महिला आरक्षण से बनेगा इतिहास या बिगड़ेगा भविष्य?
सदन पटल पर आ रहे महिला आरक्षण विधेयक के लिए उम्मीद है कि यह बहुमत से भी अधिक मतों से पारित हो जायेगा. हालांकि सरकार इस विधेयक को संसद में सर्वमत की मुहर लगवाना चाहती है लेकिन इतना साफ दिख रहा है कि तेरह सालों के अथक प्रयास के बाद बिल के पास होने घड़ी नजदीक आ गयी है. जिस वक्त महिला आरक्षण विधेयक पर बात शुरू हुए तब से अब तक तेरह साल बीत चुके हैं. इन तेरह सालों में बहुत कुछ बदला है. वह बदलाव क्या-क्या है?
तेरह साल पहले पुरुष प्रधान भारतीय संसद में जब देश की आधी आबादी को तिहाई प्रतिनिधित्व देने की बात की गयी थी तो मांग नाजायज नहीं थी. लेकिन उस वक्त "पुरुष प्रधान" भारतीय संसद में महिलाओं की भागीदारी पीड़ादायक तो बिल्कुल नहीं थी. 1999 की संसद में महिलाओं का प्रतिशत 8.8 था. इसके पहले 1996 और 1991 की संसद में महिलाओं की संख्या इस अनुपात में कम जरूर थी लेकिन संसद महिलाओं से वीरान नहीं थी. लेकिन महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा शुरू होने के इन तेरह सालों में भारत को अपनी पहली महिला राष्ट्रपति मिली, और जो लोकसभा महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देकर भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में नया अध्याय लिखने जा रही है उस संसद की सभापति भी बिना किसी आरक्षण के एक दलित महिला ही हैं. सत्ता के इतर परमसत्ता का संचालन भी एक महिला ही करती हैं जिसके लिए दुनिया की सभी बड़ी पत्रिकाएं समय समय पर उन्हें भारत की सबसे ताकतवर महिला घोषित करती रहती हैं. रही सही कसर हाल में ही भाजपा ने पूरी कर दी जब नेता विपक्ष का पद आडवाणी जी से लेकर एक महिला को सौंप दिया. जिस राजधानी में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण का इतिहास रचा जाना है उस राजधानी दिल्ली की मुख्यमंत्री पिछले पंद्रह सालों से एक महिला ही हैं.
अब हम इसे अपने देश की विडम्बना कहें या फिर ओछी राजनीति की पराकाष्ठा, कि हम आज भी उसी महिला आरक्षण बिल के पीछे पड़े है जो आज कि प्रगतिशील महिलाओं को देखते हुए आधारहीन सा प्रतीत होता है. क्योंकि इतने उद्धरणों के बाद यह कहना कि राजनीत में महिलाओं कि भागीदारी नहीं है यह तार्किक प्रतीत नहीं होता है, और सिर्फ राजनीति ही क्यों? पूरी दुनिया में व्यावसायिक रूप से प्रशिक्षित सबसे अधिक महिलाएं भारत में रहती हैं. देश की प्रमुख २१ कंपनियों की प्रमुख महिलाएं है. सिर्फ यहीं नहीं हमारे देश में अमेरिका के मुकाबले ज्यादा महिला डॉक्टर, सर्जन, वैज्ञानिक और प्रोफ़ेसर हैं. दूसरे किसी भी देश के मुकाबले भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या अधिक है जिसमें सैन्य अफसरों से लेकर अप्रशिक्षित श्रमिक तक हैं. अब इतनी क्षमतावान तथा प्रतिभावान महिलाओं के देश में राजनीतिक भागीदारी के लिए ३३% आरक्षण की मांग अपने आप ही छोटी तथा आधारहीन हो जाती है.
आरक्षण वह बैशाखी है जो सहारा तो हो सकती है लेकिन यही बैशाखी हमेशा के लिए उस वर्ग को अपाहिज भी बना देती है जो इसके सहारे चलने की कोशिश करता है. दलित और पिछड़ों को दिया गया आरक्षण इसका सबसे जीवंत उदाहरण है. आज महिला आरक्षण के सवाल पर भले ही सारे राजनीतिक दल उदारतापूर्वक व्यवहार कर रहे हैं लेकिन खुद उन प्रगतिशील महिलाओं को सोचना चाहिए कि इस बैशाखी के सहारे वे लोकतंत्र में कहां तक आगे जा पायेंगी?
हालाँकि यह दावा किया जा रहा हैं कि अन्तराष्ट्रीय महिला दिवस के शताब्दी वर्ष में महिला विधेयक पारित होने से यह एक विश्व इतिहास बन सकता है. पर क्या सारी ऐतिहासिक बाते सकारात्मक ही होती आई हैं. अगर हम ज्यादा नहीं तो थोड़ा ही पीछे जाएँ तो पाएंगे कि जब नैतिकता और सत्य पर सारा व्यतीत करने वाले विनोबा भावे ने इंदिरा गाँधी के आपातकाल लगाये जाने के फैसले को ' अनुशासन पर्व ' कहा था, जिसपर उनका मानना था कि तमाम दिक्कतों का हल राजदंड ही है, हालाँकि यह सिर्फ उनके आकलन की गलती ही थी. वैसे यह फैसला भारत में राजनैतिक ही नहीं सामाजिक तौर पर भी एक अभूतपूर्व ऐतिहासिक फैसला था पर क्या आपातकाल को किसी भी तरह से सकारात्मक कहा जा सकता है. सिर्फ यही नहीं हमारी राजनीति के ऐसे कई ऐतिहासिक फैसले है जो राजनैतिक तौर पर तो ऐतिहासिक जरुर है पर सकारात्मकता की दौड़ में कहीं पीछे हैं. जैसे सन १९७७ में जब जनता पार्टी सत्ता में आई थी तो लोगों को लगा था यह एक अहिंसक क्रांति है, लोग यही सोच रहे थे कि बैलेट को बुलेट से बड़ा साबित कर दिया गया है जो अपने आप में एक इतिहास है पर दो साल के भीतर ही जनता पार्टी कि क्रांति छिन्न- भिन्न हो गई, जब वीपी सिंह कि अगुआई में कांग्रेस के खिलाफ जंग छिड़ी तब ही इसी तरह कि क्रांति कि उम्मीद कि गई थी पर दोनों ही बार बुजुर्ग नेताओ कि सत्ता लोलुपता ने भारत में क्रांति के मायने ही पलट कर रख दिए गए. अब ऐसे तथ्यों के सामने होते हुए इसकी कि सम्भावना ज्यादा नहीं कि यह महिला आरक्षण विधेयक भी कुछ ऐसा ही इतिहास प्रस्तुत करेगा.
हालाँकि यह बात भी सत्य है कि सामाजिक, राजनैतिक,और आर्थिक चेतना के इस्तर पर भारतीय महिलाएं कुछ पीछे जरूर है अगर आंकड़ों पर गौर किया जाये तो अमेरिका में महिला सांसदों का प्रतिशत २१.८ है . यूरोप में १९.१ प्रतिशत , एशिया में १७.४ प्रतिशत है और अरब देशों में ९.६ प्रतिशत है वहीँ भारत में यह आकड़ा ५ से ११ प्रतिशत का है (वर्तमान समय में ५४३ सांसदों में से ५९ संसद महिला है ). संसदीय प्रणाली वाले १३५ देशों में भारत १०५ स्थान पर आता है जो बहुत उत्साहवर्धक बात नहीं है पर क्या महिला आरक्षण बिल इसका समाधान है? अगर हम पिछली तीन लोकसभा का रिकार्ड देखें तो महिलाओं के प्रति राजनीतिक दलों का रुख संतोषजनक नजर आता है. वर्तमान लोकसभा में ही ५९ महिला सांसद हैं जो पिछली लोकसभा के मुकाबले १४ अधिक है. लेकिन आज महिलाओं के सामने ही महत्वपूर्ण सवाल यह है कि समाज के बाकी क्षेत्रों में वे सभी जगह अपनी काबिलियत की बदौलत शीर्ष तक पहुंची है तो सिर्फ संसद तक पहुचने के लिए ही आरक्षण कि जरुरत क्यों पड़ गई? क्या इस बिल को पास करने से पहले इस बात पर विचार नहीं किया जाना चाहिए? जब किसी पेड़ कि जड़ ही कह्राब हो तो पत्तियों में कितना भी पानी डालने से हरियाली आने कि कोई सम्भावना नहीं होती, फिर भी पिछले तेरह सालों से हम यही करने अक प्रयास कर रहे है, और आज भी हरियाली आने के लिए नहीं बल्कि कृतिम पेड़ खड़े करने के लिए यह विधेयक पारित किया जा रहा है. अभी तक पंचायत और सभासदी के स्तर पर दिए जा रहे महिला आरक्षण का क्या हश्र होता आ रहा है? हर जगह आरक्षण के नाम पर पुरुष प्रधानता को महिला आरक्षण का मुखौटा पहनाया गया है, तो आगे ऐसा नहीं होगा इसका जिम्मा कौन लेगा?
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