इनके 'भगवान' को जरूर मिले भारत रत्न
सचिन तेन्दुलकर क्रिकेट के भगवान हैं. हमारे कहने की बात नहीं है. समूचा लब्ध प्रतिष्ठित समाज यही उद्घोष कर रहा है. और ऐसा कहे भी क्यों नहीं? अगर क्रिकेट इस देश की आत्मा है तो क्रिकेट का शहंशाह बिना शक भागवत पद पाने का दावेदार है. जिस देश की आत्मा भी आयात करके आरोपित कर दी गयी हो उस देश में भगवान की इससे अच्छी व्याख्या और क्या हो सकती है?
इस दौर की बहुसंख्यक जनता ने इमरजेंसी का वह काला दौर नहीं देखा है, क्योंकि बकौल हमारी सरकार और सांख्यिकी विभाग के आंकड़े इस देश की जनसंख्या का सबसे बड़ा भाग उन लोगों का है जिनकी उम्र 3० साल से कम है। वैसे मेरे हिसाब से इन युवा लोगों में भी बहुमत उन्हीं लोगों का होगा जिन्हें इमरजेंसी की परिस्थितियों के बारे में शायद ही ढंग की सूचना हो क्योंकि मौजूदा वक्त में इतिहास के बारे में जिज्ञासा करना और रखना दकियानूसी तौर-तरीकों में गिना जाने लगा है। बहरहाल यहां इस आलेख का विषय भारतीय युवाओं की इतिहासबोध पर आलोचनात्मक टिप्पणी करना नहीं है, मैं तो सिर्फ इतना कहना चाह रहा हूं कि उदारवादी दौर का आनंद लेते-लेते अपना देश उस अवस्था में पहुंच गया है जिसकी मिसाल सिर्फ प्रेमचंद के शतरंज के खिलाड़ियों से की जा सकती है. जो शतरंज के खेल में इतने मशगूल थी कि अंग्रेज अवध लूटकर चले गए और उन्हें पता भी नहीं चला। हमारे पास भी बहस के लिए सचिन तेंदुलकर की उपलब्धियां और भजन के लिए उनके रिकार्ड्स हैं, क्योंकि वह कहने को क्रिकेट के भगवान हैं. हम भला कब विचार करते हैं कि जब क्रिकेट ही बाजार का प्रायोजित खेल है तो उसे खेलनेवाला भगवान पद कैसे प्राप्त कर सकता है?
सचिन तेन्दुलकर के व्यक्तित्व की बात नहीं है. उस कृतित्व की चर्चा है जिसकी बदौलत हमारा सतही समाज उन्हें भगवान पद पर आसीन करना चाहता है. और केवल तेन्दुलकर ही क्यों? हम शाहरुख खान के जबाव पर निर्भर हैं कि भारत में पाकिस्तानी क्रिकेटरों को खेलने की इजाजत मिलनी चाहिए या नहीं, या मुम्बई में हिन्दी बोली जा सकती है या नहीं? हां, हम थोड़े मॉडरेट होकर अपने देश के अस्तित्व से जुड़ते हैं तो हॉकी वर्ल्ड कप के मुकाबले देख और उस पर बहस कर साबित कर देते हैं कि हम देश के बारे में भी सोचते हैं। मगर महंगाई से त्रस्त इस देश की सरकार बजट में इसे दूर करने के बदले इसे और बढ़ा देने और धनकुबेरों को कमाई का और अधिक अवसर प्रदान करने में तल्लीन है मगर यह खबर और इससे जुड़ी तमाम सूचनाएं हम सुनकर भुला देते हैं, गो कि ये सूचनाएं हमारे उदारवादी भोग में खलल डाल रही है. हों, ऐसे में हम कैसे कह सकते हैं कि हमारा देश शतरंज के उन खिलाड़ियों की राह पर नहीं है जो खेल में इतने मशगूल थे कि उन्हें अपने वतन के लुटने और गुलाम हो जाने की भी परवाह नहीं रही?
क्या हमने नहीं देखा कि मुम्बई की लोकल ट्रेनों को आतंकवादियों ने उड़ा दिया और दो दिन बाद उन ट्रेनों पर उतनी ही भीड़ थी. हमारी मीडिया ऐसे में मुम्बई के जज्बे को सलाम कर रही थी मगर इसके जवाब में क्या हो रहा है यह पूछने वाला कोई नहीं था. इसके कुछ ही साल बाद हमने संसद पर हमला होते देखा, हमने फिर देखा कि दस युवक एक नाव से मुम्बई में घुस आए और उन्होंने पूरे शहर को तबाह कर दिया। हमने पिछले साल अमेरिकियों के 9/11 के तर्ज पर उसकी बरसी भी मनाई पर हमने इस बात का टेंशन नहीं लिया कि यह कैसे संभव है कि सिर्फ दस लोग इस देश पर आक्रमण करने की हिम्मत कर सकते हैं और इसे तबाह करने का मंसूबा भी पाल लेते हैं.
क्योंकि उदारवादी मंत्र है टेंशन लेने का नहीं, देने का...हम इन सवालों पर नहीं सचिन तेंदुल्कर, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, ऐश्वर्या राय, सानिया मिर्जा, धोनी, सहवाग, प्रियंका चोपड़ा, करीना कपूर और राखी सावंत के बारे में सोचते हैं। सास-बहू के धारावाहिकों की चर्चा करते हैं, टैलेंट शो की बेइमानियों पर इतने नाराज हो जाते हैं कि उसे नेशनल इश्यू बना डालते हैं, मगर महंगाई, आतंकवाद, माओवाद, बेरोजगारी, बढ़ता तनाव आदि जैसे हमारे जीवन के विषय ही नहीं। हमें अपने वैवाहिक जीवन की सफलताओं-असफलताओं से अधिक राहुल गांधी की शादी और करीना कपूर और दीपिका पादुकोण के अफेयरों की चिंता है।
आप यह सोचकर प्रसन्न हो सकते हैं कि हम सौभाग्यशाली हो गए हैं कि हमने उस दौर में जन्म लिया जब सचिन तेंदुल्कर ने वनडे में दो सौ रन बनाए हैं, मगर इस बात का हमें तनिक भी अफसोस नहीं कि हम मजह दो साल में तकरीबन हर चीज की दो गुनी कीमत चुका रहे हैं। हमारी नौकरियों में हर साल पगार घट रही है और तनाव डबल होता जा रहा है। फ्री टॉक टाइम बढ़ता जा रहा है मगर अपने ही माता-पिता से, रिश्तेदारों से बातचीत के लिए वक्त लगातार कम होता जा रहा है। मगर इन सवालों के तह में जाना इतना पीड़ादायक है कि कौन इनमें समय खपाए, इंटरनेट के जरिए जीवन की बैतरणी पार करने बैठा हमारे देश का युवा सोचता है कि इससे बेहतर क्यों न आरकुट पर कोई सुंदर सा साथी तलाश लिया जाए? यही वर्ग जो जमीन से उड़कर आसमान में खूंटा गाड़ रहा है उसे ही सचिन तेन्दुलकर भगवान नजर आते हैं और उस भगवान को भारत रत्न बना देने की मांग कहीं से नाजायज नहीं लगती है. समय की मांग यही है तो उसे पूरा न करने का साहस भला कौन कर सकेगा? दरिद्र नारायण भूखे रहें तो रहें इनके भगवान को भारत रत्न जरूर मिलना चाहिए. आईये हम भी अपनी पूरी सहानुभूति उदारतापूर्वक उनकी इस मांग के साथ उड़ेल दें.
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गज़ब लिखा है. हर शब्द धारदार. कोटिशः धन्यवाद आपकी इस लेखनी को. यह हर सच्चे भारतीय की आवाज़ है.
boss aapko ab tak jitni bar bhi yaha padha hai unme yad karu to ye abhi tak ka aapka behtareen lekhan hai
बहुत ही बढ़िया कटाक्ष किया है आपने इस सिस्टम के ऊपर, समाज के हरेक व्यक्ति पर। कि किस तरह अपनी परेशानियों को भुलाने का सहारा वह ढूँढ लेता है।
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