियत के खिलाफ आया है. 2 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि धारा 377 के कारण समलैंगिकों के मूलभूत अधिकार का हनन होता है. इसलिए समान अधिकार के आधार पर गे समाज को भी आपसी रजामंदी से शारीरिक संबंध बनाने को अपराध न माना जाए. एक शब्द में कहा जाए तो यह भारतीय संस्कृति के लिए सबसे अधिक दुर्गति करने वाला फैसला है....दैनिक भास्कर ने मांगे थे पांच लाख, वह भी ब्लैक में
अपने तीस साल के राजनीतिक जीवन में मैंने मीडिया का ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा था. मीडिया के प्रतिनिधि लोकसभा चुनावों के दौरान खुलकर प्रत्याशियों से पैसे मांग रहे थे. राजनीतिक दल मजबूर होकर पैसे देते रहे. दलों की छोड़िये निर्दलीय प्रत्याशी भी इनके शिकार हुए. पैसे मांगने के लिए उन्होंने बहुत ही संभ्रांत शब्द का इस्तेमाल किया- पैकेज....खबर छापने के लिए जागरण ने मांगा था पैसा - लालजी टंडन
भाजपा के नेता और अब लखनऊ से सांसद लालजी टंडन ने कहा है कि चुनावों के दौरान दैनिक जागरण ने उनसे पैसे की मांग की थी. बदले में जागरण ने उन्हें आश्वासन दिया था कि उनकी खबरें खूब प्रकाशित की जाएंगी....लालगढ़ की लड़ाई का सच-1
लालगढ़ में जो भी हुआ वह कुछ दिन या कुछ महीनों के असंतोष और शर्मिंदगी का परिणाम नहीं था बल्कि सरकार द्वारा लंबे समय से हाशिये पर लाये गए दबे कुचले आदिवासियों की नाराजगी का इजहार था. इसलिए कहा जा सकता है कि लालगढ का आंदोलन मौजूदा व्यवस्था, शर्मनाक जिंदगी, पुलिस बल के अत्याचार और अन्याय के खिलाफ एक नए तरह के आंदोलन का आगाज था. लालगढ के आंदोलनकारियों ने जिन तरीकों का उपयोग किया उसे देखने से लगता है कि उन्होनें नंदीग्राम के अनुभवों से बहुत कुछ सीखा था....जनरैल सिंह को जागरण ने नौकरी से निकाला
गृहमंत्री पी चिदम्बरम पर जूता फेंककर अपना विरोध दर्ज करानेवाले पत्रकार जनरैल सिंह को दैनिक जागरण ने नौकरी से निकाल दिया है. उनका निष्कासन 1 जुलाई से प्रभावी माना गया है....अप्राकृतिक संबंधों पर अनैतिक फैसला
राज समाज चलाने के लिए कानूनों की परिधि में जीना जरूरी होता है. लेकिन नैतिक जीवन और कानून सम्मत जीवन में अगर किसी एक का चुनाव करना हो तो मनुष्य नैतिक जीवन का ही चुनाव करता है. यही समाज और व्यक्ति दोनों के हित में होता है. लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले ने साबित कर दिया है कि देश की राज व्यवस्था पर ही नहीं कानून व्यवस्था पर भी अब कोई अंकुश नहीं रह गया है और हमारे देश के कानूनी संस्थान भी कुछ निहित स्वार्थी तत्वों के हाथ के खिलौने बनकर रह गये हैं. ...Author info
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