डॉ वैदिक
मेरी जात हिन्दुस्तानी
जाति की जनगणना के लिए तर्क यह दिया जाता है कि अगर हम दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों को आरक्षण देते रहना चाहते हैं तो जन-गणना में जाति का हिसाब तो रखना ही होगा। उसके बिना सही आरक्षण की व्यवस्था कैसे बनेगी ? हॉं, यह हो सकता है कि जिन्हें आरक्षण नहीं देना है, उन सवर्णों से उनकी जात न पूछी जाए। लेकिन इस देश में मेरे जैसे भी कई लोग हैं, जो कहते हैं कि मेरी जात सिर्फ हिंदुस्तानी है और जो जन्म के आधार पर दिए जानेवाले हर आरक्षण के घोर विरोधी हैं।
ठगी और गुलामी का खेल है क्रिकेट
जैसे अंग्रेजी भारत की आम जनता को ठगने का सबसे बडा माध्यम है, वैसे ही क्रिकेट खेलों में ठगी का बादशाह बन गया है। दर्शकों को जितना यह खेल ठगता है, उतना दूसरा नहीं। पैसे खर्च करो, समय बर्बाद करो, पर जेबें दूसरों की भरती हैं। क्रिकेट के चस्के ने भारत के पारंपरिक खेलों, अखाडों और कसरतों को हाशिए पर सरका दिया है। क्रिकेट पैसा, प्रतिष्ठा और प्रचार का पर्याय बन गया है।...भारत पाक संबंधों के अधर में ओबामा
अमेरिकी राष्ट्रपति को नट चाल चलनी पड़ती है। तनी हुई रस्सी पर वे कभी इधर झुकते हैं तो कभी उधर। गंगा गये तो गंगा दास और जमुना गये तो जमुनादास। उन्हें भारत और पाकिस्तान दोनों को पटाकर रखना है। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों से वाशिंगटन में वे मिले और दोनों को चूसनियां थमा दीं। दोनों खुश हैं। दोनों के चाटुकार अपनी अपनी जनता को वरगलाने में जुट गये हैं। असलियत तो यह है कि आतंकवाद का बाल भी बांका नहीं हुआ और अफगान संकट से बाहर निकलने की कोई शक्ल भी नहीं उभरी। ...परमाणु कीचड़ में सने हाथ
सरकार ने परमाणु हर्जाना विधेयक लोकसभा में पेश नहीं किया, यह अच्छा किया। पेश न करने का कारण यह भी हो सकता है कि 35 कांग्रेस सांसद अनुपस्थित थे और सारे विरोधी दल एकजुट थे। वह पेश होता तो शायद गिर जाता। कारण जो भी हो, इस विधेयक का अटक जाना भारत के हित में है। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री अगले माह जब अमेरिका जाएंगे तो यह विधेयक उनके हाथ में नहीं होगा, लेकिन क्या कीचड़ में सने हाथों के साथ जाने से यह कहीं अच्छा नहीं कि वे खाली हाथ ही जाएं?...भारत बांग्लादेश संबंधों में स्वर्ण युग की शुरुआत
डॉ वेदप्रताप वैदिक का मानना है कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की यह भारत-यात्रा एतिहासिक सिद्ध होगी, इसमें ज़रा भी शक नहीं है। वैदिक कहते हैं कि बांग्लादेश की प्रधानमंत्री हसीना की यात्रा भारत-बांग्ला स्वर्ण-युग का प्रारंभ है।...दो दलों का दलदल
भारत में राजनीतिक पार्टियां तो दो ही हैं- एक कांग्रेस और दूसरी भाजपा। कांग्रेस अपने सवा सौ साल मना रही है। भाजपा चाहे तो लगभग उससे आधे साल अपने मना सकती है। ये दोनों पार्टियां जितनी लंबी चलीं, देश में कोई अन्य पार्टी नहीं चली। यदि भाजपा और जनसंघ को हम दो अलग पार्टियां मानने लगेंगे तो कांग्रेस को तो हमें कम से कम छह अलग-अलग पार्टियां मानना पड़ेगा।...एक देश, दोहरी व्यवस्था
भारत में गरीब होने का अर्थ जैसा है, वैसा शायद दुनिया में कहीं नही है| भारत में जिसकी आय 20 रू. से कम है, सिर्फ वही गरीब है। बाकी सब ? यदि सरकार और हमारे अर्थशास्त्रियों की मानें तो बाकी सब अमीर हैं| 25 रू. रोज़ से 25 लाख रू. रोज तक कमानेवाले सभी एक श्रेणी में हैं। इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है?...तकलीफदेह क्यों हो तेलंगाना का तीर?
नए राज्यों के निर्माण से घबराने की जरूरत नहीं है। ज़रा याद करें कि 1956 में भाषा के आधार पर जब नए राज्य बने तो उनके विरूद्घ क्या-क्या तर्क दिए गए थे। जो नए राज्य बने, क्या उनमें एक भी विसर्जित हुआ? क्या एक भी राज्य ऐसा निकला, जो अपने पांवों पर खड़ा न हो सका? क्या एक भी सीमांत राज्य किसी विदेशी शक्ति का मोहरा बना? क्या किसी भी राज्य ने भारत से अलग होने में सफलता पाई? ...Author info
