Vasudha Mehta
हर तरफ इंसान है, तबाही है
इंसान जानवरों के साथ क्या क्या ज्यादतियां नहीं करता..मिसाल के तौर पर शरीर पर लगाये जाने वाले प्रसाधनों के लिए उनको पीड़ित करना या फिर बूचड़खाने में एक जानवर को दूसरे जानवर की आँखों के सामने बेदर्दी से मार देना, उसका चमड़ा निकालना, मुर्गों, सांप-नेवले की जानबूझकर ज़बरदस्ती लडाइयाँ करवाना- ऐसे खेलों पर शर्तें लगा पैसे ऐंठना, बन्दर-सांप-भालू के करतब दिखाना, तेल के लिए जीवित सांडे/छिपकली को उबलते पाने में जीवित डाल देना. इंसान अपने स्वार्थ, मनोरंजन या ज़रुरत के लिए पशुओं का ऐसी ही बेदर्दी और बेशर्मी से उत्पीडन आखिर कब तक करता रहेगा? वसुधा मेहता की अपील-
कुत्तों के लिए भी संकट बना माओवाद
केंद्र सरकार के माओवादियों के खिलाफ छेड़े गए 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' के चलते, लगभग तीन हफ्ते पहले, पश्चिम बंगाल में पश्चिमी मिदनापुर, लालगढ़, बांकुरा, पुरुलिया और बर्दवान के अनेकों गाँवों में माओवादियों द्वारा एक अनोखा 'फतवा' जारी किया गया. इन गाँव में रहने वाले लोगों और आदिवासियों को कहा गया कि 'वह अपने इलाके के सारे पालतू और सड़क के कुत्तों को मार डालें नहीं तो उन्हें मार दिया जाएगा'....इंसान नहीं, चमगादड़ है
हाल ही में एक टी वी चैनल पर दिखाई गई एक खबर में दिखाए गए दृश्य उत्तर केरल के कासरगोड नामक ज़िले के 'अदुर्पंदिवयल' गाँव के हैं. केरल के इस गाँव में रहने वाले लोग हर साल दो बार एक आदिवासी देवता को प्रसन्न करने के लिए अपने आसपास के जंगलों के सारे चमगादड़ों को बेरहमी से पीट पीट कर मार डालते हैं, फिर इन्हें खा जाते हैं. इन लोगों का मानना है कि ऐसा करने से वह अपनी बुरी किस्मत का पासा पलट देंगे और उनके जीवन में खुशहाली आ जाएगी....बीटी बैंगन की कहानी
बीटी बैंगन को लेकर मच रहा है इतना शोर, पर अभी भी ज़्यादातर लोग समझ नहीं पा रहे की आखिर बैंगन को लेकर यह हो-हल्ला मचा और आखिरकार सरकार ने तात्कालिक तौर पर देश में बीटी बैंगन के उत्पादन को मंजूरी देने से मना कर दिया है. बीटी बैंगन क्या है? इसका विरोध क्यों हो रहा है? इन सभी विषयों पर विस्तार से प्रकाश डाल रही हैं वसुधा मेहता....आवारा कुत्तों को खाना खिलाने के लिए पड़ोसी से डरने की जरूरत नहीं
अब कुत्तों को खाना खिलाने वालों को अपने पड़ोसियों से डरने कि ज़रुरत नहीं है. दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश वी.के जैन ने 18 दिसंबर को एक ऐतिहासिक फैसले में कहा है कि, "जानवर प्रेमी इन कुत्तों को खाना खिला सकते हैं और इनसे बदसलूकी करने वालों के खिलाफ पुलिस को भी इन जानवर प्रेमी-लोगों और गैर सरकारी संघटनों का सहयोग करना अनिवार्य है."...गुमनाम दिलवालों की अनोखी दिल्ली
आजकल दिल्ली में एक एफ़.एम रेडियो चैनल पर दिल्ली के लोगों को अपने गरम कपडे का दान करके दरियादिली दिखाने के लिये प्रोत्साहित किया जा रहा है. इन गरम कपड़ों के बदले में आप उस रेडियो स्टेशन पर अपने नाम से एक गाना खरीद पाएंगे और ऍफ़.एम चैनल का रेडियो जौकी गाने से पहले उनका नाम दुनिया को बताइएगा और उनके द्वारा दान किये गए गरम कपडे दिल्ली की सर्दियों में सड़क पर रहने वाले लोगों की सर्दियों को 'चिल्लाक्स' करने में काम आयेंगे. इस कार्यक्रम को रोज़ सुनने वालों में से एक मैं भी हूँ, सोच कर हैरान होती हूँ कि क्या "दरियादिली" दिखाने के लिए दिल्लीवालों को 'रेडियो पर उनका नाम आने' का प्रलोभन देना ज़रूरी है?...सभ्य समाज में कुत्तों का कत्लेआम
हर दिन हमारे अखबारों-टी वी चैनलों में कई दिल दहलाने वाली खबरें देखने-पढने को मिलती हैं तो लगता है कि क्या हमारा यह समाज अपनी मानवीयता खोता जा रहा है? पर पिछले शनिवार/रविवार (२३/२४ अक्टूबर, २००९) के दौरान दिल्ली के चार बड़े अखबारों में छपी एक खबर ने विचलित कर दिया. इन ख़बरों के अनुसार दक्षिणी दिल्ली की पूर्वी निज़ामुद्दीन कालोनी में कई गली के कुत्तों और कई पक्षियों को मरा हुआ पाया गया. इन जानवरों के मृत शरीर पूरी कालोनी में इधर उधर बिखरे पाए गए. आखिर ऐसा क्या हुआ था जो कि इतने सारे जानवर बेमौत इकट्ठे मरे हुए पाए गए?...कलाजगत की 'मांग' का शिकार हो रहा है नेवला
पिछले साल एक काम के सिलसिले में मुझे दिल्ली के निज़ामुद्दीन क्षेत्र के निकट एक बहुत पुरानी मुग़ल कालीन इमारत में जाने का मौका मिला। वहां जाकर मैंने जाना की आगा खान फाउंडेशन नामक एक गैर सरकारी संगठन, ए.एस.आई. (अर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया) के साथ इस इमारत की मरहमपट्टी का काम करने की योजना बना रहा था। इन लोगों को इस बात की शिकायत थी कि इमारत की नींव में रहनेवाले नेवले इस इमारत को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं. इस टीम का यह मानना था की नेवलों के बिलों की मौजूदगी की वजह से इस इमारत की नींव कमज़ोर हो गयी है...गली के आवारा कुत्ते
नौकरशाह जब रिटायर होता है तो अपने अनुभव को आधार बनाकर मुख्य रूप से तीन बातों पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है. पहला, किसी गैर सरकारी एजंसी में अपनी नियुक्ति को सबसे अधिक प्राथमिकता देता है. दूसरा, अखबारों में लेख लिखता है और उन सिद्धांतों की व्याख्या करना शुरू करते हैं जिनके बारे में वे खुद ठीक से कुछ नहीं जानते और तीसरा, जहां वे रहते हैं उस कालोनी या घेरेबन्द इलाके का मुखिया होने की कोशिश करते हैं. इन घेरेबंद कालोनियों की रेसिडेन्ट वेलफेयर एसोसिएशनों के मुखिया बनते ही उनका पहला और पसंदीदा कार्य होता है कालोनियों में विचरण करनेवाले गली के कुत्तों के खिलाफ अभियान. ...Author info
