दो दिन के आयोजन पर सिर्फ दो सवाल
भारतीय तंत्र शास्त्र बताता है कि मनुष्य 12 वर्ष में अपनी अवस्था बदल देता है. इसलिए भारतीय समाज व्यवस्था में 12 वर्ष का बड़ा महत्व होता है. हर बारहवें साल देश में महाकुंभ का आयोजन होता है. महाकुंभ के आयोजन के पीछे ऐसी व्यवस्था थी कि हर बारह साल में एक नयी पीढ़ी समाज में आकार ले लेती है इसलिए उस नये समाज के लिए व्यवस्था में जो बदलाव करने हैं उनकी संसद महाकुंभ में आयोजित की जाती है जिसे धर्म संसद कहते हैं.
इस धर्मसंसद में समाज और सन्यास दोनों ओर से प्रतिनिधि शामिल होते हैं और महीने भर की समीक्षा के बाद नयी व्यवस्था का सूत्रपात करते हैं जिसके सहारे फिर अगले बारह सालों तक समाज में चल संन्यासियों के भरोसे समाज व्यवस्था को संचालित किया जाता था. वह व्यवस्था अब लगभग टूट चुकी है. धर्म संसद के नाम पर विश्व हिन्दू परिषद संघ के राजनीतिक एजेण्डे पर चर्चा करती है और देश के मीडिया के जरिए लोगों को बताती है कि देखो धर्म संसद ने यह निर्णय किया है. चल सन्यासी भिखारी होकर दर दर भटकते हैं और महीने भर के लिए यहां भी आते हैं तो भीख मांगने से ऊपर कुछ सोच नहीं पाते. अखाड़े और पीठ अपने ऐश्वर्य के प्रदर्शन से ज्यादा कुछ सोच नहीं पाते हैं. समाज की नागा रक्षापंक्ति क्रूर और हिंसक दिखने के अलावा अपना कोई मोल नहीं समझती है. यह महाकुंभ जिस प्रयाग के पावन संगम पर होता है उसी प्रयाग में एक दो दिवसीय ब्लाग शिविर का भी आयोजन हुआ. नामकरण किया गया-चिट्ठाकारी की दुनिया.
उद्घाटन में ही देश के सर्वोच्च आलोचक और हम सबके बुजुर्ग नामवर सिंह ने बड़े झूठ से वज्रपात कर दिया- चिट्ठाकारी शब्द का आविष्कार हमारे विश्वविद्यालय की देन है. उनका विश्वविद्यालय यानी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा. उनके इस झूठे दावे पर कई ब्लागर नाराज हो गये. लेकिन नामवर सिंह कच्चे खिलाड़ी नहीं. शब्द, समाज और सत्ता तीनों को साधने में सिद्धहस्त हैं. बाहर मीडिया से मिले तो बोल पड़े- यह पांचवा स्तंभ है. संभवत: नामवर सिंह भी मानते हैं कि चार स्तंभ कमजोर हुए हैं इसलिए नियति के कारीगर ने इस पांचवे स्तंभ को गढ़ने का काम शुरू कर दिया है. लेकिन नियति की इस पांचवी कला के उद्घाटन में ही नये मीडिया माध्यम को नसीहत दी गयी- सावधान रहना. आजादी मिली है, तो गलती मत कर देना. संभलना. अपने ऊपर नियंत्रण रखना. अगर तुम अपने ऊपर नियंत्रण नहीं रखोगे तो सरकार तुम्हारे ऊपर नौकरशाही की नकेल डाल देगी. बोलने वाले सभी लोग लगभग एक सी ही बात कर रहे थे. शब्द थोड़े बहुत अलग-थलग जरूर थे लेकिन संदेश एक ही था- सावधान. इसमें नामवर सिंह से लेकर विभूति नारायण राय तक सभी ब्लागरों को यही नसीहत दे रहे थे. आप इनकी नसीहत सुनिये लेकिन गुनने से पहले सिर्फ एक बात जान लीजिए कि नसीहत देनेवाले लोग भी चीख चिल्लाकर यही कह रहे थे कि वे इस विधा को जानते भी नहीं है कि यह क्या बला है. फिर भी उनकी नसीहत सुनिये क्योंकि वे हमारी भाषा के स्वनामधन्य पितामह हैं.
इलाहाबाद में ब्लाग सेमीनार के नाम पर जो कुछ हुआ उसमें व्यवस्था बनाने की कोशिश की गयी लेकिन हुआ वही जो ब्लाग पर होता है. सब अपने अपने केन्द्र पर घूमते रहे और केन्द्र से छूटे तो वृत्त के ही बाहर चले गये. फिर भी ब्लागरों की इस नयी उभरती जमात ने किसी से कोई शिकायत नहीं की. मानो विविधता में एकता हिन्दी ब्लागरी का वास्तविक उद्घोष है. ब्लाग पर जाओ तो वही मिलेगा और धरातल पर आओ तो वही मिलेगा. यही भारत की खूबी है. जिसे आप घामड़पन घोषित करते हैं वह इस देश की वास्तविक मेधा है, जिसे आप भीड़ और कोलाहल कहते हैं वह इस देश की अव्यक्त व्यवस्था है और जिसे आप बिखराव समझते हैं वह इसकी विविधता में एकता है.
और जिनके सामने जिनके बारे में यह बात बोली जा रही थी, वे खुद क्या बोलते हैं? उद्घाटन भाषण में रतलाम के हिन्दी ब्लागर रवि रतलामी को एक प्रेजेन्टेशन देना था जिसमें वे बतानेवाले थे कि आप इंटरनेट पर अपना ब्लाग कैसे बनाएं? बहुत मुश्किल से आपाधापी के बीच वे दो चार स्लाइड दिखाकर चुप होकर बैठ गये. थोड़ा आश्चर्य हुआ लेकिन रहस्य अगले दिन पता चला जब रवि रतलामी ने स्वीकार किया कि वे पोडियम से घबराते हैं. और केवल रनि रतलामी ही नहीं, पोडियम से हर वो रचनाकार घबराता है जो रचनाधर्मी होता है. पोडियम और माइक उन्हें चाहिए जो विशुद्ध उद्घोषक होते हैं. जो लोग यह जानते हैं कि बोलना सिर्फ बोलने के लिए होता है आचरण में उतारने के लिए नहीं वे पोडियम पाते हैं तो धाराप्रवाह बोलते हैं और भूल जाते हैं. भारत में नये मीडिया माध्यम की जो आधारशिला पड़ रही है उसकी नींव में कोई नामवर सिंह नहीं है. उसकी नींव में ऐसे अनाम लोग हैं जिनकी कुल ताकत एक अदद ब्लाग और थोड़ा सा कामचलाऊं तकनीकि ज्ञान है. लेकिन क्योंकि यह नियति की योजना है कि पांचवा स्तंभ बनाना है इसलिए नियति इसके प्रचार और प्रसार का भी आयोजन कर रही है.
इस आयोजन में हिन्दी के जो कुछ लोग फन्दे में आ गये हैं वे तो इंटरनेट को समझने में ही चुके जा रहे हैं. इंटरनेट पर आने, खड़े होने, चलने और फिर दौड़ लगाने की न जाने कितनी तकलीफें हैं जिससे पार पाना ही सबसे बड़ी समस्या है. फिर अपनी अभिव्यक्ति भी कितनी? जितनी चादर, उतना पैर. लेकिन नये मीडिया माध्यम और खासकर ब्लाग ने आम जनमानस को यह आभास करा दिया है कि वह अपने आप को अभिव्यक्त कर सकता है इसलिए वह भागा दौड़ा बड़ी आस लगाए इंटरनेट की ओर चला आ रहा है. उद्घाटन के बाद दो दिनों तक इन्हीं बातों पर चर्चा होनी थी. हुई भी. लेकिन एक मजेदार बात यह दिखी कि नामवर सिंह के इस पांचवे स्तंभ का व्यवहार देखते तो समझ में आ जाता कि यह पांचवा स्तंभ कितना अनगढ़ और अबोध है.
इसलिए सवाल ब्लाग या नये मीडिया का नहीं है. सवाल है उस अभिव्यक्ति की चरम लालसा का जो भारतीय समाज में कूट-कूट कर भरी हुई है. दो दिन का यह ब्लाग सम्मेलन देखकर मन में यही सवाल उठता है कि आखिर कौन हैं वो लोग जिन्होंने सदियों, दशकों तक लोगों की अभिव्यक्ति पर अपने गुंडई की मुहर लगा रखी थी? कहीं ये वही लोग तो नहीं हैं जो आज स्वतंत्रता और स्वच्छंदता का भेद बताकर नौकरशाही की नकेल कसने की धमकी दे रहे हैं? हम ब्लागरों के सामने भी एक सवाल आया है कि बारह साल पर न सही शुरूआत में ही इस दो दिवसीय मिनी ब्लाग कुंभ से हम कौन सी व्यवस्था लेकर बाहर आये हैं? क्या हम ब्लाग को उसके अगले चरण में ले जाने के लिए तैयार हैं? पहले के दो सवाल आयोजकों के लिए तो बाद के दो सवाल ब्लागरों के लिए हैं. जवाब भी उन्हें ही देने हैं.
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Body
- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
- हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
- सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
- टाटा-बिड़ला-अंबानी, पीयेंगे मध्य प्रदेश का पानी
- प्रेस क्लब ने खाना नहीं खिलाया, नोटिस थमा दिया
- पाँचना से फोन पर पानी पहुँचा घना



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बस, एक बात साफ कर दूं कि मुझे कहा गया था कि समय कम है, (अतिथियों को ज्यादा बोलना है, ) अतः प्रस्तुति संक्षिप्त रखें. इसीलिए बात संक्षिप्त में की, और तकनीकी स्लाइडों को आगे खिसका दिया :)
वैसे, पोडियम से घबराता हूं - जैसे कि आपने कहा - हर रचनाकार घबराता है, पर उतना भी नहीं कि बात पूरी करने से पहले बैठ जाऊं :)
शुक्रिया.
बड़ी उम्दा प्रस्तुति .वापस यू यस आना था अतः मैं शामिल न हो सका . नामवर जी ने यह नहीं बताया की बिक चुके मीडिया का पर्याय बन कर यह ' पांचवा खम्भा उतर सकता है , और उसका एक्सटेंसन भी बन सकता है ' ?
यह महाकुम्भ भी आपकी शुरुआती बातों जैसा न बन जाये , देखते रहना है .
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