विकास के गर्भ में छिपी भूख
विकास की इच्छा मनुष्य में संभवत: तभी से है जब से उसे प्रकृति ने सचेत किया है। यह इच्छा बाद में `विकास की भूख´ के तौर पर तब्दील होती गई। आज मानव ने आर्थिक, भौतिक और सामाजिक हर स्तर पर विकास के नए आयाम हासिल किए हैं। तकनीकी क्रांति ने मनुष्य की दुनिया ही बदल दी है। इसके बावजूद विकास की ये भूख खत्म नहीं हुई है। शायद यही वजह है कि आज दुनियाभर में `विकास की भूख´ चर्चा में है।
यह अपनी व्यापकता और तीव्र परिवर्तनीयता के कारण विकास बनाम भूख की बहस में तब्दील हो गया है। बदलती दुनिया के बदलते प्रतिमानों के बीच विचारकों, राजनीतिज्ञों और विकास योजना के रणनीतिकारों के लिए सुलगता सवाल यह भी है, `विकास की कीमत पर भूख´ या `भूख की कीमत पर विकास´ में प्राथमिकता किसे दें?
इसी विकास की भूख ने मानव को संवाद एवं संपर्क स्थापित करने की प्रेरणा दी। जहां वर्षों लगते थे वहीं कुछ पल में संवाद हो जाता है। कुछ घंटों में एक द्वीप से दूसरे द्वीप की यात्रा हो जाती है। मानव गुफा से निकलकर ऊंचे भवन में रहने लगा और आसमान में विचरण करने लगा है।
औद्योगिक क्रांति और द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत परिवार छोटे-छोटे होने लगे, स्त्री-पुरुष के बीच विश्वास के अभाव में संबंध-विच्छेद होने लगे और बच्चों बल्कि पूरे परिवार के खान-पान पर असर होने लगा। गांव से कस्बों, कस्बों से महानगर तक बढ़ता मानव समाज यह भूलता जा रहा है कि महानगर उसे चमकीली जिंदगी तो दे सकता है परंतु अन्न प्रदान नहीं कर सकता। अन्न तो खेतिहर के श्रम से खेत में ही पैदा हो सकता है। परंतु आज केरल हो या बिहार, गांव युवाहीन हो गया है। जिसके कारण अन्न उत्पादन पर असर पड़ा है। इस वर्ष पंजाब में खेतिहर मजदूरों का अभाव रहा।
इसी सोच का परिणाम है कि पूरी दुनिया में गांव तेजी से उजाड़े गये और पर्यावरण को पूरी तरह से नष्ट किया गया. भारत में ही अब तक 35 हजार गांव विकास और शहरीकरण की भेंट चढ़ चुके हैं. भारत के नक्से से ये गांव पूरी तरह से गायब हो चुके हैं. आज उन गांवों की जगह शहर की गलियां अस्तित्व में आ चुकी हैं. इन गांवों के खत्म होने का मतलब है कि खेती योग्य जमीन भी खत्म हुई. पशु और पर्यावरण खत्म हुआ और शहरीकरण ने विकास के नाम पर खेतों पर अट्टालिकाओं का एक बदनुमा धब्बा चस्पा कर दिया. पुराने लोग जो इस खेत में अनाज पैदा करते थे वे तो गायब ही हुए जो नये लोग आकर इन जमीनों पर बसे अब उन्हें अन्न कौन मुहैया करायेगा?
अमेरिकी कृषि विभाग के आर्थिक शोध के अनुसार देश (अमेरिका) में विकसित और आर्थिक रूप से संपन्न तीन करोड़ अस्सी लाख लोग भुखमरी के कगार पर हैं। एक करोड़ चालीस लाख बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। 21-22 करोड़ की आबादी वाले अमेरिका की यह हालत है। भारत और चीन की हालत तो और भी बदतर है। यही वजह है कि यूरोपीय संघ कृषि पर अपने बजट का चालीस प्रतिशत व्यय करने जा रहा है। यूरोपीय संघ अपने किसानों को परती जमीन रखने पर अनुदान देता है ताकि खेती की उर्वरा शक्ति बनी रहे। स्वतंत्रता के बाद भारत ने विकास का जो मॉडल अपनाया उससे आर्थिक विषमता, पर्यावरण की समस्या, अपराध, महिलाओं पर अत्याचार, मातृभाषा की उपेक्षा में बढ़ोतरी हुई है।
विकास की इस अंधी आंधी में केवल गांव ही गायब नहीं हुए हैं. फसलों के प्रकार और बीजों की विविधता भी गायब हुई है. जिस पंजाब में सन् 1961 से पहले 21 प्रकार की फसल होती थी वहां आज सिर्फ 9 प्रकार की ही फसल पैदा की जा रही है। प्रकृति ने अस्सी हजार प्रकार के अनाज, फल, सब्जी मानव व अन्य जीवों के लिए उपलब्ध किए हैं। तीन हजार प्रकार के फलों, सब्जियों और अनाज का हजारों वर्षों से उपयोग हो रहा है, पर यह भी सच है कि अदृश्य शक्तियों के कारण संसार की 75 प्रतिशत जनसंख्या आठ प्रकार के आहार ग्रहण करने को मजबूर हैं।
आज से पचास वर्ष पूर्व तक संसार की किसी संस्कृति में सोयाबीन का प्रचलन नहीं था। पर आज जानवरों के लिए चारा और खाद्य तेल के तौर पर सोया का जमकर इस्तेमाल हो रहा है, विशेषकर अनुवांशिक परिवर्धन के विधि निर्मित बीज वाले सोया का प्रचलन है। आज भारत में खाद्य तेल आयात करना पड़ रहा है। एक दशक पूर्व गांव-गांव में सरसों के तेल की पेराई होती थी। अदृश्य शक्ति के कारण लगभग तेल पेराई की दस लाख इकाइयां बंद हो गई और 10 लाख परिवार बेरोजगार हो गए।
एक किलो मांस के लिए सात किलो अनाज चाहिए। अब तो वाहन चलाने के लिए पेट्रोल, डीजल, गैस की जगह जैव ईंधन की आवश्यकता पड़ने लगी है। प्रकृति अपने जीवों के लिए आहार की व्यवस्था कर सकती है पर मानव निर्मित यंत्र के लिए नहीं। इसी कारण संसार में भुखमरी बढ़ रही है, लोग बीमार हो रहे हैं, लगभग एक अरब लोग भुखमरी के शिकार हैं तो दूसरी ओर लगभग दो अरब मोटापा के शिकार हैं। इस सत्य को हम झुठला नहीं सकते इसलिए हमें विकास की जगह `उपयुक्त विकास का वातावरण´ की नीति बनानी होगी। भूख मिटाने के लिए विविध प्रकार के अनाज का उपयोग करना होगा। जैव विविधता के संकट को खत्म करना होगा और सबसे बड़ी बात यह कि महानगरों के साथ-साथ गांव को भी ध्यान में रखना होगा।
देश की राजधानी दिल्ली में ऊर्जा का संकट नहीं है, पर दिल्ली के पड़ोस में ऊर्जा का संकट है। अगर उर्जा संकट का स्थाई समाधान करना है और सबको उर्जा मुहैया करानी है तो बड़े बांध की जगह छोटे बांध बनाने होंगे। प्रकृति द्वारा उत्पादित ऊर्जा व प्रकृति से छेड़छाड़ किए बिना ऊर्जा का उत्पादन करना होगा तभी हम आने वाले अंधकारमय युग से बच सकते हैं क्योंकि तेल और गैस 22वीं शताब्दी में उपलब्ध नहीं रहेगा। इसलिए हमें तेल आधारित व्यवस्था से मुक्त होना होगा। ऊर्जा अपव्यय करने वाले कायो± से दूर रहना होगा तभी हम भूख से मुक्त हो सकते हैं। हम लोग जिस अमेरिकी व्यवस्था की फोटोकापी बन रहे हैं, वह स्वयं आज असुरक्षा, अभाव, अस्वस्थता, आर्थिक अराजकता और आयात पर निर्भर है। यह व्यवस्था कचरा निर्यात करती है और मानव संसाधन तथा प्राकृतिक आहार का आयात करती है। इस व्यवस्था में रहने वाले बच्चे खिलौनों के लिए चीन और दूसरे एशियाई देशों पर निर्भर हैं। उस व्यवस्था की छायाप्रति बनने से अच्छा है कि हम अपने मूल भारतीय दर्शन को अपना जीवन दर्शन बनाये रखें जो कहता है कि `सांई इतना दीजिए, जामे कुटुंब समाय, मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाए।´
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- कांग्रेस अधिवेशन को सफल बनाने में जुटी अकाली भाजपा सरकार
- रामायण, महाभारत और हनुमान पर पाकिस्तान में प्रतिबंध
- भूख के पेट में समा गये मध्य प्रदेश के 28 आदिवासी बच्चे
- 24 सितंबर को आयेगा अयोध्या पर फैसला
- विश्व के 35 फीसदी निरक्षर भारत में
- मुण्डा बनेंगे मुख्यमंत्री, 10 सितंबर तक शपथ ग्रहण की संभावना
- जातिवाद, क्षेत्रवाद, धर्मवाद का शिकार माओवाद
- एक अनोखे किसान आंदोलन का अंत
- बिहार में राजनीतिक घमासान की घोषणा
- लद गये वामपंथ के दिन- राहुल गांधी



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