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माला तो माया की, पर मालामाल कौन नहीं?

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वाकई माला के अनेकों रूप। भगवान के गले में डाल दो, तो धर्म। शादी में दूल्हा-दुल्हन एक-दूसरे को पहनाएं, तो वरमाला। वर्कर अपने नेताओं को पहनाएं, तो आप ही तय करो। यह स्वागत या चमचागिरी? नेताओं के प्रति किसकी कितनी श्रद्धा, यह तो महानुभाव खुद ही जानते। फिर भी माला पहन हाथ ऐसे लहराते, मानो देश के पालनहार हो गए। कोई फूलों की माला पहन हाथ लहराता तो कोई सशरीर धर्मकांटे में बैठ सोने-चांदी के सिक्कों से तोला जाता है।

यानी सबके अपने-अपने शौक। पर शौक में जब सत्ता का नशा जुड़ जाए। तो फिर शौक के क्या कहने। मायावती को वर्करों ने सोमवार को हजार-हजार के करारे नोटों की माला पहनाई। तो विरोधी नोट की चकाचौंध झेल नहीं पाए। सो बीजेपी ने 35 करोड़ की बताई, तो सपा ने 50 करोड़ की। यानी यूपी में जिसकी जितनी हैसियत, उतना हिसाब लगाया। पर माया का मिजाज बिगड़ा। तो फिर खम ठोक दिया, बुधवार को फिर नोटों की माला पहन ली। पर माला का किस्सा बुधवार को लखनऊ ही नहीं, पटना में भी हुआ। महिला बिल पर राज्यसभा में हुड़दंग करने वाले जद यू के निलंबित सांसद एजाज अली पटना पहुंचे। तो समर्थकों ने नोटों की माला पहनाई। पर नोट देख वर्करों की नीयत बदल गई। सो माला से नोट छीनकर भाग खड़े हुए। पर माया के सिपहसालार ऐसे नहीं।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने तो एलान कर दिया- 'अगर बहनजी की इजाजत हो, तो एक-दो बार क्या, हर बार नोटों की माला पहनाएंगे।' सिद्दीकी ने अपनी मीडिया पर भी फब्ती कसी। आभार जता बोले- 'मीडिया ने 48 घंटे में ऐसी सुर्खियां बनाईं, हमारे बीएसपी वर्करों ने चंद घंटों में 18 लाख जुटा बहनजी को माला पहना दी।' यानी माया की चुनौती सिर्फ विरोधियों को नहीं, अपनी मीडिया को भी। अब भले माया का प्रदर्शन भौंडा हो। सत्ता के घमंड में चूर-चूर हो। पर क्या सवाल उठाने वाले ऐसा नहीं करते? माया और बाकी दलों में फर्क सिर्फ इतना। बाकी दल टेबल के नीचे से लेते, माया ने खुलेआम लिया। यानी सीधे सपाट शब्दों में कहें, तो इसे आप ईमानदारी से चोरी कह लें। नेता कितने पाक-साफ, यह जनता बखूबी जानती। पर माया की माला पर ही इतनी हायतौबा क्यों? माला कितने की, यह तो मालूम नहीं। पर इनकम टेक्स वाले अभी क्यों जागे? याद है, दिसंबर 2008 में बीजेपी हैडक्वार्टर से 2.6 करोड़ रुपए दिनदहाड़े चोरी हो गए। चोर बीजेपी के अपने ही थे। सो मीडिया में शोर मचने के बाद भी 'मौसेरे भाइयों' ने बात दबा ली। सो सवाल, तब इनकम टेक्स वाले कहां थे? बीजेपी ने तो एफआईआर तक दर्ज न होने दी। संसद में 22 जुलाई 2008 को नोटों की गड्डिïयां लहराईं। पर जांच कहां तक पहुंची? स्विस बैंक में जमा काला धन किसकी, जो वापस लाने की कोशिश नहीं हो रही। अब बीजेपी लोकतंत्र में लोकलाज की दुहाई दे रही। रविशंकर प्रसाद ने मायावती की तुलना सद्दाम हुसैन से की। पर लोकलाज का क्या मतलब? यही ना, चोरी करो, पर दरवाजा बंद करके। सद्दाम से तुलना माया की बुतपरस्ती को लेकर की। तो दूसरी तरफ कांग्रेस ने माया को दलित की बेटी नहीं, दौलत की बेटी कहा। अब जरा यह भी जान लो, दौलत की बेटी कहने वाला कौन? कोई और नहीं, राजा दिग्विजय सिंह ने यह उपाधि दी। वही दिग्गी राजा जब मध्य प्रदेश में सीएम थे तो सिक्कों और नोटों से कितनी बार तोले गए, शायद उन्हें भी याद न होगा।

पर नोटों की माला की प्रवृत्ति आई कहां से? पूंजीवादी बाजार में घोड़ी पर बैठा दूल्हा नोटों की माला पहन रहा। तो भाई के हाथों पर बंधने वाली राखी भी अब नोटों की बनने लगी। क्या यह भौंडा प्रदर्शन नहीं? बीजेपी-कांग्रेस जैसे बड़े दलों को तो टाटा, बिरला, अंबानी जैसे लोगों से चुनावी चंदे मिल जाते। पर छोटे दल कहां झोली फैलाएं। बीएसपी में नोटों की माला नई परंपरा नहीं। जब बीएसपी उभार के दशक में थी। तब कांशीराम ने वर्करों से यही अपील की थी। फूलों के हार से तो हम हार जाएंगे। सो वर्कर थोड़ा-थोड़ा कर ही सही, नोटों की माला बनाएं। यानी पार्टी की जमीन तैयार करने के लिए आर्थिक मदद लेने का अपना तरीका। पर तब दस-पचास रुपए के नोटों की माला बनती थी। अब माया अपने बूते सरकार चला रहीं। तो सबसे बड़े नोट की माला पहन रहीं। अब अगर कोई इस फार्मूले को ही गलत कहे। तो फिर सवाल उठाने का हक न बीजेपी को, न कांग्रेस को। हाल ही में गडकरी बीजेपी के अध्यक्ष बने। तो यही अपील की, फूलमाला-मिठाई नहीं, दफ्तर में रखे बक्से में दान डालो। ताकि किसानों का भला कर सकें। मायावती यही काम अपने समाज के लिए कर रहीं। बीजेपी-संघ हर साल गुरु पूर्णिमा पर गुरु दक्षिणा का आयोजन करतीं। जहां बेनामी लिफाफे में किसने कितने दिए, पता ही नहीं चलता। कांग्रेस में तो बड़े-बड़े फंड मैनेजर बैठे हुए। सो राजनीति में लोग कांग्रेस की दुहाई देते। अगर लेन-देन के गुर सीखने हों, तो कांग्रेस से सीखो। पर यह कैसा जमाना। जब पहली बार तोलने की परंपरा शुरू हुई। तो श्रीकृष्ण ने गुरूर तोडऩे के लिए खुद को तुलवाया था। जाम्बवंती को गुमान था, श्रीकृष्ण से उन्हें ही ज्यादा प्रेम। सो नारद ने साबित करने को कहा। तो जाम्बवंती ने प्रेम दिखाने को समूचा राजपाट तराजू पर रख कृष्ण को तोलने की कोशिश की। पर कृष्ण का पलड़ा नहीं हिला। फिर रुक्मणि ने अपना प्रेम दिखाया, महज तुलसी का पत्ता पलड़े पर रखा, तो कृष्ण का पलड़ा ऊपर उठ गया।

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भैया, मैं तो इतनी खूबसूरत माला बनाने बाले हुनरमंद कारीगर की दाद देता हूँ, राजनितिक विवाद से अलग हटकर....
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kamaal Hussan on 17 March, 2010 23:59;42
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मायावती यही काम अपने समाज के लिए कर रहीं..

लेखक mahoday kis samaaj ke liye, ya fir sabhi samudaayon ke kuchh baahubaliyo ke liye jinme nasimuddin siddiqui se lekar Dhananjay Singh, Mukhtaar ansari se lekar harishankar tiwari, Anna maharaj se DP yadav ; Guddu Pandit se yogendr sagar , khair list ginane baitha to jagah khatm ho jayegi

ha inke alwa aam aadmi ka kya kaam kiya Malawati ji ne..
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ghakki on 18 March, 2010 00:04;06
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बड़ो से छिप के सिगरेट पीने और खुलेआम पीने में फर्क ये है की खुलेआम पीने वाला चैन स्मोकर हो जाता है , आगे खुद सोच लो
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Samar Singh on 18 March, 2010 01:05;48
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दूसरी तरफ कांग्रेस ने माया को दलित की बेटी नहीं, दौलत की बेटी कहा। अब जरा यह भी जान लो, दौलत की बेटी कहने वाला कौन? कोई और नहीं, राजा दिग्विजय सिंह ने यह उपाधि दी। वही दिग्गी राजा जब मध्य प्रदेश में सीएम थे तो सिक्कों और नोटों से कितनी बार तोले गए, शायद उन्हें भी याद न होगा।
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on 18 March, 2010 01:48;45
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यार थोडा लिखना सीख लो प्लीज़. संजय जी ज़रा इनको थोड़ी ट्रेनिंग दे आप. सारे लेख का बंटाधार कर देते हो संतोष जी.
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on 18 March, 2010 15:02;30
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अगर आपको नोटों की माला पहना दी जाए, तो क्या आप अपने लेख में सही जगह पर अल्पविराम (,) लगाना शुरू कर देंगे?
मैं मज़ाक नहीं कर रहा हूं.
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santosh Kumar on 18 March, 2010 22:06;04
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सुधि पाठकगन,
पिछले कुछ दिनों से भाषा शैली पर काफी कुछ लिखा गया, लेकिन मैं बताना चाहता हूँ कि यह स्तम्भ ' इंडिया गेट से' के नाम से मेरे समाचारपत्र में हर रोज पहले पहले पन्ने हर छपता है. राजस्थान में अपनी इसी विशिष्ट शैली की वजह से यह पाठको में पिछले दस साल से अपनी ख़ास जगह बनाये हुए है.
जहाँ तक शैली का सवाल है, मैं इतना ही कहना चाहूँगा कि शब्द सीमा का बंधन होता है और कम शब्दों में दिनभर के सारे घटनाक्रम को समेटना होता है. अगर व्याकरण के हिसाब से चला जाये तो शायद यह संभव नहीं होगा.
धन्यवाद सहित.
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prashant mehrishi on 19 March, 2010 22:40;16
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अरे संतोष जी इस माला की कहानी मैं संघ कहा से आ गया . कभी अपने खून पसीने की कमाई का कोई भाग बिना मांगे दिया है क्या? गुरु दक्षिणा एक पवित्र विषय है इस पर आप विचार करे और इस राजनीत की दलदल मैं इसे न लाये .
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image संतोष कुमार मीडिया में माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री. अमर उजाला, यूनिवार्ता और नवज्योति का कार्य अनुभव. दिल्ली में रहकर दिल्ली की रिपोर्टिंग और नवज्योति में नियमित इंडिया गेट कालम का लेखन. पत्रकार के साथ साथ समालोचक. विस्फोट के लिए विशेष लेखन.
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