Pushya Mitra
लालू भी चाहिए नीतीश भी
बिहार के मतदाता इन दिनों अपने लिए एक बेहतर नेता चुनने में जुटे हैं. एक ऐसा नेता जो अगले पांच साल के लिए उनके अंदर छुपी बदलाव की खदबदाहट को दिशा दे सके और विकास के रास्तों के कंटक हटा सके. लोगों के सामने दो विकल्प है लालू या नीतीश. इस बार हो सकता है भावावेश में जनता एक को चुन ले और दूसरे को रिजेक्ट कर दें. पर जहां तक मेरी राय इनमें से किसी एक नेता से बिहार का काम चलने वाला नहीं. बिहार को दोनों चाहिए, लालू भी और नीतीश भी. आखिर क्यों ?
विकास की बिसात पर कैसे हो नीतीश की मात
बिहार में चुनाव हो तो क्या मुद्दा होना चाहिए? निश्चित रूप से बिहार से बाहर रहनेवाले लोग विकास और जातिमुक्त बिहार की आदर्शवादी कल्पना पिछले कई चुनाव से बिहार के लिए मुद्दा बनाने की बातें करते रहे हैं. लेकिन साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि बिहार चुनाव में विकास शायद ही मुद्दा बने? लेकिन इस बार यह कमाल दिखाई दे रहा है. पक्ष में हो या विपक्ष में केन्द्रीय मुद्दा विकास ही है. असल में बिहार की विपक्षी पार्टियां नीतीश को रिप्लेक्स करने के लिये तैयार ही नहीं है. लोगों को यह बात अतिशयोक्तिपूर्ण लगती है. मगर आप ही बतायें कि ”या विकास को मुद्दा बनाकर नीतीश से चुनावी समर जीता जा सकता है?...लालू हैं, तभी नीतीश हैं
भागलपुर से पूर्णिया जाते वक्त एक सहयात्री से मेरी जोरदार बहस हो गयी. वे संभवत: उच्च वर्ग से ताल्लुक रखते थे और यह साबित करने में तुले थे कि नीतीश ने ऐसा कुछ नहीं किया है जिसे आश्चर्यजनक और अद्भुत कहा जाये, उसने सिर्फ इतना ही किया कि जो सकारात्मक हो रहा है उसे होने दिया जाये और जो नकारात्मक है उसे न होने दिया जाये. उसने भ्रष्ट राजनेताओं से जरूर मुक्ति दिलाई, मगर हमें आटोक्रेटिक ब्यूरोक्रेसी के हवाले कर दिया....कांग्रेस का दाना, नीतीश की ना-ना
बिहार में चुनाव के दो चरण बीत चुका है. नक्सालियों के दखल के अलावा कहीं कोई खलल नहीं है. जनता भी निश्चिंत है और नेता भी. जैसा किसी पूर्व निर्धारित पटकथा पर सारे किरदार अपनी भूमिका निभाने में जुटे हों. नेशनल न्यूज चैनलों ने सर्वे जारी कर जरूर थोड़ी सी गहमा-गहमी क्रियेट की है मगर लोकल मीडिया में कहीं कोई सनसनी नहीं है....जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद का शिकार माओवाद
बिहार में हुई हाल की घटनाओं ने साबित कर दिया है कि माओवादी अब महज डकैतों और माफिया गुंडों का समूह है जिनसे सिर्फ डरा जा सकता है. विचारधारा और शोषण के खिलाफ लड़ने के उनके जज्बे के कारण लोगों में उनके प्रति जो सम्मान बचा था वह भी अब खत्म होने की कगार पर है. मगर इस क्राइसिस के बाद जो सबसे चौकाने वाली बात उभर कर सामने आयी है वह इन समूहों की वास्तविकता बन चुके जातिवादी झगड़े हैं....बंधक हो गयी बिहार सरकार
कभी-कभी ऐसा लगता है कि माओवादियों को शांति के नाम से ही चिढ़ है. वे हर हालात में सरकार के साथ जंग की स्थिति बरकरार रखना चाहते हैं क्योंकि अगर जंग नहीं होगा तो फिर माओवाद का क्या होगा? और अगर माओवाद मिट गया तो फिर उन माओवादियों का क्या होगा जो बंदूक की नाल से क्रांति की विचारधारा में यकीन करते-करते इस कदर बारूद की गंध के आदी हो गये हैं कि उन्हें इसके बिना जीना नामुमकिन लगता है. शायद यही वजह है कि उन्होंने बिहार में चार पुलिस कर्मियों को अगवा करके एक ऐसी सरकार के खिलाफ जंग छेड़ दी है, जिसका मुखिया हमेशा यही कहता आया है कि माओवादी हमारे समाज के अंग हैं, हम बंदूक के जोर पर इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते....राजीव गांधी के जन्मदिन पर महाविनाश की सौगात
आज पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का 66वां जन्मदिन है. इस साल उनका नाम भोपाल गैस त्रासदी को लेकर उठे विवाद में जबरदस्त तरीके से घसीटा गया. उन पर यूनियन कारबाइड के सीईओ वारेन एंडरसन को संरक्षण देने और सेफ पैसेज देने का गंभीर आरोप लगा. एक अमेरिकी एजेंसी ने तो यहां तक कह डाला कि वारेन एंडरसन के बदले इंदिरा गांधी के चहेते ड्राइवर के बेटे को छोड़ने की डील हुई थी और इसमें राजीव गांधी की बड़ी भूमिका थी. संयोगवश हमारी केंद्र सरकार ने आज का ही दिन न्यूक्लियर लायेबिलिटी बिल पर संसद में बहस कराने के लिये चुना है....आजाद कर दो कश्मीर
अगर कश्मीरी हिंदुस्तान में नहीं रहना चाहते तो उन्हें यह अनुभव कर लेने दिया जाना चाहिये कि वे जंगी और आर्थिक समस्याओं से घिरे अस्थिर पाकिस्तान में रह लें या फिर नेपाल या बांग्लादेश की तरह आजाद रहकर तय तक लें कि प्रगति के दौर में वह कहां तक जा पाते हैं. हालांकि इस देश ने अपने किसी वासी को यह तय करने का मौका नहीं दिया कि वह देश में रहना चाहता है या नहीं मगर अगर कश्मीर खुद को थोड़ा अलग महसूस कर रहा है तो उसे मौका दिया जाना चाहिये. बनिस्पत उसे हर साल दसियों हजार करोड़ के स्पेशल पैकेज दिये जायें और उसमें अपनी हजारों फौजों को मौत से मुकाबला करने के लिये ढकेल दिया जाय....सचमुच हिप्पोक्रेसी की हद है
मीडिया सचिन तेंदुलकर को क्रिकेट का भगवान मानता है और उसकी पूजा के लिये बहाने ढूंढता है. और अपनी इस कोशिश में कई बार मीडिया इतना अतार्किक हो जाता है कि उसपर हंसने की भी इच्छा नहीं होती....राजनीतिक मौन में राजमाता
ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर डेविड कैमरन अपने पहले भारतीय दौरे पर आये हुए थे. उनके कार्यक्रमों की सूची में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और महासचिव राहुल गाधी से मुलाकात का कार्यक्रम भी दर्ज था. मगर अफसोस भारतीय सत्ता के इन दोनों संविधानेतर महाशक्तियों ने अंतिम समय में कैमरन से मिलने से शिष्टतापूर्वक इनकार कर दिया. सोनिया ने जहां अपनी नासाज तबीयत का बहाना बनाया, वहीं राहुल एक दिन पहले अचानक कैमरन के ही मुल्क ब्रिटेन की यात्रा पर निकल गये. आखिर ऐसा क्यों हुआ ?...Author info
