संजय तिवारी
रामलला की है रामजन्मभूमि
ऐतिहासिक फैसला आ गया. शांति की अलोकप्रिय और अप्रासंगिक अपीलों और फैसला रुकवाने की इक्का दुक्का कोशिशों के बीच आखिरकार आज उस ऐतिहासिक विवाद में अदालत की मध्यम पायदान ने अपना फैसला सुना दिया जिसे सुनने के लिए साढ़े तीन बजे लगभग सारा देश ठहर गया था. नौ हजार पृष्ठों में पसरे फैसले की एक एक लाइन -"जहां रामलला विराजमान, वही जन्मस्थान."
माया के आगे बेबस मायानगरी
राजनीति में जाइये तो भी वहीं चिता दिखेगी. नौकरशाही में देखिए वे भी परेशान हैं उसी समस्या से. संत महंत समाज में भी वही एक चिंता है. सामाजिक कार्यकर्ता भी उसी समस्या का रोना रो रहा है. ये तो वास्तविक जीवन को रोजमर्रा की जिंदगी में जीनेवाले लोग हैं. अगर वे रोएं तो तो रोएं पर वे भला क्यों रोएं जो उस समस्या से कल्पना के तौर पर ही सही समाधान खोजकर लाते हैं? फिल्मी समाज के सामने भला वही समस्या कैसे हो सकती है जो समाज के बाकी सक्रिय हिस्से में समाहित है?...एक बहुराष्ट्रीय कंपनी का काला कारोबार
SAP. सैप या फिर एसएपी भारत के लिए भी कोई अनजाना नाम नहीं है. दुनिया की सबसे बड़ी जर्मनी की यह साफ्टवेयर कंपनी अब भारत में भी बिजनेस सोल्यूशन साफ्टवेयर प्रोवाइड करने का काम करती है और कंपनी ने बंगलौर में अपना हेडक्वार्टर और रिसर्च एण्ड डेवलपेन्ट आफिस है. इस कंपनी का ऊपरी चेहरा कुछ भी दिखता हो लेकिन इसके कारोबार का तरीका बहुत ही घिनौना और गंदा है. सरकारी संरक्षण में यह कंपनी न केवल सरकारी संस्थानों को ही चूना लगा रही है बल्कि अपना कारोबार सफल बनाने के लिए "दुबई कनेक्शन" का भी इस्तेमाल करती है. ...बाढ़ का खतरा, झूठ का प्रकोप
जिस भेड़िये के आने का डर दिखाकर पिछले महीने भर से हमारा मीडिया अपनी भेड़ों को हांक रहा था, उस भेड़िये की आहट आ गयी है. हरियाणा के हथिनीकुण्ड से आठ लाख क्यूसेक पानी "छोड़" दिया गया है. दिल्ली में बाढ़ वाले हालात हैं. नहीं नहीं, मीडिया हाइप नहीं है. सच में, बाढ़ के हालात हैं. यमुना के किनारे किनारे लो लाइंग (निचले) इलाकों में पानी पसर रहा है. लेकिन रुकिए. अभी भी बाढ़ की रिपोर्टिंग में सब कुछ सच नहीं है. ...तिरुपति की संपत्ति पर तिरछी नजर
तिरुपति में विष्णु अवतार भगवान बालाजी का देवस्थानम एक बार फिर चर्चा है. खबर आयी है कि तिरुपति मंदिर का प्रबंधन करनेवाली संस्था तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट ने अपने पास मौजूद आभूषणों का बीमा कराने का फैसला किया है लेकिन मंदिर प्रशासन के पास जितना आभूषण मौजूद है उसका बीमा करने की हैसियत ही किसी एक भारतीय बीमा कंपनी में नहीं है. आभूषणों की कीमत का जो आंकलन किया है उसका मूल्य लगभग 52 हजार करोड़ रूपये है. अब इतनी बड़ी रकम की गारंटी भगवान बालाजी भले ही रखें किसी एक भारतीय बीमा कंपनी के वश में हो भी नहीं सकता. ...एक अनोखे किसान आंदोलन का अंत
मुख्यमंत्री मायावती ने अपने कैबिनेट में एक निर्णय लिया. निर्णय यह कि प्रदेश में यमुना एक्सप्रेसवे के खिलाफ जो किसान आंदोलन कर रहे हैं उनको दो तरह के प्रस्ताव दिये जाएं. अगर वे इन दोनों तरह के प्रस्ताव को नहीं मानते हैं तो अपनी जमीन अपने पास रख सकते हैं. मायावती मंत्रिमण्डल के इस निर्णय का के बाद जेपी समूह ने टप्पल में प्रस्तावित अपनी नगर परियोजना को समाप्त करने की घोषणा कर दी. अब जो किसान नेता मुआवजा बढ़ाने का आंदोलन चला रहे थे वही समाजसेवी बनकर टप्पल में प्रस्तावित शहर न जाने देने के लिए मुख्यमंत्री को ज्ञापन लिख रहे हैं....विरोधियों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेंगे-कुठियाला
पत्रकारिता की पढ़ाई के लिए भोपाल में स्थापित माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय अक्सर विवादों में रहा है. छह महीने पहले जब प्रशासन ने नये कुलपित प्रो. बी के कुठियाला की नियुक्ति की तो एक बार फिर विश्वविद्यालय में तूफान खड़ा हो गया. प्रो. कुठियाला की नियुक्ति से लेकर अब तक विश्वविद्यालय पत्रकारिता की पढ़ाई का नहीं बल्कि राजनीति का अखाड़ा बन गया है. कुलपति पर आरोप है कि वे एक खास विचारधारा (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ) से संपर्क रखते हैं इसलिए उनकी नियुक्तियों और कार्यपद्धति में उस विचारधारा का प्रभाव है जिसे वे बर्दाश्त नहीं करेंगे. जबकि कुलपति का कहना है कि कुछ लोग जानबूझकर विश्वविद्यालय का माहौल खराब कर रहे हैं ताकि विश्वविद्यालय में जो बदलाव होने चाहिए उसे वे प्रभावित कर सकें. भोपाल में उनके घर पर हुई बातचीत में हमने उन पर लगे आरोपों और विश्वविद्यालय को लेकर लंबी बातचीत की. ...आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
क्या आतंकवाद बौद्धिक स्तर पर इतना विकसित हो चुका है कि उसका राजनीतिक धरातल तैयार हो सके? इस जटिल प्रश्न का उत्तर सरल नहीं है. जो लोग अल-कायदा को आतंकी संगठन बताकर उसके खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं वे भी शायद इसे इस्लामिक चरमपंथ कहना ज्यादा मुनासिब समझेंगे बनिस्बत कि आतंकवाद के दर्शन में निहित राजनीति को मान्यता प्रदान करें. लेकिन मुस्लिम देशों में आतंकी गतिविधियों के द्वारा दुनियाभर में थरथराहट पैदा करनेवाले इस्लामिक विद्वान इसे उस राजनीति की प्रतिक्रिया मानते हैं जिसके वैचारिक आक्रमण के कारण इस्लाम को खतरा पैदा हो गया है. शायद इसीलिए "जिहाद" जरूरी हो गया था. ...Author info
