अनुराग पुनेठा
कारगिल विजय के दौरान समझौते और लीपीपोती के निशान
हम भले ही इस इलाके में 2009 में आये हैं लेकिन यह इलाका मानों दस साल पहले 1999 में ही खड़ा है. समय ने 1999 से आगे शायद एक भी कदम आगे नहीं बढ़ाया है. हम वहां पहुंचे तो सेना ने हम हर वो मुकाम दिखाया जिसने 1999 में इतिहास बनाया था. दस साल बाद ही सही एक बाद देश और मीडिया को करगिल और द्रास याद आये हैं. इधर मैदान में जवान शहीदों की जैसी गति और दुर्गति है उसकी बात न भी करें तो द्रास और करगिल में भी हालात बहुत अच्छे नहीं है. दुनिया का दूसरा सबसे ठंडा स्थान होने के बावजूद शौर्य और पराक्रम की गरमाहट में देश की सबसे जटिल सीमा का मुश्तैदी से सुरक्षा कर रहे हैं. लेकिन एक बहुत जटिल सवाल है. क्या करगिल की लड़ाई हमने सचमुच जीत ली है?
खो गया 'कामदेव का अपना वसंत रितु का सपना'
वह 1994 जाडो की रात थी , जब मेरा सामना हबीब साहब से हुआ था, दिन याद नही है...थियेटर का शौक था, किसी ग्रुप में जाओ तो दाखिला लेने में मारामारी...दिल्ली आने पर कोई थियेटर वाला लेने का आसानी से तैयार होता नही था, हालांकि ज्यादातर थियेटर वाले चिरकुट ही लगा करते थे... बातें इतनी बडी कि नसीरुद्दीन शाह, ओमपुरी या फिर अनुपम खेर उन्ही से सीख कर गये है...तभी किसी दोस्त ने बताया कि हबीब साहब का ग्रुप भी है...उनके यंहा कोशिश की जा सकती है......तालिबान से पाकिस्तान कितना परेशान?
पाकिस्तान में तालिबान के बढ़ते दबदबे को लेकर दुनिया भर की मीडिया परेशान है. भारत में भी मीडिया तालिबान के बढ़ते दबदबे की रिपोर्टिंग में कोई कमी नहीं छोड़ रही है. लेकिन क्या खुद पाकिस्तान तालिबान के बढ़ते दबदबे को लेकर चिंतित है? ऐसी खबरें आ रही हैं कि पाकिस्तान बुनेर में तालिबान के ऊपर सैन्य कार्यवाही करने का मन बनाया है. लेकिन तालिबान को लेकर पाकिस्तान इतना ही आतंकित है तो फिर स्वात घाटी में उसने शरीयत और तालिबानी प्रशासन को मान्यता क्यों दी? लाल मस्जिद के इमाम को जेल से रिहा क्यों कर दिया जबकि वे कट्टर तालिबान समर्थक हैं. ...अफगानिस्तान बनने की राह पर पाकिस्तान
कहते है कि इतिहास अपने आप को दोहराता है. अफगानिस्तान में जो कुछ पिछले ३० सालो में हुआ वो पाकिस्तान का किया कराया ही रहा, इसमें किसी शक की गुंजाइश नही रही. लेकिन जो पाकिस्तान ने बोया वो अब काट रहा है. दरअसल जो एके -४७, राकेट लांचर, मशीनगन पाकिस्तान ने कबाइलियो, पठानो, मुजाहिदीनो और तालिबानियो को दिये थे, वो उन्होने अब अपने आकाओं की तरफ ही मोड दिये है. तो सवाल ये है कि क्या पाकिस्तान भी अफगानिस्तान की राह पर है?...Author info
