लूट की लड़ाई का नया मैदान बनेगा अफगानिस्तान
अफगानिस्तान अमेरिका के लिए दूसरा वियनताम साबित हो चुका है। यह सच विकीलीक्स के खुलासे के बाद आ चुका है। अमेरिका अफगानिस्तान से भागने की तैयारी में है। वीकीलीक्स ने इसकी जमीन तैयार कर दी है। अफगानिस्तान को अब अपनी नियति खुद तय करनी होगी। अमेरिका के जाने के बाद अफगानिस्तान में क्या होगा, यह दुनिया को दिखने लगा है।
अफगानिस्तान से नाटो फोर्स हटने के बाद अहम भूमिका पाकिस्तान, भारत, सोवियत रूस, चीन और मध्य एशिया के रूसी गणराज्यों की होगी। इसके लिए खूब जोड़तोड़ शुरू हो गई है। पाकिस्तान अपनी जोर लगा रहा है तो भारत अपनी। इस खेल में चीन और रूस की भूमिका भी दिलचस्प होगी। अमेरिकी फौजी की वापसी की सूचना सूंघने के बाद ही पाकिस्तान ने अफगानिस्ता पर दबाव बढ़ाना शुरू कर दिया है। खासकर पाकिस्तानी फौज के मुखिया परवेज कयानी ने हामिद करजई से मुलाकात में यह बता दिया है कि भारतीयों की ज्यादा मौजूदगी पाकिस्तान को पसंद नहीं है। दरअसल अब लड़ाई गरीब काबुल पर कब्जे को लेकर नहीं बल्कि अफगानिस्तान की 900 बिलियन डालर के खनिज रिजर्व को लेकर होगी, जिसकी खोज हाल ही में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने की है। भारत की अफगान नीति को कई दृष्टि से देखना होगा। अफगान कबीलाई संस्कृति के आधार पर चलने वाला एक देश है, जहां के कबीले आपस में लड़ते है। इस देश के भूगोल और सांस्कृतिक पहचान के आधार पर पाकिस्तान यहां अपना पूरा हस्तक्षेप चाहता है। इस हस्तक्षेप को मजबूत करने के लिए पाकिस्तान पख्तून वर्चस्व वाले तालिबान को बढ़ावा देता है। गौरतलब है कि पाकिस्तान के खैबर पख्तूनखवा प्रांत में पख्तूनों की आबादी खासी है। पर अफगानिस्तान में पख्तून वर्चस्व को अन्य जनजातियां जिसमें उजबेक और ताजिक शामिल है, बरदाश्त नहीं करती है। इनकी संख्या उतरी अफगानिस्तान जिनकी सीमा मध्य एशिया के रूसी गणराज्यों से लगती है ज्यादा है। नाटो फोर्स के हटने के बाद अफगानिस्तान में एक और भीषण संघर्ष शुरू होगा, जो पाकिस्तान समर्थित तालिबान और अफगान सरकार के बीच होगा। अफगान सरकार निश्चित तौर पर तालिबान के सामने कमजोर पड़ेगी। मजबूरी में वहां की सरकार को उन देशों से सहारा लेना पड़ेगा जो सबसे ज्यादा नजदीक के पड़ोसी है।
वीकीलीक्स के खुलासे ने यह स्पष्ट कर दिया है कि तालिबान और पाकिस्तान के बीच जोरदार गठजोड़ है। इस खुलासे ने यह भी बताया कि भारत विरोधी सारी कार्रवाई अफगानिस्तान में तालिबान ही आईएसआई के इशारे पर कर रहा है। यहां तक की भारतीय अधिकारियों की हत्या के लिए ईनाम भी रखा गया है। यह सारा काम नाटो फोर्स की मौजूदगी में हो रहा है। अब यह सोचने की बात है कि जब नाटो फोर्स की मौजूदगी में यह हो रहा है तो नाटो फोर्स के जाने के बाद क्या होगा। दिलचस्प बात है कि अफगानिस्तान में अमेरिका समर्थित सता पर काबिज हामिद करजई सरकार भारी भ्रष्ट है। हामिद करजई के भाई का ड्रग तस्करी का बड़ा कारोबार है। हाल ही में अमेरिकी सहायता के रुप में मिले चार अरब डालर को अफगानिस्तान के नेताओं ने विकास कार्य में खर्च करने के बजाए विदेशों में अपने एकाउंटों में भेज दिए। ये भ्रष्ट नेता नाटो फोर्स के वापस जाने के बाद तालिबान से कितनी देर लड़ पाएंगे, यह समय ही बताएगा।
दरअसल अफगानिस्तान की अगली लड़ाई उतनी आसान नहीं होगी जितना सोचा जा रहा है। अगली लड़ाई गरीब अफगानिस्तान के काबुल पर कब्जे के लिए नहीं होगी। अगली लड़ाई अमीर अफगानिस्तान के खनिज पर कब्जे के लिए होगी। हाल ही में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 900 अरब डालर के खनिज रिजर्व की खोज की है। इसमें कोयला, लिथियम, लोहा समेत कई महत्वपूर्ण खनिज है। अफगानिस्तान में प्राकृतिक गैस का बड़ा भंडार है। हालांकि इसकी आरंभिक खोज रूसी वैज्ञानिकों ने ही की थी, लेकिन रूसी सेना के हटने के बाद खोज संबंधी दस्तावेज धूल फांक रहे थे। कुछ साल पहले जब अमेरिकी सेना को यह दस्तावेज हाथ लगे तो उन्होंने इस खोज को आगे बढ़ाया। अब अफगानिस्तान के इन प्राकृतिक संसाधनों पर नजर तालिबान, अलकायदा और अन्य फोर्सेस की है जिसमें नार्दन एलांयस भी शामिल है। इस पर नजर पाकिस्तान की भी है। इन संसाधनों पर कब्जे के लिए अफगानिस्तान में आगे भीषण लड़ाई होगी। इसमें कई बड़े माफिया और तस्कर भी शामिल होंगे। लेकिन इन सबों से अलग पाकिस्तान विरोधी सोवियत रूस और भारत भी इन संसाधनों के लूट का मतलब समझ रहे है। इसलिए संसाधनों की लूट को रोकने के लिए भी एक नया गुट तैयार करने की तैयारी हो चुकी है। इसमें भारत और सोवियत रूस शामिल होने की तैयारी में है। इसमें ईरान भी सहायता दे सकता है। क्योंकि शिया बहुल ईरान सुन्नी आतंकी गतिविधियों से काफी ज्यादा परेशान है। अभी तक सुन्नी गतिविधियों का केंद्र पाकिस्तान के बलूचिस्तान रहा है, जहां से आंतकी घूसकर ईरान में हमला करते है। ईरान नहीं चाहता है कि कोई कट्टर सुन्नी आतंकी गुट का कब्जा अफगानिस्तान पर हो सके। इसलिए ईरान अफगानिस्तान को लेकर भारत और सोवियत रूस को सहयोग करने को तैयार हो सकता है। लेकिन इन सबों से अलग चीन की नीति होगी जो निश्चित रुप से अफगानिस्तान को लेकर पाकिस्तानी नीति का सहयोग करेगी। हालांकि चीन में फैले मुस्लिम अलगाववाद को लेकर चीन भी परेशान है, इसके बावजूद चीन की भारत विरोधी नीति पाकिस्तान के समर्थन में बदल जाती है।
पाकिस्तान अफगानिस्तान में काफी एक्टिव हो चुका है। भारत को अपनी विदेश नीति और आक्रमक करनी होगी। पाकिस्तान का पहला जोर जलालाबाद और कंधार में काम कर रहे भारतीय कांसुलेट को बंद कराने को लेकर है। इस मसले को लेकर हामिद करजई से अपनी नाराजगी पाकिस्तान के फौजी मुखिया कयानी बता चुके है। पाकिस्तान का दूसरा जोर अफगानिस्तान में भारतीय कंपनियों द्वारा चलाए जा रहे विकास कार्यों को बंद कराने संबंधी है। पाकिस्तान खुद कहीं पर विकास कार्य कराने की क्षमता नहीं रखता है। वहां की निजी कंपनियां भी इतनी मजबूत नहीं है कि विदेशों में जाकर विकास का कार्य कर सके। जबकि भारत में सरकारी और प्राइवेट दोनों क्षेत्रों की कंपनियां विकास और खोज का काम तेजी से करती है। आने वाले दिनों में अफगानिस्तान गैस और पेट्रोलियम रिजर्व का एक बड़ा केंद्र बनेगा। इसमें भारतीय कंपनियों की भूमिका को लेकर पाकिस्तान डरा है। पाकिस्तान को पता है कि भारत में प्राइवेट सेक्टर के रिलांयस और सरकारी सेक्टर के ओएनजीसी जैसी कंपनियों में पूरे विश्व में अपने झंडे गाड़ दिए है। कहीं यह अफगानिस्तान में न ज्यादा घुस जाए इसका भय पाकिस्तान को है। रिलायंस जैसी कंपनियों के मधुर संबंध सारे मध्य एशिया के पेट्रोलियम बहुल देशों से है। इसका फायदा भी रिलांयस को मिल सकता है।
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