काम नहीं, नाम बना टीम गडकरी का पैमाना
बजट सत्र में अभी तीन हफ्ते का ब्रेक। सो बीजेपी में संगठन की चाल बदलने की कवायद शुरू हो गई। हिंदी कलेंडर के मुताबिक मंगलवार से नया साल शुरू हो गया। सो हिंदी, हिंदू, हिंदुस्थान के हमराह होने का दंभ भरने वाली बीजेपी ने नए सफर की शुरुआत कर दी। नितिन गडकरी ने अपनी टीम का एलान कर दिया। टीम में 33 फीसदी सीटें बढ़ा करीब 60 फीसदी नए चेहरे लेकर आए।
महिलाओं को 33 फीसदी हिस्सेदारी भी सुनिश्चित की। टीम में युवाओं और अनुभवी नेताओं के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश भी। ताकि यकायक नहीं, बल्कि संक्रमण काल से गुजर बीजेपी नए युग में प्रवेश करे। फिर भी टीम को लेकर फ"ार फंस ही गया। मुख्तार अब्बास नकवी का उपाध्यक्ष बनना तय ही था। पर अल्पसंख्यकों में सकारात्मक संदेश देने के लिए पावरफुल मानी जाने वाली महासचिवों की टीम में शाहनवाज को मौका देना था। पदाधिकारियों में सबसे अहम महासचिव ही होते। सब कुछ तय हो गया, पर आखिरी वक्त में संघ ने शाहनवाज के नाम पर वीटो कर दिया। सो गडकरी ने शाहनवाज को प्रवक्ता बना दिया। पर शाहनवाज अपमानित महसूस कर रहे। अब बीजेपी के महासचिवों की संख्या पांच से सात और सात से दस हो गई। फिर भी कोई अल्पसंख्यक महासचिव नहीं। तो गडकरी किस मुंह से मुस्लिमों को जोडऩे की बात कर रहे। पर फच्चर सिर्फ यहीं नहीं फंसा। टीम में दस महासचिव, तो तेरह उपाध्यक्ष और पंद्रह सचिवों की फौज। पर जैसे ही तेरह का अंक आता, शायद बीजेपी की किस्मत साथ छोड़ देती। मंगलवार को यही हुआ। तेरह उपाध्यक्ष के नाम तय हो गए थे। पर जब लिस्ट जारी हुई, तो 11 नाम ही आए। बाकी दो बॉक्स खाली। यानी बीजेपी ने खुद ही मान लिया, अभी सब ठीक-ठाक नहीं।
सोमवार की रात तक बतौर उपाध्यक्ष ओम माथुर का नाम तय था। दूसरे नाम में यशवंत सिन्हा बताए जा रहे। पर लिस्ट जारी हुई तो डिब्बा बना रह गया, दोनों नाम गायब हो गए। खुद अरुण जेतली, वेंकैया नायडू हतप्रद रह गए। आखिर रात का लिखा सुबह सफा कैसे हो गया। माथुर का नाम बिलकुल आखिरी वक्त पर रुका। सो कार्यकारिणी में भी नाम शामिल नहीं हो सका। चूंकि उपाध्यक्ष के नाते कार्यकारिणी में शामिल होते। सो अलग से उनका नाम नहीं था। पर अब माथुर का नाम न टीम में, न कार्यकारिणी में। सो ओम माथुर की जेतली-वेंकैया से बातचीत हुई। अब भले बाद में माथुर उपाध्यक्ष हो जाएं। पर खींचतान तो उजागर हो ही गई। माथुर के नाम पर एतराज की वजह सिर्फ इतनी, वसुंधरा के साथ मिल राजनीति की नई बिसात बिछाई। माथुर की राह में राजनाथ रोड़ा बताए जा रहे। यों राजनाथ चाहकर भी वसुंधरा को महासचिव बनने से नहीं रोक पाए। सो अपनी खुन्नस शायद माथुर पर उतार दी। अब यशवंत के खिलाफ दलील देखिए। चूंकि यशवंत संसद की स्टैंडिंग कमेटी के मुखिया। पर कोश्यारी भी तो पिटीशन कमेटी के मुखिया। वैसे नाराज तो पद से महरूम होने वाले कई नेता। पर साल के पहले दिन ही टीम गडकरी के ढांचे ने शाहनवाज, माथुर, यशवंत की नाराजगी उजागर कर दी। अब सवाल, टीम बनाने में सबसे ज्यादा किसकी चली?
मंगलवार को लिस्ट जारी होने से पहले आडवाणी भी आश्वस्त नहीं थे। सो हैडक्वार्टर इंचार्ज श्याम जाजू को फोन कर पृथ्वीराज रोड से बार-बार पूछा जा रहा था, लिस्ट आई या नहीं। पर गडकरी तो इत्मीनान से नागपुर में बैठे थे। ताकि कोई गड़बड़झाला हो, तो पलक झपकते ही संघ मुख्यालय से आगे का दिशा-निर्देश ले सकें। अब जरा गडकरी के फार्मूले और टीम को देखिए। गडकरी ने जब बीजेपी की बागडोर संभाली। तबसे अब तक यही कहते रहे- 'टीम का पैमाना काम होगा। परफार्मेंस की ऑडिट कराएंगे।' पर गडकरी की टीम में ऐसा नहीं दिखा। राजस्थान में वसुंधरा के तेवर से पार्टी मुश्किल में थी। तो समझौते में महासचिव पद दे दिया। अर्जुन मुंडा को भी महासचिव पद देकर शिबू सरकार बनाने के लिए मनाया। मध्य प्रदेश में नरेंद्र सिंह तोमर का टर्म पूरा हो रहा। सो केंद्र में पुनर्वास कर दिया। हिमाचल में जेपी नड्डा धूमल के विरोधी। सो दिल्ली बुला लिया। दिल्ली में प्रदेश अध्यक्ष की खींचतान। सो दो दावेदार विजय गोयल, आरती मेहरा गडकरी की टीम के हिस्सा हो गए। उपाध्यक्ष में हेमा मालिनी बड़े चेहरे के तौर पर उभरीं। कोषाध्यक्ष पद पर पहले कोषाध्यक्ष रहे दिवंगत वेदप्रकाश गोयल के बेटे पीयूष को जगह मिली। प्रवक्ताओं की फौज भी अब तीन से सात हो गई। राजनाथ ने महासचिवों को प्रवक्ता न बनाने का कांग्रेसी फार्मूला अपनाया था। ताकि अरुण जेतली को प्रवक्ता पद से हटा सकें। पर अबके गडकरी ने पुरानी परंपरा लागू कर दी। रविशंकर प्रसाद महासचिव भी, मुख्य प्रवक्ता भी। अब आप खुद ही देख लो। टीम गडकरी का पैमाना क्या रहा, काम या नाम? शायद ही कोई ऐसा नाम मिले, जिसे सचमुच गडकरी की खोज कह सकें। अब टीम का इम्तिहान तो सालभर बाद ही होगा। पर फिलहाल तो यही लग रहा, काम नहीं, नाम ही रहा टीम गडकरी का पैमाना।
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
kaun se school aur coleg me padhe ho yar? kitne marks milte the hindi me hamesha, ye batao bhala?
पिछले कुछ दिनों से भाषा शैली पर काफी कुछ लिखा गया, लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि यह स्तम्भ ' इंडिया गेट से' के नाम से मेरे समाचारपत्र में हर रोज पहले पहले पन्ने हर छपता है. राजस्थान में अपनी इसी विशिष्ट शैली की वजह से यह पाठको में पिछले दस साल से अपनी ख़ास जगह बनाये हुए है.
जहाँ तक शैली का सवाल है, मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि शब्द सीमा का बंधन होता है और कम शब्दों में दिनभर के सारे घटनाक्रम को समेटना होता है. अगर व्याकरण के हिसाब से चला जाये तो शायद यह संभव नहीं होगा.
धन्यवाद सहित.
Post your comment