दरवेशी में बीते दो साल
आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि हालात जैसे थे वैसे ही हैं. 25 फरवरी 2008 से लेकर आज 25 फरवरी 2010 तक हालात बदस्तूर हैं. न बाहर की दुनिया के रुख में कोई बदलाव आया है और न अपनी परिस्थितियों में. हां, अब दिमाग उस समग्रता में विषय वस्तु को पकड़ने से मना कर देता है जैसे दो साल पहले पकड़ लेता है. लेकिन इसमें दिमाग का भी कोई दोष नहीं है.
मनुष्य का दिमाग असीम शक्तियों का स्वामी है. मानव सभ्यता में जिन लोगों ने दिमाग की असीम शक्तियों की थाह पाने की कोशिश की है वे सब यही मानते हैं कि एक जीवनकाल में व्यक्ति अपने मष्तिष्क का महज थोड़ा सा हिस्सा ही उपयोग कर पाता है. शेष हिस्सा बिना उपयोग का ही रह जाता है. शरीर का भारतीय विज्ञान तंत्र बताता है कि जितनी शक्तियां ब्रह्माण्ड में उतनी ही शक्ति इस दिमाग में है. अगर हम अपने दिमाग की शक्तियों का विस्तार कर सकें तो ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में मनोवांछित हस्तक्षेप कर सकते हैं. बहुत बड़ा लक्ष्य है. इसके लिए जिस साधना मार्ग पर चलने की विधि बताई गयी है वह सामान्य जीवन में संभव नहीं है. यक्ति के जीवन में कई तरह के विक्षेप आते हैं. यह विक्षेप लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के होते हैं. जैसे ही आप किसी अपरिचित शक्ति या आनंद के आगोश में आने लगते हैं आपके खिलाफ लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार की शक्तियां सक्रिय हो जाती हैं. हम समझ नहीं पाते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है लेकिन यह होना शुरू हो जाता है. जो लोग तपस्या शब्द को थोड़ा भी समझते हैं वे इस बात को समझ सकते हैं कि जैसे ही ये विक्षेप आने शुरू होते हैं आप तपस्याकाल में प्रवेश कर जाते हैं. अगर आप उन विक्षेपों को भलि भांति अस्वीकार कर देते हैं तो आपकी तपस्या सफल होती है और आपका अभीष्ट आपको प्राप्त हो जाता है. लेकिन ऐसा होन की संभावना एक करोड़ में एक से अधिक नहीं है.
हमारी सारी सफलता इसी बात पर टिकी होती है कि हम उस विक्षेप काल से कैसे गुजरेंगे? मनुष्य की चेतना ब्रह्माण्डीय चेतना से एकाकार है. चेतना के धरातल पर जड़ और चेतन में कोई अंतर नहीं है. सब एक ही चेतना के विस्तार दिखाई देते हैं. इसलिए जब हम अपनी मानसिक शक्तियों को विस्तार देना शुरू करते हैं तो हम ब्रह्माण्डीय चेतना से अपने आप को जोड़ना शुरू कर देते हैं. किसी भी पुरुष (आत्मा) का जागरण शुरू होता है तो उस वक्त उसे बहुत संभालने की जरूरत होती है क्योंकि अचानक उसमें एक आकर्षण पैदा होता है और वह आकर्षण उसके लिए विपत्ति का कारण भी बन जाता है. यह बहुत ही दुविधापूर्ण स्थिति होती है. सात्विकता से पैदा हुए आकर्षण से तमस का खिचांव सबसे तीव्र होता है. लेकिन तमस आयेगा तो सात्विकता को भ्रष्ट करने की उपाय करेगा क्योंकि यही उसका स्वभाव है. सात्विक व्यक्ति सात्विकता के प्रति सहज श्रद्धावान तो हो सकता है लेकिन वह उसके प्रति कभी आकर्षित नहीं होता है. आकर्षित हमेशा तमस ही होता है क्योंकि उसके पास उसका घोर अभाव है. तपस्या के मार्ग पर यही सबसे घातक विक्षेप होता है. एक बार तमस जीता नहीं कि सात्विकता अपने दरवाजे हमेशा के लिए बंद देती है. यह किसी भी व्यक्ति के जीवन में भी लागू होता है और उसके द्वारा किये जा रहे काम पर भी. यही वास्तविकता है जो हरेक जड़-चेतन के साथ घटित होती है.
विस्फोट भी पिछले एक साल में ऐसे अनेक विक्षेपों का शिकार हुआ है. इसकी सात्विकता ने अगर सात्विक और सत्य को शरण दी तो तामसिक वृत्तियों को भी खूब आकर्षित किया. ऐसा होना कोई अतिरेक नहीं था. क्योंकि तामसिक वृत्तियां जहां भी जाएंगी वे अपना असर पैदा करती हैं इसलिए उन वृत्तियों ने इस काम को भी कई तरह से प्रभावित करने की कोशिश की. आज की शब्दावली में कहें तो ये चलते-फिरते वायरस हैं. पिछले एक साल में मेरी निजी चिंता इन तामसिक वृत्तियों का हमला नहीं है. चिंता मेरी अपनी निजी है. कोई जान न जाने मैं खुद में यह महसूस करता हूं मेरा मानस भी कमजोर पड़ा है. मेरी इंसानी कमजोरियां मेरी यात्रा के रास्ते रुकावट बनी हैं. विक्षेप बढ़े तो मानसिक चेतना के विस्तार से उस विक्षेप को सीमित किया जा सकता है. मैं ऐसा करने में असफल रहा हूं. परमसत्ता के प्रति समर्पण की बजाय तमस का आकर्षण बढ़ा. और जब तक लगा कि यह तुम्हें नुकसान पहुंचा रहा है वह अपने हिस्से का काम कर चुका था. लेकिन इन तामसिक वृत्तियों के पास आने से सीखने के लिए बहुत कुछ मिला और कम से कम निरंतरता बधित नहीं हुई. इसे उपलब्धि तो नहीं मान सकते लेकिन इसे एक मौका जरूर मानते हैं कि आगे दिमाग तमस के प्रभाव में नहीं आयेगा. आज दो साल बाद पीछे लौटकर देखता हूं तो इस बात का परम संतोष है कि पैर सात्विक जमीन पर ही टिके हैं. तमस ने नुकसान जरूर पहुंचाया है लेकिन पैरों को सात्विकता की जमीन से नहीं डिगा पाया है. ऐसा संभवत: इसलिए हो सका क्योंकि पिछले एक साल के कठिन तपस्याकाल में निजी तौर पर मैं जब भी कमजोर पड़ा कोई न कोई आकर खड़ा हो गया और उसने उस अड़चन को दूर कर दिया जो संकट बन रहा था.
हां, विस्फोट के पाठक, लेखक और शुभचिंतकों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है. यह काम लोगों को दिमाग से नहीं बल्कि दिल से छूता है. यह साफ तौर पर पता चलता है कि यह काम मेरा शुरू किया हुआ जरूर हो सकता है लेकिन यह मेरा अपना काम है नहीं. यह लोगों का काम है और लोगों को ही समर्पित है. जब तक लोग ब्रह्माण्डीय चेतना के स्तर पर लोगों के लिए काम करते रहेंगे विस्फोट जारी रहेगा. कल ही एक मित्र फोन पर कह रहे थे कि आपने दो साल जिस तरह से इसको चलाया है वह बहुत हिम्मत का काम है. वे ऐसा इसलिए कह रहे थे कि पत्रकारीय धर्म, जनता के लिए पत्रकारिता आदि बातें कहने में अच्छी होती हैं लेकिन वास्तविक धरातल पर व्यावहारिक नहीं होती है. इसलिए इस तरह की बातों को बाजार में अच्छे नारे बनाकर बेचा जाता है ताकि पूंजी के रूप में लाभ अर्जित किया जा सके. मैं उन्हें कैसे कहता कि आप जिसे हिम्मत कह रहे हैं वह मेरे दरवेश की इच्छा है. अगर पत्रकारिता से प्रभाव की कमाई करनी है तो और दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है. जिन्हें पूंजी का व्यापार करना हो वे करें. हम थोड़े प्रभाव का संचार कर सकें तो वह हमारी सबसे बड़ी कमाई होगी. अपनी बैलेंसशीट उसी से मजबूत होनी है. लंबे समय तक इस पर टिके रहना है चुनौतीपूर्ण लेकिन और अपने पास रास्ता भी क्या है? पूंजी साधन होती है और वह वही रहे तो अच्छा. पूंजी को साध्य बना भी लें तो क्या हासिल कर लेंगे? तमस को आधार बना भी लें तो क्या हासिल कर लेंगे? इसलिए जो थे, जैसे थे, वही रहेंगे. कुछ हाथ आये तो ठीक. सब छूट जाए तो और भी ठीक. क्यों जी?
एक बात और. इस मौके पर विस्फोट का मोबाइल वर्जन सार्वजनिक कर रहे हैं. अब अगर आप चाहें तो अपने जीपीआरएस इनेबल्ड मोबाइल से विस्फोट का मोबाइल वर्जन देख सकते हैं. पता है- visfot.com/mobile
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- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
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- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



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अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो, सुबह होने से कौन रोक सकता है? तमस प्रवृत्तियों से भले ही इन दो वर्षों में सत्य को प्रभावित करने की कोशिश की हो, लेकिन सफल नहीं पाईं। यह केवल आपका ही अनुभव नहीं है। अनेक लोगे ऐसे हैं, जिनके पांव
सात्विकता की जमीन पर रहते हैं। ऐसे लोगों पर जब-जब तामसी प्रवृत्तियों ने धावा बोल कमजोर या नष्ट करने की कोशिश की, तब-तब कोई न कोई साथ खड़ा होकर स्थिति को संभाल लिया। दरअसल इसी तरह से सात्विकता को बल मिलता है। इसे यह सात्विकता की सिंचन की प्रक्रिया कह सकते हैं। अच्छी बात है कि आपके कमजोर पडऩे पर ऐसे लोग खड़े हो जाते हैं। वे आपके साथ खड़े होकर उस पत्रकारिता धर्म के साथ खड़े हो रहे हैं, जिसकी दुहाई तो हर कोई देता नजर आता है, पर उसकी राह पर चलने की हिम्मत नहीं दिखा पाते हैं।
देखते-देखते दो साल बीत गए। बेहद खुशी हो रही है। आपकी बातों से यह लगता है कि अभी तक का वक्त विस्फोट के लिए चिडिय़े की तरह फडफ़ड़ाता हुआ निकला है। पर देखिये न, इसकी अनगुंज जिन-जिन लोगों पास तक पहुंची है, एक न एक बार सोचने को मजबूर जरूर किया है। खतरनाक वक्त में इतना सोचना भी कम सफलता की बात नहीं है। वह भी उस स्थिति में जब चारो ओर सामग्री शुद्धता में सात्विक, सार्थक विचारों की महती जरूरत महसूस की जा रही है। दो वर्ष में रूप से बदहाल विस्फोट आर्थिक रूप से तंगहाल पत्र-पात्रिकाओं के लिए संजीवनी बना है। यह सब देख, सोच कर हमें भी एक ताकत मिलती है।
दो वर्ष पूरे होने पर बधाई।
संजय स्वदेश
apne such kaha.visfot padhker apne aap ye sabit hota hai ki apko 2 saal may tao kya 100 saal may bhi koi diga nahi payega.marhoom parbhash ji joshi ke baad patrkarita ke mulyo ki jo shama apne rosha ki hai usse pura desh roshan hoga.
आपने जिस जोश और जज्बे के साथ जन पत्रकारिता जैसे मुश्किल काम को संचालित कर रखा है. वो सलाम से कहीं अधिक सजदे का विषय है. साथ छोडने वाले आते ही उसी लिए है. उनसे होने वाले दुख का मतलब ये भी नहीं है कि हम दूसरों के लिए रास्ता बंद कर दें. आपने जिस उदारता से लोगों को सिखाया और बढाया है वो अपने आप में मिशाल है. कुछ वांछित सावधानियों के साथ अपने बनाये रास्ते पर चलते रहो. ईश्वर परीक्षा भी उन्हीं की लेता है जिन्हें परीक्षा देने के योग्य मानता है. आपके लिए ये अच्छी बात है कि आप उसकी नजर में एक कुशल परीक्षार्थी है. आपके हर सुझाव,आदेश के पालनार्थ हमेशा तैयार.
मैं अकेला ही चलता रहा राहे मंजिल मगर.....
लोग मिलते गए कारवां बनता गया
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