महिला आरक्षण विधेयक का मंहगा सौदा
महिला आरक्षण के सवाल पर सरकार खुद ही फंस गई है। अब सरकार से कोई पूछे, इतनी हड़बड़ी क्यों दिखाई? बिल के विरोधी तो खुल्लमखुल्ला कह ही रहे थे कि बर्दाश्त नहीं करेंगे। अभी तो सिर्फ कुर्सी और बैंच तक चढ़े हैं, जरूरत पड़ी तो लक्ष्मण रेखा के आगे जाएंगे। वाकई राज्यसभा में तो महज आठ-दस सांसद बवाली फिर भी मानो, बिल पास हो गया तो लोकसभा में क्या होगा? वहां तो बवालियों के सरदार लालू-मुलायम-शरद बैठे हुए हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि सरकार महंगाई से ध्यान बंटाने के लिए राज्यसभा से महिला आरक्षण का बिल पास कराए, फिर लोकसभा में चुनाव तक पेंडिंग कर दे?
इसे कहते हैं- चौबेजी चले थे छब्बे बनने, दुबे बनकर लौट आए। कांग्रेस ने महिला बिल पर खूब माहौल बनाया। ताकि मौका और दस्तूर निभा सके। मौका, यानी महंगाई की चक्की में पिस रही कांग्रेस को ध्यान बंटाने की वजह मिल गई। तो लगे हाथ महिला दिवस पर महिला बिल का दस्तूर भी निभा लिया। पर अबके माहौल ऐसा बनाया, मानो बिल पास होकर रहेगा। सो पहली बार राज्यसभा में तिल भर जगह नहीं। महिला आरक्षण बिल मनमोहन की पहली पारी में इसी सदन में पेश हुआ था। सबकी निगाहें राज्यसभा पर ही गड़ी थीं। लेकिन आखिर में बिल वाकई रस्म आदायगी साबित हुई। वीरप्पा मोइली ने पारित करने को बिल पेश तो कर दिया पर पास कराने का साहस नहीं जुटा पाए। मुट्ठीभर सांसदों ने सदन में भूचाल ला दिया।
यों हंगामे की उम्मीद पहले से थी। विरोधी इस कदर आक्रामक होंगे, यह भी जगजाहिर था। गुजराल का जमाना हो या वाजपेयी का। कैसे ट्रैजरी बैंच की ओर जाकर विरोधियों ने बिल फाड़े, कौन भूल सकता। खुद कांग्रेस अपना पिछला रिकार्ड याद नहीं रख पाई। पर तब फ्लोर मैनेजमेंट में कांग्रेस ने विरोधियों को चित कर दिया। तबके विधि मंत्री हंसराज भारद्वाज को बिल पेश करना था। सो सदन की दूसरी बैंच में बैठे। आजू-बाजू में महिला मंत्री अंबिका-शैलजा बैठीं। बाकी कांग्रेस की महिला ब्रिगेड घेरा बनाने को तैयार बैठी थी। सो हंगामा तो खूब बरपा पर बिल पेश हो गया। अबके स्टेंडिंग कमेटी से होकर बिल फिर सदन में आया तो फ्लोर मैनेजमेंट में कांग्रेस मुंह की खा गई। सच मायने में महिला बिल के प्रति कांग्रेस ईमानदार नहीं थी। महंगाई पर जब चौतरफा घिरी। तो दस जनपथ से महिला बिल का राकेट छूटा। कांग्रेस माहौल बनाने में कामयाब तो रही। पर प्रबंधन की कमी से एतिहासिक मौका गंवा दिया। महिलाओं को न्योता देकर उपवास तो कराया ही। पहली बार उच्च सदन यानी राज्यसभा की गरिमा पर कालिख पुत गई।
उच्च सदन में बैठने वाले कुछ सांसद महज वोट बैंक की राजनीति के लिए छोटी हरकत कर गए। दोपहर तक तो सदन ठप रहे। पर जैसे ही दो बजे बिल पेश हुआ। सपा-राजद और जदयू के सांसद चेयरमैन की कुर्सी तक पहुंच गए। फिर क्या था, मुलायमवादी कमाल अख्तर और लालूवादी सुभाष यादव ने माइक तोडऩे से लेकर बिल छीनने का इतिहास रच दिया। जदयू के निलंबित एजाज अली तो खुन्नस में एजंडे की ही चिंदी-चिंदी हवा में उड़ाते रहे। लोकसभा में तो ऐसी घटनाएं हो चुकीं। पर सम्माननीयों के सदन राज्यसभा में ऐसा पहली बार हुआ। चौदहवीं लोकसभा में ऐसा इतिहास एक नहीं, तीन-तीन बार रचे गए। सनद रहे, सो बताते जाएं। याद है, ममता बनर्जी तब एनडीए का हिस्सा थीं। सदन में बंगाल सरकार के खिलाफ बोलना चाहती थीं। सोमनाथ दादा ने इजाजत नहीं दी। पर भोजन अवकाश के बाद जब सदन बैठा। तो आसंदी पर डिप्टी स्पीकर चरणजीत सिंह अटवाल थे। ममता तुनकते हुए वैल में घुसीं। बंगाल सरकार के खिलाफ इकट्ठा सारा चिट्ठा आसंदी के मुंह पर दे मारा। फिर लालू और प्रभुनाथ की भिड़ंत ने तो शर्मसार ही कर दिया। दोनों के बीच भिड़ंत की नौबत मां-बहन की गाली तक पहुंच गई। सदन स्थगित हुआ तो लालू के बवाली साले साधु यादव ने फिल्मी स्टाइल में जंप मारा। फिर धक्कामुक्की-हाथापाई जमकर हुई।
लोकसभा का ही एक और किस्सा, जब खुद सरकार शर्मसार हुई। लेफ्ट बाहर से समर्थन दे रहा था तो डीएमके अंदर से। सामुद्रिक विश्वविद्यालय बिल को लेकर दोनों उलझ गए। खुद वासुदेव आचार्य ने ब्रिगेड समेत मंत्री बालू तक पहुंच हाथ से बिल छीन लिया। पर हर बार वही नैतिकता-मर्यादा की दुहाई और खेद प्रकट करने की परंपरा सो बवाली सांसदों का मनोबल बढ़ा हुआ। यों राज्यसभा में बलवे के बाद सरकारी तंत्र एक्टिव हुआ। सदन स्थगित था। पर इस बीच चेयरमैन की मेज से पेन, पैंसिल, पिन के स्टैंड हटा दिए गए। सैक्रेट्री जनरल की बगल में रखी किताबें दराज में समेट दी गईं। सामने की टेबल पर रखी फाइलें हटा दी गईं। सदन शुरू होने से पहले वैल में मार्शलों का घेरा बन गया। ऐसा लगा, मानो सरकार डरी हुई। फिर भी दंगल की तैयारी दिखी। लगा, हंगामा कितना भी बरपे। बिल तो पास कराकर रहेगी कांग्रेस। पर लौट के बुद्धू घर को आए। नंबर गेम का बंदोबस्त होने के बावजूद सरकार पीछे हट गई। अब प्रणव दा को चिंता वित्त विधेयक की। महिला बिल से खटास पैदा हुई। तो कट मोशन से कहीं वित्त विधेयक न अटक जाए। भले बीजेपी भरोसा दे रही। पर पिछले हफ्ते तक विपक्ष की एकजुटता सरकार देख चुकी। सो वोटिंग से कदम खींच पीएम ने कांग्रेस कोर ग्रुप की मीटिंग बुला ली। अब मंगलवार को सर्वदलीय मीटिंग हो या कुछ दलों से बात। पर नतीजा वही ढाक के तीन पात। हर बार बिल पेश हुआ, हंगामा हुआ। फिर सर्वदलीय मीटिंग में आम सहमति का ऐलान। अब आशंका वही जो शुरू में व्यक्त की जा चुकी है. अगर वैसा हुआ तो फिर क्या होगा?
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