क्यों न हो हिंदी का जयगान?
दस जून को अमेरिका के ह्यूस्टन शहर स्थित अंतरराष्ट्रीय भाषा निगरानी समूह की नजर में जय हो शब्द भले ही मानक अंग्रेजी शब्दकोश में जगह बनाने में नाकाम रहा, लेकिन ये भी सच है कि जय हो का अंग्रेजी में जयगान उसी दिन शुरू हो गया था, जिस दिन फिल्म स्लमडॉग मिलियनायर जैसी अंग्रेजी दां फिल्म में इस गीत को शामिल किया गया था। हिंदीतर दुनिया के कम से कम उन लोगों से ये शब्द आज परिचय का मोहताज नहीं रहा, जिन्होंने फिल्म स्लमडॉग मिलियनायर देखी है।
किसी भी भाषा का शब्द समूह दो तरह का होता है, वाचिक और शास्त्रीय। वाचिक परंपरा में वे शब्द आते हैं, जिनका रोजमर्रा की जिंदगी में उस भाषा के बोलने वाले लोग इस्तेमाल करते हैं। जबकि शास्त्रीयता की कोटि में वे शब्द आते हैं, जिनका साहित्यिक और लेखन की दुनिया में मानक तौर पर इस्तेमाल होता है।
लेकिन जय हो अकेला शब्द नहीं है, जो अंग्रेजी की वाचिक दुनिया में स्थान बना पाया है। बोलचाल की भाषा के सबसे बेहतरीन वाहक इन दिनों मीडिया है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों के साथ ही अखबारों में भी आजकल आम बोलचाल की भाषा के शब्दों की भरमार है। ये कम बड़ी हैरत की बात नहीं है कि कभी हिंदी के नाम पर नाक भौं सिकोड़ने वाले भारतीय अंग्रेजी के अखबारों में भी आज हिंदी के शब्दों का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है। तड़का मार के, टशन, मसाला मार के जैसे शीर्षक आज अंग्रेजी के नामचीन अखबारों में भी देखे जा सकते हैं। जहां तक मानक डिक्शनरी में हिंदी के शब्दों की बात है तो भाषा इंडिया के मुताबिक करीब 700 हिंदी शब्द अपनी जगह बना चुके हैं। मजे की बात ये है कि इन शब्दों ने कोई पचीस-पचास सालों में ये जगह नहीं बनाई, बल्कि सोलहवीं शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्यवादी शासन व्यवस्था की भारत में नींव पड़ने के साथ ही शुरू हो गई, जो आज तक बदस्तूर जारी है। कई बार अंग्रेजों को कोई शब्द नहीं सूझा तो उन्होंने उसके मूल से जुड़े नए शब्द ही गढ़ लिए। 1857 में जब मंगल पांडे ने अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ विद्रोह शुरू किया तो अंग्रेजों ने इस पूरी प्रक्रिया के लिए पांडेमोनियम नाम का नया शब्द ही गढ़ दिया और विद्रोह का प्रतीक रहा ये शब्द आज ऑक्सफोर्ड इंगलिश डिक्शनरी में मजबूती से पैर जमाए खड़ा है। इसमें कई वैसे शब्द हैं, जिनका विकास उनके मूल हिंदी शब्दों से हुआ है तो कई शब्द ऐसे हैं, जिन्हें सीधे लिया गया है। इस कोटि में वे शब्द आते हैं, जिनका अंग्रेजी, लैटिन या फ्रेंच में कोई समानार्थी प्रतीक या शब्द नहीं था। आज योग अंग्रेजी में भले ही योगा हो गया हो, लेकिन उसे भुलाना आसान नहीं है। योग, साड़ी, खाकी, योग, स्वास्तिक और सती जैसे शब्द इसी श्रेणी में आते हैं। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि सिर्फ उन्हीं हिंदी शब्दों को सीधे शामिल किया गया, जिनके अंग्रेजी या यूरोपीय दुनिया में कोई पर्याय नजर नहीं आते थे। गुरू, जंगल, पंडित, धर्म जैसे ठेस भारतीय और संस्कृतनिष्ठ परंपरा वाले शब्द भी अंग्रेजी की मानक डिक्शनरियों की शोभा बढ़ा रहे हैं। इसकी वजह ये है कि इनके समानार्थी अर्थ अंग्रेजी में होते हुए भी इनका उच्चारण कुछ खास है, जो अंग्रेजी उच्चारण के नजरिए से मुफीद बैठता है।
हिंदी में जिसे हम छींट का कपड़ा कहते हैं, अंग्रेजी में थोड़े से हेरफेर के साथ इसे चींट कहा जाता है। दरअसल इस शब्द की व्युत्पति दक्षिण भारत के कालीकट में बनने वाले कपड़े से मानी जाती है। कालीकट से बनने वाले कपड़े को अंग्रेजी कैलिको कहते थे और जिन कपड़ों पर स्प्रे जैसी डिजाइन होती थी, उन्हें चींट कहते थे। हिंदीवालों ने इसे छींट कर लिया। अंग्रेज भला कहां कॉट पर सोते थे। हिंदी में चारपाई को खाट कहा जाता है और सत्रहवीं सदी में ही अंग्रेजों ने इस खाट को कॉट बनाकर अपने यहां जगह दे दी और खुद भी कॉट पर सोने लगे। पायजामा, धोती, कुर्ता भी सीधे-सीधे अंग्रेजी में जगह बना चुके हैं। एक ब्रिटिश रिकॉर्ड के मुताबिक पायजामा का उल्लेख 1634 में ही मिलने लगता है। इसी तरह जंगल और लूट ने भी ठीक मूल अर्थों में ही अंग्रेजी में जगह बना ली है। आपको ये जानकर ताज्जुब होगा कि संस्कृत के कालांतर शब्द से ही कैलेंडर निकला है। जो आज ना सिर्फ अंग्रेजी, बल्कि दुनियाभर की भाषाओं में दैनंदिन के लिए इस्तेमाल हो रहा है। इसी तरह पंजाबी शब्द खांड से आया शब्द अंग्रेजी में कैंडी बन गया है। अब सिर्फ भारतीय ही मसाले का इस्तेमाल नहीं करते, मसालों के साथ अंग्रेज भी चटनी, कबाब और बासमती चावल भी खाने लगे हैं। कहने का मतलब ये कि मसाला, चटनी और बासमती को भी अंग्रेजी में जगह मिल गई है। महंगे रेस्तरां में जाकर फ्रुट पंच पीने का चलन अब भारत में भी है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पंच भी पांच चीजों के मेल को कहते हैं और इसे अंग्रेजी ने पिछली ही सदी में अपना लिया था। लूट और ठग जैसे शब्द भी अब अंग्रेजी में जोरशोर से इस्तेमाल किए जा रहे हैं।
आपको ये जानकर हैरत होगी कि इंगलैंड में पक्का और मजबूत चीजों के लिए पक्का शब्द का ही इस्तेमाल होता है। मानसून भले ही भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि का मजबूत स्तंभ हो, अंग्रेजों ने भी इसे इसी रूप में अपना लिया है। जब मानसून आएगा तो भला अंग्रेजी मौसम क्यों ना खुशगवार हो। लिहाजा मौसम ने भी अंग्रेजी जुबान पर जगह बना ली है। अब अंग्रेज भी सफर से लौटकर बरामदे में सुस्ताते हैं और खाना बनाने में जाफरान यानी केसर का इस्तेमाल करते हैं। उनके यहां भी बालटी में पानी भरा जाने लगा है। इत्र से खुद को खुशबूदार बनाने की कोशिशें हो रही हैं।
पहले अंग्रेजों ने अपनी दैनंदिन और शासन की सहूलियतों के लिए हिंदी और भारतीय भाषाओं के शब्दों को अपनाया। लेकिन आज ये भूमिका बदल गई है। आज भारत का तकरीबन चालीस करोड़ लोगों का मध्यवर्ग पूरी दुनिया की नजर में बड़ा बाजार है और इसका एक बड़ा हिस्सा हिंदी ही बोलता है। लिहाजा आज अंग्रेजी जुबान वाले दुनिया के बड़े – बड़े तीसमार खां भी हिंदी बोलने के लिए मजबूर हुए हैं। जय हो इसी प्रक्रिया का एक उदाहरण है। जैसे – जैसे बाजारीकरण की ये प्रक्रिया बढ़ेगी, बाजार की जरूरतों के दबाव में ही सही, हिंदी का ये जयगान बढ़ेगा।
Title :
Body
- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
- हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
- सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
- टाटा-बिड़ला-अंबानी, पीयेंगे मध्य प्रदेश का पानी
- प्रेस क्लब ने खाना नहीं खिलाया, नोटिस थमा दिया
- पाँचना से फोन पर पानी पहुँचा घना



del.icio.us
Digg
Vishleshan kabhi bhi ekaangi nahin hona chahiye. Hindi ki bahut si seemayen hain. Vaigyanik shabdawali main Hindi ya to adhoori rah jati hai ya phir bahut bojhil ho jati hai. Angrezi ne agar Hindi shabdon ko apnaaya hai toh Hindi Kosh main bhi bahut se angrezi shabdon ne sthaan paya hai. Ginaane ki zaroorat hai kya ?
Angrezi jaanane wale log jaante hain ki angrezi saahitya zyada smriddh hai, usme vigyan, vipnan, chikitsa, shodh aadi kshetron main tark-sangat aur praasangik sahitya Hindi ke mukaable bahut adhik hai. Hindi sahitya main uss gahrayi ka atyant abhaav hai.
Sach toh yah hai ki aaj hum Hindi bhi angrezi main bolte hain. Iss sthiti ke zimmedaar hum Hindi waale hi hain jo apne aham se baahar nahin aa pate aur Hindi ke viruddh kahe gaye har sach ko jhuthlane ke liye kisi bhi had tak chale jate hain.
Hindi ka gungaan achhi baat hai, par Hindi main maankikaran ka abhaav araajkata ki had tak hai. Vice Chancellor aur Deputy Commissioner jaise aam shabd tak ke anuvaad ka maanakikaran toh hum kar nahin paaye. Hindi ke gungaan ke saath saath hamen Hindi ki kamiyon par bhi nazar rakhani hogi aur unhen door karne ka iemaandaar prayaas karna hoga, varna hum sirf Hindi ke gun gaate rah jayenge aur Angrezi se har pratiyogita main pichharte rahenge.
Dhanyavaad.
Post your comment