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नेक काम लेकिन नीयत पर शक

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इस महिला आरक्षण विधेयक के कई पहलू हैं। ऐसा तो होगा नहीं कि सभी आरक्षित सीटों पर नेताओं की बीबीयां ही मैदान में उतरेंगी। ऐसा भी नहीं है कि किसी महिला कार्यकर्ता ने जगह नहीं बनाई। सुषमा स्वराज या मायावती किसकी बीबी हैं? वो तो अपने ही दम पर आगे आईं हैं। मगर ऐसी महिलाओं की संख्या कम है। आरक्षण के बाद से ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ने लगेगी।

सबसे पहले तो महिला आरक्षण विधेयक के राज्य सभा में पास होने पर बधाई। पहली बार हिन्दुस्तान में जाति आधारित राजनीति की हार हुई है। जाति आधारित राजनीति बेचारी नज़र आई है। आरक्षण का मैं समर्थक रहा हूं। मानता हूं कि दुनिया में इससे बेहतर और कारगर कोई सामाजिक नीति नहीं है। लेकिन इसकी एक सीमा है जो प्राइवेट कंपनियों में आरक्षण की मांग के बहाने झलकती है तो महिला आरक्षण के बहाने खास जाति समुदाय के आरक्षण की मांग के बहाने झलकती है।

लेकिन नीयत पर सवाल की गुज़ाइश अब भी है। 1996 से इस बिल का ड्राफ्ट सबके सामने है। क्या कभी किसी राजनीतिक दल ने अपने पार्टी के स्तर पर महिलाओं की संख्या बढ़ाने की कोशिश की। नहीं की। क्या कांग्रेस ने मुस्लिम महिलाओं को टिकट देने में उदारता दिखाई। मर्द मुस्लिम उम्मीदवार तो छोड़ दीजिए। बीजेपी एक ऐसी पार्टी है जो नाम के लिए एक या दो लोगों को टिकट देती है। देश की एक प्रमुख विपक्षी पार्टी में मुसलमानों का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। इसकी वजहें भी साफ हैं। अगर मुसलमानों के लिए महिला आरक्षण के भीतर आरक्षण होता तो क्या बीजेपी वहां उम्मीदवार नहीं उतारती? उतारना पड़ता। इस बहाने कानूनी तौर पर हम बीजेपी को मजबूर कर सकते थे कि बीजेपी मुसलमानों को प्रतिनिधित्व देने के लिए बाध्य हो। क्या करती बीजेपी। सहारनपुर की सीट मुस्लिम महिला के लिए रिज़र्व हो जाती तो। कहती कि उम्मीदवार नहीं उतारेंगे या किसी बिजनेसमैन मुसलमान के घर जाती, हाथ पांव जोड़ती और कहती कि प्लीज़ आप अपनी बेग़म को समझाइये कि हमारी पार्टी का उम्मीदवार बन जाएं। इस तरह से महिला आरक्षण के बहाने सेकुलरिज़्म का एजेंडे में सबको समेट लेने का मौका मिल जाता। लेकिन दलीलें इसके ख़िलाफ़ दी जाती रही हैं। इसलिए बीजेपी कांग्रेस के इस प्रस्ताव पर सहमत हो गई। ये एक मौका था, बीजेपी को भी मजबूर करने का कि वो अपने भीतर मुसलमानों का प्रतिनिधित्व बढ़ाये।

मुसलमान का वोट सबको चाहिए लेकिन जब कोई आज़म ख़ान कल्याण सिंह को लेकर मुलायम सिंह यादव के ख़िलाफ़ खड़ा होता है तो सब मिलकर आज़म ख़ान की गत निकाल देते हैं। कोई दल उनका साथ नहीं देता। मायावती की पार्टी में मुसलमान विधायकों की संख्या तो है लेकिन उनका कोई स्वतंत्र वजूद नहीं। फिर भी वहां नसीमुद्दीन सिद्दीकी जैसे नेताओं की अहमियत दिखाई पड़ती है। शायद यही वजह रही होगी कि बीएसपी ने सदन का वॉकआउट किया।

राजनीति वो ज़रिया है जिसके सहारे सभी समाजों को समय के अलग-अलग चक्रों में आगे बढ़ने और अपनी भागीदारी बढ़ाने का मौका मिलता है। मुसलमानों को आज तक नहीं मिला। उनका वोट सबको चाहिए। नेता नहीं चाहिए। इस लिहाज़ से आप देखें तो सिर्फ मुसलमान हैं जो बिना किसी उम्मीद और शर्त के वोट करते हैं। मुस्लिम वोटर अपने चरित्र में ज़्यादा राष्ट्रीय है। यह नहीं कहता है मेरी इतनी संख्या भारी तो दो मुझको भी हिस्सेदारी। न ही जब मुसलमानों की बारी आती है तो पार्टियां ऐसा करती हैं। मुस्लिम मध्यमवर्ग तैयार हो रहा है। राजनीति की मुख्यधारा से सक्रिय रूप से जोड़ने का ये अच्छा मौका था। मान लीजिए मौजूदा मुस्लिम नेतृत्व का कोई स्तर नहीं है। चाहें वो किसी भी पार्टी में हों,उनका कोई वक़ार नहीं है। लिज़लिज़े हैं सब। किसी ने आवाज़ तक नहीं उठाई। ओवैसी जैसे एकाध सांसद चिल्लाते रहे लेकिन मुस्लिम सांसद अपनी मजबूरियों के ख़ौफ से इस ऐतिहासिक बिल को अपनी गली की तरफ मोड़ने में नाकाम रहे। जो मुस्लिम सांसद अपनी सांसदी नहीं छोड़ सकते वो क्या ख़ाक़ अपने क़ौम की बात करेंगे। मेरी यह दलील किसी काम की न होतीं अगर टिकट देने के मामले में बिना धर्म का ख़्याल किये पार्टियों को मुस्लिम नौजवानों में राजनीतिक नेतृत्व का कौशल नज़र आता।

अब देश में कामयाब महिलाओं का दो समूह होगा। एक वो जो अपने दम पर अंतरिक्ष की यात्रा कर आती है और एक वो जो आरक्षण के दम पर संसद की यात्रा करेगी। दोनों प्रक्रियाओं से आधी आबादी को दुनिया के मंच पर आने की रफ्तार तेज होगी। हज़ारों सालों से जिन्हें कमरे में बंद कर रखा गया है,उन्हें बाहर निकालने के लिए घर के सारे दरवाज़े खोलने ही होंगे। तीसरी बात है। क्या आरक्षण अब अपना राजनीतिक महत्व खोने की दिशा में जा रहा है? अति आरक्षण एक मजाक है। ग़रीब सवर्णों के नाम पर आरक्षण की मांग अभी बाकी है। बीएसपी इसकी वकालत करती है। आर्थिक, जाति और जेंडर के आधार पर आरक्षण को लेकर कोई प्रॉब्लम नहीं तो धर्म को लेकर क्यों होता है? इसलिए कि आरक्षण मुसलमानों को मिल जाएगा? चौथी बात है। जिस मंडल की राजनीति ने मंदिर आंदोलन की हवा निकाल दी,वो महिलाओं के आगे निरस्त हो गया। मंदिर को हराने वाला मंडल,महिलाओं से हार गया है। यादव त्रयी बेचारे नज़र आए। उनकी बातों पर चर्चा किये बिना बाकी दलों ने किनारे ठेल दिया। ये कुछ सवाल है जो मेरे मन में उभर रहे थे,बिल पास होने की खुशी के उतार-चढ़ाव में।

(रवीश कुमार एनडीटीवी इंडिया के फीचर एडीटर और संवेदनशील पत्रकार हैं.)

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ghakki on 10 March, 2010 22:47;28
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रंगहीन स्वाद हीन गंधहीन लेख
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देशप्रेमी on 11 March, 2010 01:26;35
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"इस लिहाज़ से आप देखें तो सिर्फ मुसलमान हैं जो बिना किसी उम्मीद और शर्त के वोट करते हैं। मुस्लिम वोटर अपने चरित्र में ज़्यादा राष्ट्रीय है। यह नहीं कहता है मेरी इतनी संख्या भारी तो दो मुझको भी हिस्सेदारी"
ये लाइन पच नही रही है. कोई हाजमोला दो भाई.
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सलीम अख्टर सिद्दीकी on 11 March, 2010 12:09;47
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हाजमोला की ज़रूरत तो आपको है तताकथित देशप्रेमी भाई केवल लिखने से ही कोई देशप्रेमी नहीं हो जाता.
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सोनू on 11 March, 2010 23:32;42
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ऐनडीटीविए तो बेगम में भी ग़ैन का नुक्ता लगा देते हैं।
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