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नारी मुक्ति का नाजायज नारा

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आज अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर महिला दिवस का अनुष्ठान है. आज सरकारी तौर पर लम्बे -चौड़े वक्तव्य,विज्ञापन,संकल्प, धूमधडाका, विमर्श, कार्यशालाओं आदि के आयोजन होंगे. सवाल पैदा होता है कि क्या एक दिन महिलाओं के नाम पर इस तरह के औपचारिक अनुष्ठान संपन्न करा लेने भर से महिलाओं का समग्र कल्याण हो जाना निश्चित है?

क्या हम को पश्चिम से चली नारी-स्वाधीनता की भोगवादी आंधी को सहज स्वीकार लेना चाहिए? स्वामी विवेकानंद कहते थे कि भारत में नारी के रूप में जन्म लेना नर के रूप में जन्म लेने की तुलना में अधिक पुण्य-फल प्रदान करनेवाला होता है. हालांकि पश्चिमी संकृति के सामने हमारी हिन्दवी संस्कृति को दकियानूस मानने वाला वर्ग हमारे 'यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः' को दंभ भरी अनर्गल उक्ति से अधिक कुछ भी माने को तैयार नहीं होंगे. यह भी सच है कि आज भी इस देश में ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं है जो कन्या के जन्म को दुर्भाग्य मानते हैं,पर इस सच से रत्ती मात्र भी यह सच्चाई भी कम नहीं की इस देश का लोक मानस नारी को पूज्य मानता रहा है. अवधी का एक मशहूर गीत है-

'काहे बिन सून अंगनवा ये बाबा, काहे बिन सून लख राव, काहे बिन सून दुवरवा ये बाबा, काहे बिन पोखरा तोहार!
  
तोहरे  बिन सून अंगनवा ये बेटी, कोइलारे बिन लख रावँ, पूत बिन सून दुवरवा ये बेटी, हंसा बिन पोखरा हमार!'

कन्या अपने पिता से पूछती है- पिताजी, किसके बिना आँगन सूना हो जाता है,किसके बिना आमों का बाग़,किसके बिना दरवाजा सूना लगता है,किसके बिना तुम्हारा पोखर? पिता उत्तर देते हैं- बेटी, तुम्हारे बिना आँगन सूना हो जाएगा, कोयल बिना आमों का बाग़, पुत्र के बिना दरवाजा सूना लगता है और हंस के बिना पोखर. यहाँ हंस का अर्थ दामाद से लिया जाता है. जिस देश के लोक गीतों में नारी को हजारों रिश्तों के केंद्र के रूप में मान्यता रही हो वहाँ कोई नारी को बंधन से मुक्त कराने की बात करे तो अजब नहीं लगता? इस देश में नारी तो अपने मायके में वाणी, लक्ष्मी की तरह पुजाती है. वह मायके से ससुराल तक किसी की ननद है, किसी की भाभी है, किसी की जेठानी, किसी की देवरानी, किसी की दीदी, किसी की लाडली, किसी की बहू, किसी की अनुज-वधु, किसी की चाची, किसी की मौसी, किसी की बुवा. स्वामी विवेकानंद ने नारी को इस सहस्र कमल दल रुपी रिश्तों के बीच निहारा होगा सहस्र कमल दल के बीच उसके पराग कण रुपी सर्जन की क्षमता में उन्होंने नारी की पुण्यदायिनी क्षमता को प्रस्फुटित  होते देखा होगा. पश्चिम नारी के जिस स्वरुप का आदी है वह नारी निरे यौन आकर्षण के केंद्र से बाहर अपना विस्तार नहीं पाती. यौनाकर्षण में घुट कर पश्चिम की नारी चुक जाती है.पश्चिम की नारी बांधवी स्वरुप को कैसे समझे? वहाँ के बाप ने तो बालिग़ होते ही कन्या को बेगानेपन के ऊसर में खदेड़ दिया है. माँ को बोझ करार दे दिया है.पश्चिम के समाज से कहा जाए कि माँ के हाथ की मकुनी अमृत समान होती है तो वह तर्क के धरातल पर उसे खारिज कर देगा. संयुक्त परिवार तो उसकी कल्पना में ही नहीं आ सकता. हमारा समाज शहरीकरण के दबाव को झेलकर भी अभी रिश्तों के बंध्याकरण का शिकार नहीं हुआ है. आंटी-अंकल के रिश्ते भले ही इस देश में भी सर्वव्यापी हो गए हों, बावजूद इसके मित्र की पत्नी उम्र में छोटी होते ही बहू बन जाती है. बड़ी हुई तो उसे भाभी कहने में संकोच नहीं होता. मित्र की बहन हमारी बहन ,बुआ से बुआ वाला रिश्ता हम क्यों जोड़ लेते हैं? इन रिश्तों के आते ही हमारा उनकी ओर देखने का भाव क्यों बदल जाता है?

'दुर्गा सप्तशती'  में 'स्त्रियः समस्त्रातव देवि भेदः' में इसी तथ्य को दर्शाया गया है. स्त्री की प्रत्येक भंगिमा में देवी का कोई न कोई भाव,कोई न कोई सौन्दर्य रूपायित होता है. इसलिए भारतीय संस्कृति ने माना कि नारी का शरीर केवल भोग्य नहीं है वह पश्चिमी संस्कृति की समझ की तरह केवल वास्तु नहीं है,बल्कि वह शक्ति पुंज है.इस संस्कृति में नर-नारी सम्बन्ध परस्पर यौन संबंधों पर आधारित नहीं है. वरना 'महाभारत' द्रौपदी कृष्ण की बहन होकर कृष्णा कैसे बन जाती? जो सम्मान पटरानी होकर रुक्मिणी  नहीं पाती वह द्रौपदी के हिस्से कैसे चला जाता? 'उत्तर रामचरित' की  वासंती तो राम को भी फटकारती है और विरह दग्ध राम की खातिर सीता को भी उलाहने देती है. समाज से नारी के अनत रिश्तों ने ही उसे अलग-अलग मौकों पर मया,मोहमयी रजनी, काली-कंकाली, दयामयी, रागमयी, लालासामायी लक्ष्मी, उल्हासमायी , प्रकाशमयी सरस्वती बना दिया. नारी समस्त सृष्टि की साधना और आकांक्षा है. नारी जिस कुल में जन्म लेती है उसे तारती ही है साथ ही जिस कुल में ब्याही जाती है उसे भी तार देती है. इसलिए जो नारी उत्पीडन के कुछ आंकडे देकर इस देश को नारीवाद का उपदेश देने निकल पड़े हैं उन्हें समझना होगा कि जिस देश में वैदिक काल से लोपमुद्रा ऋचाएं रचती रही ही उसे नारी स्वातंत्र्य का उपदेश पश्चिमी मापदंड पर नहीं दिया जा सकता. इस देश में तो सृष्टि की रचना ही नारी से मानी गयी है,पृथ्वी को नारिस्वरूपा समझा गया है.स्वर्गीय आचार्य नरेन्द्रदेव कहा करते थे कि संस्कृति मानव चित्त की खेती हुआ करती है. हिन्दवी मानस नारी के सम्मान में झुका रहता है,इसलिए यहाँ का देवता भी अर्धनारीश्वर होता है, इसलिए नारी को हिस्सेदारी के कानूनी जामे में बांधना महज विधिक व्यस्थापन के अलावा कुछ और नहीं.नर और नारी सृष्टि  रूपी वाहन के दो समान पहिये हैं, उनमें कोई किसी से कमजोर होगा तो सृष्टि का सहज संचालन ही कठिन हो जाएगा. हमारा देश तो नारी युग में जीता है उसे नारी दिवस का दिया दिखाने का क्या औचित्य?

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इरफ़ान on 09 March, 2010 20:44;58
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प्रेम भाई,
आखिरकार कुछ अलग लिखा और क्या खूब लिखा. बहुत ही बढ़िया लेख! आमतोर पर ऐसे लेखो पर टिप्पणिया कम आती है लेकिन आप लिखते रहिये.
मुबारकबाद आपको!
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image प्रेम शुक्ल मुंबई से प्रकाशित हिन्दी सामना के कार्यकारी संपादक. पिछले 20 सालों से पत्रकारिता. पत्रकारिता के साथ ही मुबंई में हिन्दीभाषी समाज के विभिन्न सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में भी सक्रिय. विस्फोट.कॉम के नियमित स्तंभ लेखक. संपर्क - premshukla@rediffmail.com
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