संजय स्वदेश
किसानों के माथे पर मौत का पसीना
राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में किसान हितों की चर्चा हो तो विदर्भ के किसानों को नाम सहज ही मन में आ जाता है। इसका कारण भी है। गत एक दशक में विदर्भ के विभिन्न जिलों में किसानों की लगातार होने वाली आत्महत्या की घटनाओं से देश-दुनिया का ध्यान विदर्भ की ओर खींचा है, हालांकि गत दो-तीन सालों में आत्महत्या की घटनाओं में थोड़ी कमी जरूर आई है, पर रूकी नहीं है। सोचने वाली बात पहले भी थी और आज भी है। विदर्भ के लहलहाते खेतों को देख कर भी किसानों के खिलने वाले चेहरे पर आज मौत का पसीना नजर आता है।
Author info
