राजेश अग्रवाल
ससुराल गेंदा फूल के बाद अब चोला माटी के राम
छत्तीसगढ़ के लोक-गीत अब बालीवुड के रास्ते दुनिया भर में धूम मचा रहे हैं. दूरदर्शन में समृध्द लोक नाटकों, प्रहसनों का और आकाशवाणी में इस तरह की गीतों का खज़ाना भरा पड़ा है. वक्त आ गया है कि अब इन महान रचनाओं को लोगों को सामने लाने के लिए प्रसार-भारती अपना व्यावसायिक दायित्व निभाए, वरना भद्दे वीडियो एलबम और बेतुके छत्तीसगढ़ी फिल्म, यहां के महान कलाकारों का योगदान धूल-धुरसित करके रख देंगे.
धान किसान पस्त, चाउर बाबा मस्त
गन्ना किसानों ने जिन दिनों दिल्ली में प्रदर्शन कर संसद की कार्रवाई रूकवा दी थी, तकरीबन उसी समय देश के प्रमुख धान उत्पादक राज्य छत्तीसगढ़ के किसानों ने राज्य की भाजपा सरकार को धान पर बोनस देने के वादे से पीछे हटने पर अपनी ताकत दिखाई. छत्तीसगढ़ के चाउर बाबा पर कोई फर्क पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है लेकिन गन्ना उत्पादकों की तरह छत्तीसगढ़ के धान उगाने वाले किसानों की लड़ाई अभी जारी है....नक्सलियों के आगे नोट का टुकड़ा
आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के लिए केन्द्रीय गृह मंत्री पी.चिदम्बरम् के नये पुनर्वास पैकेज से उत्साहित होने की कोई वजह नहीं दिखती. यह छत्तीसगढ़ सरकार की पिछले 10 साल से चल रही पुनर्वास नीति का ही विस्तार है, जो बुरी तरह से असफल रही है. भरोसे व सुरक्षा के अभाव में छत्तीसगढ़ में केवल गिनती के नक्सलियों ने हथियार डाले, जबकि इससे कई गुना ज्यादा नये लोग संघम और दलम् में शामिल हो गये....बूझो न बूझो अबूझमाड़
नक्सलियों से सीधी लड़ाई के लिए सरकार ने तीन दशक से बंद अबूझमाड़ का मोर्चा खोल दिया है. वस्त्रविहीन व कंदमूल खाकर जीने वाले आदिम गोंड़ जाति के बीच अब आम लोगों का सीधा सम्पर्क हो सकेगा. इससे उनकी जीवन शैली और संस्कृति पर ख़तरे तो दिखाई दे रहे हैं, लेकिन सरकार को अपने इस फैसले के पीछे नक्सली हिंसा की आग से झुलस रहे बस्तर में शांति की नई बयार बहने की उम्मीद भी दिखाई दे रही है. वैसे तो लोग देश में कहीं भी आने-जाने के लिए आज़ाद हैं लेकिन बस्तर का अबूझमाड़ दुर्गम पहाड़ियों और घने जंगलों से घिरा एक ऐसा गलियारा है जहां पिछले 3 दशकों से आम लोगों को जाने की मनाही थी....मीठी बोली कड़वी सोच
बस्तर में पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने बीते साल 2 दिसम्बर से एक हफ्ते तक अपने संगठन की स्थापना की वर्षगांठ मनाई. इस दौरान उन्होंने जगह-जगह अपनी मांगों के परचे चिपकाए. इनमें छत्तीसगढ़ को राजभाषा का दर्जा दिए जाने का विरोध भी शामिल था. सन् 2001 में मुख्यमंत्री रहते हुए अजीत जोगी ने जब छत्तीसगढ़ को राजभाषा का दर्जा देने की घोषणा की तो बस्तर के अख़बारों में नक्सलियों ने बयान भेजकर ऐसा फैसला नहीं लेने की चेतावनी दी. बस्तर के आदिवासियों का भरोसा जीतने व बाकी छत्तीसगिढ़ियों से उन्हें अलग बताने के लिए नक्सलियों के पास एक मुद्दा यह भी है. समझा जा सकता है कि भाषा का मामला कितना संवेदनशील है....नक्सल के नाम पर निर्दोषों का नरसंहार
छत्तीसगढ़ के सिंगावरम में जो कुछ हुआ वह राज्य प्रशासन के नक्सल खात्मे के नजरिये पर भी सवाल उठाता है. कहा गया कि बस्तर को नक्सलमुक्त बनाने के लिए सिंगावरम में नक्सलियों को मारा गया. लेकिन पत्रकारों की अपनी छानबीन कुछ और ही कहानी कहती है. छत्तीसगढ़ से राजेश अग्रवाल की रिपोर्ट. ...समृद्धि का राऊतनाच
राऊत नाच छत्तीसगढ़ का संभवतः सबसे वृहद सामूहिक नृत्य है। जैसा कि देश के अधिकांश भागों में है, राज्य के यादव भी परम्परागत रूप से गाय-भैंस पालने और दूध बेचने के व्यवसाय से जुड़े हैं। धान की फसल जब घरों में पहुंचने लगती है और गायों को कटी हुई फसल से भरपूर चारा मिलने लगता है। यह ठंड की शुरूआत भी होती है। गायें न केवल भरपूर दूध देने लगती हैं बल्कि वे हष्ट पुष्ट भी हो जाती हैं। जिन घरों के गायों को यादव चराते हैं, वहां से यादवों को उपहार भी मिलता है...अहो! बन मं गरजथे बनसपतियां जैसे...
निर्धनता के थपेडों से सूख चुके 70 साल के छेड़ूराम को आज की शाम भी चौकीदारी पर जाने के लिए देर हो रही थी. अपने पोपले मुंह से बार-बार उखड़ती सांसों पर जोर देते हुए उनने तकरीबन एक घंटे तक सुरीली तान छेड़ी फिर पूरे आदरभाव के साथ बांस को भितिया पर लटका दिया. अब ये कई-कई दिनों तक इसी तरह टंगा रहेगा. छैड़ूराम को याद नहीं कि पिछली बार बांस उन्होंने कब बजाया....जन-प्रतिनिधि को वापस बुलाओ !
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने की मांग पुरानी है. राज्य स्तर पर नगर निकाय प्रतिनिधियों के वापसी का अधिकार वाला कानून भी पुराना है. लेकिन छत्तीसगढ़ में इसका प्रयोग पहली बार हुआ है. वह भी अविभाजित मध्यप्रदेश में बने कानून के 45 साल बाद. यह कानून बोतल से जिन्न की तरह बाहर निकल कर आया है, ...खाली होता धान का कटोरा
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है लेकिन यहां के किसान शहरों में आकर रिक्शा चला रहे हैं, ईंटा-गारा की मजूरी रहे हैं और किसी तरह दो वक्त की रोटी का प्रबंध कर पा रहे हैं. ...Author info
