दो किरोडी एक सरकार
कर्नल किरोडी बैंसला ने एक बार फिर आन्दोलन की धमकी दी है. सरकार को रविवार सुबह 10 बजे तक अपनी स्थिति स्पष्ट करने का समय दे दिया है. उसके बाद वो कूच करेगें. ऐसे अवसर पिछले 15 दिनों में कई बार आये है. इस बार स्थिति कुछ अलग हो सकती है. गुर्जर आन्दोलन और उसके तरीकों के धुर विरोधी रहे डां किरोडी मीणा ने आन्दोलन को अपना पूरा समर्थन देने की मंशा जाहिर की है. ऐसे में दो किरोडियों के एक होने से अकेली सरकार कैसे निबटेगी?
हाँ अब राजस्थान में दो किरोडी एक है. एक अकेली सरकार है. दोनों किरोडी अपने अपने समाजों के खुद को मठाधीश मान रहे है. सरकार बिचारी अकेली है. मई 2007 की तपती गर्मी में जब राष्टीय राजमार्ग 11 पर गुर्जर समाज अपने लिए एस टी आरक्षण की माँग को लेकर अपने सपूतो के शवों को लेकर बैठा था. उस समय दोनों समाज एक दूसरे के आमने सामने आ गये थे. उसके बाद ये तनाव बढता ही गया. लेकिन आज दोनों के बीच समंवय दिखाई दे रहा है. डां किरोडी मीणा गुर्जर समाज के अनशन कारियों को माला पहनाकर साफा बाँध रहे है. साथ ही उन्हें 5 प्रतिशत आरक्षण मिले. इसके लिए तन मन धन से सहयोग करने की बात भी कर रहे है.
कर्नल किरोडी सिंह बैंसला ने सेना की नौकरी से सेवानिवृत होने के बाद गुर्जर समाज के बीच अलख जगाना शुरू किया. सबसे पहले कर्नल करौली जिले के हिण्डौन कस्वे में रेल पटरियों को उखाड फेंकने को लेकर सुर्खियों में आयें. उसके बाद मई 2007 में पाटौली पर चक्का जाम किया. कुछ जाने तो गई. आन्दोलन प्रदेश से चलकर देश व्यापी हो गया. जब आन्दोलन धीरे धीरे आगे बढा तो मीणा समाज उसे रोकने के लिए भाजपा सरकार के सामने आया. डां मीणा उस समय प्रदेश सरकार के मंत्री होते हुये भी समाज के मुखिया रूप में दिखाई देने लगे. ये माना जा सकता है कि उनका इशारा समझ मीणा समाज ने भी पंचायतें करना शुरू कर दिया. बस यही से दोनों एक हुक्के के समाजों के बीच खाई पैदा हो गई. और एक बार तो प्रदेश में जातीय संघर्ष के हालात पैदा हो गये. मीणा समाज ये मानने लगा कि गुर्जर एस टी के उनके आरक्षण में से हिस्सा लेना चाहते है. दोनों समाजों के बीच आहार व्यवहार पूरी तरह से बंद हो गया.
मई 2008 में एक बार फिर गुर्जर समाज रेल की पटरियों पर आया. दिल्ली मुंबई लाईन पर भरतपुर जिले के पीलूपुरा गाँव के पास खून की होली खेली गई. 28 दिनों तक प्रदेश सहित देश भर में आन्दोलन की गूँज रही. अंत में महारानी ने आरक्षण की लडाई को वोट के तराजू पर तोल दिया. एस टी का दर्जा माँगने वाले गुर्जरों को विशेष कोटे में 5 प्रतिशत और सवर्ण गरीबों को 14 प्रतिशत आरक्षण का लौलीपौप विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुये थमा दिया. पीलूपुरा आन्दोलन में सरकार ने मीणा जाति के गाँव में पर्याप्त सुरक्षा उपलब्ध कराई. इस आन्दोलन में गुर्जर मीणा के बीच कहीं किसी प्रकार का कोई तनाव नजर नहीं आया. लगता था वो ये समझ चुके थे कि एस टी में गुर्जरों को आरक्षण किसी भी कीमत पर नहीं मिल सकता है.
गुर्जर और मीणा समाज के बीच एक बार लोकसभा चुनावों के दौरान और माहौल गर्म हुआ. जब कर्नल बैंसला और नमोनारायण मीणा ने टोंक सवाईमाधोपुर सामान्य सीट से चुनाव लडा. उसके बाद दोनों ही समाजों के बीच कभी कोई तनाव प्रदेश में नजर नहीं आया. इस बीच कटटर भाजपाई डां किरोडी मीणा ने भाजपा के खिलाफ बगावत कर दी. तो किरोडी बैंसला भाजपा के गुर्जर बाहुल्य इलाकों में स्टार प्रचारक हो गये. विधानसभा और उसके बाद लोकसभा के चुनावों में उन्होंने खूब प्रचार किया. भाजपा दोनों ही चुनावों में औंधे मुँह गिरी.
डां किरोडी मीणा ने दोनों ही चुनावों में अपनी उपस्थिति का अहसास कराया. पहले विधायक और फिर सांसद बने. पत्नी गोलमा को प्रदेश सरकार में मंत्री भी बनवा दिया. और भाजपा छोडने के बाद किसी दल में भले ही नहीं रहे. उन्होंने कांगेस भाजपा दोनों को ही खूब छकाया है. कभी पानी की माँग को समर्थन किया. तो कभी जुगाड को सडकों पर लाने के लिए संघर्ष करते दिखे. प्रदेश की कोई समस्या ऐसी नहीं है जहाँ डां मीणा ने अपनी उपस्थिति दर्ज नहीं कराई हो. डां किरोडी मीणा अब प्रदेश भर में अपनी आकामक छबि के साथ पहचान बना चुके है. ऐसे में डां मीणा ने गुर्जर आन्दोलन को खुले में समर्थन देकर एक बार फिर से खुद को और आन्दोलन को चर्चाओं में ला दिया है. किरोडी बैंसला भी किरोडी मीणा के समर्थन से अभिभूत है. उधर प्रदेश सरकार सकते में है. डर का कारण अब किरोडी बैंसला से अधिक किरोडी मीणा हैं. कारण साफ है किरोडी मीणा के साथ मीणा समाज जितना है उतना गुर्जर समाज बैंसला के साथ नजर नहीं आ रहा है. ऐसे में गुर्जर समाज एक बार मई महीने तक आन्दोलन का मूंड बनाता दिख रहा है.
26 मार्च से आन्दोलन की घोषणा करने वाले कर्नल बैंसला ने सरकार के आश्वासनों पर विश्वास कर उसे अनशन में बदल दिया. आश्वासनों का समय निकल जाने पर एक बार फिर कर्नल बैसला ने शनिवार को एक महापंचायत कर सरकार को रविवार सुबह 10 बजे तक का समय दे दिया है. उसके बाद कर्नल बैंसला एक बार फिर हिण्डौन कस्वे की ओर कूच करेगें. वहाँ से आगे की रणनीति पर विचार होगा. कर्नल राजधानी की ओर कूच कर सकते है. ऐसे में एक बार फिर प्रदेश में आन्दोलन के हालात नजर आ रहे है. इस बार आन्दोलन की चर्चा डां मीणा के समर्थन को लेकर कहीं अधिक है. गुर्जर समाज कर्नल बैंसला के साथ कम ही नजर आ रहा है. सरकार ने अपने प्रयासों से गुर्जरों के बीच कर्नल को लेकर कई धडे बनवा दिये है. ऐसे में अब ये देखना दिलचस्प होगा कि एक दूसरे को दुश्मन मानने लग गये इन समाजों के बीच कैसा समंवय दिखाई देगा. क्या दोनों समाजों के बीच एक बार फिर एक हुक्के का संबंध बन पाता है ?
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