शिरीष खरे
ठाकरे नहीं ठेकेदारों की मुंबई
मुंबई मेहनतकश मजदूरों की बदौलत चलती है. जिस रोज उन्होंने अपना हाथ रोका यह शहर भी रूक जाएगा. इतनी अहम हिस्सेदारी होने के बावजूद उनकी जिंदगी मलिन बस्तियों में गुजरती है.क्योंकि देश की पूरी तरक्की खास शहरों को केन्द्र में रखकर हुई इसलिए कई दलित, आदिवासी, मछुआरा, कामगार और कारीगर अपने माहल्लों से उजड़कर यहां आए. लेकिन अमीर खानदान उन्हें `अतिक्रमणदार´ कहते हैं.
गांव-गांव टूटकर, ठांव-ठांव बन गए
मेलघाट इस साल ज्यों ही टाइगर रिजर्व बना कोरकू जनजाति का जीवन दो टुकड़ों में बट गया. एक विस्थापन और दूसरा पुनर्वास. ऊंट के आकार में उठ आये विस्थापन के सामने पुनर्वास जीरे से भी कम था. पुराने घाव भरने की बजाय एक के बाद एक प्रहारों ने जैसे पूरी जमात को ही काट डाला. अब इसी कड़ी में 27 गांव के 16 हजार लोगों को निकालने का फरमान जारी हुआ है. अफसर कहते हैं बेफिक्र रहिए, कागज में जैसा पुनर्वास लिखा है ठीक वैसा मिलेगा. जबाव में लोग पुनर्वास के कागजी किस्से सुनाते हैं. और आने वाले कल की फिक्र में डूब जाते हैं....पाठशाला से समाजशाला तक
शाम ढल गई लेकिन पारदी गानों की धुन पर बच्चों का थिरकना जारी रहा. चलते वक्त क्लास पहली के कुछ बच्चो ने घेर लिया. उनमें से दीपक शिंदे ने कहा- ''हमारी एक कविता तो सुनते जाओ.” हमने कहा - ''कौन-सी ?'' वह बोला-''सूरज को तोड़ने जाना है''. हमने कहा-''अगली बार, तोड़ कर सुनाना.'' ...Author info
