क्रांति प्रकाश
नाजायज नहीं है चीन की चौधराहट
चीन की कंपनियां भारत में व्यापार करना चाहती हैं और भारत सरकार इस बात को लेकर भयभीत है कि वे कंपनियां चीन के लिए जासूसी कर सकती हैं. चीनी कंपनियों को भारत में व्यापार करने की अनुमति देकर भले ही चीन भारत ने चीनी कंपनियों को प्रवेश दे दिया हो लेकिन भारत सरकार को भी समझना होगा कि व्यापार के मामले में चीन की चौधराहट नाजायज नहीं है.
कोपेन हेगन में होगी असली परीक्षा
सन् 1972 में स्टॉकहोम में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में मानव वातावरण पर एक सम्मेलन हुआ था। सबसे पहले यहीं बदलते पर्यावरण पर विचार-विमर्श हुआ, फिर 1992 में रियो द जनेरो में अर्थ समिट हुआ जहां पर्यावरण को लेकर चिंता जाहिर की गई और यह माना गया कि कार्बन उत्सर्जन में कमी नहीं की गयी तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। इस दौरान बैठकों का दौर चलता रहा और अब आने वाले दिसंबर में कोपेन हेगन में जलवायु परिवर्तन को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ का सम्मेलन होने जा रहा है।...खेती खेत रहे इससे पहले
समय आ गया है कि हम इस कथित वैज्ञानिक या आधुनिक खेती की सार्थकता पर फिर से विचार करें और देर होने से पहले भारत में हजारों साल से प्रचलित जैविक (देसी) खेती की ओर लौट चलें। भारत के संदर्भ में जब हम जैविक खेती की बात करते हैं तो इसका मतलब एक ऐसी कृषि व्यवस्था से है जो मोटे तौर पर आत्मनिर्भर रहा है जहां खाद-बीज से लेकर तमाम साधन स्थानीय स्तर पर ही उपलब्ध हो जाता है। चूंकि पारम्परिक खेती में बाजारू चीजों का उपयोग न के बराबर होता है इसलिए इसमें लागत भी कम आती है। ...विकास के गर्भ में छिपी भूख
विकास की इच्छा मनुष्य में संभवत: तभी से है जब से उसे प्रकृति ने सचेत किया है। यह इच्छा बाद में `विकास की भूख´ के तौर पर तब्दील होती गई। आज मानव ने आर्थिक, भौतिक और सामाजिक हर स्तर पर विकास के नए आयाम हासिल किए हैं। तकनीकी क्रांति ने मनुष्य की दुनिया ही बदल दी है। इसके बावजूद विकास की ये भूख खत्म नहीं हुई है। शायद यही वजह है कि आज दुनियाभर में `विकास की भूख´ चर्चा में है। ...पेठिया की खाली होती पेटियां
बहुत सालों बाद इस बार गांव (गंगेया जिला मुजफ्फरपुर) जाना हुआ और संयोग से कुछेक दिन रूकने का भी सौभाग्य मिला। इस दौरान लोगों से मिलने-मिलाने के अलावा काफी कुछ देखने को मिला और इसी कड़ी में एक दिन पेठियां जा पहुंचा। पेठियां यानी ग्रामीण बाजार जो हर इलाके के कुछ गांव में हर रोज या सप्ताह में एक या दो बार लगता है। पूर्वांचल में इसे हाट या हटिया भी कहा जाता है और दिल्ली जैसे महानगरों में सोम बाजार से लेकर शुक्र या शनि बाजार तक। हालांकि पेठियां शहर के साप्ताहिक बाजार से इस मायने में अलग है कि यहां का ज्यादातर कारोबार दिन के उजाले में होता है और शाम होते-होते सिमट जाता है।...किसी को नहीं चाहिए राजनीतिक कार्यकर्ता
पिछले कुछ दशकों में भारतीय राजनीति और राजनीतिक दलों में ढेरसारे बदलाव आए हैं और ये बदलाव चौतरफा हैं। इस दौरान राजनीति के मायने तो बदले ही हैं, राजनीतिक दलों के कामकाज के तौर-तरीकों में भी भारी बदलाव आया है। इस बदलाव का एक परिणाम यह भी है कि राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता गायब होते जा रहे हैं। सच बात यह है कि वामदलों को छोड़कर तमाम पार्टियों में कार्यकर्ताओं का टोटा है और भारतीय लोकतंत्र के लिए यह अच्छा संकेत नहीं है। इस मामले को लेकर राजनीतिक दलों की अंदरूनी सोच क्या है, यह तो मालूम नहीं, लेकिन तरह से तमाम पार्टियां कार्यकर्ताओं की अनदेखी कर रही हैं, उससे तो यही लगता है कि वे कार्यकर्ताओं से पीछा छुड़ाने में ही भलाई समझने लगे हैं। सवाल है कि ऐसा क्यों है? ...Author info
