राजीव शर्मा
राजस्थान के (अ) नाथ सपेरे
एक ओर जहाँ देश में विकास दर,मानव विकास सूचकांक,शैक्षिक विकास और नारी के विकास जैसे भारी भरकम शव्दों के आँकडों लोगों के सामने रखे जा रहे है। वही दूसरी ओर देश में अपना परम्परागत पारिपारिक जीवन यापन के तरीकों को बदलने के लिए कुछ लोग मजबूर हो रहे है। वो मानव समाज के साथ हमारे पर्यावरण के भी मित्र हुआ करते थे। मगर अब सरकारी और सामाजिक उपेक्षा के चलते उन्होंने अपनी सोच के अनुसार अपने जीवन को बदल लिया है। उनके लिए मजबूरीवश किया अपना विकास ही सही मायनों खुद का विकास है। राजस्थान के नाथ सपेरे समाज के जीवन में झाँकती एक रिपोर्टः
भाजपा के नटवर सिंह बन गये जसवंत
केन्द्र की राजनीति में यों तो राजस्थान के कई नेताओं ने अहम स्थान प्राप्त किया है। लेकिन दोनों ही प्रमुख दलों में विदेशमंत्री का दायित्व निभा चुके नटवर और जसवंत को उनके दलों ने दूध से मक्खी की तरह निकाल बाहर कर दिया है। दोनों का ही संबंध राजस्थान के पूर्वी और पश्चिमी इलाके से है। इन दोनों ही नेताओं ने सीधे ही केन्द्र की राजनीति में प्रवेश किया था। इनका अपने प्रदेश में जातिगत बल तो है लेकिन खुद का कोई मजबूत जनाधार नहीं रहा है। यही कारण रहा कि इनके दलों ने मजबूत जनाधार न होने के कारण इन्हें बिना कुछ सोचे विचारे बाहर का रास्ता दिखा दिया।...नरेगा के लोकतंत्र में दलित बहुमत की हार
जिस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में एक वोट से सरकारें गिर जाती है, उसी संसद के द्वारा देश में पहली बार मजदूरों को दिये गये रोजगार के अधिकार कानून में 98 दलित मजदूर हार गये और 52 सवर्ण बाहुबली जीत गये है। सरकारी जॉच की रफ्तार कछुआ चाल से कुछ कदम भी नही चल पाई की गॉव के दबंग समूहों और जनप्रतिनिधियों ने दलित मजदूरों पर चाणक्य नीति के साम, दाम, दण्ड औरद भेद के सभी प्रयोग कर दिये गये। आखिर पहले से ही बमुश्किल अपने शोशण के खिलाफ आवाज उठाने कि हिम्मत जुटा पाये मजदूरों ने हार मान ली। वो बहुमत में होते हुये भी लोकतंत्र में हार गये।...जीवन के संघर्ष का सांझा नाम...सॉंसी
इक्कीसवी शताब्दी में आज ये सोचना कि समाज का मैला ढोने वाला वर्ग भी किसी दूसरे वर्ग के लिए सम्मानीय है। और वो उसके झूठन को अपने काम में लेता है, इसे प्रत्यक्ष में राजस्थान के भरतपुर जिले में निवास करने वाली सॉसी जनजाति के जीवन में झॉक कर आसानी से देखा जा सकता है।...बीपीएल तो बन गये अब बताने में शर्म आती है
राजस्थान भर में लाखों परिवारों को इन दिनों शर्म महसूस हो रही है, इसके लिए जिम्मेदार भी वो स्वंय हैं।जिस चीज से उन्हें शर्म महसूस हो रही है उसे लेने के लिए उन्होंने न केवल दूसरों के हक को मारा है बल्कि सरकार की ऑखों में अपने जुगाड के महामंत्र से धूल भी उन्होंने ही झोंकी है।वो अमीर है।उनके पास खेती है,दुकान है सुख सुविधा के वो तमाम साधन है जिनसे उनके बच्चे और वो खुद चैन की जिंदगी जी रहे है मगर अब जब वो प्रतीक घर पर दिखता है तो उन्हें शर्म आती है।...पौधे तय करेंगे गुरूजी का भविष्य
अकाल से जूझते राजस्थान में शिक्षक अब स्कूलों में पेड लगा रहे है। प्रदेश के शिक्षामंत्री ने शिक्षकों को ये नई जिम्मेदारी दी है जिसमें प्रत्येक शिक्षक को अपने विद्यालय में एक पौधा लगाना होगा। जनगणना से लेकर मतदान की प्रक्रिया, मिड डे मील तक के कामों में उलझे शिक्षकों को राजस्थान में अब एक और ऐसी जिम्मेदारी दी गई है जिसके ऊपर उनकी ए सी आर कैसी होगी ये भी निर्भर करेगा।...नरेगा के प्याले में कर्मचारियों का तूफान
मजदूरों को काम का अधिकार देने वाले नरेगा कानून से अब उसके कार्मिक ही खफा हो गये है। राजस्थान भर में 15 हजार नरेगा कर्मचारियों ने कलमबंद हड़ताल कर रखी है। 17 जुलाई के राज्य सरकार के एक आदेश ने इन कार्मिकों की परेशानियॉ बढा दी है। सरकार की ओर से कर्मचारियों को उनके संविदा नियमों से हटकर प्लेसमेंट एजेंसी के माध्यम से लगाने की योजना है। जबकि कर्मचारी नियमित नियुक्ति के सपने पाले हुऐ थे। देश भर में काम के हिसाब से नंबर वन राजस्थान में नरेगा भ्रष्टाचार और शिकायतों में भी नंबर वन ही है।...गुर्जर आरक्षण की राजनीति और प्रहसन के पांच दिन
राजस्थान में राजनैतिक और सामाजिक उथल पुथल मचा देने बाले आरक्षण आन्दोलन के एक युग का नाटकीय पटाक्षेप हो गया। गुर्जरो ने खुद को एस टी वर्ग में ‘शामिल करने की मॉग को लेकर वर्ष 2006 से आन्दोलन की शुरूआत की थी। पाटोली, पीलूपुरा से होते हुए आन्दोलन पेंचला मोड़ तक चला, जिसमें 70 लोगों की जान चली गई जिनके बदले उन्हें एस टी का आरक्षण तो नहीं मिला। राज्य सेवाओं में 5 प्रतिशत विशेष आरक्षण पर ही संतोष कराना पडा हैं।...Author info
