Pankaj Chaturvedi
बस, एक सरदार चाहिए कश्मीर के लिए!
कश्मीर समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है ,कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है। इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता।
सलवा जुड़ुम की खामोश विदाई
नक्सल समस्या से जूझने के लिए तैयार की गयी सलवा –जुडूम नाम की सामाजिक दीवार का इस तरह धीरे-धीरे धसक जाना बहुत ही निराशा-जनक है। यदपि यह भी सत्य है की ,इसकी बुनियाद बहुत ही कमजोर थी। अधिकृत रूप से सन२००५ में सरकार द्वारा शुरू किये जाने के बाद से ही ये विवादास्पद रही है और ये विवाद ही इसको सतत रूप से कमजोर करते रहें, जबकि ये प्रयास निसंदेह अच्छा था।...आदिवासी और अल्पसंख्यक नेता की खोज में है राहुल गाँधी
मध्य प्रदेश की राहुल गाँधी की तीन दिवसीय यात्रा राहुल के राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और सिमी की समानता के बयान से सरगर्म रही, तो वही राहुल द्वारा कांग्रेस के लिए मध्य प्रदेश से दस आदिवासी और दस अल्पसंख्यक नेता की खोज का ऐलान भी बहुत महत्त्वपूर्ण है। सिमी से तुलना के बयान ने तो कल भोपाल में भा.जा.पा. प्रदेश कार्यकारीणी के बैठक में अन्य मुद्दों को पीछे छोड़ दिया सबने ने राहुल के बयान की निंदा को प्राथमिकता दी और साथ मुख्य –मंत्री शिवराज से ये सवाल भी पूछा गया की राहुल को राज्य अतिथि का दर्जा क्यों?...'तराजू' पर टिकी हैं 'तिलक' और 'टोपी' की उम्मीदें
हमारे राजनेताओ ने रामजन्मभूमि विवाद-बाबरी मुद्दे पर खूब राजनीतिक–व्यापार किया और लाभ भी कमाया लेकिन आम जनता की झोली आज भी खाली है और ये भी निश्चित है की यदि कोई दंगा–फसाद हुआ तो आम जनता ही पिसेगी फिर वो तिलक वाला हो या टोपी वाला। समय है कि हम सबको अब इस मुद्दे को धार्मिक चश्मे से देखना बंद करना होगा नहीं तो हम फिर उन धर्म के ठेकदारों के हथियार बन जायेंगे जो अपने राजनितिक लाभ के लिए हमे सूली पर चढा देते है।...नियमगिरी में अमन चैन की वापसी
भारत अपने विकास के पथ पर तो बढ़ता जा रहा है लेकिन साथ-साथ देश में अमीर-गरीब के बीच की दूरियां भी लगातार बढती ही जा रही हैं। देश के कई भू-भागों में आज भी प्राकृतिक संसाधनों पर स्वामित्व का संघर्ष अपने चरम पर हैं, जहाँ एक ओर अपने जीवन यापन के लिए जंगल और प्रकृति पर निर्भर आदिवासी समुदाय है, तो उनके सामने सर्वाधिकार युक्त एवं सशक्त उद्योगपति हैं। इस संघर्ष में जीत किसी होगी ये एक बड़ा सवाल होता हैं। भय और औद्योगिक आतंक के साए में जी रहे उड़ीसा के कालाहांडी जिले के नियमगिरि पहाड़ों के आसपास निवास करने वाले आदिवासी समुदाय के लोग अब निस्संदेह चैन की साँस ले सकते है।...मंदी के रास्ते आई मंहगाई बनी हरजाई
सन २००८ में आयी आर्थिक मंदी के बाद से विश्व भर में तमाम देशों की आर्थिक सेहत खराब बनी हुई है। कभी ऐसा लगता है कि अब हालत ठीक है तो कभी स्तिथि खराब लगने लगती है। इस बड़े आर्थिक प्रहार के बाद से दो वित्तीय वर्ष पूर्ण होने के उपरांत भी आर्थिक मंदी से अपेक्षित राहत नहीं मिल सकी है और ये आर्थिक मंदी सीधे –सीधे बढती महंगाई के लिये जिम्मेदार है।...मानसून की टेढ़ी चाल
मानसून की टेढ़ी चाल से भारत में सभी हतप्रभ हैं। पिछले कुछ वर्षो से जिस तरह से मानसून दगा दे रहा है वो भारत जैसे कृषि प्रधान देश में भारी चिंता का विषय हैं। सामान्यतः मानसून शब्द का उपयोग भारी वर्षा के पर्याय के रूप में होता है, लेकिन वस्तुतः यह हवा कि दिशा बदलने का प्रतीक है, जिससे वर्षा कि सम्भावनाएं ज्ञात होती है।...न्याय के नाम पर न करें राजनीति
विगत कुछ दिनों से जो पूरा देश देख रहा है और सुन रहा है, वह भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ितों के जख्मों पर नमक छिड़कने के समान है या यॅंू कहा जाए कि जख्मों को नमक-मिर्च लगे खंजर से कुरेदा और गहरा किया रहा है तो गलत नहीं होगा। गला फाड़कर चिल्लाने वाला मीडिया, भोपाल में डेरा डाले बड़े-बड़े चैनलों के सूट-बूट वाले तथाकथित बड़े पत्रकार, एक दूसरे पर भोपाल से दिल्ली तक कीचड़ उछालते, वो तमाम राजनेतागण, अफसोस कि आप सब ने भोपाल के दर्द को अपनी राजनीति की दुकान में बदल दिया है । क्या आप सब पिछले पच्चीस बरसों से सो रहे थे? या मूक दर्शक बने इस बात का इंतजार कर रहे थे, कि कब मौका आये और हम इसे अपने-अपने हितों के अनुरूप इस अवसर को भुनायें । ...प्रतिहिंसा से नहीं मिटेगी नक्सली हिंसा
नक्सलवाद से निपटने के लिए हिंसा का जवाब प्रतिहिंसा कदापि नहीं हो सकता. जो लोग हथियार छोड़कर आना चाहते हैं उनके पुनर्वास की उचित व्यवस्था के साथ-साथ इन क्षेत्रों में भूमि सुधार भी तत्काल प्रभाव से लागू होना चाहिए। नक्सलवाद से निपटने के लिए ऐसे महात्मा गांधी की जरूरत है जो इनके बीच जाकर परिस्थितियों को पलट सके। अभी देर जरूर हुई है पर अंधेर नहीं है। उजाले की किरण अभी भी बाकी है । ...जान का दुश्मन बना इलेक्ट्रानिक कचरा
आज के इस आधुनिक युग में जब संचार क्रांति के परिणाम परिलक्षित हो रहे हैं। ऐसे समय में यह ध्यान देना और सोचना भी बहुत आवश्यक है कि, क्या यह संचार क्रांति के अत्याधुनिक उपकरण कहीं मानव जीवन से खिलवाड़ तो नहीं कर रहे, कहीं ऐसा न हो कि आधुनिकता की दौड़ में भागते-भागते हमारा दम निकल जाए ।...Author info
