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सत्ता में महिला भागीदारी का कड़वा सच

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सत्ता में सबको भागीदारी चाहिए। महिलाओं को भी सत्ता में भागीदारी देने के लिए महिला विधेयक राज्यसभा में पास करा लिया गया। सब कुछ ठीक रहा तो सत्ता में महिलाओं की तैंतींस प्रतिशत भागीदारी निश्चित हो जाएगी। हालांकि सपा, राजद और कुछ मुस्लिम नेताओं की राय है कि जो तैंतीस प्रतिशम महिलाएं चुनकर आएंगी, वे केवल 'इलीट' क्लास की होंगी। दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं की भागीदारी नहीं के बराबर होगी। इसलिए इन राजनैतिक दलों का तर्क है कि दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं को भी आरक्षण दिया जाए। इन दलों की बात सही है। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं होती।

मान लिया कि दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं को आरक्षण दे भी दिया गया तो इससे फायदा क्या होगा ? क्या इन तबकों से भी केवल वहीं महिलाएं ही जीत कर नहीं आएंगी, जिनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनैतिक रही है? जिनका पति, भाई या कोई और रिश्तेदार पहले से ही सांसद या विधायक है, या रह चुका है ? समस्या यह है कि जो एक बार सांसद या विधायक बन जाता है, वह और उसका परिवार यह समझने लगता है कि जीती हुई सीट उसके और उसके परिवार के नाम पर आरक्षित हो चुकी है। लालू यादव से प्रश्न है कि आपकी गैरमौजूदगी में आपकी पत्नि ही क्यों बिहार की मुख्यमंत्री बनीं थीं ? मुलायम सिंह यादव के के परिवार के सभी सदस्यों को क्यों सत्ता प्रतिष्ठान का हिस्सा बनना चाहिए ? जम्मू-कश्मीर का मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला परिवार से ही क्यों बनता है ? इस तरह के उदाहरण बहुत सारे हैं। संसद और विधानसभाओं में पिता-पुत्र, चाचा-भतीता, माता-पुत्री की भरमार हो गयी है। एक बात और इन नेताओं के बच्चे विदेशों में पढ़कर डाक्टर, इन्जीनियर या किसी विषय में डिग्री लेकर भले ही आ जाएं, लेकिन अंत में अपना 'कैरियर' राजनीति को ही बनाते हैं।

मुसलमानों को भी आबादी के हिसाब से सत्ता में भागीदारी चाहिए। मुसलमानों में भी प्रत्येक जाति को सत्ता में भागीदारी की दरकार है। हिन्दुओं की भी प्रत्येक जाति को सत्ता में भागीदारी की चाहत है। लेकिन सवाल यही है कि सभी को तो सत्ता में भागीदारी कैसे दी जा सकती है ? प्रत्येक जाति के कुछ लोगों को संसद या विधानसभाओं में भेजा जा सकता है। लेकिन सत्ता में भागीदारी में जीत कर गया किसी भी जाति का सांसद या विधायक अपनी जाति का कितना भला आज तक कर पाया है ? सत्ता में भागीदारी का मतलब यह होना चाहिए कि जिस जाति का सांसद या विधायक जीता है, वह अपनी जाति के कमजोर और दबे-कुचले लोगों की मदद करे। उनकी बस्तियों में अच्छी सड़कों का निर्माण कराए। इलाज की समुचित व्यवस्था कराए। स्कूल कालेज खुलवाए। लेकिन क्या ऐसा होता है ? सच तो यह है कि जीतने वाला सांसद और विधायक इन्हीं लोगों से इतना दूर हो जाता है कि पूरे पांच साल तब ही नजर आता है, जब उसे दोबारा से वोट लेने होते हैं। जब वह पांच साल बाद अपनी जाति के लोगों के सामने जाता है तो लोगों को पता चलता है कि उनकी हालत तो बदला या नहीं बदली, सांसद या विधायक की हालत में जरुर परिर्वतन आ गया है। इस तरह से सत्ता में भागीदारी केवल व्यक्ति और उसके परिवार को तो मिलती है, उसको जिताने वाली उसकी जाति को नहीं। विद्रूप यह कि उसकी जाति के लोग फिर से जाति के नाम पर उसी व्यक्ति को सांसद या विधायक बना देते हैं, जो उनके किसी काम नहीं आया है।

बात यदि मुसलमानों की करें तो हालात और भी ज्यादा खराब हैं। मुस्लिम नेता सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट को लागू करवाने के लिए बहुत बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। ये बातें भी इसलिए की जाती हैं, ताकि अपने आपको मुसलमानों का सबसे बड़ा हितैषी बनकर उनके वोट लिए जा सकें। सच जो यह है कि कुछ मुस्लिम नेता तो ऐसे हैं, जिन्हें यही नहीं पता कि सच्चर समिति और रंगनाथ मिश्र की रिपोर्ट में लिखा क्या है। इसकी वजह यह है कि वे कभी स्कूल गए ही नहीं है। मैं अपने क्षेत्र मेरठ की ही बात करता हूं। यहां के मेयर और सांसद रहे शाहिद अखलाक लगभग अनपढ़ हैं। मौजूदा शहर विधायक की हालत भी यही है। शायद इसीलिए मुस्लिम क्षेत्रों का विकास नहीं के बराबर हुआ है। शायद इसीलिए ये लोग लगभग पांच लाख की मुस्लिम आबादी में कोई इंटर या डिग्री कालेज तो दूर एक सरकारी स्कूल नहीं खुलवा पाएं हैं। किसी सरकारी या गैर सरकारी बैंक की शाखा नहीं खुली। कोई सरकारी अस्पताल नहीं खुला। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं तक मुहैया नहीं हो सकी हैं। सड़कों की हालत खराब है। सफाई नियमित रुप से नहीं होती है। क्या इन सब कामों का कराने का फर्ज इन मुस्लिम मेयर, सांसद और विधायक का नहीं था। हां, इतना जरुर हुआ है कि मुस्लिम आबादी में सांसद महोदय का एक आलीशान पब्लिक स्कूल जरुर खुल गया है। इतना भी हुआ कि इनके कारोबार में कोई रुकावट नहीं आयी।

इस तरह से सत्ता में भागीदारी के नाम पर कुछ सौ लोगों और उनके परिवार को ही सत्ता में भागीदारी मिलती है। यह भागीदारी भी उन परिवारों को मिलती है, जो नामचीन हैं और अरबपति हैं। जमीन से जुड़े लोगों के लिए अब कोई गुंजाइश नहीं बची है। बात सत्ता में महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत की भागीदारी देने की कवायद से शुरु हुई थी। इसमें मेरा मत है कि जो लोग जिस आधार पर महिला आरक्षण बिल का विरोध कर रहे हैं, वे सही तो हैं, लेकिन उनकी नीयत भी सही नहीं है। वे यदि दलित, पिछड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं को भी आरक्षण देने की मांग कर रहे हैं तो उन्हें सबसे पहले अपने अन्दर से परिवारवाद खत्म करना होगा। उन दलित, पिछ+ड़ी और अल्पसंख्यक महिलाओं को तैंतीस प्रतिशत टिकट देने की शुरुआत करें, जिनकी पृष्ठभूमि अराजनैतिक है। आरक्षण के बगैर ही अपने आपको आरक्षित समझने वालों के लिए भी संविधान में एक संशोधन यह करना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति लगातार दो बार जीतने के बाद तीसरी बार चुनाव नहीं लड़ सकता। यह भी कि परिवार में एक व्यक्ति के सांसद या विधायक रहते उसकी पत्नि, बेटा या बेटी चुनाव नहीं लड़ सकते। यदि संसद और विधानसभाओं को कुछ परिवारों की बपौती बनने से रोकना है और वास्तव में सभी को सत्ता में भागीदारी देनी है तो यह करना बहुत जरुरी है। जनता को भी इतना जागरुक होना चाहिए कि उनकी जाति या धर्म के नाम पर सत्ता की मलाई खाने वाला सांसद या विधायक उनके लिए क्या कर रहा है?

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Janardan Pasi on 21 March, 2010 00:37;48
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कुल मिलाकर आरक्षण का विचार ही गलत है. यह दानव अब वोट बटोरने का हथियार बन गया है. और इससे किसी का भी भला होनेवाला नहीं है, सिवाय आरक्षण का खेल खेलनेवाली पार्टियों के.
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image सलीम अख्तर देश के अनेक समाचार-पत्रों में सामायिक मुद्दों पर लेख आदि लिखने के साथ ही टेक्निकल पुस्तकों का स्वतन्त्र लेखन। लेखन या पत्रकारिता का कोई कोर्स नहीं किया। लिखने की शुरुआत 1984 से दिल्ली से प्रकाशित होने वाले 'हिन्दुस्तान' और 'नवभारत टाइम्स' में सम्पादक के नाम पत्रों से की थी। हौसला बढ़ा तो सम्पादकीय पेज पर छपने के लिए लिखना शुरु किया। मशहूर पत्रकार स्व0 उदयन शर्मा मेरे आइडियल रहे हैं। इसलिए कलम का इस्तेमाल हमेशा ही फिरकापरस्त ताकतों के खिलाफ और दबे-कुचले लोगों के पक्ष में चली है। जनवादी लेखक संघ से भी जुड़ा हुआ हूँ। संपर्क: saleem_iect@yahoo.co.in
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