सलीम अख्तर
एक बार फिर आग लगाने की कोशिश
भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी एक बार फिर राम नाम का सहारा लेकर मैदान में उतर गए हैं। यह अच्छा हुआ कि बाबरी मस्जिद विवाद के मालिकाना हक का फैसला कुछ दिन के लिए टल गया है। अब समझ आ गया है कि भाजपा की चुप्पी दरअसल घात लगाने की मुद्रा भर थी। फैसला आते ही उसकी हरकतें नब्बे के दशक जैसी हो जाती और देश को एक बार फिर साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने की नाकाम कोशिश की जाती। अब राममंदिर मुद्दे को दोबारा सड़कों पर लाने की बात करके भाजपा न्यायपालिका को ब्लैकमेल करना चाहती है।
हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए परीक्षा की घड़ी होगी 24 सितंबर
बाबरी मस्जिद बनाम राममंदिर के मालिकाना हक के 24 सितम्बर को आने फैसले को रोकने के लिए रिट याचिकाएं हाईकोर्ट ने रद्द करके सही किया है। अदालत से बाहर इस मसले का निपटारे असम्भव हो चला है। जब फैसला आने में महज एक सप्ताह ही रह गया है तो इस पर यह कहना कि अदालत से बाहर हल निकालने का समय दिया जाना चाहिए, बैमानी ही नहीं बल्कि मसले को लटकाए का रखने का प्रयास भी था। सवाल यह है कि फैसले की तारीख की घोषणा होते ही फैसला रुकवाने की कवायद क्यों की गयी ?...अखबार ही बिगाड़ रहा है शहर की फिजा
'हिन्दुस्तान' के मेरठ संस्करण ने 4 सितंबर को एक खबर बड़ी प्रमुखता से प्रकाशित किया है. 'बिगड़ते-बिगड़ते बची शहर की फिजा, तनाव' शीर्षक से छपी इस खबर में एक छोटी सी झड़प को सांप्रदायिक रंग दे दिया गया है. हालांकि इस खबर को अन्य अखबारों ने इस तरह नहीं छापा है लेकिन मेरठ के अखबारों में महीने में इस तरह की तीन-चार खबरें जरुर छपती हैं।...Author info
