राजीव यादव
सरायमीर की पीर
चर्चित बटला हाउस मुठभेड़ कांड में आजमगढ़ के युवकों की हत्या के बाद से वहां मुस्लिम समुदाय में एक उबल देखा गया. इस बीच इस समुदाय से भी उलेमा काउंसिल बना कुछ लोगों ने इसे हिन्दू बनाम मुस्लिम मुद्दा बना साम्प्रदायिक रूप देने की कोशिश की. तमाम दमनात्मक कार्यवाहियों के बाद यह उस समुदाय की एक प्रतिक्रिया थी. १९ सितम्बर को बटला हाउस मुठभेड़ कांड के एक वर्ष पूरे हो गये. लेकिन क्या आजमगढ़ में अब बटला हाउस नहीं दोहराया जा रहा है? पढ़िये राजीव यादव की रिपोर्ट-
राग-द्वेष की भेंट चढ़ गया छात्रों का एक आंदोलन
बात इलाहाबाद के पत्रकारिता विभाग के सुनील उमराव के बारे में है। पिछले दो हफ्ते से हम उनके साथ या कहें कि उनके नेतृत्व में एक निजीकरण विरोधी आंदोलन में साथ रहे। इस आंदोलन को धार देने के लिए हमने हर स्तर पर उनका साथ दिया। इस बात भी स्थापित ही नहीं एक माॅडल बनाने की भी मुहीम थी कि एक शिक्षक का यह धर्म है कि वह आने वाली नस्लों के लिए शिक्षा के जनपक्षधर स्वरुप को बचाए रखने के लिए जरुरत पड़े तो सड़कों पर भी उतरे। और पिछले कई सालों में पहली बार हुआ कि निजीकरण का यह आंदोलन पत्रकारिता विभाग के छात्रों और पत्रकार भाइयों के सहयोग से राष्ट्रीय फलक पर दर्ज हुआ। और इस पर सरकार के नुमाइंदों को भी बोलना पड़ा।...क्या जागरण क्या हिन्दुस्तान, सब बिके हुए थे
स्वराज्य अखबार इसी इलाहाबाद शहर से निकलता था जिसके आठ संपादकों को अंग्रेज हुकूमत का विरोध करने के कारण कालेपानी की सजा हुई थी. लेकिन उसी इलाहाबाद के अखबार आज गलीजपन की हदें स्थापित कर रहे हैं। बीतें लोकसभा चुनावों में अखबारों ने पैसे लेकर खबरों को विज्ञापन के रुप में ही नहीं बल्कि खबरों व खबरों के स्थान के लिए प्रत्याशियों के सामने लाखों रुपये के पैकेज तक पेश किये। खुलेआम यह ऐलान किया कि बिना पैसा लिये खबर नहीं छापेंगे। चुनाव के परवान चढ़ने के बाद यह अभियान इतना तेज हो गया कि अखबारों का दूसरे अखबार से प्रतिस्पर्धा बस इसी के लिए रह गयी कि कौन कितना बड़ा पैकेज लिया।...बहुजन हिताय सर्वजन दुखाय
यूं तो ये बात जगजाहिर है कि गुंण्डे-माफिया हाथी के महावत बन गए हैं। पर चुनावों में लाज-शरम ही सही उनको अपने दायरे में रहना पड़ता था। पर पिछले दिनों जिस तरह से इंडियन जस्टिस पार्टी के बहादुर लाल सोनकर की हत्या की गई और फिर सोनकर समाज के वोट को रोकने का जो सर्वसमाज अभियान चलाया जा रहा है वो बहन जी को मंहगा पड़ सकता है। सत्ता के मद में चूर जंगली हाथी के दिल्ली कूच के सर्वजन अभियान में बहुजन का उसके प्रति विक्षोभ बढ़ता ही जा रहा है जो दूसरे चरण के मतदान के दौरान इलाहाबाद, फूलपुर, कौशांबी और बांदा समेत आस-पास की सीटों पर साफ दिखा। ...अंगूठा छाप लोकतंत्र का आंदोलन
पूर्वी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र इलाके में समानांतर लोकतंत्र की नींव रखी गयी. चुनाव आयोग भले ही लोकतंत्र का पर्व पूरा कराने में लगा हो लेकिन यहां के आदिवासियों ने अपनी समानांतर लोकतांत्रिक प्रणाली के तहत उम्मीदवारों का चयन किया. बाकायदा बैलट पेपर छापे गये और उम्मीदवारों के नाम के आगे अगूंठा लगाकर मतदान संपन्न करवाया गया. हालांकि यह सब प्रशासन के उस निर्णय के विरोध में हुआ जिसमें तेरह आदिवासियों का नामांकन सिर्फ इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि उन्होंने हस्ताक्षर की जगह अंगूठा लगाया था. लेकिन बात इतनी ही नहीं है. यह पूरा इलाका नक्सलवाद से प्रभावित है और ऐसा समझा जाता है कि प्रशासन को सीधे चुनौती देने के लिए यह अंगूठा छाप लोकतंत्र का आंदोलन चलाया गया. इलाहाबाद से राजीव यादव की रिपोर्ट- संपादक...Author info
