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आखिर यह सूबा है किसका?

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मायावती और उनके हाथी मार्का दलित वोट बैंक का या मुलायम सिंह यादव की साइकिल पर फर्जी सवार पिछड़ों का? या फिर भाजपा के कमल पर बैठे बनियों, ठाकुरों, बाभनों का? या कांग्रेस के थके हारे भाग्य भरोसे हाथ पर हाथ धरे बैठे कार्यकर्ताओं का या फिर अजीत सिंह के वोट जाटों का है किसका है आखिर यह सूबा? यहां रहने वाले गरीब-गुरबों का, हिन्दुओं, मुसलमानों का, सिक्खों, बंगालियों का आखिर किसके नाम उत्तर प्रदेश की रजिस्ट्री है? कौन जवाब देगा?

किस जाति के पास है उत्तर? यहां रहने वालों से भी कोई पूछेगा कि उत्तर प्रदेश से उनकी क्या नातेदारी है? जरा-जरा सी बात पर जातियां सड़क पर उतर आती है। भाषा और धर्म के झंडाबरदार अहिंसक हो जाते हैं। हिंदू रोटी, मुसलमान पानी, दलित गंगा और टोपी गांधी का बंटवारा करने वालों यह आग सूबे और धर्म दोनों को जलाकर राख कर देगी।

गांधी-नेहरू को गरियाने से, मायावती-कांशीराम के बुतों को तुड़वाने की धमकी देने से और हलवाई की दुकान पर समोसा खाने से और उस पर बयानबाजी करने से वोट बैंकों में खुले खातों में कोई इजाफा नहीं होने वाला। यहा सारे चोंचले सूबे को कमजोर करने वाले हैं। दिलों के बीच दीवार खड़ी करने वाले हैं। जातियां गिनने से भी कुछ नहीं होने वाला। मुसलमानों को आरक्षण का वटुवा थमा देने से उनका कोई भला नहीं होगा। औरतों को राजनीति में आरक्षण देकर भी सूब्रे का कोई भला नहीं होगा। न ही संदेश यात्राओं से उप्र के फटेहाल खुशहाल होंगे और न ही मुलायम सिंह यादव के हजरतगंज चौराहे पर लगे अम्बेदकर के बुत के नीचे नंगी सड़क पर बैठ जाने से मंहगाई में कोई गिरावट दर्ज होगी। न ही बसपा के हाथी पर चढ़कर जिले-जिले में धरना देने से दलितों के चूल्हे गरम हो सकेंगे? न ही भाजपा के मंसूबे श्रीराम मंदिर निर्माण के हल्ले-गुल्ले से हिन्दुओं की थालियां दाल-भात से भर जाएंगी? यह सारे सवाल करने के पीछे केवल एक मंशा है कि सूबे के लोगों से भी तो पूछो कि वो क्या चाहते हैं?

सूबे के राजनीतिक पंडाल में मेड इन इंगलैण्ड रोटी और अमेरिकन पिज्जे के खोमचे सजाए जा रहे हैं। अमेठी जिले के दौरे पर कांग्रेसी सांसद राहुल गांधी के साथ आये इंगलैण्ड के एक मंत्री गरीब की झोपड़ियों के भीतर ठंडे चूल्हे झांक कर गांव की चौपाल में बिछी खटिया पर पूड़ी-सब्जी खाने के बाद कुएं का ताजा ठंडा पानी पीकर डकार लेते हुए सपने बांटकर वापस लंदन चले गये। फिर आये अमेरिकन डॉलरों से भरी पूरी तिजोरी लिए बिल गेट्स ने अमेठी की औरतों को अमेरिका ले जाने का ख्वाब थमा दिया। उससे भी मजेदार हकीकत है डॉलर सभ्यता के साथ दलितों की मसीहा के गठजोड़ की, जी हां! बिल गेट्स की पत्नी मिरिंडा गेट्स सूबे की मुख्यमंत्री मायावती के साथ मिलबैठकर उप्र की गरीबी दूर करने का मंसूबा जाहिर कर गई। ऐसी दोगली, ऐसी झूठी, ऐसी बेईमान राजनीति! इस कदर गंदी राजनीति को किसी टाटा, बिड़ला के कारखाने में बना साबुन भी नहीं धो सकता।

अब जरा सीधी और साफ-साफ बात पर गौर करिये। हर सियासी दल 2010 के ठेले पर विधान सभा चुनाव का शर्बत बेच रहा है। कांग्रेस की संदेश यात्राएं तमाम गलियों में घूमकर, किराए के मंचों पर नाच-गाकर सुस्ता रही हैं। अब कांग्रेस के दफ्तर में विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के ‘एंट्रेस एग्जाम’ चल रहे हैं। यूपी की कमान सम्हाले राहुल गांधी अमेठी के गांव-गांव घूम रहे हैं। बहराइच के दलितों के टोले में रात्रि निवास करके उनके साथ खाना खाते हुए बतिया गये। रायबरेली सांसद सोनिया गांधी अपने संसदीय क्षेत्र का विकास कर अपने पूर्वजों का सपना पूरा करने में व्यस्त है बाकी समूची कांग्रेस गांव तकिये के सहारे लेटी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्षा रीता बहुगुणा जोशी को धकियाने और अपना नसीब चमकाने के प्रेस नोट तैयार कराने में व्यस्त है। उसे अपनी अध्यक्षा का घर फूंक दिये जाने से रत्ती भर अपमान का एहसास नहीं है। अपने ही कार्यालय में बरसों से वफादारी से काम करने वाले कर्मचारी के पुत्र, जो वहीं मीडिया विभाग में कार्यरत था, की हत्या हो जानेे बाद अपराधी के न पकड़े जाने और पुलिस के लगातार झूठ बोलने पर भी कोई फर्क नहीं पड़ता, न ही शर्मिन्दा हैं कांग्रेसी। उन्हें भरोसा है मुलायम सिंह यादव और चौधरी अजीत सिंह के वोट बैंक का हाथ का साथ देने का और भरोसा है मुसलमान वोटरों का।

मुलायम सिंह यादव पिछड़ों की गिनती के साथ मुसलमानों का पहाड़ा लगातार याद करा रहे हैं। उन्होंने महंगाई और पत्थर के बुतों को लेकर समूचे सूबे की सड़कें रौंद डालीं। सड़क पर चलने वाली सरकारी बसें फुंकवा दी। तमाम शहरों में जाम लगवा दिये, व्यापार ठप करा दिये फिर भी न महंगाई कम हुई, न बुतों की चमक। हां, इस कसरत की एवज में चुपके से कांग्रेस के ड्राइंगरूम से डायनिंग रूम तक पहुंच गये। सच बात तो यह है कि वे बेहद हताश हैं। पहले उनके दोस्त बेनी प्रसाद वर्मा उनसे रूठकर कांग्रेस में चले गये, फिर आजम खां बागी हो गये। दुर्भाग्य देखिए जनेश्वर मिश्र की मृत्यु धरना प्रदर्शन के 24 घंटों बाद हो गई।

अमर सिंह जैसे अंतरंग मित्र हाथ झटक कर अलग हो गये। उनका और उनकी पार्टी का कद सूबे में घट रहा है। इसीलिए कांग्रेसी दोस्ती उन्हें फायदे का सौदा लग रही है। भाजपाईयों ने नया सूर्य उगा दिया है, जिसकी रोशनी में श्रीराम मंदिर केा हिंदुत्व की ईंटों और नफरत के गारे से जोड़कर एक बार फिर से बनाया जाएगा? दरअसल भाजपा का वोट बैंक खाली है, सो बाप-दादाओं के छोड़े गये खजानों के किस्से सुनाकर काम चलाने का नुस्खा आजमाने से क्या दिक्कत? भाजपा खेमें में नया, ताजा, उग्र और गांधी परिवार का दूसरा बेटा वरूण गांधी बगैर बने मंदिर में खड़े होकर बेहूदगी व बेहयाई का घंटा बजाने के काम पर रख लिया गया है। मुख्यमंत्री को अपशब्द कहने पर एक बार जेल जा चुके वरूण उनकी मूर्तियां तुड़वाकर उसी जगह श्रीराम की मूर्तियां लगवाने का एलान कर पार्टी को संकट में डालने का काम कर चुके हैं। बाकी का बचा खुचा अखबारों में रोज छपवाकर पार्टी की साख का सत्यानाश हो रहा है।

बसपा 13 मई, 2007 से लगातार कांग्रेस को गरियाने और हर बात की जिम्मेदारी कांग्रेस पर थोपने के साथ रैलियों, धरना-प्रदर्शनों और पत्थरों के स्मारक बनवाने में व्यस्त रही है। कभी रायबरेली रेल फैक्ट्री के लिए जमीन देने से मना कर देती है उप्र सरकार, तो कभी सोनिया-राहुल का रास्ता रोक देती है। कभी उनकी सभाओं के लिए इजाजत नहीं देती, तो कभी रायबरेली-अमेठी में बिजली की किल्ल्त बढ़ाने जैसा काम कर बैठती है। कभी प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष का घर फूंकनेवालों की पीठ ठोते हुए कांग्रेस को खुले आम धमकाने का काम कर बैठती है ऐसे न जाने कितने बेमानी कार्मो में अपनी ऊर्जा खराब करते हुए चुपके से कांग्रेस से जरूरत के मुताबिक दोस्ती गांठ लेती है। यह किस किस्म की राजनीति है। उसे तो यह बेहतर मौका मिला है, उसका भरपूर फायदा उठाना चाहिए। अपने वोट बैंक दलितों के भले के लिए काम करना चाहिए। बसपा मुखिया को उप्र के गरीब-गुरबों और सताये हुए भाइयों की सच्ची बहन साबित होकर दिखाना चाहिए। दिखावे की राजनीति या अपराधियों के सफाये की बांग देने से क्या होगा? अभी भी दो साल का समय  ईमानादारी से काम करने के लिए बाकी है।

सीधी सी बात यह कि 2012 में विधानसभा के भीतर दाखिल होने के लिए उप्र के बीस करोड़ लोगों के लिए सब सियासी पार्टियां क्या करनी वाली हैं, क्या करेंगी और अभी क्या कर रही हैं, इसका खुलासा करना होगा। लोग डर कर वोट देंगे? गुस्से में आकर वोट देंगे? लालच में आकर वोट देंगे? जी नहीं! इससे तो झगड़े बढ़ेंगें। इसलिए सच्चे मन से सच्चा काम करने की हलफ उठाए बिना वोटर सिंहासन नहीं सौंपने वाला।

(लेखक रेड फाइल के संपादक हैं.)

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Sanjeet Tripathi on 18 June, 2010 02:00;31
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aapne is report me nishhpaksha hokar UP ke sabhi rajnaitik dalo aur netao ki haqikat bayan ki hai. pasand aai ye haqikat bayani.... kam hi dekhni milti hai...
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sushil Gangwar on 18 June, 2010 20:22;21
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Maya ki maya abrampaar hai . Dalito ke vote bank par mukhyamantri ki kamaan sabhalne vali maya apne beete din bhul chuki hai. Hum kah sakte hai unke din buhar gaye hai. Apne putlo par arvo rupye karne vali maya ne jitna vikas putlo ka kiya hai Gar yah paisa Gareev lachaar Dalit varg or vikas ki raah par karch kiya jata to UP ki disha or dasha badal jati patrantu esa nahi ho saka .
yah rona desh ke ek neta ka nahi hai . Har neta esa hi karta hai. vah apne baare jayda or janta ke vaare me kam sochta hai. Chahe vah Mayavati ji ,Lalu Prasad Yadav - fir Aaj ka arjun --Arjun singh kyo na ho . Ek baar janta ko sahi dhang se sochne ki jarurat hai .
www.sakshatkar.com
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