भीख मांगकर विस्फोट करनेवाले लोग
आलोक तोमर विस्फोट.कॉम के शुरूआत में ही हमसे जुड़ गये थे. उनका नाम बड़ा है और पत्रकारिता में अनुभव भी कम नहीं है. सोमवार को उन्होंने अपनी वेबसाईट आलोकतोमर.कॉम पर विस्फोट और मेरे बारे में वह सब लिखा है जो उनके मन में है. हम अपने पाठकों के लिए वह पूरा का पूरा लेख प्रकाशित कर रहे हैं. उन्होंने जो कुछ लिखा है उसे विस्फोट.कॉम के पाठकों के सामने जरूर प्रस्तुत कर रहा हूं. ठीक वैसे ही जैसे उनके लिखे को अब तक प्रकाशित करता आया हूं.
भोपाल से चलने वाली एक लगभग अज्ञात वेबसाइट पर छपा देखा कि आलोक तोमर खबरों की चोरी करते हैं। बताया गया था कि वे विस्फोट और तहलका जैसी वेबसाइटों से सामग्री अपनी वेबसाइट पर डालते हैं। रविवार वेबसाइट का नाम भी इसमें शामिल था। इस वेबसाइट मोहल्ला लाइव डॉट कॉम को चलाने वाले बंधु के बारे में पहले पता लगाया। इनका नाम पहले कभी नहीं सुना था। लेकिन जो पता लगा उससे तो होश उड़ गए। ये साहब अच्छा लिखते हैं, पत्रकारिता की बाकायदा पढ़ाई की है और एक बड़े अखबार में स्थानीय संपादक या समाचार संपादक बन गए थे। भोपाल में रहते हैं और वहां माखन लाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की एक छात्रा जो प्रशिक्षण लेने इनके यहां आई थी, के साथ अशालीन प्रस्ताव रखने और मजबूर करने के आरोप में इन्हें नौकरी से निकाला गया था। इनका नाम अविनाश दास है।
यह संयोग नहीं हैं कि जिस समाचार पत्र समूह से निकाला गया था उसी से जुड़े एक पत्रकार द्वारा लिखे गए एक लेख पर इनकी लगभग अज्ञात वेबसाइट पर लगातार टिप्पणियां आ रही थी। इस पत्रकार का नाम अभिलाष खांडेकर है और उन्होंने पता नही किस लेख में बिहारियों पर टिप्पणी कर दी थी और इसके बाद अविनाश दास के भक्त पत्रकार मैदान में कूद कर उन्हें गोडसे और हर तरह का खलनायक साबित करने में लगे हुए थे। अविनाश दास के इतिहास पर मैं नहीं जाऊंगा। खुद बलात्कार के आरोप का शिकार होने के पहले वे मीडिया की सबसे बड़ी वेबसाइट भड़ास के संपादक यशवंत सिंह पर यही आरोप लगा चुके है। वह आरोप सिद्व नहीं हुआ लेकिन इन साहब को प्रेरणा जरूर मिल गई कि लड़कियां छेड़ने की वस्तु होती है। इससे ज्यादा लिख कर अविनाश दास को मैं महत्व नहीं देना चाहूंगा।
संजय तिवारी इतने महान आदमी है कि पहले उन्होंने लिखा कि उनके पास वेबसाइट चलाने के लिए पैसा नहीं है इसलिए वे उसे बंद करने जा रहे है। बहुत सारे मित्रों में जिनमें मैं भी शामिल था, सहायता की पेशकश की। इसके बाद चंदा लेने के लिए उन्होंने क्रेडिट कार्ड से भुगतान का गेटवे अपनी साइट पर डाल दिया और चंदा मांगने लगे। यह गेटवे लगभग तीस हजार रुपए में आता है। जिसके पास भीख का कटोरा खरीदने के लिए इतनी रकम हो वह चंदा क्यों मांग रहा हैं?
मगर विस्फोट डॉट कॉम चलाने वाले संजय तिवारी का मैं क्या करूं? उन्हें अब भी मैं मित्र मानता हूं और यह भी मानता हूं कि वे फर्जी और जालसाज आदमी नहीं है। लेकिन पता नहीं उन्हें क्या कीड़ा काटा कि उन्होंने भी इल्जाम जड़ दिया कि मैं उनकी वेबसाइट से खबरे और लेख उठाता रहा हूं। इस बात को एक बार छोड़ भी दिया जाए कि विस्फोट पर मोटे मोटे शब्दों में लिखा है कि यहां प्रकाशित सारी सामग्री सर्वाधिकार असुरक्षित है। इसका भी क्या किया जाए कि उनके यहां जो राजेंद्र जोशी लिखते हैं, वे मित्र हैं और वे डेटलाइन इंडिया के उत्तराखंड में अधिमान्यता प्राप्त पत्रकार है। इसका भी कुछ नहीं हो सकता कि खुद मेरे दो दर्जन से ज्यादा लेख विस्फोट पर छपे हैं और वे ही विस्फोट के सबसे लोकप्रिय लेखों में गिने जाते हैं।
इसके अलावा जिन जिन लेखकों के लेख रविवार और विस्फोट आदि से लिए गए हैं, उनसे बाकायदा ई मेल लिख कर अनुमति ले ली गई हैं। संजय तिवारी चाहे तो उन पत्रकार मित्रों की अनुमति की ई मेल मुझसे मांग सकते हैें। मैं चंदा ले कर वेबसाइट नहीं चलाता। 1993 में जनसत्ता की नौकरी से निकाला गया था-छेड़छाड़ या बलात्कार के आरोप में नही- उसके बाद से फीचर एजेंसी और अब वेबसाइट ठाठ से चला रहा हूं और विश्वास कीजिए कि ज्यादातर काम मैं और मेरे युवा सहयोगी मिलन गुप्ता करते हैं। हमने किसी से चंदा नहीं मांगा। इतवार की छुट्टी छोड़ कर वेबसाइट कभी बंद नहीं रही। मैं विदेश मेंं रहा तो भी मित्रों की मदद से चलती रही। इसी महीने फिर एक सप्ताह के लिए विदेश में होऊंगा और वेबसाइट चलेगी।
विस्फोट की भूमिका पर इसलिए भी ऐतराज है कि किसी दूसरी वेबसाइट पर छपी सामग्री को ले कर संजय तिवारी के और मेरे भी अभिभावक तुल्य राम बहादूर राय के साक्षात्कार पर जब विवाद हुआ तो दो किस्तों में जवाब विस्फोट पर छपा। मैं यशवंत सिंह को जानता हूं। राय साहब अगर वहां जवाब देते तो वह भी छपता। मगर अब यह राय साहब की मर्जी है कि उन्हें एक प्रवाहित मंच पसंद हैं या अपने एनजीओं के पते पर चलने वाला भिखमंगा मंच।
संजय तिवारी और अविनाश दास दोनों को मेरी विनम्र लेकिन साफ सलाह है कि और चाहे जो कर लेना मुझसे पंगा मत लेना। मैं सरोकार वाली पत्रकारिता करता हूं और इसीलिए शायद ंहिंदी पत्रकारिता के भंवर में सोलह साल से बगैर किसी नौकरी के टिका हुआ हूं। हां, टीवी सीरियल वगैरह भी लिखता हूं और आशा करता हूं कि मेरा ऐसा करना आपको पत्रकारिता के प्रति मेरा विश्वासघात नहीं लगेगा। मैं प्रभाष जोशी की प्रखर और राम बहादूर राय की ईमानदार और जिद्दी परंपरा का शिष्य हूं और इस रिश्ते में न कोई संजय तिवारी आता है और न अविनाश दास। इसीलिए निवेदन है कि मेरे काम में थानेदार बनने की कोशिश मत कीजिए क्योंकि मुझे छोटे मोटे लोगों से लड़ने की आदत नहीं है। लड़ता हूं तो सीधे पुलिस कमिश्नर से और तिहाड़ पहुंच जाता हूं।
अब तहलका की बात पर आइए। तहलका में मेरे गुरु प्रभाष जोशी लिखते हैं और वे कई बार कह चुके हैं कि उनका लिखा हर शब्द मेरी संपत्ति हैं। उनके लेखों और स्तंभ में कुछ नहीं तो कम से कम दो सौ बार अलग अलग संदर्भों में मेरा नाम आ चुका हैं। तहलका में प्रकाशित प्रभाष जी के स्तंभ औघट घाट को मैंने अपनी वेबसाइट पर इस्तेमाल किया था और जरूरी पडेग़ा तो फिर करूंगा। कमाल की बात तो यह है कि तहलका से वहां काम करने वाले हमारे मित्र संजय के जरिए ई मेल पर ही कुछ बाद विवाद हुआ था मगर इसकी खबर आपको देने के लिए संजय तिवारी पहुंच गए। हो सकता है कि तहलका उनकी इस भक्ति पर प्रसन्न हो कर चंदा दे दे।
वेब के अविष्कार ने और खास तौर पर यूनीकोड के चलन ने हिंदी पत्रकारिता को वे असाधारण मंच दिए हैं जिनकी वजह से हर लिखने वाला खुद को अभिव्यक्त कर सकता है। जिसकी अभिव्यक्ति सबसे ताकतवर होगी, वही सबसे ज्यादा लोकप्रिय होगा। गलतियां मैने भी बहुत की है मगर अपराध नहीं किए। इसलिए जिन न्यायमूर्तियों को मेरे होने पर आपत्ति हैं उनसे निवेदन है कि अपने नकली चोले उतार कर रख दें और शब्दों के मैदान में आ कर मुकाबला करें। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि सवा लाख पर मैं अकेला एक भारी पड़ूंगा। (शब्दार्थ)
(यह लेख उन्होंने अपनी साईट आलोकतोमर.कॉम पर प्रकाशित किया है. इस बार हम बिना उनकी अनुमति के इसे प्रकाशित कर रहे हैं)
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
मुझसे किसी ने कहा था की अविनाश नामके कुंठित और 420 इंसान ने कई भले पत्रकारों को जो उसके झांसे में नही आए उनको बेवजह बदनाम करने का बीडा उठाया है उसकी घटिया किस्म की मुहीम के कई भले लोग शिकार हो गए है ये अलग बात है की आजकल इसके सितारे गर्दिश में हैं और जो कुचक्र ये दूसरो के लिए रचता था उनका शिकार ये ख़ुद गया है, खैर मुद्दे पर आता हूँ,
एक उस आदमी जिसको ख़ुद और उसकी घटिया साईट को कोई बहुत तवज्जो नही दे रहा उसको आख़िर आप और हम क्यूँ तवज्जो देने लगे, जीवन में कई बार बहुत कुछ दीखता है पर जैसा दीखता है अक्सर वैसा नही होता, इस मामले में भी मेरे ख्याल से कही न कहीं संवादहीनता की स्थिती रही और अविनाश जैसा घटिया आदमी अपनी करतूत में सफल रहा, मैं न तो व्यक्तिगत रूप से आपसे मिला हूँ न अलोक जी से लेकिन इस मायने में भाग्यशाली रहा हूँ की आप दोनों जिनके करीब रहे हैं उनका बेहद करीबी और अच्छा मित्र रहा हूँ, अलोक जी की यूएसपी ही उनका फायर ब्रांड व्यक्तित्व रहा है, दिल्ली आकर शायद उन्होंने भले, शालीन और कथित सज्जनता का लबादा किसी हालत में नही ओढा, बताते हैं अपनी जवानी के दिनों में भी इतने ही तेवर थे उनमे जितने आज हैं, वैसे उनसे बेहद खफा हूँ मैं भी, वजह ये की अभी हाल ही में उनकी तबियत ख़राब हुयी तो कुशल क्षेम जानने की तमन्ना लेकर एक मेल की थी इस अपेक्षा के साथ की शायद उनके हाल का हाल उनसे जान सकूँ लेकिन वजह कोई रही हो मुझे जवाब नही मिला, अपरिचित होने के नाते घर जाकर हालचाल लेने में झिझक थी..परिस्थितियाँ कैसी भी हों पर न्यूनतम शिष्टाचार हमेशा निभाने की कोशिश की, अगर मैं चाहता तो इस छोटे से मुद्दे पर उनसे जिंदगीभर खुन्नस खता रह सकता था, लेकिन अलोक तोमर ने जो किया ( जाहिर है पत्रकारिता के लिए) उसपर अगर एक बार इमानदारी से सोच लिया जाए तो उनके प्रति सम्मान के सिवा और कोई भाव नही पनपता, ये सच है उनपर आरोप लगाने वाले चटखारे ले -लेकर आरोप लगते हैं और कई बार उनके उस काम जिसे करने का दम सिर्फ़ उनमे ही था उसको भी बड़ी बेशर्मी के साथ कठघरे में खड़े करते हैं यकीन जानिए ऐसों की ऐसी तैसी कर देने का मन करता है, संजय जी पत्रकारिता में मात्र ७ साल का अनुभव है , बड़े मजे से अपनी शर्तों पर काम कर रहा हूँ, बिना किसी समझौते के, जाहिर है बिना लाखों की मोटी तनख्वाह पाये और पत्रकारिता के मूल स्वरुप के छेड़छाड़ के यूँ सीना तानकर हम जैसों को बड़ा भाता है,
संजय दादा आपका दिन रात एक करके विस्फोट को एक क्वालिटी साईट बनाने के आपके साहसी प्रयोग को मैंने भी देखा है, आपके ख़िलाफ़ कई बेहूदा कमेन्ट इसी विस्फोट पर देखे हैं लेकिन उनसे शायद ही आपके प्रति इंच भर भी सम्मान में कमी आई हो, आने जो कर दिया मैं जानता हूँ आपके मित्र जानते हैं और इश्वर जानता है वो इतिहास है, ऐसे में एकाएक आपका यूँ अलोक जी पर तल्ख़ हो जाना बहुत समझ में नही आया, आप दोनों बड़े और अनुभवी लोग हैं, कितना बेहतर होता की कोई एक अपने ''मैं'' को छोड़कर थोड़ा विस्तृत परिद्रश्य में चीजों को देखता, उससे शायद बहुत कुछ नही होता लेकिन पत्रकारिता का बहुत भला हो जाता,
अन्तिम बात ये की एक चीज से वाकई मैं दुखी हूँ की कोई भी ऐरा गैरा आता है और प्रभाष जी को गरिया देता है अलोक तोमर को गरिया देता है, अभी मेरे ही एक साथी ब्रजेश सिंह जिनके योगदान को मुझसे बेहतर शायद ही कोई जानता हो , वो भड़ास ४ मीडिया में अवतरित हुए और प्रभाष जी और अलोक तोमर जी को गरिया के चले गए, दादा युवा हूँ मन आहात होता है, मुझ जैसा नौसिखिया ये जानता है की किसी की आलोचना करना दुनिया का सबसे आसान काम है तो सालों से स्थापित बुजुर्ग साथी इस सच को क्यूँ नही स्वीकारते, आज प्रभाष जी को इसलिए हरकोई गरिया देता है क्यूंकि वो सशिशेखर की तरह नौकरी नही देते, म्रणाल पाण्डेय की तरह उनका मजबूत गैंग नही है, वो अब मुख्धरा में नही हैं इसलिए अपनी सुविधा के हिसाब से आइये और गरियायिये, मैं जब भी पत्रकारों के बारे में सोचता हूँ तो प्रभाष जी और अलोक जी के प्रति अगर मन में कुछ आता है श्रद्धा और सम्मान का भावः और हाँ भले बहुतों के लिए आप एक असफल पत्रकार रहे हों लेकिन आपकी ललक और सच के साथ खड़े रहने की अदा पर सिर्फ़ फ़िदा हुआ जा सकता है और कुछ नही,
तो समापन सिर्फ़ इसके साथ की कितना बेहतर होता की आप दोनों कम से कम एक बार संवाद करते और फ़िर जो कहना होता कहते हाँ ये भी समझने की कोशिश करते की जब आप नही बदले तो अलोक तोमर कैसे बदल सकते हैं उनकी लेखनी में तेवरों की झलक आज भी जिन्दा है यही तो उनका स्टाइल है और आप भी कहाँ किसी से दबने वाले बस यहीं से तल्खी की शुरुआत शायद हो चुकी है जिसमे आप दोनों का पता नही कितना फायदा होगा पर हम जैसे नौनिहालों का बेहद नुक्सान होगा...काश की आप दोनों मेरा दर्द समझ पाते .....
आप दोनों का
हृदयेंद्र प्रताप सिंह
सीनियर सब एडिटर, दैनिक जागरण, नॉएडा
और ह्रदयेश भाई, आपका सन्देश पाने में मुझसे चूक हो गयी होगी. क्षमा करें. अस्पताल से लौटा तो हज़ार से ऊपर मेल थे. मैं आप से माफी चाहता हूँ. घर आयेंगे तो मानूंगा कि गुस्सा नहीं हो.
सस्नेह
आलोक तोमर
अगर आप अपनी जेब से पैसा खर्च करते हैं और अरबों रूपये लगा देते हैं तो भी समाज परिवर्तन नही हो सकता. इतिहास गवाह है कि दुनिया में जितने भी बड़े परिवर्तन हुए हैं वे सब भीख मांगकर ही हुए हैं. अगर जनता का काम करना है तो बिना जनता का अंशदान लिए आप कामयाब नहीं हो सकते.
विस्फोट हमेशा गरीब और भूखे नंगे लोग ही करते हैं. जो खाता पीता आदमी है उसे विस्फोट करने की जरूरत नहीं होती है.
और यदि पत्रकार महोदय इसी प्रकार एक दुसरे पर आरोप लगते रहे तो हिंदी वेब पत्रकारिता की विश्वाशनियेता घट जायेगी जो की हिंदी पाठको के लिए बहुत बड़ी हानि होगी.
में सभी पत्रकार भईयो से अनुरोध करूँगा सामजस्य और समरसता से काम ले. और हाँ कम से कम इस बार इस अंग्रजी मीडिया के कुचक्रों से बच कर रहे. क्योंकि वेब हिंदी पत्रकारिता सीधे तौर पर अंग्रेजी मीडिया के पेट पर लात है.
(एक विनती जिसका पत्रकारिता से दूर दूर का रिश्ता नहीं)
http://parshuram27.blogspot.com/
vaise dilli ki mahima hi apar hai. lakhtakiya ptrakar bhi nasihaten dene men va sarv gyata hone ke bhram men jeeta hai. aap bachen.
Ganesh Prasad Jha, VOI TV.
विस्फ़ोट.कोम वाकई बहुत साहसी वेब पत्रिका हैं.पर जो बातें आप लोग कर रहे हो वो हमें जरा भी समझ मे नहीं आ रही हैं.हम भी विस्फ़ोट से कई लेखकों को पड्ते है अच्छा लगने पर लेखक से अनुमती लेकर अपने पोर्ट्ल में इस्तेमाल करते हैं.इसमे बूरा क्या हैं. लेख लेखक कि सम्पती होता है न कि किसी प्रकाशक का.यदी आप लेखक को मानधन दे रहे हैं तो अलग बात हैं. हर लिखे पर समाज का अधिकार हैं ,न की लिख्नने वाले लेखक का.
वैसे हम आपके बहुत शुक्रगुजार हैं आपके पोर्टल ने हमे
बहुत हिम्मत दी.
चन्द्रपाल
Post your comment