Home | बात करामात | जनता के लिए जनता द्वारा जन-पत्रकारिता

जनता के लिए जनता द्वारा जन-पत्रकारिता

image

इधर हाल के दिनों में विस्फोट से जुड़े लेखकों को हमने एक इमेल किया था. इमेल में मैंने कुछ संक्षिप्त चर्चा पत्रकारिता पर पूंजी के प्रभाव के बारे में की थी. प्रतिउत्तर में कुछ जवाब आये जिसमें एक जवाब महत्वपूर्ण है. पुष्यमित्र पूछते हैं, थोड़ा और विस्तार से समझाइये.

विस्तार यह कि पिछले दो साल में इस काम के साफ तौर पर दो हिस्से नजर आ रहे हैं. पहला साल उत्साह, उमंग और उभार का साल था. मैं बिल्कुल ही कल्पना नहीं करता था कि कौन जुड़ेगा या नहीं जुड़ेगा. मैं खुद वह सब कुछ लिखना पढ़ना चाहता था इसलिए साइट बनाई, उसके विषय निर्धारित किये और चल पड़ा. चला तो फिर लोग भी आ गये. किसी काम के प्रति ऐसा उमंग मुझे खुद आश्चर्यजनक लगा था. लेकिन पहला साल ऐसे ही बीता. मुश्किल शुरू हुई पहला साल बीतने के साथ. दूसरे साल में मेरी धारणा में थोड़ा बदलाव आ गया और लगा कि लोग लिखेंगे, आवाज उठायेंगे, बोलेंगे इसलिए जो जुड़े थे उनसे साधिकार कहना शुरू किया कि आपको यह काम ऐसे करना चाहिए. यहीं से गड़बड़ शुरू हो गयी.

मुझे सचमुच इस बात का अंदाज बहुत देर से लगा कि अभिव्यक्ति के इस बेहद प्रभावी माध्यम को एक पेशे के तौर पर विकसित कर दिया गया है जिसे पत्रकारिता कहते हैं. मेरी समझ में कभी यह नहीं आया कि अगर हम कोई घटनाक्रम देखते हैं तो फिर उस पर अपनी प्रतिक्रिया के लिए हम किस बात की उम्मीद करते हैं? दुखद रूप से वह सिर्फ पैसा होकर रह गया है. जिसे आम अवाम नेशनल मीडिया कहता है उस नेशनल मीडिया की दशा क्या पूरी दुर्दशा है. हर व्यक्ति जो अपने आपको पत्रकार कहकर परिभाषित करता है वह देखे को बता देने की फीस वसूली करता है. यहीं से आम सूचना कर्म पत्रकारिता का रास्ता पकड़ती है और वणिक जन इसे पैसे से जोड़कर इसे व्यापार बना देते हैं. बस सामान्य लिखना पढ़ना पूंजी के प्रभाव में आ जाती है और लिखनेवाला सोचता है कि मुझे इस काम के लिए पैसा मिलना चाहिए क्योंकि आगे मेरे ही लिखे को आधार बनाकर वणिक जन व्यापार करते हैं. लेकिन जरा रुकिये. किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की जरूरत नहीं है.

विस्फोट के कारण कितनों का अभीष्ट पूरा हुआ, नहीं कह सकता लेकिन विस्फोट का अभीष्ट अभी अधूरा है. जिस समग्रता में जनता की पत्रकारिता होनी चाहिए उसमें शायद कमी है. यह कमी दूर करने के बारे में एक बार फिर सोच विचार करने की जरूरत महसूस हो रही है.

हम तथाकथित पत्रकार बिरादरी तो सूचना देने के लिए आये थे न? तो फिर पूंजी की बाध्यकारी अवधारणा हमारे लिए बाधक कैसे हो गयी? अव्वल तो शिकायत यह होती है कि साहब, हमें मौका नहीं मिल रहा है. फिर मौका मिला तो सुविधा नहीं मिल रही है. फिर सुविधा मिली तो माहौल खराब है. फिर माहौल ठीक किया तो घर में हालात अच्छे नहीं है. घर के हालात अच्छे हुए तो मन खिन्न है. हर पत्रकार के पास काम न करने के ऐसे ही सैकड़ों बहाने और झूठी दलीले हैं. अगर हम किसी भी पत्रकार को पकड़कर उसके व्यक्तित्व को एनेलाइज करें तो अंतत: इसी निष्कर्ष पर पहुंचेगे कि भैया, यह काम नहीं करना चाहता, बाकी सिर्फ बहाने हैं. कोई भी पत्रकार ओढ़े गये तनाव के आडम्बर से बाहर ही नहीं आना चाहता. क्रांति करते करते अब वह क्या करने लगा है, उसे खुद भी कुछ नहीं मालूम है. जब आप पूंजी के प्रभाव में आकर व्यावसायिक बुद्धि ग्रहण कर लेते हैं तो आप कोई भी काम तभी करते हैं जब उसका पारिश्रमिक मिलता है. अन्यथा आप ता उम्र बिना काम किये बैठे रहेंगे लेकिन बिना पूंजी प्राप्ति के काम नहीं करेंगे. मीडिया ऐसी ही मानसिकता वाले पत्रकारों की गिरफ्त में चली गयी है.

ये बातें कहने का कोई खास मतलब नहीं है. मतलब सिर्फ इतना ही है आम जन इस बात की उम्मीद छोड़ दें कि कारपोरेट पत्रकार उनके लिए कभी पत्रकारिता करेगा. किसी भी कार्य के लिए जब पूंजी निर्धारक तत्व हो जाती है तो वह कार्य मानवता के खिलाफ चला जाता है. पत्रकारिता की दुनिया में कारपोरेट पत्रकार पूंजी का गुलाम है क्योंकि उसे भी अपना घर चलाना है, परिवार पालना है और सामाजिक संबंधों का निर्वहन करना है. आप कुछ भी करें, आखिरकार आपको धन तो कमाना ही चाहिए. पत्रकारिता के सामने यह संकट नहीं है, विरोधाभास है जो उसे जन सूचना कर्म और व्यावसायिकता के बीच फंसा रहा है.

लेकिन कहते हैं जहां एक रास्ता बंद होता है वहां दूसरा शुरू हो जाता है. इधर डिजिटल मीडिया ने वह दूसरा रास्ता खोल दिया है. लेकिन मुश्किल यह है कि यहां अकेलापन सबको बहुत आकर्षित करता है. सामूहिक प्रयास सफल नहीं हो रहे हैं. हर तल पर हमारे भारतीय मानस के विरोधाभास हावी होते जा रहे हैं. फिर वह मानसिकता तो सनातन रूप से मौजूद ही है कि लिखना पढ़ना पूंजी न पैदा करे तो ऐसा लिखना पढ़ना बेकार है. क्यों जी? और फिर कोई संजय तिवारी "अपना" विस्फोट चला रहे हैं तो हम उनके लिए मुफ्त में क्यों लिखें?........विस्फोट का दूसरा साल इसी संघर्ष में बीता है. हो सकता है कि हमारे अंदर कोई ऐसी कमी हो कि हम यह समझाने में पूरी तरह से नाकामयाब रहे हों कि मेरा मन व्यावसायिक नहीं है लेकिन लोगों ने इसे ही गांठ बांध ली. मुझे बहुत बाद में समझ में अच्छा कन्टेन्ट प्रभाव ही नहीं पूंजी का भी वाहक होता है. इसलिए उसकी कीमत लगानी चाहिए. मेरी समझ में अच्छा कन्टेन्ट प्रभाव पैदा करनेवाला होना चाहिए, पूंजी पैदा करनेवाला नहीं. लेकिन लोग शायद इसे अब मानने को तैयार नहीं हैं.

अब सवाल है कि ऐसी परिस्थितियों में करें क्या? अपना काम है अलख जगाना और वह करते रहेंगे. यह काम पूरेपन में हो इसके लिए इसका दर्शन बनाये रखना जरूरी है. कोई भी काम उसके दर्शन से आंका जाता है. और विस्फोट का दर्शन पूंजी उत्पादन की पत्रकारिता की बजाय प्रभाव पैदा करनेवाली पत्रकारिता का ही बना रहेगा. क्यों जी, कुछ गलत बोल रहा हूं?

Subscribe to comments feed Comments (4 posted):

Rajesh R. Singh on 05 February, 2010 19:42;29
avatar
अनिल जी जो मुहीम आपने चलाई है वास्तव में वह मुहीम न केवल आपकी बल्कि हमारी और उन सभी पत्रकारों की है जो अपने आपको लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का सिपाही मानते है या होने का दावा करते है । डिजिटल मीडिया नें पत्रकारिता के लिए जो रास्ता खोला है उसमें एकजुट होकर एक मंच पर आने के बजाय अलग अलग बिखर कर अपनी ताकत खो रहे है बाकी लोगों के बारे में तो मै कुछ नहीं कह सकता किन्तु मै इस मुहीम में आपके साथ हूँ ।
Thumbs Up Thumbs Down
1
sanjay on 05 February, 2010 20:25;57
avatar
जो पैसे लेखकर लिखने की बात करते हैं, वे क्या लिखते हैं? जहां पैसे लेकर लिखा जाता है, वहां लेखन का दायरा बंधा होता है। ऐसे दायरे में बंध कर कई लोग दो-चार सौ रूपये जुटा लेते हैं। पर वह शब्दों का खेल भर होता है।
जो पैसे लेकर लिखने की बात करते हैं, उन्हें जरा कहिए कि वे हिंदुस्तान, अमर अजाला, नवभारत टाइम्स आदि अपने यहां प्रकाशित आलेखों के बदले पैसे मिलते हैं। जरा लेख भेज कर तो देखें, छपता है कि नहीं? और छपता है तो कितना कमाते हैं?
Thumbs Up Thumbs Down
1
Sam Pruner on 05 February, 2010 23:13;35
avatar
Dear Sanjay,

You doing great job. Keep it up.

Regards
Thumbs Up Thumbs Down
1
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा on 09 February, 2010 21:59;01
avatar
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा
संजय तिवार जी मैं आपकी भावनाओं की कद्र करता हँू। आपने जितने भी कारण अपनी बात को सिद्ध करने के लिये गिनाये हैं। सभी तार्किक हैं। हाँ इस बात में कोई दो राय नहीं हो सकती कि जीवन चलाने के लिये धन की जरूरत होती है और व्यक्ति धन कमाने के लिये अपने हुनर का उपयोग करता है। अनेक लोगों का मानना है कि लेखन भी वह हुनर है, जिसके माध्यम से धन कमाया जा सकता है। आज के परिप्रेक्ष में उनका ऐसा सोचना प्रारम्भिक अवस्था में गलत भी नहीं है, लेकिन आगे चलकर यही सोच विकृत मानसिकता को जन्म देती है। जब लेखन पैसा कमाने के जरिये के रूप में एक आधार बना जाता है तो लेखक या पत्रकार वह नहीं लिखता है, जो समाज या मानवता या प्रकृति के संरक्षण और, या इन सबके उत्थान के लिये जरूरी है, बल्कि ऐसे हालात में ऐसे विषय और ऐसी बातें बढा-चढाकर लिखी जाने लगती हैं, जो धनात्सर्जन कर सकें। यहीं से पत्रकारिता का बण्टाधार होना शुरू हो जाता है। अतः घूम फिरकर पत्रकारिता की ऐसी-तैसी करने वाले लोग पत्रकार कर्म में शामिल हो जाते हैं।
आपका दर्द सही है, आपकी सोच भी सही है। इस सम्बन्ध में मेरा एक विनम्र सुझाव है। अभी भी समाज में ऐसे लोगो की कमी नहीं है, जिनके पास न्यूनतम जरूरत के आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं और जो धन को जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य नहीं मानते हैं तथा ऐसे लोगों के दिल में भी अपने आसपास की घटनाओं को लेकर दर्द है। यही नहीं उनमें अनेक संवेदनशील हैं और कुछ तो लिखना भी जानते हैं। यदि ऐसे लोगों को लेखन कला में, भाषा में और भावाभिव्यक्ति में कमजोर होने के उपरान्त भी आप अवसर देते हैं तो आपके मिशन में ऐसे लोग सच्चे सहयोगी बन सकते हैं। और भी बहुत सारे तरीके हो सकते हैं, सच्चे लेखकों तक पहुँचने के, प्रयास करते रहना चाहिये।
-लेखक होम्योपैथ चिकित्सक, मानव व्यवहारशास्त्री, दाम्पत्य विवादों के सलाहकार, विविध विषयों के लेखक, कवि, शायर, चिन्तक, शोधार्थी, तनाव मुक्त जीवन, लोगों से काम लेने की कला, सकारात्मक जीवन पद्धति आदि विषय के व्याख्याता तथा समाज एवं प्रशासन में व्याप्त नाइंसाफी, भेदभाव, शोषण, भ्रष्टाचार, अत्याचार और गैर-बराबरी आदि के विरुद्ध १९९३ में स्थापित एवं १९९४ से राष्ट्रीय स्तर पर दिल्ली से पंजीबद्ध राष्ट्रीय संगठन-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) के मुख्य संस्थापक एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं। जिसमें २८ जनवरी, २०१० तक, ४०४९ रजिस्टर्ड आजीवन कार्यकर्ता देश के १७ राज्यों में सेवारत हैं। फोन नं. ०१४१-२२२२२२५ (सायं ७ से ८ बजे)
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 4 | displaying: 1 - 4

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
Rate this article
5.00
More from बात करामात
Previous
image
अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।...
image
खुद ही खुदा बनने चला संघ
आर एस एस ने अब शायद बी जे पी को हाशिये पर लाने का मन बना लिया है .अपनी आबरू बचाने के लिए १० नवम्बर को आरएसएस के नेता खुद सडकों पर उतरेगें और धरना प्रदर्शन करेगें . उनकी शिकायत है कि यूपीए सरकार संघी आतंकवाद के ब्रैंड को प्रचारित करने में लगभग कामयाब हो गयी है और बीजेपी वाले कोई भी राजनीतिक पहल नहीं कर रहे हैं. नाराज़ संघी नेतृत्व अब खुद ही मैदान ले रहा है ....
image
शाबाश ओबामा, पहले दिन ही दस अरब डालर का बिजनेस
अपने भारत दौरे के पहले दिन ही बराक ओबामा दस अऱब डालर का बिजनेस कर गए। बेशक भारत को कुछ न मिले। पर भारत ओबामा को काफी कुछ देगा। भारत अमेरिकी बेरोजगारी को दूर करेगा। बेशक आतंकी हमलों से संबंधित भाषण में ओबामा ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, पर भारत ने अपनी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत सरकार और भारत के प्राइवेट कारपोरेट ने ओबामा को खुश कर दिया है। चीन से परेशान बराक ओबामा को भारत दौरे से राहत मिली है।...
image
भारत के रुख से चीन बेचैन
इस समय चीन बैचेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भीड़े है। चीन काफी बैचेने से भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हाल ही में हुई विदेश यात्रा और बराक ओबामा का नवंबर के दूसरे सप्ताह में होने वाली दक्षिण एशिया की यात्रा पर नजर रखे है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम यात्रा की आलोचना चीनी अखबार पीपुल्स डेली कर रहा है। जबकि ओबामा की यात्रा को भी चीनी अखबार विस्तारवादी यात्रा बता रहा है।...
image
चड्ढी पहन के फूल खिलाने वाले उपेक्षित
छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में कुछ साल पहले ‘ विकास बनाम संस्कृति ’ पर चर्चा करते हुए डा. रमन सिंह ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी. बकौल डा. सिंह ‘आखिर कब तक आप संस्कृति के नाम पर गरीब आदिवासियों के सिर पर सिंह लगा उन्हें नचाते रहेंगे ? उनको भी विकास और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर दीजिए.’ तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर हम प्रदेश को बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार आगे बढते और विकसित प्रदेश के रूप में उसकी पहचान बनाना देखना चाहते हों तो हमें नवाचार को बढ़ावा देना होगा....
image
बस, एक सरदार चाहिए कश्मीर के लिए!
कश्मीर समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है ,कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है। इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता। ...
image
शुक्र मनाओ कि तुम भारत में हो अरुंधती
भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है....
image
आइये अरुंधती को लानत भेंजे
उसका बस चले तो वो हिंदुस्तान के सिर्फ इसलिए टुकड़े टुकड़े कर दे क्यूंकि ऐसा करने से वो भीड़ से अलग नजर आएगी। उसके पास हत्याओं को वाजिब ठहराने के तमाम तर्क हमेशा मौजूद रहते हैं ,क्यूंकि इसे वो खुद को महान साबित करने का औजार समझती है। संभव है इसके बहाने वो नोबेल पुरस्कार पाने की कोशिश कर रही हो। वो वामपंथ का ऐसा क्रूर चेहरा है जिसका इस्तेमाल मीडिया कभी अपनी टीआरपी बढाने में तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करता है। संभव है बहुतों को उससे मोहब्बत हो लेकिन हम अरुंधती को लानत भेजते हैं क्योंकि उसे राष्ट्र के अस्तित्व से नफरत है।...
image
टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!
पुरानी कहानी है कि एक परिवार के तीन तोतलों की शादी नहीं हो पा रही थी। पिता ने हिदायत दी कि इस बार जो लडकी वालों के सामने बोलेगा उसको घर से निकाल दिया जाएगा। लकड़ी वाले आए, बडे बोला -‘पितादी ती बात याद है न।‘‘ मंझला बोला -‘‘टुप्प भईया।‘‘ छोटा बोल उठा -‘‘टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!‘‘ इस तरह तीनों की पोल खुल गई। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भी कमोबेश एसा ही कुछ होता दिख रहा है।...
image
संघ को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश
राजस्थान सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अजमेर दरगाह शरीफ पर कुछ साल पहले हुूए बम धमाके के मामले में कुछ तथाकथित अभियुक्तों के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया है। इस आरोप पत्र में जिन आरोपियों को नाम हैं उनमें इन्द्रेश कुमार का नाम नहीं है। यहां तक का किस्सा सामान्य जांच प्रक्रिया का अंग है। परंतु उसके बाद की कहानी राजनैतिक कहानी है।...
image
सामी नहीं, कांग्रेस के मुंह पर कालिख
कहने के लिए भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंके जाने का मुद्दा शांत होता दिख रहा हो लेकिन इसकी गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी। हकीकत यह है कि यहां कांग्रेस की गुटबाजी को आलाकमान अपना पूरा दम लगाकर भी शांत नहीं कर सकता। प्रभारी के रूप में सामी की यहां यह दूसरी बार फजीहत हुई है। मंगलवार को पीसीसी प्रतिनिधियों की बैठक में जब महज एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सामी यहां पहुंचे थे तो कांग्रेस भवन के बाहर ही उन पर काली स्याही फेंकी गई जो उनके चेहरे और कपड़े पर होते हुए उनके साथ कार से उतरे शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल पर भी पड़े।...
image
अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?...
image
अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...
image
बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
image
काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
image
ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
image
आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2