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चीं भाजपा का ई आंदोलन

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भारतीय संस्कृति और परंपराओं की दुहाई देने वाली पार्टी अब आधुनिक तकनीक का दामन थाम सत्ता शीर्ष तक पहुँचने की जुगत में लगी हुई है । इंडिया शाइनिंग और इंटरनेट के ज़रिये मतदाताओं को रिझाने की तमाम कोशिशें नाकाम होने के बावजूद बीजेपी का अब भी संचार के तेज़ी से उभरते नये माध्यम से मोहभंग नहीं हुआ है।

पार्टी के प्रमुख पदाधिकारियों ने हाल ही में एक प्रदर्शन देखा, जिसमें एक कम्प्यूटर पर एक साथ दस लोग काम करते दिखाये गये थे । गौरतलब है थिन क्लाइंट टेक्नॉलाजी पर आधारित साफ्टवेयर के जरिए एक बेसिक कम्प्यूटर का एक से अधिक लोग एक साथ उपयोग कर सकते हैं । इस तकनीक के इस्तेमाल से कम्प्यूटर खरीदी के खर्च में 60 प्रतिशत तक कटौती का दावा भी किया गया है। पार्टी की सोच है कि आईसीटी योजना के तहत हायर सेकेण्डरी तथा हाई स्कूलों के लिए बड़े पैमाने पर होने वाली कम्प्यूटर खरीदी सहित भविष्य में होने वाली सरकारी खरीद में ऐसी तकनीकी अपनाकर बड़ी बचत की जा सकती है। इसके लिए आंध्रप्रदेश का उदाहरण दिया जा रहा है, जहां नई तकनीक के जरिए कम खर्च में ज्यादा से ज्यादा स्कूली बच्चों को कम्प्यूटर मुहैया कराए गए हैं। बहुत सी सरकारी योजनाओं में स्कूलों के लिए कम्प्यूटरों की खरीदी होती है। सरकार की योजना में प्रत्येक स्कूल को 25-25 कम्प्यूटर तक दिए जाते हैं। परंपरागत तरीके से होने वाली इस खरीदी में एक कम्प्यूटर पर एक समय में एक विद्यार्थी ही काम कर सकता है । जबकि एक नए हार्डवेयर और साफ्टवेयर के उपयोग से उसी वक्त पाँच से दस विद्यार्थी एक साथ लाभान्वित हो सकेंगे।

मध्यप्रदेश में बीजेपी की सरकार और संगठन का तालमेल "राम मिलाई जोड़ी" सा प्रतीत होता है। राज्य सरकार एक रुपया बचाने के लिये सौ का नोट खर्चने में कोई गुरेज़ नहीं करती। गोया कि बचत हो ना हो बचत करते दिखना बेहद ज़रुरी है। उधर पार्टी के पदाधिकारी भी अब बचत की नायाब तरकीबें सुझाने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। मुख्यमंत्री महोदय आये दिन बचत का तुगलकी फ़रमान जारी करते हैं और "आगे पाठ पीछे सपाट" की तर्ज़  पर जल्दी ही भूल जाते हैं। मंदी और तँगी के दौर में राज्य सरकार की शाहखर्ची में भले ही कोई कमी नहीं आई हो, मगर मितव्ययिता का ढ़िंढ़ोरा पीटने में कोई कसर ना सरकार ने छोड़ी है और ना ही संगठन पीछे है । प्रदेश में इस तरह के तुगलकी फ़रमान आम बात है। प्रदेश में बिजली संकट बेकाबू हुआ, तो मुख्यमंत्री ने चंद कदमों का फ़ासला पैदल तय कर बैतूल ज़िले के सारणी में "कोयला सत्याग्रह" का बिगूल फ़ूँक दिया । बरसात के दिनों में सरकारी दफ़्तरों के एसी बंद रखने का फ़रमान जारी कर दिया । बिजली बचाने के लिये करोड़ों रुपए के सीएफ़एल बल्ब खरीद कर फ़िलामेंट बल्ब और ट्यूब लाइट बदलने की कवायद शुरु कर दी गई। ये और बात है कि सड़कों, दफ़्तरों और घरों में अब भी पुराने लट्टू ही जगमगा रहे हैं। पेट्रोल-डीज़ल महँगा हुआ, तो फ़ोटोग्राफ़रों और सरकारी गाड़ियों से घिरे मुख्यमंत्री महोदय ने साइकिल की सवारी कर जनता को फ़िज़ूलखर्ची पर लगाम कसने का पाठ पढ़ा डाला 

मितव्ययिता के नए नुस्खे तलाश रही मध्य प्रदेश सरकार को अब भाजपा संगठन ने भी खर्च घटाने के उपाय सुझाना शुरू कर दिया है। भाजपा ने स्कूली बच्चों को कम्प्यूटर शिक्षा के मामले में मितव्ययिता के साथ सुविधाओं के विस्तार का विकल्प सुझाया है। भाजपा की यह पहल राज्य सरकार द्वारा खरीदे जाने वाले कम्प्यूटरों को लेकर है। आमतौर पर सरकार के कामकाज में सीधे हस्तक्षेप से परहेज का दावा करने वाले संगठन का यह कदम सरकारी कामकाज में दखल नहीं है?यूँ तो चुनावों में "चीं" बोलने वाले दल ने महँगाई के मुद्दे पर ई-आंदोलन भी छेड़ा था । दो वक्त की रोटी को तरसते लोगों की लड़ाई कम्प्यूटर पर लड़ने का फ़ितूर पालने का अंजाम भी पार्टी के मौजूदा हाल ही की तरह रहा है। आई-टी सेल के प्रदेश महामंत्री सचिन खरे की अगुवाई में पिछले साल 9 नवंबर से मध्यप्रदेश के सभी जिलों में सेल के सदस्यों ने आंदोलन में हिस्सा लिया। आंदोलन के दौरान केंद्र सरकार की सभी ई-मेल, वेबसाइट, इंटरनेट, सोशल साइट, फेस बुक, ऑरकुट, ट्विटर और ब्लॉग पर जनजागरूकता अभियान चलाया गया। केन्द्र सरकार को जगाने के लिये नेताओं के मोबाइल पर असीमित एसएमएस भेजने की मुहिम चलाने की बात भी कही गई । लेकिन ई-आंदोलन का हश्र महँगाई के दिनोंदिन बढ़ते ग्राफ़ को देखकर सह्ज ही लगाया जा सकता है।  इंटरनेट की बदौलत संसद में बहुमत पा जाने का सपना चकनाचूर होने के बाद भी लगता है बीजेपी की अकल पर पड़े ताले की चाबी कहीं खो गई है। संसदीय चुनाव के बाद हुए विधान सभा चुनावों में कई राज्यों में भी मुँह की खाने के बावजूद पार्टी के होश ठिकाने पर नहीं आ सके हैं ।

इधर अपनी ही पीठ थपथपाने में माहिर प्रदेश के भाजपा नेता ना जाने किस खुशफ़हमी में जी रहे हैं। प्रदेश में ना बिजली है और ना ही पानी। गड्ढ़ों में सड़कों के अवशेष तलाश करना भूसे के ढ़ेर में सुई ढ़ूँढ़ने से भी ज़्यादा दुरुह काम हो चुका है। सूबे के मुखिया घोषणाएँ करने का विश्व रिकॉर्ड बनाकर नाम गिनीज़ बुक में दर्ज़ कराने पर आमादा हैं और फ़िर भी प्रदेश में अमन-चैन है । शिवराज भरी सभा में मान चुके हैं कि पूरे सूबे पर तरह-तरह के माफ़ियाओं ने कब्ज़ा कर लिया है। मगर बीजेपी नेता मानते हैं कि प्रदेश में रामराज्य की कल्पना को शिवराज ने पूरी तरह साकार कर दिखाया है।

वन विभाग के नये मंत्री सरताजसिंह ने आते ही महकमे में चल रही पोलपट्टियाँ खोलकर रख दीं। गृहमंत्री खुद मान चुके हैं कि प्रदेश में कानून-व्यवस्था बुरी तरह चरमरा चुकी है। मगर छह साल से शासन कर रहे दल के इन मंत्री महोदय की महानता तो देखिये वे इस बदहाली का पूरा "श्रेय" अब भी काँग्रेस को देना नहीं भूलते। भाजपा के सभी नेता घोषणावीर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की शान में कसीदे पढ़ते हैं। वृंदावली गाने वाले प्रदेश में दूसरी बार सरकार बनने का श्रेय चौहान को ही देने में ज़रा भी देर नहीं लगाते।

प्रवचन की शैली में जनता को अपने कर्तव्यों का पाठ पढ़ाने वाले शिवराज मलाई अपने ईष्ट मित्रों के साथ सूँतना चाहते हैं और काम का बोझ जनता के कँधे पर डाल देना चाहते हैं। अफ़सर भी इस चालाकी को अच्छी तरह भाँप चुके हैं, तभी तो वे पीपीपी(पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप) के नाम पर ऎसी स्कीम बना कर लाते हैं जो नेता का भला तो करें ही, वे भी बहती गंगा में ना सिर्फ़ हाथ धोएँ , बल्कि अच्छी तरह मल-मल कर नहा-धो सकें।

प्रदेश में हाल का मंत्रिमंडल  विस्तार बताता है कि केन्द्रीय नेतृत्व ने शिवराज को समझा दिया है कि बात की कीमत जाये चूल्हे में, दागी का मसला गया तेल लेने, खिसकते जनाधार को देखते हुए माल अँटी में करो और बढ़ लो , लिहाज़ा "हम सब एक हैं" की शैली ने सभी विरोधों को भुला कर हर गुट को बराबर मौका दिया गया । इसीलिये भूमाफ़ियाओं को जेल की सलाखों के पीछे भेजने का एलान करने वाले मुख्यमंत्री ने झुग्गियों और मंदिरों के ज़रिये बेशकीमती ज़मीने कबाडने वालों को ऎलानिया संरक्षण दे रहे नेता को गृह मंत्री का ताज पहना दिया । सरकारी ज़मीनों की उद्योगपतियों और नेताओं की मिली भगत से लूट खसोट जारी है , मगर जनता चुप है । मेहमूद गज़नवी को पानी पी-पी कर कोसने वाले लोगों ज़रा इन गज़नवियों की फ़ौज पर भी नज़रे इनायत करें और बतायें कि साधु के भेष में दाखिल हुए इन लुटेरों से कैसे निजात पायें ?

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सुरेश चिपलूनकर on 05 January, 2010 17:49;57
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सरिता जी, भाजपा कितनी भी बुरी हो, फ़िलहाल कांग्रेस से तो "ठीक" ही है… और कोई विकल्प भी तो नहीं है…। कांग्रेस को केन्द्र में लोगों ने नहीं बदला इधर राज्य में लोगों ने भाजपा को नहीं बदला…। दोनों लूट रहे है, लेकिन किया भी क्या जा सकता है…। हां इतना जरूर है कि जिस प्रकार पत्रकार-बुद्धिजीवी भाजपा-संघ के पीछे एकतरफ़ा पड़े रहते हैं, उससे किसी साजिश की बू अवश्य आती है… वरना कांग्रेस ने केन्द्र में क्या कम सितम ढाये हैं, लेकिन फ़िर भी पत्रकारों को इस बात की चिन्ता ज्यादा होती है कि भाजपा का अध्यक्ष कौन बनेगा… आडवाणी का क्या होगा, सुषमा किसके पाले में हैं आदि-आदि। निश्चित रूप से इसके पीछे कुछ न कुछ तो है ही… माना कि दोनों पार्टियां चोर हैं लेकिन सिर्फ़ एक को ही लगातार निशाना बनाना, कहीं विशिष्ट घोटाला तो नहीं?
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सोनू on 05 January, 2010 21:00;37
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वृंदावली या विरुदावली?

विरुदावली, स्त्री. [सं.ष.त.] 1.विरुदों या पदवियों का संग्रह। 2.किसी बड़े व्यक्ति के गुणों,पराक्रम आदि का होनेवाला विस्तार-पूर्वक वर्णन। 3.गुणावली।
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virendra jain on 05 January, 2010 22:40;54
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दोनों ही पार्टियों को चोर मानने के लिये सुरेश जी साधुवाद के पात्र हैं भले ही उन्होंने अपने प्रचार ब्लाग में कभी भाजपा के काले कारनामों पर सीधा हमला नहीं किया. भाजपा के साथ दिक्कत यह है कि कोढ के साथ खाज अर्थात साम्प्रदायिकता भी जुड़ी हुयी है। आर्थिक भ्रष्टाचार को तो कभी भी घुटना रखकर निकाल लेंगे पर इस साम्प्रदायिकता से जो देश टूट जायेगा उसका क्या करेंगे?
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Jeet Bhargava on 05 January, 2010 23:54;54
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सुरेशजी की बात से पूर्णत: सहमत हूँ. आखिर एकतरफा लेखन करके पत्रकार बिरादरी क्या साबित करना चाहती है?? क्या उसे अपनी विश्वसनीयता की ज़रा भी फिक्र नहीं??
न जाने क्यूँन जाने क्यूँ आप बात-बेबात भाजपा के पीछे पड़ जाते हैं. कम से कम निकम्मी कांग्रेस से तो भाजपा बेहतर ही है. आप बात-बेबात भाजपा के पीछे पड़ जाते हैं. कम से कम भोंदू युवराज और महारानी के तलवे चाटने वाली निकम्मी कांग्रेस से तो भाजपा बेहतर ही है.
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Animesh Arya on 06 January, 2010 00:08;54
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एक तरफ़ा और एकांगी लेख. ऐसा लगता है मानो कोंग्रेस की प्रेस विज्ञप्ति हो.
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Shakti Prakash Devshali on 06 January, 2010 12:10;06
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The article seems to be one sided only and is more an election speech instead of article.
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sunita yadav on 09 February, 2010 14:10;04
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मै सुनीता यादव अमर सिंह जी आप मुलायम जी को तभी मात दे सकते है जब आप यादव वर्ग से जुडे और यादव महिलायें राजनीति में आना चहाती है और आप उनको साथ में लें फिर देखे नेता जी का दहन कैसे होता है यह आपको सलाह मैं इस लिए दे रही है कि मै भी एक यादव हूँ फिर भी मैं और मेरे से जुडे लोग उनको पंसद नहीं करते।
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image सरिता अरगरे संघर्ष को पत्रकारिता से जोड़नेवाली सरिता अरगरे भोपाल में रहती हैं और पारिवारिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच भी पत्रकारिता के प्रति पूरी तरह से समर्पित. विस्फोट के अलावा विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन और दूरदर्शन में अंशकालिक पत्रकार के बतौर कार्यरत.
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