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खत्म होना चाहिए अंको का खेल

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हमारी शिक्षा प्रणाली पूरी तरह से अंकों के इर्द-गिर्द घूम कर रह गई है. प्रतिभा निखारने और उनमें आत्म विश्वास पैदा करने का काम हमारी शिक्षा व्यवस्था से दूर होता जा रहा है. बावजूद इसके, अगर आप में अपने मंजिल तक पहुंचने की दृढ़ इच्छा शक्ति और दृढ़ निश्चय है तो अंक कभी भी आप के कैरियर में रुकावट नहीं बन सकते.

स्कूल के नोटिस बोर्ड पर परीक्षा परिणाम देखते ही रमन की आंखों के सामने अंधेरा छा गया. उसे लगा की उसका करियर अब यहीं खत्म है. घरवाले उन्हें डाक्टर बनाना चाहते थे. लेकिन वे लगातार फेल हो रहे थे. बारहवीं में लगातार तीसरी बार फेल होने के बावजूद रमन ने धैर्य नहीं छोड़ा और पढ़ाई जारी रखी. चौथी बार वे साधारण अंकों से पास हुए. लेकिन मंजिल की तरफ बढ़ने का उनका प्रयास सतत जारी रहा. आखिरकार, उनकी मेहनत रंग लाई. 14 साल बाद एक और पल आया, जिसने रमन को उस बुलंदी पर पहुंचा दिया जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी. वे आज एक प्रतिष्ठत बहुराष्ट्रीय कंपनी में सलाहकार है. उन दो पलों को याद करते हुए रमन भाव विभोर हो उठते हैं. आंखे चमकाते हुए वे दार्शनिक अंदाज में कहते हैं, “पहला पल गहरी निराशा का था तो दूसरा हर्ष और उल्लास का. मनुष्य अपना अतीत तो नहीं, लेकिन मेहनत, लगन और धैर्य से अपना भविष्य जरूर बदल सकता है.”

हालांकि प्रोफेशनल कारणों से रमन अपना अतीत छुपाना चाहते हैं, इसलिए हमने यहां उनका असली नाम नहीं दिया है. लेकिन रमन का यह मूल मंत्र हमारे नौनिहालों के लिए एक संदेश है. रमन उन हजारों किशोरों के लिए एक मिसाल भी हैं जो बारहवीं की परीक्षा में फेल होने या फिर कम नंबर पाने की वजह से गहरी निराशा में डूब जाते हैं. अवसाद और हीन भावना से ग्रसित ऐसे किशोर युवकों को हम बताना चाहते हैं कि प्रतिभा को परीक्षा परिणाम के अंकों में नहीं समेटा जा सकता. ऐसे लाखों उदाहरण मिल जाएंगे, जो पढ़ाई में साधारण रहे, लेकिन अपनी मेहनत की वजह से वे उन बुलंदियों तक पहुंचे, जिसकी उनके परिवार (साधारण अंक पाने वाले लोगों से परिवार के लोग अच्छे करियर की उम्मीद नहीं करते) के लोगों ने कल्पना भी नहीं की थी. महान भारतीय संगीतकार ए आर रहमान पढ़ने में कतई मेधावी नहीं थे. लेकिन आस्कर पुरस्कार विजेता इस संगीतकार के संगीत की आज पूरी दुनिया में धूम है. लाखों युवाओं के आदर्श रहे सचिन तेंदुलकर की शैक्षिक योग्यता के बारे में किसी से छुपा नहीं है. महान वैज्ञानिक आंइस्टीन भी साधारण छात्र रहे हैं. उन्हें तो जोड़-घटाने में भी दिक्कत होती थी. बल्ब सहित सैकड़ों आविष्कार करने वाले थामस अल्वा एडिशन को उनके शिक्षक ने “डल स्टूडेंट” का तमगा दे रखा था. शिक्षकों की राय में एडिशन एक ऐसे छात्र थे जो कभी कुछ सीख ही नहीं सकते थे. न्यूटन ने गुरुत्वाकर्षण के सिंद्दांत की खोज कर भौतिकी की दुनिया ही बदल कर रख दी. वे भी एक सामान्य छात्र ही थे. महान लेखक एचजी वेल्स और प्रसिद्ध कारोबारी रिचर्ड ब्रैनसन अपनी स्कूली शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाए. महान भारतीय गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजम तो स्कूल में गणित को छोड़ कर बाकी सभी विषयों में फेल हो जाते थे. माइक्रोसाफ्ट के मालिक बिल गेट्स और हवाई जहाज का आविष्कार करने वाले राइट्स बंधु भी ज्यादा पढ़े लिखे नहीं थे. साठ हजार करोड़ से ज्यादा बड़ा व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा करने बाले धीरू भाई अंबानी को तो स्कूली शिक्षा भी ठीक से नसीब नहीं हो पाई थी. दुनिया को बदलने वाले गांधी और चर्चिल भी समान्य छात्र ही थे. इन साधारण छात्रों ने अपनी प्रतिभा और मेहनत से दुनिया को जो असाधारण चीजें दी, उससे वे महान बन गए

हमारी जो मौजूदा शिक्षा प्रणाली है और मुल्यांकन का जो तरीका है, वह कतई ठीक नहीं है. ऐसी व्यवस्था में प्रतिभा की बजाए अंकों को महत्व दिया जाता है. अंकों का खेल छात्रों में प्रतिभा निखारने की बजाए, उनमें अवसाद पैदा करता है. 60 फीसदी अंक पाने वाला छात्र प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हो कर खुद को गर्वांन्वित महसूस करता है, जबकि 59 फीसदी अंक पाने वाला छात्र द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण होकर निराशा में डूब जाता है. प्रसिद्ध समाजशात्री और पूर्व कुलपति प्रो सत्यमित्र दूबे परीक्षा मूल्याकंन प्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, “हमारी अंक प्रदान करने की पद्धति ही गलत है. शिक्षकों से एक दिन में बैठा कर कापियां जंचवा ली जाती हैं. शिक्षक के पास कोई तराजू तो नहीं है जिससे तोल कर वह अंक दे सके. हमारी मौजूदा मुल्याकंन प्रणाली निष्पक्ष नहीं है और इसमें मानवीय भूल की गुंजाइश कहीं ज्यादा है. इसीलिए ग्रेडिंग प्रणाली की बात की जा रही है.” टॉपरों की मेरिट लिस्ट भी छात्रों में निराशा और अवसाद पैदा करती है. उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने इस बारे में एक अच्छा कदम उठाते हुए पहले उसने टॉपरों की मेरिट लिस्ट जारी करने पर रोक लगा दी है और अब ग्रेडिंग प्रणाली को लागू कर दिया है. ऐसा कदम और राज्यों को भी उठाना चाहिए. कपिल सिब्बल का भी दसवीं के बोर्ड परीक्षा खत्म करने का प्रयास सराहनीय है. उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी जसबीर सिंह तो कोचिंग संस्थानों द्वारा टॉपर छात्रों के अखबारों में फोटो प्रकाशित करने पर भी सख्त एतराज करते हैं. वे कहते हैं, “इस तरह के फोटो प्रकाशित करने और टॉपर छात्रों के महिमा मंडित करने से दूसरे छात्रों में हीन भावना पैदा होती है. कई मामलों में तो हीन भावना इतनी बढ़ जाती है कि छात्र आत्म हत्या तक कर लेते हैं.” लिहाजा ऐसे पोस्टर और विज्ञापन प्रकाशित करने पर भी रोक लगानी चाहिए.

यदि एक छात्र किसी एक विषय में बहुत प्रतिभावान है लेकिन अन्य में नहीं, तो परीक्षा में उसके औसत नंबर ही आएंगे. लेकिन अगर छात्र की उस प्रतिभा को पहचान कर उसके मुताबिक उसे शिक्षा दी जाए तो वह सफलता के झंडे गाड़ सकता है. इसका उदाहरण सचिन तेंदुलकर हैं. अगर उनकी खेल प्रतिभा को उनके बड़े भाई ने पहचाना नहीं होता तो वह आज क्रिकेट के बादशाह नहीं होते. कई बार ऐसा भी देखा गया है कि अंकों के फेर में प्रतिभा को मार दिया गया. इस लेखक का एक दोस्त बचपन से पेंटिंग का शौक रखता था. स्कूल में पेंटिंग के शिक्षक न केवल उसकी तारीफ करते थे, बल्कि उसकी हर पेंटिंग पर वेरीगुड के रिमार्क भी देते थे. लेकिन माता-पिता के बेटे के डाक्टर बनाने की चाहत ने इस प्रतिभावान कलाकार को मार दिया. 12वीं में कम अंक आने से मेरे मित्र अवसाद ग्रस्त हो गए और बड़ी ही मुश्किल से बीएससी कर पाए. लेकिन आगे चल कर उन्हें अपनी इसी प्रतिभा के बल पर ही एक विज्ञापन एजेंसी में नौकरी मिली.

अंक कुछ हद तक आप की कामयाबी में भूमिका निभाते हैं लेकिन अंक ही सब कुछ है, यह सोचना गलत है. अंक किसी छात्र की प्रतिभा की सही कसौटी नहीं है. प्रतिभा को पहचानने और निखारने का काम शिक्षक और अभिभावक का होता है. लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे समाज और परिवार में आज भी अंकों को कहीं ज्यादा महत्व दिया जाता है. लिहाजा माता-पिता अंकों को स्टेटस सिब्बल मानने लगे हैं तो शिक्षक इसे अपनी काबिलियत का सर्टीफिकेट. आज भी सरकारी नौकरीरियों में बेहतरीन कैरियर भारतीय प्रशासनिक सेवा को ही माना जाता है. भारतीय प्रशासनिक सेवा का इतिहास अगर उठा कर देखें तो हम पाते हैं कि बारहवी और उच्च शिक्षा में साधारण अंक पाने वाले कई छात्र न केवल सफल हुए हैं बल्कि मेरिट में उच्च स्थान भी प्राप्त किया है. मेडिकल और इंजीनियरिंग में अच्छा कैरियर माना जाता है. इसलिए ज्यादातर माता-पिता अपने बच्चों पर विज्ञान विषयों की पढ़ाई करने का दबाव डालते हैं. इन छात्रों से अधिक अंकों की ज्यादा आशा की जाती है. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि कम अंक पाने वाले डाक्टर-इंजीनियर नहीं बनते.

कोटा को इंजीनियरिंग की प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने वाले छात्रों के लिए मक्का मदीना माना ज्यादा है. यहां के एक प्रमुख कोचिंग सेंटर कैरियर प्वाइंट के निदेशक (अकादमिक) शैलेंद्र माहेश्वरी भी कम अंकों को कैरियर में बाधक नहीं मानते. वे द संडे इंडियन से कहते हैं, “हमारे पास तो इंजीनियरिंग की कोचिंग के लिए कम अंकों वाले छात्र भी बहुतायत संख्या में आते हैं और वे सफल भी होते हैं. मैं ऐसे कई छात्रों को जानता हूं जिनका बारहवीं में थर्ड डीविजन था लेकिन वे देश के सर्वश्रेष्ठ इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में सफल हुए. इनमें से कई तो हिंदी माध्यम के छात्र थे.” वे आगे कहते हैं, “हालांकि पिछले कुछ सालों से आईआईटी की प्रवेश परीक्षा में शामिल होने के लिए 60 फीसदी अंक की सीमा निर्धारित कर दी गई है. लेकिन देश के और भी तमाम बेहतरीन इंजीनियरिंग संस्थान हैं जहां कम अंक वाले छात्र दाखिला पा सकते हैं.” उदारीकरण ने युवाओं के सामने कैरियर के तमाम नए रास्ते खोले हैं. नौकरी के साथ-साथ आप खुद उद्दमी भी बन सकते हैं. इसकी अपार संभावनाए हैं. पहले कभी मेडिकल और इंजीनियरिंग ही अच्छा कैरियर माना जाता था. लिहाजा विज्ञान संबंधित पाठ्यक्रमों की मांग कहीं ज्यादा थी. लेकिन बाजार के इस नए दौर में आईटी, प्रबंधन, होटल प्रबंधन, वाणिज्य, अर्थशास्त्र, सांख्यकी, अंतरराष्ट्रीय व्यापार, जन संचार, अंग्रेजी, संगीत, कला और अभिनय जैसे नए विषयों की बड़ी मांग है. दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो जे एल शर्मा कहते हैं, “देश में जिस तेजी से उदारीकरण और बाजार का विस्तार हो रहा है उससे तमाम ऐसे पाठ्यक्रमों की मांग बढ़ गई जिसे कभी “ड्राई सब्जेक्ट” कह के नकार दिया जाता था. पहले हिंदी और अंग्रेजी आनर्स की सीटें खाली पड़ी रहती थीं, लेकिन पिछले चार-पांच सालों से इसमें दाखिले के लिए मारा-मारी होती है.”

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image अनिल पाण्डेय पत्रकारिता में मास्टर डिग्री. नई दिल्ली से प्रकाशित दैनिक समाचारपत्र जनसत्ता में पांच साल तक संवाददाता. इसके बाद माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय के पत्रकारिता विभाग में पांच साल तक व्याख्याता के तौर पर कार्य किया. वर्तमान में 13 भाषाओं में प्रकाशित साप्ताहिक पत्रिका द संडे इंडियन में प्रमुख संवाददाता के रुप में कार्यरत.
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