सतीश सिंह
सड़ते अनाज की आग में जलती जनता
लगता है कि विवाद और शरद पवार के बीच चोली-दामन का रिश्ता कायम हो गया है। ताजा विवाद 12 अगस्त को सर्वोच्च न्यायलय के द्वारा भारतीय खाद्य निगम के गोदामों के अंदर और बाहर सड़ते हुए अनाजों को गरीबों के बीच मुफ्त उपलब्ध करवाने के आदेश के बाबत है। दिलचस्प बात यह है कि शरद पवार सर्वोच्च न्यायलय के इस आदेश को समझ ही नहीं सके जिसके कारण पुनः 31 अगस्त को सर्वोच्च न्यायलय ने सड़ते अनाज के मामले की सुनवाई करते हुए कहा है कि 12 अगस्त का उनका निर्णय आदेश था, न कि सुझाव। जब एक कैबिनट मंत्री को अदालत की भाषा समझ में नहीं आ रही है तो आम आदमी का क्या होगा?
बेजा नहीं है ब्लैकबेरी पर बवाल
ब्लैकबेरी ईमेल मैसेजिंग के सवाल पर एक बार फिर सरकार और कंपनी आमने सामने हैं. कंपनी ने सीमित मात्रा में सरकार को सूचना उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया है लेकिन अब सरकार ने कहा है कि वह कारपोरेट इमेलिंग पर भी सरकार को नजर रखने की सुविधा मुहैया कराए. पूरे विवाद में क्या सरकार सही है या फिर ब्लैकबेरी? सतीश सिंह मानते हैं कि रिम कंपनी को सरकार की बात मान लेनी चाहिए क्योंकि यूरोप और अमेरिका में वह ऐसा कर रही है. ...सच्चाई से मुंह छिपाने का शर्मनाक खेल
भारत जैसे तथाकथित विकासशील देश में जहाँ आंकड़ों की बाजीगरी के द्वारा विकास किया जाता है वहां राष्ट्रमंडल खेल के आयोजन की बात सोचना ही एक क्रूर मजाक करने के समान है, क्योंकि आज भी भारत के 60 फीसदी लोग प्रतिदिन दो वक्त की रोटी का इंतजाम करने के लिए संघर्ष करने पर भी आधे पेट पानी पीकर सोकर मजबूर हैं। शुतुरमुर्ग की तरह रेत के ढेर में मुँह छिपाने से क्या सच को हम बदल सकते हैं? भारत के क्या हालत हैं, क्या यह दुनिया से छुपा है?...सारण के अंधेरे में उजाले की दस्तक
‘कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता है, जरा तबियत से पत्थर तो उछालो यारों’। इस कथन को सच कर दिखाया है बिहार के सारण जिला में चल रहे सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड (कंपनी) के चार प्रमोटरों ने। योगेन्द्र प्रसाद, जर्नादन प्रसाद, रमेश कुमार और विवेक गुप्ता ने सन् 2006 में मिलकर सारण रिन्यूबल एनर्जी प्राईवेट लिमिटेड का गठन किया था, जिनकी एक ही मंशा थी अंधेरे में डूबे हुए सारण जिले के गांवों तक बिजली पहुँचाना।...बेमतलब हो गया है विश्व जनसंख्या दिवस
हमारे देश में हर खास दिन को दिवस के रुप में मनाया जाता है। जनसंख्या दिवस उन्हीं दिवसों में से एक है जो 1987 से हर साल 11 जुलाई को मनाया जा रहा है। दरअसल 11 जुलाई 1987 में ही विश्व की जनसंख्या 5 अरब हुई थी, पर हकीकत में इस दिवस में ऐसा कुछ नहीं है कि इसे मनाया जाए। क्योंकि न तो हम 11 जुलाई को जनसंख्या कम करने के लिए कोई प्रण लेते हैं और न ही इस बाबत किसी तरह का सकारात्मक कदम उठाते हैं।...टीआरपी के खेल का सच
हाल में ही सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की पहल पर एक कमेटी का गठन किया गया है जो कि तीन महीने के अंदर टीआरपी के नाम पर की जा रही धांधली पर एक रिपोर्ट सौंपेगा. सरकार का इरादा है कि टीआरपी के नाम पर जिस तरह से खबरों के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है उस पर रोक लगाई जा सके. क्या है टीआरपी और विवाद के विषय क्या हैं, इसके बारे में बता रहे हैं सतीश सिंह...सलवा जुड़ुम पर नई सोच की जरूरत
पश्चिम बंगाल में माओवादियों से लड़ने के लिए सीपीएम समर्थित सलवा जुड़ुम का एक नया आंदोलन खड़ा हो गया है जो नक्सलियों और माओवादियों से सशस्त्र संघर्ष कर रहे हैं. इस खबर ने एक बार फिर सलवा जुड़ुम की प्रासंगिकता और उसके स्वरूप पर बहस छेड़ दी है. क्या आदिवासियों के खिलाफ प्रशासन और संगठित तंत्र के इस आदिवासी आंदोलन को की उपयोगिता क्या होगी?...यमदूतों को मिला भारत में फरिश्तों का दर्जा
कहने के लिए तो भारत एक लोकतांत्रिक देश है, लेकिन यहाँ जिस तरह से नई दवाओं का परीक्षण जानवरों की जगह गरीब इंसानों पर किया जा रहा है, वह निश्चित रुप से लोकतंत्र के सिद्धांतों के खिलाफ है, पर इससे सरोकार न तो मानवाधिकार संगठनों को है और न ही सरकार को। ...जनगणना सुलझा सकती है कई अनसुलझे सवाल
सतीश सिंह का मानना है कि हम इस बार बिना कोई गलती किये हुए सन् 1931 में हुई जनगणना तर्ज पर 2011 की जनगणना करवायें तो इससे बहुत तरह की समस्याओं का हल स्वतः-स्फूर्त तरीके हो जाएगा और नेताओं के तरकश के बहुत सारे तीर अपने-आप बेअसर हो जायेंगे।...नशे की खेती से पलता नक्सलवाद
अफगानिस्तान में अगर नशे का कारोबार और खेती तालिबानी आतंकवादियों लिए आर्थिक संजीवनी बनी हुई है तो भारत में अफीम की खेती नक्सलवाद के लिए आर्थिक आधार का प्रमुख स्रोत हो गया है. उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अफीम की खेती के कारोबार के जरिए नक्सली अपने लिए धन जुटा रहे हैं. ...Author info
