मुस्लिम आरक्षण करेगा राष्ट्र का भक्षण
महिला आरक्षण पर संसद की चिकचिक चीख पुकार में बदल गयी. लालू प्रसाद यादव ने तो यहां तक कह दिया कि महिला आरक्षण विधेयक उनकी लाश पर ही पारित होगा. लेकिन लालू से लेकर तथाकथित प्रगतिशील दलों ने महिला आरक्षण का विरोध नहीं किया. उन्होंने महिला आरक्षण में जाति और मजहब के आधार पर आरक्षण के भीतर आरक्षण के लिए बवाल किया. यह प्रगतिशील दलों की नयी चाल है जिसमें उन्होंने अपने जातिवाद को धर्मनिर्पेक्षता का जामा पहना दिया है. मुस्लिम और इसाईयों के लिए आरक्षण की मांग इसी धर्मनिर्पेक्षता की पैदाइश है.
महिलाओं के लिए आरक्षण हमारी संवैधानिक प्रतिबद्धता का अंग है. संविधान के अनुच्छेद 15(3) के अनुसार सरकार बच्चों और महिलाओं के लिए किसी प्रकार का विशेष प्रावधान करना चाहे तो उसमें कोई बाधा नहीं आयेगी. संविधान की यह धारा जहां महिलाओं और बच्चों के लिए आरक्षण की पैरोकार है वहीं संविधान के अनुच्छेद 15 (1) में स्पष्ट कहा गया है कि सरकार किसी के जन्मस्थान, जाति, लिंग, धर्म या इनमें से किसी एक के भी आधार पर किसी भी नागरिक के प्रति भेदभाव नहीं करेगी. बावजूद इसके पिछले एक अर्से से धर्म के आधार पर आरक्षण का सुनियोजित षण्यंत्र जारी है. मुस्लिमों को आरक्षण देने के इरादे से ही जस्टिस सच्चर और जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोगों का गठन किया गया था और उनसे इस तरह के निष्कर्षों की अपेक्षा की गयी जिससे मुस्लिम समाज को सरकारी नौकरी में आरक्षण मिल सके.
दोनों आयोगों ने अल्पसंख्यकों के बारे में जानने की कोशिश की कि सार्वजनिक और व्यक्तिगत क्षेत्र के रोजगार में मुसलमानों का सापेक्ष हिस्सा क्या है? यह पता करने की कोशिश की गयी कि राज्य की कुल जनसंख्या में पिछड़े मुसलमानों का क्या अनुपात है. क्या राष्ट्रीय एवं राज्य पिछड़ा वर्ग आयोगों द्वारा तैयार की गयी रपटों के आधार पर मुसलमानों के लिए आरक्षण की अगर कोई व्यवस्था है तो क्या उसका पालन हो रहा है? सार्वजनिक क्षेत्र के कुल रोजगार में पिछड़े वर्ग के मुसलमानों का कुल हिस्सा कितना है¿ जाहिर सी बात है इन सवालों की आड़ में जो निष्कर्ष निकलेंगे वे मुसलमानो को आरक्षण की संतुति ही करेंगे. जस्टिस रंगनाथ मिश्रा आयोग ने यह काम कर दिया है. अब सवाल यह है कि क्या धर्म के नाम पर आरक्षण दिया जाना चाहिए? संविधान निर्माताओं ने गहन विचार विमर्श के क्रम में इन समुदायों से जुड़े लोगों से जब विचार-विमर्श किया था तो उन्हीं लोगों ने कहा था कि इस तरह सांप्रदायिक आधार पर आरक्षण की व्यवस्था देश और स्वयं समुदाय के लिए भी घातक होगी.
2004 में लंबे वनवास के बाद कांग्रेस सत्ता में वापस लौटी. इसके बाद ही आंध्र प्रदेश सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण का शिगूफा छोड़ा. अब पश्चिम बंगाल की साम्यवादी सरकार भी मुस्लिमों को आरक्षण देने के लिए कमर कस रही है. लेकिन कांग्रेस की गाडमदर भूल रही हैं कि उनके पुरोधा पंडित जवाहरलाल नेहरू भी इस बात के कतई हिमायती नहीं थे कि जाति और मजहब के नाम पर उनका बंटवारा किया जाए. 1950 के दशक में पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया था जिसके अध्यक्ष काका कालेलकर थे. उस वक्त पंडित जवाहरलाल नेहरू ने राज्य के मुख्यमंत्रियों को लिखे पत्र में लिखा था "जाति और वर्ग के आधार पर जनता का सूक्ष्म विभाजन घातक है. सरकार इस तरह के वर्गीकरण को मिटा देना चाहती है जो जनता को दलित, हरिजन, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति आदि के रूप में बांटकर वैचारिक और भौतिक अलगाव पैदा करती है." क्या पंडित नेहरू के राजनीतिक वंशज इस बात का ख्याल कर रहे हैं कि कि वे नेहरू की कैसी विरासत को आगे बढ़ा रहे है?
धर्म के आधार पर आरक्षण का जो षण्यंत्र चल रहा है उसकी सोच आज से बहुत पहले 1857 में ही प्रकट हो चुकी थी. डॉ भीमराव अंबेडकर ने इंडियन कौंसिल एक्ट 1892 पर लिखी अपनी पुस्तक "थाट्स आन पाकिस्तान" में डॉ अंबेडकर मानते हैं कि इस्लामी विचारधारा के चलते मुस्लिमों को एक बहुधार्मिक, बहुसांस्कृतिक, देश में साथ साथ रहना असंभव हो जाता है. देश के पहले राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने अपनी पुस्तक इंडिया डिवाइडेड में लिखा है कि सन 1857 के विद्रोह ने ब्रिटिश शासन की जड़े हिलाकर रख दीं थी लेकिन कुछ ही समय के लिए. इसके दमन के दो तीन वर्षों के भीतर अंग्रेजों ने इससे सबक लेकर चतुराई से अपना स्वार्थ सिद्ध किया. विद्रोह को केवल कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित कर दिया गया था. विद्रोह के पीछे एक राष्ट्रीय भावना का अभाव था." अंग्रेजों ने यहीं से भारत में फूट डालो और राज करो की नीति का पालन शुरू कर दिया जिसकी शुरूआत लार्ड एलफिस्टन ने की थी. अंग्रेज भारतीयों को विभाजित करने के लिए किस तरह से सक्रिय थे इसका अंदाजा लंदन में उस समय भारत के राज्य सचिव जान मार्ले द्वारा लार्ड मिन्टो को लिखे गये पत्र से लगता है जो कि एलफिस्टन के बाद गवर्नर बनकर भारत आये थे. जान मार्ले लिखते हैं कि "26 अक्टूबर को आपने मुस्लिमों के बारे में जो कुछ बताया है वह दिलचस्प है. इसका एक लाभ यह हुआ है कि इसने जनता के एकजुटता की संभावना को समाप्त कर दिया है. अब स्थिति ब्रिटिश सरकार बनाम जनता की बजाय हिन्दू बनाम मुस्लिम की दिखाई देगी." परिणाम यह हुआ कि आगे चलकर बंगाल विभाजन को स्वीकृति दे दी जिसने और आगे चलकर देश को ही विभाजित कर दिया.
इसलिए धर्म के नाम पर आरक्षण की वकालत करनेवाले एक और विभाजन की नींव रख रहे हैं. अगर लार्ड मिन्टो ने 1906 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में विभाजन के बीज बोये थे तो आज के तथाकथित सेकुलर राजेन्द्र सच्चर और रंगनाथ के बहाने विभाजन की एक और पूर्वयोजना तैयार कर रहे हैं. 1906 में हिन्दू मुस्लिम के बीच डाला गया अलगाव का बीज 41 साल बाद देश को बांट देता है. क्या 2004 में बोया गया अलगाव का बीज चार दशक की प्रतीक्षा करेगा?
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