Umesh Chaturvedi
इस सरदार की समझ पर तरस आता है
जैसे-जैसे गरीबी कम होती है, महंगाई बढ़ती जाती है। अर्थशास्त्र की कोई स्थापना भले ही इसे मानने से इनकार करे, लेकिन मशहूर अर्थशास्त्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ऐसा ही मानते हैं। विकसित देशों के योजनाकार जिस तरह 2008 में आई भयानक मंदी के लिए तेज आर्थिक विकास को ही जिम्मेदार मानते थे, मोंटेक सिंह का बयान भी कुछ ऐसा ही है। चूंकि अहलूवालिया अर्थशास्त्री हैं, प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं, देश के वित्त सचिव रह चुके हैं, सबसे बड़ी बात यह कि वे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भी नौकरी कर चुके हैं। जाहिर है उनके विचार को तरजीह दिया ही जाएगा, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका यह विचार स्वीकार के काबिल है?
किसानों की कीमत पर बचाये गये कारपोरेट
सत्यम घोटाले के मुख्य आरोपी रामलिंगराजू को आखिरकार जमानत मिल गयी है. लेकिन रामलिंगराजू की कंपनी को बचाने के लिए किसानों को कर्ज देने के लिए बनी संस्था ने 100 करोड़ रुपये बिना किसी नियम कानून का पालन किये दे दिये. सरकार के अरबों रूपए बिना किसी कागजी कार्रवाई के रिलीज कर दिए गये, उस पर सवाल कोई और नहीं, उसी संस्था के अपने ऑडिटर उठाए। मामला केंद्रीय सतर्कता आयुक्त को भेजा गया। सतर्कता आयोग अपनी जांच में चेयरमैन को दोषी पाया, लेकिन वह चेयरमैन आज भी अपनी कुर्सी पर काबिज है। जांच रफा-दफा हो गई और सबकुछ सामान्य चल रहा है।...कश्मीर में न सही, दिल्ली में कश्मीर आजाद है
सात अगस्त की देर शाम…राजधानी के जंतर-मंतर स्थित पटेल भवन की चारदीवारी से सटे लोग हाथों में अपनी मांगों की तख्तियां लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं। जाकिर हुसैन कॉलेज दिल्ली के प्रोफेसर एसआर गिलानी की अगुआई में कश्मीर घाटी में सुरक्षा बलों के अत्याचार और निर्दोष(प्रदर्शनकारियों की नजर में) लोगों के खून बहाने के खिलाफ प्रदर्शन चल रहा है। ये वही गिलानी हैं, जिन्हें संसद पर हमला मामले में सुप्रीम कोर्ट बरी कर चुका है। हालांकि बरी करते वक्त उसने कहा भी था कि इस मामले में गिलानी की भूमिका पर 'गंभीर संदेह' है, लेकिन पुख्ता सुबूत न होने की वजह से उन्हें बरी किया जा रहा है।...प्रेमचंद के बहाने साहित्यकारों से दो बातें
महान कथाकार प्रेमचंद की कल जयंती बीत गई। मेरे जेहन में उनका जयशंकर प्रसाद के साथ खिंचवाई एक तसवीर ताजा हो गई है। इस तसवीर में कामायनी के रचयिता महाकवि प्रसाद धीर-गंभीर मुद्रा में खड़े हैं। लेकिन उनके साथ खड़े उपन्यास सम्राट की भंगिमा बिलकुल अलग है। उपन्यास सम्राट के फटे जूते से पैरों की अनामिका उंगली किंचित झांकती सी नजर आ रही है। प्रसाद जी की गंभीरता से ठीक उलट प्रेमचंद के स्मित होठ इससे बेपरवाह नजर आ रहे हैं।...नीतीश कुमार की अतिवादी राजनीति
2009 के आम चुनावों के आखिरी दौर के मतदान के ठीक बाद कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने जब नीतीश कुमार की प्रशंसा की थी, भारतीय जनता पार्टी से उनके अलगाव का अंदेशा उसी दिन लगाया जाने लगा था। यह बात और है कि जिस फोटो वाले विज्ञापन के नाम पर नीतीश कुमार नाराज होने का स्वांग कर रहे हैं, नरेंद्र मोदी के साथ हंसता हुआ वह फोटो उन्होंने पिछले आम चुनाव में एनडीए की लुधियाना रैली में खिंचवाए थे। ...भरी जवानी में बूढ़ी हो गयी भाजपा
कालक्रम में किसी व्यक्ति के जीवन में तीस साल कैरियर शुरू करने की उम्र होती है. यानी नये सिरे से जिन्दगी में आगे बढ़ने की उम्र. लेकिन अगर यही उम्र का असर किसी राजनीतिक दल पर लागू करें तो क्या कहेंगे? भारतीय जनता पार्टी ने 6 अप्रेल को तीस साल पूरा कर लिया. उसके तीस साल पूरा होने के मौके पर अगर हम इस राजनीतिक दल की यात्रा का आंकलन करें तो पायेंगे कि भाजपा तीस साल की उम्र में ही बूढ़ी हो चली है. ...नानाजी को मीडिया की ना ना जी
27 फरवरी को जनसंघ के वरिष्ठ नेता रहे नानाजी देशमुख का निधन हुआ। नानाजी भले ही दक्षिणपंथी धारा के महत्वपूर्ण स्तंभ रहे हैं, लेकिन उनका संबंध समाजवादी राजनीति के अलंबरदारों से भी गहरा रहा है। फिर भी उनके निधन को टेलीविजन की तो बात ही छोड़िए, अखबारों तक ने वह कवरेज नहीं दी, जिसके वे हकदार थे।...क्यों हार गये बिहार के सुशासन बाबू
बिहार के चुनाव नतीजों ने साफ कर दिया है कि लोकतंत्र में सिर्फ नौकरशाही पर भरोसा करना कितना खतरनाक साबित हो सकता है। जनता ने अपने वोट के जरिए ये भी सवाल पूछा है कि लालू का साथ रहे नेता नीतीश के साथ आते ही पाकसाफ कैसे हो गए। दरअसल ये नतीजे नीतीश के लिए चेतावनी हैं कि अगर सबकुछ ऐसा ही चलता रहा तो वह अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनावों में नीतीश को भी बाहर का रास्ता दिखाने से नहीं चूकेगी। लेकिन क्या इस बात को समझ रहे हैं या फिर बहानेबाजी करके झुठलाना चाहते हैं?...अटल की परियोजनाओं पर कांग्रेस का कुठाराघात
उलटबांसियों से भरे आर्थिक मानकों के बीच महंगाई दर में कमी के बावजूद आम आदमी जिस तरह कदम-कदम पर महंगाई की त्रासदी से दो-चार हो रहा है। उससे एक बार फिर वाजपेयी सरकार की याद आने लगी है। कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ होने का दावा तो कर रहा है, लेकिन महंगाई है कि ठहरने का नाम ही नहीं ले रही है। ऐसे में अगर लोग वाजपेयी सरकार के दौरान खाद्यान्नों और दूसरी रोजमर्रा की चीजों की ठहरी दरों को याद करें तो कोई हैरत भी नहीं होनी चाहिए।...मानसून की मार से याद आयी परंपरागत खेती
मानसून में देरी से हिली सरकार ने तमाम तरह के राहत इंतजामात का ऐलान किया है। लेकिन हकीकत ये है कि ये इंतजाम ना सिर्फ फौरी हैं, बल्कि लोकलुभावन ज्यादा हैं। किसी का ध्यान अपनी पारंपरिक और सतत विकास वाली खेती की ओर नहीं है। ...Author info
