जनता के लिए जनता द्वारा जन-पत्रकारिता
इधर हाल के दिनों में विस्फोट से जुड़े लेखकों को हमने एक इमेल किया था. इमेल में मैंने कुछ संक्षिप्त चर्चा पत्रकारिता पर पूंजी के प्रभाव के बारे में की थी. प्रतिउत्तर में कुछ जवाब आये जिसमें एक जवाब महत्वपूर्ण है. पुष्यमित्र पूछते हैं, थोड़ा और विस्तार से समझाइये.
विस्तार यह कि पिछले दो साल में इस काम के साफ तौर पर दो हिस्से नजर आ रहे हैं. पहला साल उत्साह, उमंग और उभार का साल था. मैं बिल्कुल ही कल्पना नहीं करता था कि कौन जुड़ेगा या नहीं जुड़ेगा. मैं खुद वह सब कुछ लिखना पढ़ना चाहता था इसलिए साइट बनाई, उसके विषय निर्धारित किये और चल पड़ा. चला तो फिर लोग भी आ गये. किसी काम के प्रति ऐसा उमंग मुझे खुद आश्चर्यजनक लगा था. लेकिन पहला साल ऐसे ही बीता. मुश्किल शुरू हुई पहला साल बीतने के साथ. दूसरे साल में मेरी धारणा में थोड़ा बदलाव आ गया और लगा कि लोग लिखेंगे, आवाज उठायेंगे, बोलेंगे इसलिए जो जुड़े थे उनसे साधिकार कहना शुरू किया कि आपको यह काम ऐसे करना चाहिए. यहीं से गड़बड़ शुरू हो गयी.
मुझे सचमुच इस बात का अंदाज बहुत देर से लगा कि अभिव्यक्ति के इस बेहद प्रभावी माध्यम को एक पेशे के तौर पर विकसित कर दिया गया है जिसे पत्रकारिता कहते हैं. मेरी समझ में कभी यह नहीं आया कि अगर हम कोई घटनाक्रम देखते हैं तो फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया के लिए हम किस बात की उम्मीद करते हैं? दुखद रूप से वह सिर्फ पैसा होकर रह गया है. जिसे आम अवाम नेशनल मीडिया कहता है उस नेशनल मीडिया की दशा क्या पूरी दुर्दशा है. हर व्यक्ति जो अपने आपको पत्रकार कहकर परिभाषित करता है वह देखे को बता देने की फीस वसूली करता है. यहीं से आम सूचना कर्म पत्रकारिता का रास्ता पकड़ती है और वणिक जन इसे पैसे से जोड़कर इसे व्यापार बना देते हैं. बस सामान्य लिखना पढ़ना पूंजी के प्रभाव में आ जाती है और लिखनेवाला सोचता है कि मुझे इस काम के लिए पैसा मिलना चाहिए क्योंकि आगे मेरे ही लिखे को आधार बनाकर वणिक जन व्यापार करते हैं. लेकिन जरा रुकिये. किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जरूरत नहीं है.
विस्फोट के कारण कितनों का अभीष्ट पूरा हुआ, नहीं कह सकता लेकिन विस्फोट का अभीष्ट अभी अधूरा है. जिस समग्रता में जनता की पत्रकारिता होनी चाहिए उसमें शायद कमी है. यह कमी दूर करने के बारे में एक बार फिर सोच विचार करने की जरूरत महसूस हो रही है.
हम तथाकथित पत्रकार बिरादरी तो सूचना देने के लिए आये थे न? तो फिर पूंजी की बाध्यकारी अवधारणा हमारे लिए बाधक कैसे हो गयी? अव्वल तो शिकायत यह होती है कि साहब, हमें मौका नहीं मिल रहा है. फिर मौका मिला तो सुविधा नहीं मिल रही है. फिर सुविधा मिली तो माहौल खराब है. फिर माहौल ठीक किया तो घर में हालात अच्छे नहीं है. घर के हालात अच्छे हुए तो मन खिन्न है. हर पत्रकार के पास काम न करने के ऐसे ही सैकड़ों बहाने और झूठी दलीले हैं. अगर हम किसी भी पत्रकार को पकड़कर उसके व्यक्तित्व को एनेलाइज करें तो अंतत: इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगे कि भैया, यह काम नहीं करना चाहता, बाकी सिर्फ बहाने हैं. कोई भी पत्रकार ओढ़े गये तनाव के आडम्बर से बाहर ही नहीं आना चाहता. क्रांति करते करते अब वह क्या करने लगा है, उसे खुद भी कुछ नहीं मालूम है. जब आप पूंजी के प्रभाव में आकर व्यावसायिक बुद्धि ग्रहण कर लेते हैं तो आप कोई भी काम तभी करते हैं जब उसका पारिश्रमिक मिलता है. अन्यथा आप ता उम्र बिना काम किये बैठे रहेंगे लेकिन बिना पूंजी प्राप्ति के काम नहीं करेंगे. मीडिया ऐसी ही मानसिकता वाले पत्रकारों की गिरफ्त में चली गयी है.
ये बातें कहने का कोई खास मतलब नहीं है. मतलब सिर्फ इतना ही है आम जन इस बात की उम्मीद छोड़ दें कि कारपोरेट पत्रकार उनके लिए कभी पत्रकारिता करेगा. किसी भी कार्य के लिए जब पूंजी निर्धारक तत्व हो जाती है तो वह कार्य मानवता के खिलाफ चला जाता है. पत्रकारिता की दुनिया में कारपोरेट पत्रकार पूंजी का गुलाम है क्योंकि उसे भी अपना घर चलाना है, परिवार पालना है और सामाजिक संबंधों का निर्वहन करना है. आप कुछ भी करें, आखिरकार आपको धन तो कमाना ही चाहिए. पत्रकारिता के सामने यह संकट नहीं है, विरोधाभास है जो उसे जन सूचना कर्म और व्यावसायिकता के बीच फंसा रहा है.
लेकिन कहते हैं जहां एक रास्ता बंद होता है वहां दूसरा शुरू हो जाता है. इधर डिजिटल मीडिया ने वह दूसरा रास्ता खोल दिया है. लेकिन मुश्किल यह है कि यहां अकेलापन सबको बहुत आकर्षित करता है. सामूहिक प्रयास सफल नहीं हो रहे हैं. हर तल पर हमारे भारतीय मानस के विरोधाभास हावी होते जा रहे हैं. फिर वह मानसिकता तो सनातन रूप से मौजूद ही है कि लिखना पढ़ना पूंजी न पैदा करे तो ऐसा लिखना पढ़ना बेकार है. क्यों जी? और फिर कोई संजय तिवारी "अपना" विस्फोट चला रहे हैं तो हम उनके लिए मुफ्त में क्यों लिखें?........विस्फोट का दूसरा साल इसी संघर्ष में बीता है. हो सकता है कि हमारे अंदर कोई ऐसी कमी हो कि हम यह समझाने में पूरी तरह से नाकामयाब रहे हों कि मेरा मन व्यावसायिक नहीं है लेकिन लोगों ने इसे ही गांठ बांध ली. मुझे बहुत बाद में समझ में अच्छा कन्टेन्ट प्रभाव ही नहीं पूंजी का भी वाहक होता है. इसलिए उसकी कीमत लगानी चाहिए. मेरी समझ में अच्छा कन्टेन्ट प्रभाव पैदा करनेवाला होना चाहिए, पूंजी पैदा करनेवाला नहीं. लेकिन लोग शायद इसे अब मानने को तैयार नहीं हैं.
अब सवाल है कि ऐसी परिस्थितियों में करें क्या? अपना काम है अलख जगाना और वह करते रहेंगे. यह काम पूरेपन में हो इसके लिए इसका दर्शन बनाये रखना जरूरी है. कोई भी काम उसके दर्शन से आंका जाता है. और विस्फोट का दर्शन पूंजी उत्पादन की पत्रकारिता की बजाय प्रभाव पैदा करनेवाली पत्रकारिता का ही बना रहेगा. क्यों जी, कुछ गलत बोल रहा हूं?
Title :
Body
- ममता के दरबार में कांग्रेस की सरकार
- आतंकवाद की राजनीति और मीडिया
- राजनीतिक हिन्दुत्व पर दिग्गी का दांव
- कृष्णं वन्दे जगतगुरुम्
- हरिप्रसाद का लोकतंत्र 'हठ'
- 'हिंदुस्तान' ने पूर्णिया को शर्मसार कर दिया
- सुखाड़ का शिकार हो गया बिहार
- टाटा-बिड़ला-अंबानी, पीयेंगे मध्य प्रदेश का पानी
- प्रेस क्लब ने खाना नहीं खिलाया, नोटिस थमा दिया
- पाँचना से फोन पर पानी पहुँचा घना



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जो पैसे लेकर लिखने की बात करते हैं, उन्हें जरा कहिए कि वे हिंदुस्तान, अमर अजाला, नवभारत टाइम्स आदि अपने यहां प्रकाशित आलेखों के बदले पैसे मिलते हैं। जरा लेख भेज कर तो देखें, छपता है कि नहीं? और छपता है तो कितना कमाते हैं?
You doing great job. Keep it up.
Regards
संजय तिवार जी मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हँू। आपने जितने भी कारण अपनी बात को सिद्ध करने के लिये गिनाये हैं। सभी तार्किक हैं। हाँ इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि जीवन चलाने के लिये धन की जरूरत होती है और व्यक्ति धन कमाने के लिये अपने हुनर का उपयोग करता है। अनेक लोगों का मानना है कि लेखन भी वह हुनर है, जिसके माध्यम से धन कमाया जा सकता है। आज के परिप्रेक्ष में उनका ऐसा सोचना प्रारम्भिक अवस्था में गलत भी नहीं है, लेकिन आगे चलकर यही सोच विकृत मानसिकता को जन्म देती है। जब लेखन पैसा कमाने के जरिये के रूप में एक आधार बना जाता है तो लेखक या पत्रकार वह नहीं लिखता है, जो समाज या मानवता या प्रकृति के संरक्षण और, या इन सबके उत्थान के लिये जरूरी है, बल्कि ऐसे हालात में ऐसे विषय और ऐसी बातें बढा-चढाकर लिखी जाने लगती हैं, जो धनात्सर्जन कर सकें। यहीं से पत्रकारिता का बण्टाधार होना शुरू हो जाता है। अतः घूम फिरकर पत्रकारिता की ऐसी-तैसी करने वाले लोग पत्रकार कर्म में शामिल हो जाते हैं।
आपका दर्द सही है, आपकी सोच भी सही है। इस सम्बन्ध में मेरा एक विनम्र सुझाव है। अभी भी समाज में ऐसे लोगो की कमी नहीं है, जिनके पास न्यूनतम जरूरत के आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं और जो धन को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं मानते हैं तथा ऐसे लोगों के दिल में भी अपने आसपास की घटनाओं को लेकर दर्द है। यही नहीं उनमें अनेक संवेदनशील हैं और कुछ तो लिखना भी जानते हैं। यदि ऐसे लोगों को लेखन कला में, भाषा में और भावाभिव्यक्ति में कमजोर होने के उपरान्त भी आप अवसर देते हैं तो आपके मिशन में ऐसे लोग सच्चे सहयोगी बन सकते हैं। और भी बहुत सारे तरीके हो सकते हैं, सच्चे लेखकों तक पहुँचने के, प्रयास करते रहना चाहिये।
-लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध १९९३ में स्थापित एवं १९९४ से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें २८ जनवरी, २०१० तक, ४०४९ रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के १७ राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. ०१४१-२२२२२२५ (सायं ७ से ८ बजे)
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