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भीख मांगकर विस्फोट करनेवाले लोग

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आलोक तोमर विस्फोट.कॉम के शुरूआत में ही हमसे जुड़ गये थे. उनका नाम बड़ा है और पत्रकारिता में अनुभव भी कम नहीं है. सोमवार को उन्होंने अपनी वेबसाईट आलोकतोमर.कॉम पर विस्फोट और मेरे बारे में वह सब लिखा है जो उनके मन में है. हम अपने पाठकों के लिए वह पूरा का पूरा लेख प्रकाशित कर रहे हैं. उन्होंने जो कुछ लिखा है उसे विस्फोट.कॉम के पाठकों के सामने जरूर प्रस्तुत कर रहा हूं. ठीक वैसे ही जैसे उनके लिखे को अब तक प्रकाशित करता आया हूं.

भोपाल से चलने वाली एक लगभग अज्ञात वेबसाइट पर छपा देखा कि आलोक तोमर खबरों की चोरी करते हैं। बताया गया था कि वे विस्फोट और तहलका जैसी वेबसाइटों से सामग्री अपनी वेबसाइट पर डालते हैं। रविवार वेबसाइट का नाम भी इसमें शामिल था। इस वेबसाइट मोहल्ला लाइव डॉट कॉम को चलाने वाले बंधु के बारे में पहले पता लगाया। इनका नाम पहले कभी नहीं सुना था। लेकिन जो पता लगा उससे तो होश उड़ गए। ये साहब अच्छा लिखते हैं, पत्रकारिता की बाकायदा पढ़ाई की है और एक बड़े अखबार में स्थानीय संपादक या समाचार संपादक बन गए थे। भोपाल में रहते हैं और वहां माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की एक छात्रा जो प्रशिक्षण लेने इनके यहां आई थी, के साथ अशालीन प्रस्ताव रखने और मजबूर करने के आरोप में इन्हें नौकरी से निकाला गया था। इनका नाम अविनाश दास है।

यह संयोग नहीं हैं कि जिस समाचार पत्र समूह से निकाला गया था उसी से जुड़े एक पत्रकार द्वारा लिखे गए एक लेख पर इनकी लगभग अज्ञात वेबसाइट पर लगातार टिप्पणियां आ रही थी। इस पत्रकार का नाम अभिलाष खांडेकर है और उन्होंने पता नही किस लेख में बिहारियों पर टिप्पणी कर दी थी और इसके बाद अविनाश दास के भक्त पत्रकार मैदान में कूद कर उन्हें गोडसे और हर तरह का खलनायक साबित करने में लगे हुए थे। अविनाश दास के इतिहास पर मैं नहीं जाऊंगा। खुद बलात्कार के आरोप का शिकार होने के पहले वे मीडिया की सबसे बड़ी वेबसाइट भड़ास के संपादक यशवंत सिंह पर यही आरोप लगा चुके है। वह आरोप सिद्व नहीं हुआ लेकिन इन साहब को प्रेरणा जरूर मिल गई कि लड़कियां छेड़ने की वस्तु होती है। इससे ज्यादा लिख कर अविनाश दास को मैं महत्व नहीं देना चाहूंगा।

संजय तिवारी इतने महान आदमी है कि पहले उन्होंने लिखा कि उनके पास वेबसाइट चलाने के लिए पैसा नहीं है इसलिए वे उसे बंद करने जा रहे है। बहुत सारे मित्रों में जिनमें मैं भी शामिल था, सहायता की पेशकश की। इसके बाद चंदा लेने के लिए उन्होंने क्रेडिट कार्ड से भुगतान का गेटवे अपनी साइट पर डाल दिया और चंदा मांगने लगे। यह गेटवे लगभग तीस हजार रुपए में आता है। जिसके पास भीख का कटोरा खरीदने के लिए इतनी रकम हो वह चंदा क्यों मांग रहा हैं?

मगर विस्फोट डॉट कॉम चलाने वाले संजय तिवारी का मैं क्या करूं? उन्हें अब भी मैं मित्र मानता हूं और यह भी मानता हूं कि वे फर्जी और जालसाज आदमी नहीं है। लेकिन पता नहीं उन्हें क्या कीड़ा काटा कि उन्होंने भी इल्जाम जड़ दिया कि मैं उनकी वेबसाइट से खबरे और लेख उठाता रहा हूं। इस बात को एक बार छोड़ भी दिया जाए कि विस्फोट पर मोटे मोटे शब्दों में लिखा है कि यहां प्रकाशित सारी सामग्री सर्वाधिकार असुरक्षित है। इसका भी क्या किया जाए कि उनके यहां जो राजेंद्र जोशी लिखते हैं, वे मित्र हैं और वे डेटलाइन इंडिया के उत्तराखंड में अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार है। इसका भी कुछ नहीं हो सकता कि खुद मेरे दो दर्जन से ज्यादा लेख विस्फोट पर छपे हैं और वे ही विस्फोट के सबसे लोकप्रिय लेखों में गिने जाते हैं।

इसके अलावा जिन जिन लेखकों के लेख रविवार और विस्फोट आदि से लिए गए हैं, उनसे बाकायदा ई मेल लिख कर अनुमति ले ली गई हैं। संजय तिवारी चाहे तो उन पत्रकार मित्रों की अनुमति की ई मेल मुझसे मांग सकते हैें। मैं चंदा ले कर वेबसाइट नहीं चलाता। 1993 में जनसत्ता की नौकरी से निकाला गया था-छेड़छाड़ या बलात्कार के आरोप में नही- उसके बाद से फीचर एजेंसी और अब वेबसाइट ठाठ से चला रहा हूं और विश्वास कीजिए कि ज्यादातर काम मैं और मेरे युवा सहयोगी मिलन गुप्ता करते हैं। हमने किसी से चंदा नहीं मांगा। इतवार की छुट्टी छोड़ कर वेबसाइट कभी बंद नहीं रही। मैं विदेश मेंं रहा तो भी मित्रों की मदद से चलती रही। इसी महीने फिर एक सप्ताह के लिए विदेश में होऊंगा और वेबसाइट चलेगी।

विस्फोट की भूमिका पर इसलिए भी ऐतराज है कि किसी दूसरी वेबसाइट पर छपी सामग्री को ले कर संजय तिवारी के और मेरे भी अभिभावक तुल्य राम बहादूर राय के साक्षात्कार पर जब विवाद हुआ तो दो किस्तों में जवाब विस्फोट पर छपा। मैं यशवंत सिंह को जानता हूं। राय साहब अगर वहां जवाब देते तो वह भी छपता। मगर अब यह राय साहब की मर्जी है कि उन्हें एक प्रवाहित मंच पसंद हैं या अपने एनजीओं के पते पर चलने वाला भिखमंगा मंच।

संजय तिवारी और अविनाश दास दोनों को मेरी विनम्र लेकिन साफ सलाह है कि और चाहे जो कर लेना मुझसे पंगा मत लेना। मैं सरोकार वाली पत्रकारिता करता हूं और इसीलिए शायद ंहिंदी पत्रकारिता के भंवर में सोलह साल से बगैर किसी नौकरी के टिका हुआ हूं। हां, टीवी सीरियल वगैरह भी लिखता हूं और आशा करता हूं कि मेरा ऐसा करना आपको पत्रकारिता के प्रति मेरा विश्वासघात नहीं लगेगा। मैं प्रभाष जोशी की प्रखर और राम बहादूर राय की ईमानदार और जिद्दी परंपरा का शिष्य हूं और इस रिश्ते में न कोई संजय तिवारी आता है और न अविनाश दास। इसीलिए निवेदन है कि मेरे काम में थानेदार बनने की कोशिश मत कीजिए क्योंकि मुझे छोटे मोटे लोगों से लड़ने की आदत नहीं है। लड़ता हूं तो सीधे पुलिस कमिश्नर से और तिहाड़ पहुंच जाता हूं।

अब तहलका की बात पर आइए। तहलका में मेरे गुरु प्रभाष जोशी लिखते हैं और वे कई बार कह चुके हैं कि उनका लिखा हर शब्द मेरी संपत्ति हैं। उनके लेखों और स्तंभ में कुछ नहीं तो कम से कम दो सौ बार अलग अलग संदर्भों में मेरा नाम आ चुका हैं। तहलका में प्रकाशित प्रभाष जी के स्तंभ औघट घाट को मैंने अपनी वेबसाइट पर इस्तेमाल किया था और जरूरी पडेग़ा तो फिर करूंगा। कमाल की बात तो यह है कि तहलका से वहां काम करने वाले हमारे मित्र संजय के जरिए ई मेल पर ही कुछ बाद विवाद हुआ था मगर इसकी खबर आपको देने के लिए संजय तिवारी पहुंच गए। हो सकता है कि तहलका उनकी इस भक्ति पर प्रसन्न हो कर चंदा दे दे।

वेब के अविष्कार ने और खास तौर पर यूनीकोड के चलन ने हिंदी पत्रकारिता को वे असाधारण मंच दिए हैं जिनकी वजह से हर लिखने वाला खुद को अभिव्यक्त कर सकता है। जिसकी अभिव्यक्ति सबसे ताकतवर होगी, वही सबसे ज्यादा लोकप्रिय होगा। गलतियां मैने भी बहुत की है मगर अपराध नहीं किए। इसलिए जिन न्यायमूर्तियों को मेरे होने पर आपत्ति हैं उनसे निवेदन है कि अपने नकली चोले उतार कर रख दें और शब्दों के मैदान में आ कर मुकाबला करें। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि सवा लाख पर मैं अकेला एक भारी पड़ूंगा। (शब्दार्थ)

(यह लेख उन्होंने अपनी साईट आलोकतोमर.कॉम पर प्रकाशित किया है. इस बार हम बिना उनकी अनुमति के इसे प्रकाशित कर रहे हैं)

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संजय भाई साहब,

मुझसे किसी ने कहा था की अविनाश नामके कुंठित और 420 इंसान ने कई भले पत्रकारों को जो उसके झांसे में नही आए उनको बेवजह बदनाम करने का बीडा उठाया है उसकी घटिया किस्म की मुहीम के कई भले लोग शिकार हो गए है ये अलग बात है की आजकल इसके सितारे गर्दिश में हैं और जो कुचक्र ये दूसरो के लिए रचता था उनका शिकार ये ख़ुद गया है, खैर मुद्दे पर आता हूँ,

एक उस आदमी जिसको ख़ुद और उसकी घटिया साईट को कोई बहुत तवज्जो नही दे रहा उसको आख़िर आप और हम क्यूँ तवज्जो देने लगे, जीवन में कई बार बहुत कुछ दीखता है पर जैसा दीखता है अक्सर वैसा नही होता, इस मामले में भी मेरे ख्याल से कही न कहीं संवादहीनता की स्थिती रही और अविनाश जैसा घटिया आदमी अपनी करतूत में सफल रहा, मैं न तो व्यक्तिगत रूप से आपसे मिला हूँ न अलोक जी से लेकिन इस मायने में भाग्यशाली रहा हूँ की आप दोनों जिनके करीब रहे हैं उनका बेहद करीबी और अच्छा मित्र रहा हूँ, अलोक जी की यूएसपी ही उनका फायर ब्रांड व्यक्तित्व रहा है, दिल्ली आकर शायद उन्होंने भले, शालीन और कथित सज्जनता का लबादा किसी हालत में नही ओढा, बताते हैं अपनी जवानी के दिनों में भी इतने ही तेवर थे उनमे जितने आज हैं, वैसे उनसे बेहद खफा हूँ मैं भी, वजह ये की अभी हाल ही में उनकी तबियत ख़राब हुयी तो कुशल क्षेम जानने की तमन्ना लेकर एक मेल की थी इस अपेक्षा के साथ की शायद उनके हाल का हाल उनसे जान सकूँ लेकिन वजह कोई रही हो मुझे जवाब नही मिला, अपरिचित होने के नाते घर जाकर हालचाल लेने में झिझक थी..परिस्थितियाँ कैसी भी हों पर न्यूनतम शिष्टाचार हमेशा निभाने की कोशिश की, अगर मैं चाहता तो इस छोटे से मुद्दे पर उनसे जिंदगीभर खुन्नस खता रह सकता था, लेकिन अलोक तोमर ने जो किया ( जाहिर है पत्रकारिता के लिए) उसपर अगर एक बार इमानदारी से सोच लिया जाए तो उनके प्रति सम्मान के सिवा और कोई भाव नही पनपता, ये सच है उनपर आरोप लगाने वाले चटखारे ले -लेकर आरोप लगते हैं और कई बार उनके उस काम जिसे करने का दम सिर्फ़ उनमे ही था उसको भी बड़ी बेशर्मी के साथ कठघरे में खड़े करते हैं यकीन जानिए ऐसों की ऐसी तैसी कर देने का मन करता है, संजय जी पत्रकारिता में मात्र ७ साल का अनुभव है , बड़े मजे से अपनी शर्तों पर काम कर रहा हूँ, बिना किसी समझौते के, जाहिर है बिना लाखों की मोटी तनख्वाह पाये और पत्रकारिता के मूल स्वरुप के छेड़छाड़ के यूँ सीना तानकर हम जैसों को बड़ा भाता है,

संजय दादा आपका दिन रात एक करके विस्फोट को एक क्वालिटी साईट बनाने के आपके साहसी प्रयोग को मैंने भी देखा है, आपके ख़िलाफ़ कई बेहूदा कमेन्ट इसी विस्फोट पर देखे हैं लेकिन उनसे शायद ही आपके प्रति इंच भर भी सम्मान में कमी आई हो, आने जो कर दिया मैं जानता हूँ आपके मित्र जानते हैं और इश्वर जानता है वो इतिहास है, ऐसे में एकाएक आपका यूँ अलोक जी पर तल्ख़ हो जाना बहुत समझ में नही आया, आप दोनों बड़े और अनुभवी लोग हैं, कितना बेहतर होता की कोई एक अपने ''मैं'' को छोड़कर थोड़ा विस्तृत परिद्रश्य में चीजों को देखता, उससे शायद बहुत कुछ नही होता लेकिन पत्रकारिता का बहुत भला हो जाता,

अन्तिम बात ये की एक चीज से वाकई मैं दुखी हूँ की कोई भी ऐरा गैरा आता है और प्रभाष जी को गरिया देता है अलोक तोमर को गरिया देता है, अभी मेरे ही एक साथी ब्रजेश सिंह जिनके योगदान को मुझसे बेहतर शायद ही कोई जानता हो , वो भड़ास ४ मीडिया में अवतरित हुए और प्रभाष जी और अलोक तोमर जी को गरिया के चले गए, दादा युवा हूँ मन आहात होता है, मुझ जैसा नौसिखिया ये जानता है की किसी की आलोचना करना दुनिया का सबसे आसान काम है तो सालों से स्थापित बुजुर्ग साथी इस सच को क्यूँ नही स्वीकारते, आज प्रभाष जी को इसलिए हरकोई गरिया देता है क्यूंकि वो सशिशेखर की तरह नौकरी नही देते, म्रणाल पाण्डेय की तरह उनका मजबूत गैंग नही है, वो अब मुख्धरा में नही हैं इसलिए अपनी सुविधा के हिसाब से आइये और गरियायिये, मैं जब भी पत्रकारों के बारे में सोचता हूँ तो प्रभाष जी और अलोक जी के प्रति अगर मन में कुछ आता है श्रद्धा और सम्मान का भावः और हाँ भले बहुतों के लिए आप एक असफल पत्रकार रहे हों लेकिन आपकी ललक और सच के साथ खड़े रहने की अदा पर सिर्फ़ फ़िदा हुआ जा सकता है और कुछ नही,

तो समापन सिर्फ़ इसके साथ की कितना बेहतर होता की आप दोनों कम से कम एक बार संवाद करते और फ़िर जो कहना होता कहते हाँ ये भी समझने की कोशिश करते की जब आप नही बदले तो अलोक तोमर कैसे बदल सकते हैं उनकी लेखनी में तेवरों की झलक आज भी जिन्दा है यही तो उनका स्टाइल है और आप भी कहाँ किसी से दबने वाले बस यहीं से तल्खी की शुरुआत शायद हो चुकी है जिसमे आप दोनों का पता नही कितना फायदा होगा पर हम जैसे नौनिहालों का बेहद नुक्सान होगा...काश की आप दोनों मेरा दर्द समझ पाते .....

आप दोनों का

हृदयेंद्र प्रताप सिंह

सीनियर सब एडिटर, दैनिक जागरण, नॉएडा
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आलोक तोमर on 23 June, 2009 17:57;59
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संजय जी, आप ने मेरा लेख छापा. धन्यवाद्., मुझे आप भी जानते हैं की आप से कोइ बैर नहीं है मगर आपने उस चोर के मंच पर जो लिखा वो एक फ़ोन उठा कर मुझे कह भी सकते थे. चलिए, झगडा ख़त्म करते हैं और संवाद की दुनिया के सभ्य नागरिकों की तरह रहते हैं.

और ह्रदयेश भाई, आपका सन्देश पाने में मुझसे चूक हो गयी होगी. क्षमा करें. अस्पताल से लौटा तो हज़ार से ऊपर मेल थे. मैं आप से माफी चाहता हूँ. घर आयेंगे तो मानूंगा कि गुस्सा नहीं हो.

सस्नेह
आलोक तोमर
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anil lahoti on 23 June, 2009 21:29;23
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ऐसा लगता है पार्टियों की तरह पत्रकारिता में भी अब लोग ,में बडा कि में के चक्कर में पडकर अपना दम्भ दूसरों के उपर लाद रहे है ।दलाली का धंधा बंद करो और कोई भला काम करना आरम्भ करो ।नेताओं की तरह ये जनता अब कुछ दिनों बाद पत्रकारों को भी सरेराह जूते मारना आरम्भकरने वाली है। दिल्ली में बैढकर लोगों के दर्द को लिखों फालतू की आपसी टॉग खिचाई से क्या होने वाला है।एक तों वो लोग बेबकूफ है जो आपके लिए फालतू मे लिख रहे है और दूसरे वो पाठक जो तुम्हें पढते है।ऐसा लगता है जमाना बेव का आने वाला है तो कम से कम इसके स्तर को तो बना के रखने की कोशिश करो ।आपसी विचार भिन्नता और वैमनस्य से पाठक का क्या सरोकार है समझ में नहीं आता ।इसलिए कुछ अच्छा करने की कोशिश करो जिससे अच्छा होता दिखें।16 साल से बिना किसी नौकरी के दिल्ली में जमे हो तो क्या दादा ,नाना की पुश्तैनी कमाई खा रहे हो या दलाली के अलावा और कोई काम करते हो ।आप बिना अनुमति के भी खबरे छापते है इा बात को अब यही समाप्त करो और कुछ अच्छा करने की कोशिश करो।
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R L Francis on 23 June, 2009 21:52;05
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जो व्यक्ति समाज परिवर्तन की बात करता है और भीख मांगना नहीं जानता है वह कभी समाज में परिवर्तन नहीं ला सकता. निजी पैसे से लोग धंधा कर सकते हैं लेकिन समाज में परिवर्तन नहीं कर सकता.

अगर आप अपनी जेब से पैसा खर्च करते हैं और अरबों रूपये लगा देते हैं तो भी समाज परिवर्तन नही हो सकता. इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितने भी बड़े परिवर्तन हुए हैं वे सब भीख मांगकर ही हुए हैं. अगर जनता का काम करना है तो बिना जनता का अंशदान लिए आप कामयाब नहीं हो सकते.

विस्फोट हमेशा गरीब और भूखे नंगे लोग ही करते हैं. जो खाता पीता आदमी है उसे विस्फोट करने की जरूरत नहीं होती है.
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Arjun Sharma on 23 June, 2009 21:52;13
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Alok Bhai aap ne bhi baddpan dikhaya hai. sanjay ji vaise hi soofi-sant hain. per alok bhai aapke lekhon main aajkal ugarta aur gali-glouch kuch jyada hi hone laga hai. apna bp check karwayiye aur sathion per is tarah ki seena cheer dene wali tippaniyon se parhej karen. bahut chota hoon, isse jyada kehne ki meri aukaat nahi hai
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Tyagi on 23 June, 2009 22:28;18
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पत्रकार बिरादरी पर टिपणी करना उचित नहीं समझता परन्तु अलोक तोमर जैसे संघर्षशील एवं झुझारू पत्रकार के ऊपर आरोप लगाने वालो को एक बार उनसे फ़ोन कर कर पूछ तो लेना चाहिय था. एसे समय में जब की हिंदी पत्रकारिता वेब पर एक नए रूप में विस्तृत हो रही है और जब अंग्रजी पत्रकार हिंदी पत्रकारों की नव प्रयोगों और उनकी बढती लोकप्रियता से हलकान है. विस्फोट जैसी वेब साईट एक भरोसेमंद और बेबाक साईट है. और इसने इतने कम अन्तराल पर तिवारी जी के नेतेरत्व में वास्तव में उच्चकोटि का सरहनीय कार्ये किया है. एअसे में हिंदी पत्कारिता के पितृपरुष इस और दिशा दे सकते है.
और यदि पत्रकार महोदय इसी प्रकार एक दुसरे पर आरोप लगते रहे तो हिंदी वेब पत्रकारिता की विश्वाशनियेता घट जायेगी जो की हिंदी पाठको के लिए बहुत बड़ी हानि होगी.
में सभी पत्रकार भईयो से अनुरोध करूँगा सामजस्य और समरसता से काम ले. और हाँ कम से कम इस बार इस अंग्रजी मीडिया के कुचक्रों से बच कर रहे. क्योंकि वेब हिंदी पत्रकारिता सीधे तौर पर अंग्रेजी मीडिया के पेट पर लात है.
(एक विनती जिसका पत्रकारिता से दूर दूर का रिश्ता नहीं)
http://parshuram27.blogspot.com/
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s.bhartiya on 24 June, 2009 08:57;13
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dambh se bachiye tomer ji. joshi ji se jude aadami se is terah ki bhasha ki ummid nahi ki ja sakati.
vaise dilli ki mahima hi apar hai. lakhtakiya ptrakar bhi nasihaten dene men va sarv gyata hone ke bhram men jeeta hai. aap bachen.
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pradeep on 24 June, 2009 09:05;58
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भई आलोक तोमर न हुए कोई हिटलर हो गये। जब इतनी दादागीरी लेख में है तो जाहिर है कि असली जीवन में कितनी दादागिरी करते होंगे। आखिर अभी एक सज्जन आपके बारे में बहुत बड़ी-बड़ी बातें उपर लिख चुके हैं परंतु मुझे नहीं लगता की आप सचमुच वैसे होंगे। पत्रकारिता सिर्फ सच्चाई उभारने का नाम नहीं है बल्कि सौम्यता भी झलकनी चाहिये आप तो किसी बंबईया फिल्म के मवाली की तरह पुलिस कमिश्नर से उलझने की बात कर रहे हैं। आखिर क्यों? आप एक पत्रकार हैं वरना देश के कितने लोग पुलिस कमिश्नर से उलझ सकते हैं। होंगे आप बहुत बड़े पत्रकार परंतु भाषा तो बिल्कुल गुंडई लगती है। और हां सिर्फ दूसरों की आलोचना करके ही खुश मत रहिये अपनी आलोचना भी झेलने की हिम्मत रखिये और उस पर कुछ कहना है तो कम से कम भाषा की शालीनता तो रखिये।
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Ganesh Prasad Jha on 24 June, 2009 09:32;01
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Kahte hain ki sher ko danda karoge to shara jungle janega. Shayad isiliye kutch tuchhe type patrakar ajkal adarniya Prabhash Joshi aur bhai Alok Tomar ko gariyakar jungle me khud ki maujoodgi ka ahsas karane ki koshish kar rahe hain. Ab theek hai inme apko koi khot dikh rahi hai, to khot kisme nahi hota. Aakhir we bhi to manav hi hain. Par Prabhashji ne apne jivan me jo kiya use bhi to dekho. Hindi patrakarita ko is vyakti ne jo diya wah wajan me bahut bhari baithta hai. Jansatta jaisa hindi ka manak akhbar na kabhi pahle nikla aur na aage kabhi koi aisa niklega. mana ki Jansatta ham sabke samuhik mehnat ka natija tha, par iski poori parikalpana to Prabhashji ki hi thi. Hamne to sirf wo kiya jo unhone bataya. Is aadmi ke kiye ki ijjat to har hal me karne padegi. Patrakarita, khaskar hindi patrakarita ko vinash se bachane me aaj bhi we jo kuch kar sakte hain kar rahe hain. Unki uchai ka aaj koi patrakar nahi. Mujhe to garv hai maine unke sath kam kiya hai aur unke manak akhbar Jansatta me kam kiya hai. Aj kuch waise log bhi unhe gali de rahe hain jo hain to unke hi banaye hue par kinhi karno se bahut sampanna hokar "bade aadmi" ho gaye hain. Prabhashji me lakh burai ho par we hindi ke patrakaro ke liye hamesha poojniya rahenge.
Ganesh Prasad Jha, VOI TV.
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chandrapal on 24 June, 2009 10:50;02
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प्रिय भाई ,
विस्फ़ोट.कोम वाकई बहुत साहसी वेब पत्रिका हैं.पर जो बातें आप लोग कर रहे हो वो हमें जरा भी समझ मे नहीं आ रही हैं.हम भी विस्फ़ोट से कई लेखकों को पड्ते है अच्छा लगने पर लेखक से अनुमती लेकर अपने पोर्ट्ल में इस्तेमाल करते हैं.इसमे बूरा क्या हैं. लेख लेखक कि सम्पती होता है न कि किसी प्रकाशक का.यदी आप लेखक को मानधन दे रहे हैं तो अलग बात हैं. हर लिखे पर समाज का अधिकार हैं ,न की लिख्नने वाले लेखक का.
वैसे हम आपके बहुत शुक्रगुजार हैं आपके पोर्टल ने हमे
बहुत हिम्मत दी.
चन्द्रपाल
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image आलोक तोमर हिन्दी पत्रकारिता में कालाहांडी के भूख की रिपोर्टिंग से चर्चा में आये आलोक तोमर आरोपों से घिरे रहनेवाले पत्रकार हैं. फिर भी सक्रियता में कोई कमी नहीं. लेखन के अलावा टीवी पत्रकारिता में सशक्त हस्ताक्षर के रूप में स्थापित. डेटनालाइन इंडिया और शब्दार्थ के संपादक.
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टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!
पुरानी कहानी है कि एक परिवार के तीन तोतलों की शादी नहीं हो पा रही थी। पिता ने हिदायत दी कि इस बार जो लडकी वालों के सामने बोलेगा उसको घर से निकाल दिया जाएगा। लकड़ी वाले आए, बडे बोला -‘पितादी ती बात याद है न।‘‘ मंझला बोला -‘‘टुप्प भईया।‘‘ छोटा बोल उठा -‘‘टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!‘‘ इस तरह तीनों की पोल खुल गई। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भी कमोबेश एसा ही कुछ होता दिख रहा है।...
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संघ को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश
राजस्थान सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अजमेर दरगाह शरीफ पर कुछ साल पहले हुूए बम धमाके के मामले में कुछ तथाकथित अभियुक्तों के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया है। इस आरोप पत्र में जिन आरोपियों को नाम हैं उनमें इन्द्रेश कुमार का नाम नहीं है। यहां तक का किस्सा सामान्य जांच प्रक्रिया का अंग है। परंतु उसके बाद की कहानी राजनैतिक कहानी है।...
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सामी नहीं, कांग्रेस के मुंह पर कालिख
कहने के लिए भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंके जाने का मुद्दा शांत होता दिख रहा हो लेकिन इसकी गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी। हकीकत यह है कि यहां कांग्रेस की गुटबाजी को आलाकमान अपना पूरा दम लगाकर भी शांत नहीं कर सकता। प्रभारी के रूप में सामी की यहां यह दूसरी बार फजीहत हुई है। मंगलवार को पीसीसी प्रतिनिधियों की बैठक में जब महज एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सामी यहां पहुंचे थे तो कांग्रेस भवन के बाहर ही उन पर काली स्याही फेंकी गई जो उनके चेहरे और कपड़े पर होते हुए उनके साथ कार से उतरे शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल पर भी पड़े।...
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अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?...
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अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...
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बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
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काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
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ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
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आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
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