Home | बात करामात | दरवेशी में बीते दो साल

दरवेशी में बीते दो साल

image विस्फोट अपने सभी पाठकों, लेखकों, शुभचिंतकों को दो साल पूरा होने पर सलाम करता है

आपको यह जानकर अच्छा लगेगा कि हालात जैसे थे वैसे ही हैं. 25 फरवरी 2008 से लेकर आज 25 फरवरी 2010 तक हालात बदस्तूर हैं. न बाहर की दुनिया के रुख में कोई बदलाव आया है और न अपनी परिस्थितियों में. हां, अब दिमाग उस समग्रता में विषय वस्तु को पकड़ने से मना कर देता है जैसे दो साल पहले पकड़ लेता है. लेकिन इसमें दिमाग का भी कोई दोष नहीं है.

मनुष्य का दिमाग असीम शक्तियों का स्वामी है. मानव सभ्यता में जिन लोगों ने दिमाग की असीम शक्तियों की थाह पाने की कोशिश की है वे सब यही मानते हैं कि एक जीवनकाल में व्यक्ति अपने मष्तिष्क का महज थोड़ा सा हिस्सा ही उपयोग कर पाता है. शेष हिस्सा बिना उपयोग का ही रह जाता है. शरीर का भारतीय विज्ञान तंत्र बताता है कि जितनी शक्तियां ब्रह्माण्ड में उतनी ही शक्ति इस दिमाग में है. अगर हम अपने दिमाग की शक्तियों का विस्तार कर सकें तो ब्रह्माण्डीय व्यवस्था में मनोवांछित हस्तक्षेप कर सकते हैं. बहुत बड़ा लक्ष्य है. इसके लिए जिस साधना मार्ग पर चलने की विधि बताई गयी है वह सामान्य जीवन में संभव नहीं है. यक्ति के जीवन में कई तरह के विक्षेप आते हैं. यह विक्षेप लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार के होते हैं. जैसे ही आप किसी अपरिचित शक्ति या आनंद के आगोश में आने लगते हैं आपके खिलाफ लौकिक और पारलौकिक दोनों प्रकार की शक्तियां सक्रिय हो जाती हैं. हम समझ नहीं पाते हैं कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है लेकिन यह होना शुरू हो जाता है. जो लोग तपस्या शब्द को थोड़ा भी समझते हैं वे इस बात को समझ सकते हैं कि जैसे ही ये विक्षेप आने शुरू होते हैं आप तपस्याकाल में प्रवेश कर जाते हैं. अगर आप उन विक्षेपों को भलि भांति अस्वीकार कर देते हैं तो आपकी तपस्या सफल होती है और आपका अभीष्ट आपको प्राप्त हो जाता है. लेकिन ऐसा होन की संभावना एक करोड़ में एक से अधिक नहीं है.

हमारी सारी सफलता इसी बात पर टिकी होती है कि हम उस विक्षेप काल से कैसे गुजरेंगे? मनुष्य की चेतना ब्रह्माण्डीय चेतना से एकाकार है. चेतना के धरातल पर जड़ और चेतन में कोई अंतर नहीं है. सब एक ही चेतना के विस्तार दिखाई देते हैं. इसलिए जब हम अपनी मानसिक शक्तियों को विस्तार देना शुरू करते हैं तो हम ब्रह्माण्डीय चेतना से अपने आप को जोड़ना शुरू कर देते हैं. किसी भी पुरुष (आत्मा) का जागरण शुरू होता है तो उस वक्त उसे बहुत संभालने की जरूरत होती है क्योंकि अचानक उसमें एक आकर्षण पैदा होता है और वह आकर्षण उसके लिए विपत्ति का कारण भी बन जाता है. यह बहुत ही दुविधापूर्ण स्थिति होती है. सात्विकता से पैदा हुए आकर्षण से तमस का खिचांव सबसे तीव्र होता है. लेकिन तमस आयेगा तो सात्विकता को भ्रष्ट करने की उपाय करेगा क्योंकि यही उसका स्वभाव है. सात्विक व्यक्ति सात्विकता के प्रति सहज श्रद्धावान तो हो सकता है लेकिन वह उसके प्रति कभी आकर्षित नहीं होता है. आकर्षित हमेशा तमस ही होता है क्योंकि उसके पास उसका घोर अभाव है. तपस्या के मार्ग पर यही सबसे घातक विक्षेप होता है. एक बार तमस जीता नहीं कि सात्विकता अपने दरवाजे हमेशा के लिए बंद देती है. यह किसी भी व्यक्ति के जीवन में भी लागू होता है और उसके द्वारा किये जा रहे काम पर भी. यही वास्तविकता है जो हरेक जड़-चेतन के साथ घटित होती है.

विस्फोट भी पिछले एक साल में ऐसे अनेक विक्षेपों का शिकार हुआ है. इसकी सात्विकता ने अगर सात्विक और सत्य को शरण दी तो तामसिक वृत्तियों को भी खूब आकर्षित किया. ऐसा होना कोई अतिरेक नहीं था. क्योंकि तामसिक वृत्तियां जहां भी जाएंगी वे अपना असर पैदा करती हैं इसलिए उन वृत्तियों ने इस काम को भी कई तरह से प्रभावित करने की कोशिश की. आज की शब्दावली में कहें तो ये चलते-फिरते वायरस हैं. पिछले एक साल में मेरी निजी चिंता इन तामसिक वृत्तियों का हमला नहीं है. चिंता मेरी अपनी निजी है. कोई जान न जाने मैं खुद में यह महसूस करता हूं मेरा मानस भी कमजोर पड़ा है. मेरी इंसानी कमजोरियां मेरी यात्रा के रास्ते रुकावट बनी हैं. विक्षेप बढ़े तो मानसिक चेतना के विस्तार से उस विक्षेप को सीमित किया जा सकता है. मैं ऐसा करने में असफल रहा हूं. परमसत्ता के प्रति समर्पण की बजाय तमस का आकर्षण बढ़ा. और जब तक लगा कि यह तुम्हें नुकसान पहुंचा रहा है वह अपने हिस्से का काम कर चुका था. लेकिन इन तामसिक वृत्तियों के पास आने से सीखने के लिए बहुत कुछ मिला और कम से कम निरंतरता बधित नहीं हुई. इसे उपलब्धि तो नहीं मान सकते लेकिन इसे एक मौका जरूर मानते हैं कि आगे दिमाग तमस के प्रभाव में नहीं आयेगा. आज दो साल बाद पीछे लौटकर देखता हूं तो इस बात का परम संतोष है कि पैर सात्विक जमीन पर ही टिके हैं. तमस ने नुकसान जरूर पहुंचाया है लेकिन पैरों को सात्विकता की जमीन से नहीं डिगा पाया है. ऐसा संभवत: इसलिए हो सका क्योंकि पिछले एक साल के कठिन तपस्याकाल में निजी तौर पर मैं जब भी कमजोर पड़ा कोई न कोई आकर खड़ा हो गया और उसने उस अड़चन को दूर कर दिया जो संकट बन रहा था.

हां, विस्फोट के पाठक, लेखक और शुभचिंतकों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है. यह काम लोगों को दिमाग से नहीं बल्कि दिल से छूता है. यह साफ तौर पर पता चलता है कि यह काम मेरा शुरू किया हुआ जरूर हो सकता है लेकिन यह मेरा अपना काम है नहीं. यह लोगों का काम है और लोगों को ही समर्पित है. जब तक लोग ब्रह्माण्डीय चेतना के स्तर पर लोगों के लिए काम करते रहेंगे विस्फोट जारी रहेगा. कल ही एक मित्र फोन पर कह रहे थे कि आपने दो साल जिस तरह से इसको चलाया है वह बहुत हिम्मत का काम है. वे ऐसा इसलिए कह रहे थे कि पत्रकारीय धर्म, जनता के लिए पत्रकारिता आदि बातें कहने में अच्छी होती हैं लेकिन वास्तविक धरातल पर व्यावहारिक नहीं होती है. इसलिए इस तरह की बातों को बाजार में अच्छे नारे बनाकर बेचा जाता है ताकि पूंजी के रूप में लाभ अर्जित किया जा सके. मैं उन्हें कैसे कहता कि आप जिसे हिम्मत कह रहे हैं वह मेरे दरवेश की इच्छा है. अगर पत्रकारिता से प्रभाव की कमाई करनी है तो और दूसरा कोई रास्ता भी नहीं है. जिन्हें पूंजी का व्यापार करना हो वे करें. हम थोड़े प्रभाव का संचार कर सकें तो वह हमारी सबसे बड़ी कमाई होगी. अपनी बैलेंसशीट उसी से मजबूत होनी है. लंबे समय तक इस पर टिके रहना है चुनौतीपूर्ण लेकिन और अपने पास रास्ता भी क्या है? पूंजी साधन होती है और वह वही रहे तो अच्छा. पूंजी को साध्य बना भी लें तो क्या हासिल कर लेंगे? तमस को आधार बना भी लें तो क्या हासिल कर लेंगे? इसलिए जो थे, जैसे थे, वही रहेंगे. कुछ हाथ आये तो ठीक. सब छूट जाए तो और भी ठीक. क्यों जी?

एक बात और. इस मौके पर विस्फोट का मोबाइल वर्जन सार्वजनिक कर रहे हैं. अब अगर आप चाहें तो अपने जीपीआरएस इनेबल्ड मोबाइल से विस्फोट का मोबाइल वर्जन देख सकते हैं. पता है- visfot.com/mobile

Subscribe to comments feed Comments (8 posted):

संजय स्वदेश on 25 February, 2010 18:54;08
avatar
श्री संजयजी,
अंधेरा चाहे कितना भी घना क्यों न हो, सुबह होने से कौन रोक सकता है? तमस प्रवृत्तियों से भले ही इन दो वर्षों में सत्य को प्रभावित करने की कोशिश की हो, लेकिन सफल नहीं पाईं। यह केवल आपका ही अनुभव नहीं है। अनेक लोगे ऐसे हैं, जिनके पांव
सात्विकता की जमीन पर रहते हैं। ऐसे लोगों पर जब-जब तामसी प्रवृत्तियों ने धावा बोल कमजोर या नष्ट करने की कोशिश की, तब-तब कोई न कोई साथ खड़ा होकर स्थिति को संभाल लिया। दरअसल इसी तरह से सात्विकता को बल मिलता है। इसे यह सात्विकता की सिंचन की प्रक्रिया कह सकते हैं। अच्छी बात है कि आपके कमजोर पडऩे पर ऐसे लोग खड़े हो जाते हैं। वे आपके साथ खड़े होकर उस पत्रकारिता धर्म के साथ खड़े हो रहे हैं, जिसकी दुहाई तो हर कोई देता नजर आता है, पर उसकी राह पर चलने की हिम्मत नहीं दिखा पाते हैं।
देखते-देखते दो साल बीत गए। बेहद खुशी हो रही है। आपकी बातों से यह लगता है कि अभी तक का वक्त विस्फोट के लिए चिडिय़े की तरह फडफ़ड़ाता हुआ निकला है। पर देखिये न, इसकी अनगुंज जिन-जिन लोगों पास तक पहुंची है, एक न एक बार सोचने को मजबूर जरूर किया है। खतरनाक वक्त में इतना सोचना भी कम सफलता की बात नहीं है। वह भी उस स्थिति में जब चारो ओर सामग्री शुद्धता में सात्विक, सार्थक विचारों की महती जरूरत महसूस की जा रही है। दो वर्ष में रूप से बदहाल विस्फोट आर्थिक रूप से तंगहाल पत्र-पात्रिकाओं के लिए संजीवनी बना है। यह सब देख, सोच कर हमें भी एक ताकत मिलती है।
दो वर्ष पूरे होने पर बधाई।
संजय स्वदेश
Thumbs Up Thumbs Down
0
Vicky G on 25 February, 2010 19:01;40
avatar
बधाई. शुभकामनाएं- बस ये दो शब्द ही हैं. पूरे दिल से.
Thumbs Up Thumbs Down
1
mustafa hussain on 25 February, 2010 19:25;22
avatar
sanjay bhayya!
apne such kaha.visfot padhker apne aap ye sabit hota hai ki apko 2 saal may tao kya 100 saal may bhi koi diga nahi payega.marhoom parbhash ji joshi ke baad patrkarita ke mulyo ki jo shama apne rosha ki hai usse pura desh roshan hoga.
Thumbs Up Thumbs Down
0
dibyanshu on 25 February, 2010 19:34;16
avatar
संजय जी दो साल पूरे होने पर बधाई, एक नियमित पाठक होने के नाते इस मौके पर जरुर कहूंगा कि तथाकथित वामपंथी चोले से विस्फोट को बचाएं... कभी कभी बेतुके और ज्यादातर उत्कृष्ट रहने की कोशिश जारी रखें.. तो खुशी होगी...
Thumbs Up Thumbs Down
0
veerendra singh soalnki on 25 February, 2010 19:59;20
avatar
visfot ke 2 varsh pure hone par hardik badhai
Thumbs Up Thumbs Down
0
राजीब शर्मा on 25 February, 2010 21:12;18
avatar
संजय भाई.
आपने जिस जोश और जज्बे के साथ जन पत्रकारिता जैसे मुश्किल काम को संचालित कर रखा है. वो सलाम से कहीं अधिक सजदे का विषय है. साथ छोडने वाले आते ही उसी लिए है. उनसे होने वाले दुख का मतलब ये भी नहीं है कि हम दूसरों के लिए रास्ता बंद कर दें. आपने जिस उदारता से लोगों को सिखाया और बढाया है वो अपने आप में मिशाल है. कुछ वांछित सावधानियों के साथ अपने बनाये रास्ते पर चलते रहो. ईश्वर परीक्षा भी उन्हीं की लेता है जिन्हें परीक्षा देने के योग्य मानता है. आपके लिए ये अच्छी बात है कि आप उसकी नजर में एक कुशल परीक्षार्थी है. आपके हर सुझाव,आदेश के पालनार्थ हमेशा तैयार.
Thumbs Up Thumbs Down
0
Shruti Awasthi on 26 February, 2010 00:20;43
avatar
विस्फोट को उसके जन्मदिन पर ढेर सारी बधाई
मैं अकेला ही चलता रहा राहे मंजिल मगर.....
लोग मिलते गए कारवां बनता गया
Thumbs Up Thumbs Down
0
mrajsingh on 26 February, 2010 04:05;00
avatar
संजय जी , कोई भी लगन,मेहनत बेकार नहीं जाती। किसी ना किसी रुप में वो खुद को, समाज को, देश को कुछ दे ही जाती है। विस्फोट को मैंने कई बार देखा है और सच में कई लेख आम मीडिया माध्यमों की एकरसता मिटाने में सफल रहे। आपके, हम सबके विचारों को विस्फोट जगह देता रहे ऐसी कामना है। एक छोटी चीज की ओर मैं आपका ध्यान दिलाना चाहूंगा। आपने इंट्रो में 25 फरवरी 2009 लिखा है,कृपया इसे सुधार दें,अटपटा लग रहा है। विस्फोट के शतायु होने की कामना के साथ.......
Thumbs Up Thumbs Down
0
total: 8 | displaying: 1 - 8

Post your comment comment

Type in Hindi (हिन्दी में कमेन्ट करने के लिए यहां रोमन में लिखिए यह अपने आप हिन्दी में बदल देगा.)

Title :
Body
Powered by Vivvo CMS v4.1.2
Share |
  • email Email to a friend
  • print Print version

ईमेल से विस्फोटः अपना ईमेल यहां भरें और सब्सक्राइब करें:

Delivered by FeedBurner

Author info
image संजय तिवारी आप जहां तक सोच सकते हैं इंटरनेट आपको वह करने का मौका देता है. अभी तक मानव सभ्यता ने जितने भी मीडिया माध्यमों का उपयोग किया है यह उन सबमें अनूठा, प्रभावी और सर्वगुण संपन्न है. सूचना लेने देने के तीन माध्यमों दृश्य, श्रवण और पाठ को एक ही धागे में लपेटे नया मीडिया उत्पादन और पहुंच दोनों के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ है. ऐसे नये मीडिया का जनहित के लिए भरपूर उपयोग हो, विस्फोट.कॉम उसी दिशा में उठा एक कदम है. sanjaytiwari07@gmail.com
Rate this article
5.00
More from बात करामात
Previous
image
अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।...
image
खुद ही खुदा बनने चला संघ
आर एस एस ने अब शायद बी जे पी को हाशिये पर लाने का मन बना लिया है .अपनी आबरू बचाने के लिए १० नवम्बर को आरएसएस के नेता खुद सडकों पर उतरेगें और धरना प्रदर्शन करेगें . उनकी शिकायत है कि यूपीए सरकार संघी आतंकवाद के ब्रैंड को प्रचारित करने में लगभग कामयाब हो गयी है और बीजेपी वाले कोई भी राजनीतिक पहल नहीं कर रहे हैं. नाराज़ संघी नेतृत्व अब खुद ही मैदान ले रहा है ....
image
शाबाश ओबामा, पहले दिन ही दस अरब डालर का बिजनेस
अपने भारत दौरे के पहले दिन ही बराक ओबामा दस अऱब डालर का बिजनेस कर गए। बेशक भारत को कुछ न मिले। पर भारत ओबामा को काफी कुछ देगा। भारत अमेरिकी बेरोजगारी को दूर करेगा। बेशक आतंकी हमलों से संबंधित भाषण में ओबामा ने पाकिस्तान का नाम नहीं लिया, पर भारत ने अपनी सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत सरकार और भारत के प्राइवेट कारपोरेट ने ओबामा को खुश कर दिया है। चीन से परेशान बराक ओबामा को भारत दौरे से राहत मिली है।...
image
भारत के रुख से चीन बेचैन
इस समय चीन बैचेन है। बैचेनी का कारण भारत की विस्तारवादी विदेश नीति है। इस विदेश नीति के तहत भारत ने उन देशों से दोस्ती बढ़ानी शुरू कर दी है, जो देश चीन से किसी न किसी मसले पर भीड़े है। चीन काफी बैचेने से भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की हाल ही में हुई विदेश यात्रा और बराक ओबामा का नवंबर के दूसरे सप्ताह में होने वाली दक्षिण एशिया की यात्रा पर नजर रखे है। भारतीय प्रधानमंत्री की जापान, मलेशिया, दक्षिण कोरिया, वियतनाम यात्रा की आलोचना चीनी अखबार पीपुल्स डेली कर रहा है। जबकि ओबामा की यात्रा को भी चीनी अखबार विस्तारवादी यात्रा बता रहा है।...
image
चड्ढी पहन के फूल खिलाने वाले उपेक्षित
छत्तीसगढ़ के सन्दर्भ में कुछ साल पहले ‘ विकास बनाम संस्कृति ’ पर चर्चा करते हुए डा. रमन सिंह ने एक बड़ी अच्छी बात कही थी. बकौल डा. सिंह ‘आखिर कब तक आप संस्कृति के नाम पर गरीब आदिवासियों के सिर पर सिंह लगा उन्हें नचाते रहेंगे ? उनको भी विकास और समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का अवसर दीजिए.’ तो ज़ाहिर सी बात है कि अगर हम प्रदेश को बदलते वैश्विक परिवेश के अनुसार आगे बढते और विकसित प्रदेश के रूप में उसकी पहचान बनाना देखना चाहते हों तो हमें नवाचार को बढ़ावा देना होगा....
image
बस, एक सरदार चाहिए कश्मीर के लिए!
कश्मीर समस्या ने इस मिथक को भी तोड़ दिया की विकास की योजनाओं और बुनियादी अवशक्ताओ की पूर्ति से किसी भी समस्या का हल ढूंढा जा सकता है ,कश्मीर में वो सब प्रयास विफल रहे है। वो हाथ जो डल झील में नाव चलाते थे, अब पत्थर-बाजी में शरीक है। इन स्थितियों में तो ऐसा लगता है काश आज सरदार पटेल के कद और राजनीतिक दृढता वाला कोई नेता देश में होता तो अब तक ये विवाद कब का हल हो गया होता। ...
image
शुक्र मनाओ कि तुम भारत में हो अरुंधती
भारतीय समाज में बुद्धजीवी का दर्जा पा चुकी अरुंधती रॉय ने कहा है कि कश्मीर कभी भी भारत का अभिन्न हिस्सा रहा ही नहीं है. गिलानी दिल्ली में सेमिनार में कह रहें है कि उन्हें आज़ादी से कम कुछ भी नहीं चाहिए. गिलानी अगर ऐसी बात कहें तो कोई हैरानी नहीं होती लेकिन अरुंधती ऐसा कहें तो आश्चर्य होता है. हालांकि इसके पहले भी अरुंधती रॉय एक ऐसा ही बयान दे चुकी हैं. तब उन्होंने मावोवाद का समर्थन किया था. कश्मीर को भारत का अभिन्न हिस्सा ना मानने सम्बन्धी बयान वहां पर अपनी जान कि बाज़ी लगा रहे जवानों के लिए एक तमाचा है. साथ ही शेष देश के लोगों के लिए क्षोभ और शर्मिंदगी की वजह है....
image
आइये अरुंधती को लानत भेंजे
उसका बस चले तो वो हिंदुस्तान के सिर्फ इसलिए टुकड़े टुकड़े कर दे क्यूंकि ऐसा करने से वो भीड़ से अलग नजर आएगी। उसके पास हत्याओं को वाजिब ठहराने के तमाम तर्क हमेशा मौजूद रहते हैं ,क्यूंकि इसे वो खुद को महान साबित करने का औजार समझती है। संभव है इसके बहाने वो नोबेल पुरस्कार पाने की कोशिश कर रही हो। वो वामपंथ का ऐसा क्रूर चेहरा है जिसका इस्तेमाल मीडिया कभी अपनी टीआरपी बढाने में तो कभी व्यवस्था के विरुद्ध अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए करता है। संभव है बहुतों को उससे मोहब्बत हो लेकिन हम अरुंधती को लानत भेजते हैं क्योंकि उसे राष्ट्र के अस्तित्व से नफरत है।...
image
टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!
पुरानी कहानी है कि एक परिवार के तीन तोतलों की शादी नहीं हो पा रही थी। पिता ने हिदायत दी कि इस बार जो लडकी वालों के सामने बोलेगा उसको घर से निकाल दिया जाएगा। लकड़ी वाले आए, बडे बोला -‘पितादी ती बात याद है न।‘‘ मंझला बोला -‘‘टुप्प भईया।‘‘ छोटा बोल उठा -‘‘टुम बोले टुम बोले हम टो टुप्पई टाप!‘‘ इस तरह तीनों की पोल खुल गई। कांग्रेसनीत केंद्र सरकार में भी कमोबेश एसा ही कुछ होता दिख रहा है।...
image
संघ को बदनाम करने की कांग्रेसी साजिश
राजस्थान सरकार के आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अजमेर दरगाह शरीफ पर कुछ साल पहले हुूए बम धमाके के मामले में कुछ तथाकथित अभियुक्तों के खिलाफ अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के न्यायालय में आरोप पत्र दाखिल किया है। इस आरोप पत्र में जिन आरोपियों को नाम हैं उनमें इन्द्रेश कुमार का नाम नहीं है। यहां तक का किस्सा सामान्य जांच प्रक्रिया का अंग है। परंतु उसके बाद की कहानी राजनैतिक कहानी है।...
image
सामी नहीं, कांग्रेस के मुंह पर कालिख
कहने के लिए भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंके जाने का मुद्दा शांत होता दिख रहा हो लेकिन इसकी गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी। हकीकत यह है कि यहां कांग्रेस की गुटबाजी को आलाकमान अपना पूरा दम लगाकर भी शांत नहीं कर सकता। प्रभारी के रूप में सामी की यहां यह दूसरी बार फजीहत हुई है। मंगलवार को पीसीसी प्रतिनिधियों की बैठक में जब महज एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सामी यहां पहुंचे थे तो कांग्रेस भवन के बाहर ही उन पर काली स्याही फेंकी गई जो उनके चेहरे और कपड़े पर होते हुए उनके साथ कार से उतरे शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल पर भी पड़े।...
image
अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?...
image
अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...
image
बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
image
काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
image
ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
image
आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
Next
Tags
No tags for this article
सर्वाधिकार (अ)सुरक्षित

विस्फोट.कॉम में प्रकाशित सामग्री पर हमारी ओर से कोई कापीराइट नहीं है.

Powered by Vivvo CMS v4.1.2