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खुला दिमाग लेकिन दरवाजा बंद

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संसद और विधान मंडलों में महिलाओं को आरक्षण देने के लिए संविधान में संशोधन करने की कोशिशों को एक ज़बरदस्त झटका लगा है. बी जे पी की नेता सुषमा स्वराज ने कहा है कि इस बिल को लोकसभा में पास कराने के लिए प्रस्तावित सभी पार्टियों की मीटिंग में उनकी पार्टी खुले दिमाग से जायेगी. यह बयान बी जे पी के अब तक के रुख से थोडा अलग है.

क्योंकि अब तक बी जे पी वाले कहते थे कि महिलाओं को ३३ प्रतिशत आरक्षण देने के मामले में उनका फैसला बिलकुल स्पष्ट है. वे इसे पूरा समर्थन  देते हैं. कांग्रेस से मतभेद के बावजूद, कांग्रेस की तरफ से  लाये गए बिल का  बी जे पी ने राज्यसभा में ज़बरदस्त समर्थन किया था. सबको पता है कि बी जे पी के समर्थन के बिना बिल किसी भी हालत में पास नहीं हो सकता था.

अब खुले दिमाग से बिल पर विचार करने की बात कह कर  बी जे पी ने अपने रुख में बदलाव का साफ़ संकेत दे दिया है . यह बात भी सच है कि बी जे पी के लिए अब  अपनी बात बदलना बहुत मुश्किल होगा लेकिन  राजनीति में उन्हीं बातों को किया जा सकता है जो संभव हों .. कोई भी असंभव लक्ष्य रख कर उस पर काम करना बहुत ही  कठिन होता है और असंभव को हासिल करने की कोशिश में कई  बार वह भी हाथ नहीं आता जो आ सकता था .  बी जे पी , कांग्रेस और लेफ्ट फ्रंट ने  कोशिश की थी कि  महिला आरक्षण के संविधान संशोधन को एलीट महिलाओं के  हित की रक्षा के लिए एक कानून के रूप में पास करा लिया जाए लेकिन अब बी जे पी और कांग्रेस में उठ रहे असंतोष की वजह से पार्टियों ने अपने रुख में नरमी लाने का संकेत दिया है . बी जे पी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के गठन के मामले में भी पार्टी के एलीट रुख की बात सामने आ गयी है .कार्यकारिणी में हालांकि ३३ प्रतिशत महिलाओं को जगह दी गयी है  लेकिन उनमें से लगभग सभी समाज के ऊपरी तबके की हैं. बी जे पी में पिछड़ी जाति के सांसदों की संख्या काफी है और उन्हें अब लालू प्रसाद और  मुलायम सिंह यादव के उस तर्क में दम नज़र आने लगा है जिसमें उन्होंने कहा था कि महिला आरक्षण के नाम पर बी जे पी संभ्रांत लोगों को आगे लाने की गुपचुप कोशिश कर रही है ..बिहार से चुन कर आये बी जे पी सांसद हुकुम  देव नारायण  यादव ने पहले ही सार्वजनिक मंचों से यह बात कहना शुरू कर दिया है. बीजेपी के आला नेताओं को मालूम है कि उनके अलावा और भी बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो वर्तमान रूप में महिलाओं के आरक्षण के संविधान संशोधन को स्वीकार नहीं करेंगें . इसीलिए  बी जे पी की नेता सुषमा स्वराज ने खुले दिमाग से आगे बढ़ने की बात करके संभावित बगावत पर रोक लगाने की कोशिश की है .

हालांकि कांग्रेस अभी भी बिल को मौजूदा रूप में ही पास कराने पर आमादा है लेकिन जानकार बताते हैं कि कांग्रेस के लिए भी यह संभव नहीं होगा क्योंकि यू पी ए सरकार को समर्थन दे रहे दलों में बहुत सारे ऐसे नेता हैं जो  ऐसा होने नहीं देंगें. राज्यसभा में बिल को पास करवा कर  कांग्रेस और बी जे पी ने अपने नंबर तो बढ़ा लिए हैं लेकिन अब साफ़ लगने लगा है कि महिला आरक्षण के प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में धकेलने की योजना  तैयार हो चुकी है. मौजूदा राजनीतिक माहौल को देख कर लगता है कि संसद के बहुसंख्यक पुरुष सदस्य  महिलाओं को आरक्षण देने के मूड में नहीं दिखते, वे इसे टालने के बहाने ढूंढ रहे हैं. एक पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष ने तो  बता दिया है कि  अगर महिलाओं का आरक्षण लागू हो गया और रोटेशन  की प्रणाली भी प्रयोग में आ गयी तो  १५ साल बाद ९९ प्रतिशत सीटों पर महिलाओं का क़ब्ज़ा होगा. अन्य पार्टियों के नेता भी इसीतरह के उल जलूल तर्क दे रहे हैं. लेकिन लुब्बो लुबाब  यह है कि महिलाओं के आरक्षण के सवाल को किसी तरह अब ठंडे बस्ते में डाल देना है.

सवाल यह है कि क्या महिला आरक्षण बिल का वही हाल होगा जो पिछले १५ वर्षों से हो रहा है? या कोई रास्ता है जिसका अनुसरण करने से संविधान का यह ज़रूरी संशोधन पास कराया जा सकता है. पुरुष प्रधान समाज के मर्दवादी लोगों की तो यही कोशिश  है कि महिलाओं को वहीं रहने दिया जाए जहां वे सदियों से हैं. इस सन्दर्भ में पिछले कुछ  दिनों बहुत सारे उल जलूल बयान आये हैं. कोई कहता है कि महिलाओं की जगह  घर के अन्दर है तो कोई कहता है कि उनका काम बच्चों की देख भाल करना है. ऐसी और भी बहुत सारी बातें माहौल में हैं. उन सबका ज़िक्र करके दकियानूसी  विचारों को अहमियत देने से कोई फायदा नहीं होगा. सोचने की बात यह है कि क्या कोई फौरी तरीका है जिस से महिलाओं को राज काज में शामिल किया जा सके.

सीधी बात है कि अगर देश की आधी आबादी को शामिल करके कोई रणनीति बनायी जाए तभी संविधान में संशोधन करके महिलाओं को आरक्षण दिया जा सकता है. यह तभी संभव होगा जब राज्यसभा में पेश किया गया बिल इस तरह से दुरुस्त कर दिया जाए कि समाज के हर वर्ग को उसमें जगह मिल सके.. इस देश में ज़्यादातर लोग गरीब हैं. गरीबी रेखा के नीचे वाले गरीब और गरीबी रेखा के ऊपर वाले गरीब. यह सारे गरीब गावों में रहते हैं. शहरों में भी कुछ मिल जायेंगें. जब तक ग्रामीण महिलाओं , मुस्लिम महिलाओं, दलित महिलाओं और गरीब महिलाओं को राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया में  शामिल नहीं किया जाएगा तब तक कुछ होने वाला नहीं है. अभी जो बिल संसद में पेश किया गया है उसे पास कराने से देश की पूरी आबादी का कोई भला नहीं होगा क्योंकि यह बिल तो वास्तव में देश की दो प्रतिशत महिलाओं को ३३ प्रतिशत सीटें देने की साज़िश है यह उम्मीद नहीं करना चाहिए कि  पूरा देश इसे समर्थन देगा. हाँ अगर महिलाओं के आरक्षण के लिए ५० प्रतिशत सीटें ऑफर कर दी जाएँ और मुसलमानों, दलितों , पिछड़े वर्गों और गरीब सवर्णों को आरक्षण के दायरे में लाया जाए तो किसी भी पार्टी की हिम्मत नहीं होगी कि महिला आरक्षण के लिए संविधान में प्रस्तावित संशोधन का विरोध कर सके

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sanjiv panday on 20 March, 2010 18:21;57
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शेष नारायण जी ने ठीक लिखा है। महिला बिल का मौजूदा स्वरूप पूरी तरह से ग्रामीण भारत, दलित भारत और पिछड़ा भारत विरोधी है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि भाजपा जैसी पार्टी गरीबों और दलितों की भले की बात नहीं कर सकती है। जिस पार्टी का चरित्र शहरी हो, बनियावादी हो वो गरीबों और दलितों की बात क्यों करेगी। यही कारण है कि महिला आरक्षण के मौजूदा चरित्र पर भाजपा ने पहले समर्थन दिया। अब भाजपा समर्थन वापस लेने के लिए इसलिए परेशान है कि सारा क्रेडिट कांग्रेस लेकर जा रही है। शेषनारायण जी की यह बात भी सौ प्रतिशत सही है कि भाजपा ने संगठन में जिन महिलाओं को जगह दी वे सारे एलिट, शहरी और ऊंचे घरानों की है, जिन्हें देश के दिल से कुछ नहीं लेना देना। एक-दो जो पिछड़ी जाति की महिला भाजपा में थी उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इसमें उमा भारती भी शामिल है। महिला आरक्षण का लाभ जबतक दलितों, गरीबों, ग्रामीण महिलाओं को नहीं मिलेगा तबतक महिला आरक्षण का कोई फायदा नहीं है। लेकिन अब तो भाजपा जैसी पार्टी मुलायम सिंह और लालू प्रसाद की मुख्य मांग जिसमें आरक्षण के अंदर आरक्षण की बात है पर विचार करने के बजाए पूरी तरह से बिल को ही ठंडे बस्ते में डालने की तैयारी में है।
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AMAN on 20 March, 2010 22:46;44
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WAH Mr Sanjiv Paren Mausere Bhai ki tarah,
tum Shesh Ji ki tarif Karo,
Aur Sheshji Tumhare,
Aur Dono milkar BJP ki Aisi -Taisi. Theka to mila hi hua hai
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nirbhai on 21 March, 2010 00:04;56
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शेष नारायण और संजीव ऐसे दुकानदार है जिनकी दुकानदारी नहीं चलती है तो एक दुसरे की दुकान से माल खरीद लेते है | तो मेरी पीठ खुजला मैं तेरी खुजलाता हूँ |
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बिन्दु अशेष on 21 March, 2010 00:15;21
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लगता है संजीव पांडे और शेष नारायाण जी को भाजपा के बारे में अनर्गल लिखने की 'भारी सुपारी' मिली है. यह दोनो प्रतिभावान लेखक बीजेपी के अलावा अन्य मसलो पर कब लिखेंगे?
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shailendra kumar on 21 March, 2010 01:11;36
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इन लोगो के पास और कोई काम नहीं है जिन राज्यों में एनडीऐ की सरकारे है लगभग सभी जगहों पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस है बिहार छोड़कर जबकि कांग्रेस के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता जैसे हरियाणा, जम्मू एंड कश्मीर, आंध्र, केरला, आसाम कांग्रेस से ज्यादा राज्यों में बीजेपी की सरकारे है देश में बीजेपी के पास कांग्रेस से ज्यादा विधायक है फिर भी बीजेपी की बुराई करना इनकी आदत है मैं बीजेपी का कोई कार्यकर्ता नहीं लेकिन उसका समर्थक जरूर हूँ मुझे ऐसा लगता है की संजीव जी कभी बीजेपी समर्थक रहें है और बीजेपी को उन कसौटियों पर कसना चाहते है जिस पर कांग्रेस नहीं चल पाई और बीजेपी से ज्यादा उम्मीद होने के कारण वो ज्यादा निराश है और अपनी भड़ास निकल रहें है उम्मीद तो मुझे भी है और मैं निराश नहीं हूँ और शेष जी आप से बड़ा बेवक़ूफ़ कौन जो अपना सारा परिश्रम और जीवन बीजेपी जैसी पार्टी की आलोचना करने में नष्ट कर दिया अब भी सुधर जाइये शायद बुढ़ापा ठीक से कट जाये और जहाँ तक महिला आरक्षण का सवाल है कांग्रेस को कौन रोकता है अगर बीजेपी पीछे हट जाती है तो कांग्रेस को ही फायदा होगा
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sanjiv panday on 21 March, 2010 08:30;17
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शैलेंद्र जी एक सच्चाई बताता हूं। भइया समय के साथ हर कोई किसी न किसी का समर्थक करता है। कभी मैं वीपी सिंह का समर्थक रहा तो कभी भाजपा का तो कभी कांग्रेस का। क्योंकि अगर समर्थक पाला नहीं बदलेंगे तो सरकारें नहीं बदलेंगी। फिर तो इस देश में तानाशाही आ जाएगी। भाजपा की सरकार तभी इस देश में आयी जब कई कांग्रेस समर्थक जातियों ने भाजपा को समर्थन दिया। यूपी में भाजपा का ग्राफ इसलिए बढ़ा कि कांग्रेस का ब्राहमण वोट बैंक भाजपा के पास आया। आज बिहार में भाजपा का ग्राफ इसलिए बढ़ा कि कांग्रेस का ही वोट बैंक उनके पास आया। अब भाजपा का ग्राफ इसलिए घटेगा कि कांग्रेस के पास भाजपा का वोट बैंक वापस जा रहा है।
बाकी भाजपा से हमनें कोई उम्मीद नहीं पाली है। जो दिन पर हलुआ, पुरी, दूध की चाय के चक्कर में रहेंगे वो क्या देश को बदलेंगे। जहां जाते है वहीं खाने के चक्कर में लगे रहते है। फिर भयंकर ढोंगी। अय्याशी कांग्रेस के लीडरों की तरह करते है और दुनिया के सामने बहन जी बोलते है। इससे ज्यादा हिप्पोक्रेसी क्या होगी। दम है तो अय्याशी कांग्रेस की लीडरों की तरह करो। रात में मांस और मदिरा का सेवन करेंगे और अपने प्रेस कांफ्रेंस में शाकाहार की व्यवस्था करेंगे। फिर तर्क देंगे अरे भाई संघ की शिक्षा में इसका प्रावधान नहीं है। कार्यकर्ता कोई कामलेकर जाएंगे तो कहेंगे यह संघ का अनुशासन नहीं सिखाता। पर वही काम किसी कांग्रेसी से पैसे लेकर कर देंगे। फिर इस पार्टी के नेताओं से क्या उम्मीद करेंगे।
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ghakki on 21 March, 2010 12:46;02
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संजीव की बातो से ये पता चलता है की वो बिलकुल थाली के बैगन है कभी कांग्रेस कभी वी पी सिंह
कभी बी जे पी के साथ जाते रहते है इसका मतलब उनकी अपनी कोए विचारधारा नहीं है | वो तो बस हर चीज में अपना मतलब देखते है | जो भी पार्टी उनको भाव नहीं देती है | उसे से उनका मोहभंग हो जाता है | लगता है इस बार उनका बी जे पी से मोहभंग हुआ है | क्यों के कांग्रेस की सर्कार पांच साल के लिये है | तो भईया कांग्रेस की जय जय बी जे पी की हाय हाय | रे भाई ये क्यों नहीं सोंचते हो की बी जी पी को मानने वाले भी बहुत बहुत बहुत ज्यादा है |देश में इस समय दो ही राष्ट्रीय इस्तर की पार्टिया है बी जी पी और कांग्रेस | सो आप ये कैसे कह सकते हो की सारी खराबी बी जे पी में ही है| अगर ऐसा होता तो बी जी पी के मानने वाले या उसे वोट करने वाले इतनी बड़ी संख्या में नहीं होते | सभी तरह की विचारधरा जरूरी है इससे शक्ति का संतुलन बना रहता है एक स्वस्थ लोकतंत्र में शक्ति का संतुलन बहुत जरुरी है |वर्ना सर्कार तानाशाह बन जाएगी | और आप जनता को हलुवा पूरी ढूढ़ यहाँ तक की खाद क्या सुखी रोटी भी मयस्सर नहीं होगी | अंध विरोध और अंध बहती मत करो | जनता के हित में लिखो , किसी पूर्वाग्रह से ग्रसित हो कर मत लिखो | और हा मैं ये बता दू की मैं संघी या कांग्रसी नहीं हूँ वामपंथी भी नहीं हूँ |सिर्फ एक नागरिक हूँ |भैया नागरिको की समस्याओं पर भी कुछ लिखो खाली सतही राजनीत पर लिखने से कुछ नहीं होगा | शुभकामनाओ सहित |
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sanjiv panday on 21 March, 2010 13:10;23
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उपर वाले विद्वान महोदय के लिए
जम्मू-कश्मीर से शुरू करता हूं। भाजपा कहीं नजर नहीं आता। पंजाब में जूनियर पार्टनर। हरियाणा में ओमप्रकाश चौटाला का चरण छूकर सता में आए। दिल्ली में पिछले 15 सालों से बेचारे सता से बाहर। उतर प्रदेश में पांच सालों में ही एसा एक्सपोज हुए कि अब चौथे नंबर की पार्टी बन गए। बिहार में जूनियर पार्टनर। झारखंड में जूनियर पार्टी। बंगाल में आजतक सता तो क्या विधानसभा में दस का आंकड़ा नहीं पार कर पाए। उड़ीसा में कभी नवीन पटनायक के पैरों को पकड़ सता में आए। नवीन पटनायक ने लात मारा तो बेचारे भाजपाई हो गए जीरो। आंध्र प्रदेश में हालत खराब। नायडू ने लात मारी तो कहीं के नहीं रहे। तामिलनाडू की हालत सभी जानते है। सता में सुख के लिए कभी डीएमके के पैर पकड़ते है तो कभी जयललिता के। केरल में आजतक हालत पतली। कर्नाटक में सता में आए तो माइन्स माफिया रेड्डी ने पानी पिला दिया राष्ट्रीय नेताओं को। मुख्यमंत्री यदूरप्पा जनता के सामने रोने लगे। महाराष्ट्र में पिछले तीन टर्म से कांग्रेस से पटखनी खा रहे है। पूरा नार्थ ईस्ट साफ, कहीं मुख्य विपक्षी दल भी नहीं। राजस्थान में पांच साल में ही कांग्रेस ने पटखनी दे दी। फिर गुजरात, मध्यप्रदेश, छतीसगढ़ उतरांचल और हिमाचल प्रदेश के बल ही राष्ट्रीय पार्टी। अरे भाजपा के चमचों, झूठ बोलते शर्म नहीं आती। राष्ट्रीय पार्टी तो बसपा भी है। सिर्फ उतर प्रदेश में अपनी सरकार बनाकर। कुछ तो शर्म करो। राष्ट्रीय पार्टी तो सीपीएम भी है बंगाल, त्रिपुरा और केरल में सरकार बनाकर। अगर अब भी आंखें नहीं खुलती तो मैं क्या कर सकता हूं।
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वीरेन्द्र on 21 March, 2010 18:09;08
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सच तो यह है कि भाजपा और कांग्रेस एक ही सिक्के के दो पहलू हैं भ्रष्टाचार और लूट खसोट के लिए सता चाहते हैं कांग्रेस आज़ादी की लड़ाई के मुआवज़े के रूप में सता का सेवन करती रही तो भाजपा समाज में अनुपस्थित साम्प्रदायिकता को उकसा कर हिन्दू वोट से राजनीति करती रही, दोनों ने ही राजनीतिक विचार के आधार पर संगठन नहीं बनाया अपितु पूर्व राजे महाराजे फिल्म्स्टार,स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के वंशज, ज़मींदार, पूंजीपतियों की कठपुतलियाँ, शहीद राजनेताओं की विधवायें पुत्र पुत्रियाँ, संत महंतों की चोले में रहने वाले पाखण्डी,किर्केट हाकी खिलाड़ी, कवि कलाकार? आदि किसी भी क्षेत्र में लोक्प्रिय व्यक्तियों की लोकप्रियता को भुनाकर तथा वकीलों को प्रवक्ता बना कर सत्ता की लूट कर रहे हैं। भाजपा की हिन्दू साम्प्रदायिकता से आतंकित मुसलमान गैर राजनीतिक आधार पर कांग्रेस का सुरक्षित वोटर हो जाता है इसलिये कांग्रेस संघ परिवार को परोक्ष रूप से पालती है। महिला आरक्षण दोनों में से कोई नहीं चाहता और राज्य सभा में जहाँ आरक्षण की व्यवस्था नहीं है पास करा लिया अब इसे इस या उस बहाने से टालेंगे। ये दोनों ही दल राजनीतिक दल नहीं राम लीला पार्टियाँ हैं जो साधारण जन को छल रही हैं। इनके पक्ष में टिप्पणी करने वालों में कुछ धूर्त हैं जो सच जानने के बाद भी वकालत करते हैं और कुछ भावुक मूर्ख हैं जो इनके छलावे में आये हुये हैं ये एक अच्छे मंच पर कीचड़ फैला कर वैचारिक बहस नहीं होने देते।
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शेष नारायण सिंह on 21 March, 2010 19:54;59
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वीरेन्द्र जी की बात को मैं पूरी तरह से सही मानता हूँ. और अपने आप को उन गालियों का हिस्सेदार घोषित करता हूँ जो वीरेन्द्र जी को मिलने वाली हैं. क्योंकि न्यू मीडिया जैसे क्रांतिकारी मंचों पर टिप्पणी करने वाला स्पेस काफी हद तक , बी जे पी, कांग्रेस ,कम्युनिस्ट ,आर एस एस और जमाते-इस्लामी वालों के कब्जे में है . और यह विद्वान लोग किसी भी भले आदमी की आबरू उतार लेते हैं . इसलिए इनकी गालियों को खा कर ही सच्ची बात कहने का जोखिम उठाया जाता है और वीरेन्द्र जी ने वह जोखिम उठा लिया है . .
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image शेष जी शेष नारायण सिंह मूलतः इतिहास के विद्यार्थी हैं. शुरू में इतिहास के शिक्षक रहे. .बाद में पत्रकारिता की दुनिया में आये...प्रिंट, रेडियो और टेलिविज़न में काम किया. इन्होने १९२० से १९४७ तक की महात्मा गाँधी की जीवनी के उस पहलू पर काम किया है जिसमें वे एक महान कम्युनिकेटर के रूप में देखे जाते हैं..1992 से अब तक तेज़ी से बदल रहे राजनीतिक व्यवहार पर अध्ययन करने के साथ साथ विभिन्न मीडिया संस्थानों में नौकरी की. अब मुख्य रूप से लिखने पढने के काम में लगे हैं. एक अखबार में काम और विस्फोट.कॉम के सम्मानित स्तंभलेखक.
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बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
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काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
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ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
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आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
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