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आलोक तोमर जी, मैं राजीव शर्मा बोल रहा हूं

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उस दिन मेरे आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब देश के ख्यातिनाम संघर्षशील कहे जाने वाले पत्रकार आलोक तोमर का ई मेल अपने इनवॉक्स में देखा। सच कहूं तो बहुत देर तक उसे खोलकर पढ नही सका, लेकिन उस दिन सौमवती अमावस्या को गोर्वधन महाराज की परिक्रमा देने और उनसे ये अनुरोध करने जा रहा था कि प्रभू अब तो अपने इस नातुक्ष भक्त पर कुछ कृपा कर दीजिए जिससे जीवन के अनवरत संघर्षों में कुछ राहत मिल सके।

साथी बार बार चलने का अनुरोध कर रहे थे इतने में इच्छा हुई कि एक बार कोई मेल हो तो देखता चलूं। इतने में आलोक तोमर जी का मेल नजर आया तो लगा कि गोर्वधन महराज ने परिक्रमा से पहले ही मानो मनौती पूरी कर दी है। आलोक जी ने कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला के साक्षात्कार जो विस्फोट डॉट काम पर प्रकाशित हो चुका था की तारीफ के साथ उसको डेट लाईन इंडिया पर प्रकाशित करने की अनुमति मॉगी थी। मन बल्लियों उछल रहा था इसलिए अनुमति को अपना सौभाग्य मान देने में बिल्कुल देरी नहीं की और कम्प्यूटर ऑफ कर परिक्रमा देने चला गया।

रास्ते भर साथियों के बीच इसी बात के साथ कि अब अपने दिन फिरने वाले है, कुछ ऐसी ही बातें करता रहा और बडी श्रद्धा के साथ खुशी के मारे परिक्रमा के 21 किलोमीटर के कंक्रीट पडे रास्तों का पता ही नहीं चला। बार बार ईश्वर को धन्यवाद देते मन ये सोच रहा था कि अब लगता है कि मीडिया की चकाचौंध भरी दुनिया में अपने लिए भी कहीं छोटी सी जगह अब मिल जाएगी। इसी बीच धीरे से एक बात और याद आई की ये तो वो ही आलोक तोमर है जिनके पास कई बार अपना बायोडॉटा और अनुरोध पत्र भेजे मगर आज तक किसी का कोई जबाब और सलाह इनकी ओर से देने की कोशिश नहीं की गई। अब अचानक ऐसा क्या हो गया या मैने कर दिया कि वो खबर प्रकाशित करने की अनुमति मॉग रहे है। लेकिन मन प्रसन्न था इसलिए अधिक ध्यान नहीं दे पाया।

परिक्रमा की थकान के बाद तेज धूप में एक सौ किलोमीटर मोटर साईकिल चलाकर जब घर वापिस पहुंचा तो सबसे पहले कम्प्यूटर आन करके ये देखा कि आलोक जी ने उसे किस तरह से प्रकाशित किया है। और फिर एक बार आलोक जी के द्वारा भेजे ई मेल को देखने का मन हुआ तो वहॉ आलोक तोमर डॉट काम का लिंक दिखाई दिया। उस पर एक खबर दिखाई दी ´भीख मॉगकर विस्फोट करने वाले लोग´शरीर में थकान थी मगर ´विस्फोट´ का नाम देखकर पढने की इच्छा को रोक नहीं सका, फिर तो कई बार पढा और लगा कि आखिर ये क्या है। क्या दिल्ली जिसे देखने की अभी तमन्ना बाकी है, में रहने वाले सभ्य समाज और विशेषकर मीडिया के लोगों के बीच आपसी खीचंतान और व्यवहार कुछ ऐसा ही है जैसा असभ्य कहे जाने वाले हम जैसे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के बारे में कहा जाता है। क्या दिल्ली हमारे उन इलाकों से भी बदतर है जहॉ लोग थूक कर चाटते है?

बिना किसी प्रकार के कम्प्यूटर प्रशिक्षण के बाद एक दिन एक साथी के इंटरनेट पर यों ही हाथ पैर मार रहा था, तो आलोक तोमर जी कि डेटलाईन इंडिया को देखा था। स्थानीय अखबारी दुनिया से परेशान मन की इच्छा हुई कि बेव मीडिया में हाथ आजमाया जाए। स्थानीय अखबारों में पत्रकार नहीं दलाल चाहिए थे। मैं जहॉं रहता हूं वहॉ एक भी प्रशिक्षित पत्रकार नहीं है मगर अखबारों को इससे क्या? उन्हें तो खबरें नहीं विज्ञापन चाहिए, पत्रकार महोदय भले ही स्नातक भी न हो कोई जरूरी नहीं है। इसलिए आलोक तोमर जी को कई बार अपना बायोडाटा और अनुरोध पत्र प्रेषित किये, मगर आज तक उनकी ओर से किसी भी प्रकार का कोई जबाब नहीं आया।विस्फोट से जुड़ने की कहानी भी दिलचस्प है. एक दिन अचानक एक लिंक से चलते चलते विस्फोट डॉट कॉम तक पहुंच गया और बहॉ भी पत्रकार बनने जैसा एक कॉलम था जिसमें यूनीकोड एक ऐसा ‘शब्द था जिसे में खुद और इस छोटी सी जगह के कुछ परिचित लोग नहीं समझ पा रहे थे, तो एक दोस्त ने सलाह दी कि क्यों न संपादक महोदय से पत्र व्यवहार करके पूछ लिया जाऐ? तो एक बार फिर से एक और अनुरोध पत्र इन संपादक महोदय के नाम लिख दिया, मन में इतना जरूर था कि जबाब तो आने वाला नही है क्योंकि इस बीच और कई बड़े लोगों को ऐसे ही अनुरोध पत्र भेज चुका था। लेकिन इस बार कुछ बात अलग निकली। दूसरे ही दिन यूनीकोड की पहेली को सुलझाने के साथ उत्साह बढ़ानेवाला ईमेल मिला। उसके बाद एक जनवरी को ´गिद्धों' से संबधित एक खबर भेजी जिसे यूनीकोड फॉण्ट में बदल कर अगले दिन प्रकाशित किया. मुझे याद है स्टोरी प्रकाशित होने के बाद संजय जी का फोन आया था और उन्होंने कहा था कि यह आज के दिन की सबसे बड़ी स्टोरी है. उनसे बाद विस्फोट पर लिखने का जो सिलसिला शुरू हुआ वह आज तक जारी है।

संजय जी से केवल मोबाईल से बात होती है जिसमें सुझाव और सलाह के साथ पत्रकारिता के मूल्यों के साथ काम करने की प्रेरणा भी देते रहते हैं। आरम्भ में ही संजय जी ने अपनी आर्थिक व्यवस्थाओं का खुले मन से खुलासा कर दिया था। उनके साथ यह जुड़ाव ही था कि जिस दिन विस्फोट पर विराम की खबर देखी,खुद को रोने से रोक नहीं पाया था। आलोक जी ने एक बात लिखी है कि खबरों के प्रकाशन से पहले लेखक से स्वीकृति लेते रहे है। इसके संबंध में इतना जरूर कहूंगा कि मुझे नहीं पता कि विस्फोट से लेकर उन्होंने मेरी कितनी खबरों का प्रकाशन किया है। हॉ मैनें कर्नल बैसला के साक्षात्कार के प्रकाशन की अनुमति बड़े ही खुशी के माहौल में उन्हें दी थी, लेकिन इस बीच मैंने एक और खबर ´हिण्डौन में छोटे बच्चों के शरीर से निजी नर्सिग होमों के संचालक डाक्टरों के द्वारा रक्त निकाल लेने´ वाली खबर को मैने डेटलाईन इंडिया पर देखा था जो अभी भी वहां मौजूद है। मैं दावे से कह सकता हूं कि वह खबर छापने से पहले अनुमति से संबधित उनका कोई पत्र व्यवहार मेरे साथ नहीं हुआ।

राजस्थान के छोटे से गॉव में रहते हुए जहॉ वेब की चर्चा करना अपने लिए मुसीबत मोल लेने से कम नहीं है। पत्रकारिता करने की इच्छा पता नहीं कहॉ से मन में टीस की तरह चुभती रही है। उस ओर बढने पर हर तरफ जब अंधेरा दिखाई पड़ रहा था तो संजय जी ने जिस प्रकार हाथ थामा वो ही मेरे लिए उनके व्यक्तित्व का आईना है, जो बार बार मुझसे ये कहता है कि वो आम इंसान से अलग ऐसे व्यक्ति है जो कि जीवन के संघर्ष के साथ अपनी अलग पहचान और मूल्यों के साथ खडे हुए हैं, उन्हें दी गई चुनौती खीज सी लगती है।

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hridayendra pratap singh on 25 June, 2009 10:10;02
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संजय भैय्या ये क्या हो गया है आपको, आप हमेशा बिना किसी विवाद या बहस में पड़े अपना काम करते रहते हैं फ़िर आप न तो कुछ बोल रहे हैं न आप ये कह रहे हैं की आप आलोक जी से गुस्सा हैं न ये कह रहे हैं की आप उनसे खुश हैं, बल्कि कुछ कुछ ऐसा हो रहा है जिससे समझ में यही आता है की आप बिना कुछ कहे भी आलोक जी की बातों को दिल में गहरे तक ले गए हैं, शायद तभी हम जैसे तमाम साथियों के अनुरोध के इस मुद्दे को लगातार तूल देते जा रहे हैं, भैय्या आलोक जी ने बाकायदा एक पोस्ट में आपसे विनम्रता से मुद्दे के समापन का अनुरोध किया है, फ़िर पता नही क्यूँ आप लगातार बढाते जा रहे हैं, ऑफिस आने के बाद कुछ साइट्स की लिस्ट है जिनपर अपने २ घंटे रोज देता हूँ उनमे विस्फोट भी है, दादा ये बताइए क्या राजीव जी का ताजा लेख इस लायक है की उसे विस्फोट पर जगह दी जाती, बिला शक राजीव जी का पिछला लेख संग्रहनीय था उसे पढ़ा आनंद आया, पर ये क्या की आलोक तोमर की सांकेतिक आलोचना करने वाले उनके बेहद घटिया और एकपक्षीय लेख को आपने छाप दिया, विस्फोट के किसी लेख को देख लीजिये आपकी नजर में विस्फोट का जो सबसे सतही लेख हो उसकी भी तुलना राजीव शर्मा जी के ताजा लेख से कर लीजिये यकीन जानिए इसको विस्फोट पर प्रकाशित करने का इसके सिवाय दूसरा कोई कारण आपको नजर नही आएगा की '' आपके मन में अभी भी कहीं आलोक तोमर के प्रति खलिश बाकी है'' दादा मयंक सक्सेना, मैंने और दूसरे कई युवा साथियों ने आपसे अपील की है की कृपा करके इस मामले का पटाक्षेप कर दें, पर पता नही क्या वजह है, विस्फोट जिसका शायद आपने कभी बेजा इस्तेमाल किया हो उसे उस दिशा में लेके चले जा रहे हैं जहाँ आपसे कई सवाल करने का मन करता है, दादा हाथ जोड़ता हूँ कृपा करके कुछ ज्वलंत और पहले की तरह बढ़िया आलेखों से दो चार कराइए, जो काम आपने आज तक नही किया आज भी न कीजिये, उम्मीद है मुझ नाचीज की बातों का मान रखेंगे, बिना किसी स्वार्थ के आपसे और आलोक जी दोनों से जुडाव है इसलिए आपसे प्रार्थना करता हूँ, न मैंने आलोक जी से कभी नौकरी की अपेक्षा की है ना आपसे किसी फायदे की अपेक्षा है, तो अब मान भी जाइए वरना दरियागंज आकर अनशन ही शुरू करना पड़ेगा, फ़िर पान खिलाने से भी मामला सुलझेगा नही,
आपका नालायक
हृदयेंद्र
..........................
भाई राजीव के नाम एक पाती,
भाई राजीव जी आपके संघर्ष को सलाम, आपके शब्दों से बेहतर पत्रकारिता करने की ललक किसी भी ठीक-ठाक आदमी को समझ आ जायेगी, पर भैय्या ये क्या गुड गोबर कर डाला आपने,
एक मामला जिसका समापन हर कोई चाहता है उसे फ़िर से तूल दे दिया और ऐसा वैसा नही बल्कि न जाने क्या क्या अनाप शनाप लिख डाला ख़ुद पढिये ''क्या दिल्ली जिसे देखने की अभी तमन्ना बाकी है, में रहने वाले सभ्य समाज और विशेषकर मीडिया के लोगों के बीच आपसी खीचंतान और व्यवहार कुछ ऐसा ही है जैसा असभ्य कहे जाने वाले हम जैसे ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के बारे में कहा जाता है। क्या दिल्ली हमारे उन इलाकों से भी बदतर है जहॉ लोग थूक कर चाटते है?'' भैय्या दिल्ली में चाट तो बहुत खायी है मैंने और मुझ जैसे कई तेवर वाले साथियों ने लेकिन थूक कर शायद ही किसी ने चाटाहो और आप ये शब्द उस आदमी के बारे में कह रहे हैं जिसके इतिहास और भूगो़ल के बारे में भी आपको नही मालूम, राजीव जी आप पत्रकारिता में आना चाहते हैं लेकिन बात एकतरफा करते हैं, भाई आपकी पोस्ट पढ़ कर यही लगा की आपने आलोक जी से ये आशा की थी की वो अपने संपर्कों के चलते कहीं न कहीं नौकरी दिला देंगे, भाई मेरे भी खानदान में कोई पत्रकार नही है लखनऊ से दिल्ली आया और बिना किसी की मदद के आज ठीकठाक मुकाम पर हूँ, यकीनन रास्ता बहुत ज्यादा कठिन था, पर धीरे धीरे रास्ता बनता गया, आपके लिए भी रास्ता बनेगा और कोई नही बनाएगा आप ख़ुद बना लेंगे, और अगर आप किसी से अपेक्षाएं कर रहे हैं की वो आपको पत्रकारिता में स्थापित करेगा तो ये आपका पलायनवादी रवैय्ये के सिवा और कुछ नही हो सकता, आलोक जी को आपने इसलिए बहुत कुछ संकेतों में भला बुरा कह दिया क्यूंकि वो आपको एक अदद नौकरी दिलाने में मददगार नही रहे , ये कहीं न कहीं किसी मुद्दे पर आपका स्टैंड कम खुन्नस ज्यादा लगती है, भाई हमसे आपसे तोमर जी उम्र में बेहद बड़े हैं और उनके लिए आप जिस भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं क्या अपने घर के बड़ों के लिए थूक के चाटना, और ना जाने क्या क्या शब्द इस्तेमाल करते हैं भैय्या इस दर्जे की भाषा के साथ आप पत्रकारिता में कीर्तिमान बनाने की उम्मीद करते हैं, जरा ठंडे दिमाग से सोचियेगा क्या सही है क्या ग़लत है, बहुत सारे उथले और बाजारू लोगों की तरह आप भी कीचड उछालने में जुट गए और आप चाहते हैं इस शैली को गले लगाया जाए, संजय जी से आपसे कम प्रेम नही करता हूँ
रह कोई अपेक्षा भी नही है, उनके ख़िलाफ़ कही एक-एक बात पर खून
खौलता
है इसलिए क्यूंकि उनके सरोकार मैंने भी देखें हैं, यकीनन आलोक जी ने जो विस्फोट के बारे में कहा उससे सहमत नही हूँ, पर बंधू आपको पता है इसके पीछे कितनी बड़ी साजिश काम कर रही है, पहले हमारे एक साथी को बलात्कारी साबित करने का कुचक्र उस घटिया जानवर अविनाश दाश ने किया अब वही नीच संजय जी और आलोक जी के बीच दुराव पैदा करने में लगा है क्या आपको पता है ये सब, शायद नही क्यूंकि आप राजस्थान के एक गाँव में बैठकर वो सब देख सुन नही पा रहे हैं जो हम देख समझ रहे हैं, ये सही है आलोक जी को थोड़ा सा उकसाइए और वो किसी की ऐसी तैसी करने के लिए तैयार हो जाते हैं, बेहद भावुक और भले आदमी हैं हाँ गुस्सा बहुत तेज आता है इसी का फायदा बहुतों ने उठाया और आज भी उनकी इसी कमजो़री का फायदा उठाकर कुछ नीच अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हैं
आप जिस मुद्दे पर बिना वजह दाना पानी लेकर कूद पड़े हैं उसके पीछे की कहानी जानते तो बेहतर होता, और यूँ ही सारे दिल्ली वालों और मीडिया वालों को गरियाकर अपने बारे में घटिया सोच बनाने के लिए मजबूर न करें, हो सकता है जिनसे आप मिले हों उनसे आपके अनुभव अच्छे न रहे हों लेकिन इसका मतलब ये नही की आप सबको एक तराजू में तौलें, आपको नौकरी नही दिला सकता पर वायदा है दिल्ली आइये जितना दिन रहना है मेरे घर रहिये मजे से और संघर्ष कीजिये आपको जरूर अपनी राय बदलने में मदद मिलेगी मेरे साथ रहकर, ये सही है पत्रकारिता में योग्य आदमी हैं नही और जो हैं वो हाशिये पर हैं, लेकिन इसका मतलब ये नही हर पत्रकार गड़बड़ है,
अंत में भैय्या ये बता दूँ संजय जी को कोई चुनौती नही दे रहा, आपकी ग़लतफ़हमी है, आलोक जी के मन में संजय जी के प्रति कोई दुराव नही है, बस आप जैसे भाई बंधू इसे तूल न दें तो सब कुछ मजे में चलेगा, और भाई एक बार आलोक तोमर से मिलिए तो उनके बारे में आपकी राय वो नही रहेगी जो आपके ताजा लेख में है, मेरा आपसे निवेदन है दिल्ली आइये और यहाँ संजय भाई साहब से मिलिए और आलोक जी से भी मिलिए इसलिए नही की ये आपको कोई नौकरी दिलाएंगे बल्कि इसलिए क्यूंकि पत्रकारिता के लिए बहुत कुछ नया बहुत कुछ अलहदा जानने समझने को आपको मिलेगा साथ ही मैं भी इसी बहाने बहुत कुछ जान लूँगा
कई मायनों में आपसे बहुत कम ज्ञान रखता हूँ, लेकिन अपने अनुभवों से इतना ही सीखा है की बड़ों को सिर्फ़ आदर ही दीजिये जीवन बड़ा चंगा बीतेगा, और जिनको आप लगभग गरिया रहे थे वो जब नही रहेंगे तब यकीन जानिए उनके बारे में किताबें और महाग्रंथ लिखे जायेंगे, जनसत्ता एक इतिहास है और उसमे काम करने वाले कई लोग इतिहासपुरुष रहे हैं, आपको बहुत बाद में पता चलेगा की एक छोटीसी खुन्नस में आपने किसको शब्दों की सूली पर चदा दिया है, आप जैसा भला आदमी मेरी बात पर गौर करेगा उम्मीद ऐसी ही है, ये सब संजय भैय्या और आलोक जी के बीच का मामला है वो बड़े लोग हैं हम क्यूँ उनके बीच में आए
हृदयेंद्र
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ALOKTomar on 26 June, 2009 04:05;09
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Sanjay bhai, Ye ho kyaa raha hai? dismanee lakh karo, par ye gunjaaish rahe, ki jab kabhee hum dost ban jaayen to sharmindaa na hon.
kahne ko sabke pas bahut kuchh hai, magar............?
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मयंक on 26 June, 2009 08:22;57
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संजय जी.
आपने तो बात खत्म कर दी थी....क्या बात पर टिके रहने का पत्रकारिता में चलन खत्म हो गया...पहले सर्वाधिकार असुरक्षित वाली बात और अब ये....आप कम से कम अपने स्तर और कद का तो ध्यान करें....
आपस में ही लड़ते रहेंगे क्या....पहले मामला खत्म किया और कहा कि कोई नाराज़गी नहीं और अब....दिल में कोई गुबार हो तो खुल के कहें...खुद कुछ लिखें...इस तरह पर्दे के पीछे से क्यों खेल हो...
जब किसी से कोई गिला रखना
सामने अपने आईना रखना

यूँ उजालों से वास्ता रखना
शम्मा के पास ही हवा रखना

घर की तामीर चाहे जैसी हो
इस में रोने की जगह रखना

मस्जिदें हैं नमाज़ियों के लिये
अपने घर में कहीं ख़ुदा रखना
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अवधेश आकोदिया on 26 June, 2009 10:04;31
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हृदयेंद्र भाई,
आपकी तरह मैं भी इस बेवजह विवाद से बेहद दुखी हूं। सबसे ज्‍यादा दुख की बात तो यह है कि इसे यहीं दफन करने की बजाय तूल दिया जा रहा है। आपकी तरह संजय भाई को मैं भी गुजारिश कर रहा हूं कि 'बीती ताही बिसार दे, आगे की सुध ले...'
वैसे हृदयेंद्र जी आपने राजीव जी को कुछ ज्‍यादा ही भला-बुरा कह दिया। वे भले आदमी हैं और इस विवाद से दुखी हैं। आलोक भाई के लिए उनके मन में कोई द्वेष नहीं है। दरअसल, वे भी भावनाओं में बहकर इतना कुछ कह गए। संजय जी से उनका जु़डाव ज्‍यादा गहरा है, इसलिए अनजाने में थोड़ी सी तरफदारी कर गए। चलिए, उम्‍मीद करते हैं इस विवाद पर मेरी यह पोस्‍ट आखरी होगी और सब मिलजुल कर साथ-साथ आगे बढ़ेंगे...
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image राजीव शर्मा राजीव शर्मा राजस्थान में रहकर मुक्त पत्रकारिता कर रहे हैं.इससे पूर्व कइ अखवारों के लिए रिपोटिंग कर चुके हें। राजनीति के अलावा पानी-पर्यावरण के मुद्दे पर संवेदनशील रिपोर्टिंग के लिए प्रयासरत। विस्फोट के लिए राजस्थान से नियमित लेखन और रिपोर्टिंग.
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प्रेमचंद के बहाने साहित्यकारों से दो बातें
महान कथाकार प्रेमचंद की कल जयंती बीत गई। मेरे जेहन में उनका जयशंकर प्रसाद के साथ खिंचवाई एक तसवीर ताजा हो गई है। इस तसवीर में कामायनी के रचयिता महाकवि प्रसाद धीर-गंभीर मुद्रा में खड़े हैं। लेकिन उनके साथ खड़े उपन्यास सम्राट की भंगिमा बिलकुल अलग है। उपन्यास सम्राट के फटे जूते से पैरों की अनामिका उंगली किंचित झांकती सी नजर आ रही है। प्रसाद जी की गंभीरता से ठीक उलट प्रेमचंद के स्मित होठ इससे बेपरवाह नजर आ रहे हैं।...
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