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राष्ट्रमंडल खेलों के बहाने होगी लंपटों की नारी 'पूजा'

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इन दिनों एक खबर जोरशोर से उछाली जा रही है कि राष्ट्रमण्डल खेलों के आयोजन के दौरान भारत सरकार की मंजूरी से या भारत सरकार की ओर से या सरकार की मौन सहमति से हजारों 'सुरक्षित' सेक्स वर्कर राजधानी नयी दिल्ली में आने को तैयार हैं। कहा जा रहा है, कि यह न मात्र हमारी स्वर्णिम और नारी की पूजा करने वाली संस्कृति को नष्ट कर देने वाली पश्चिमी जगत की चाल है, बल्कि इससे ऐड्‌स के तेजी से फैलने की भी भारी आशंका है। इससे देश का चरित्र भी नष्ट होना तय है।

कुछ ने तो सीधे सीधे भारत सरकार पर आरोप जड़ दिया है कि स्वयं सरकार ही नारी को भोग की वस्तु बनाकर पेश करने जा रही है और नारीवादी संगठन चुपचाप सरकार का साथ दे रहे हैं। इस प्रकार से नारीवादी संगठनों को सडकों पर उतरने के लिये भी उकसाया जा रहा है, जिससे कि यह मुद्दा बहस का मुद्दा बने और उनकी खबर बिकती रहे। माल कमाया जाता रहे। यह है मीडिया की नयी खबर उत्पाद नीति। जो स्वयं नैतिक मानदण्डों पर खरे नहीं हैं, उन्हें दूसरों से नैतिक या सांस्कृतिक मानदण्डों पर खरे नहीं उतरने पर कोसने का या आलोचना करने का कोई हक नहीं होना चाहिये, लेकिन मीडिया का कोई क्या कर सकता है? जब चाहे, जिसकी, जैसे चाहे वैसे आलोचना या प्रशंसा या चरणवन्दना करने का हक तो केवल मीडिया के ही पास है!

अब हम मीडिया द्वारा उत्पादित विषय पर आते हैं। पाठकों/दर्शकों के समक्ष सवाल दागा गया है कि गया है कि जिस भारत वर्ष में हजारों वर्षों से नारी की पूजा की जाती रही है, उसी महान भारत देश की राजधानी में स्त्री को स्वयं सरकार द्वारा भोग की वस्तु बनाकर प्रस्तुत करना देश को रसातल में ले जाने वाला कदम है! इस सवाल को उठाकर मीडिया जहाँ एक ओर तो अपने काँग्रेस विरोध को सरलता से प्रकट कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कथित राष्ट्रवादी दलों के नेताओं की दृष्टि में उभरने का अवसर भी प्राप्त कर रहा है। सवाल उठाया जा रहा है कि भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों के संरक्षण के बजाय, उन्हें नष्ट-भ्रष्ट करके तहस-नहस किया जा रहा है। सवाल यह भी उठाया जा रहा है कि विदेशों में राष्ट्रमण्डल जैसे आयोजन होते हैं, तो वहाँ पर स्वयं सरकार द्वारा सुरक्षित सेक्स की उपलबधता सुनिश्चितता की जाती है। जिससे मीडिया का यह विरोधाभाषी चेहरा भी उजागर होता है कि यदि भारत में भी ऐसे आयोजनों के दौरान यदि सेक्स सुरक्षित हो तो वह ठीक है, फिर भारत की संस्कृति या पूजा की जाने वाली नारी की इज्जत को कोई क्षति नहीं पहुँचेगी? मेरा सीधा सवाल यह है कि जब भारत के एक हिस्से नवरात्रों के दौरान युवा अविवाहित लडकियों एवं औरतों के द्वारा गरबा नाच (डांडिया डांस) में माँ दुर्गा की भक्ति के पवित्र उद्देश्य से भाग लिया जाता है, उस दौरान स्वयं सरकार द्वारा गर्वा नाच में भाग लेने वाली अविवाहित लडकियाँ गर्भवति नहीं हों, इस उद्देश्य से गर्भनिरोधक गोलियाँ/साधन मुफ्त में बांटे जाते हैं। इस सबके बावजूद भी यदि स्थानीय मीडिया की बात पर विश्वास किया जाये तो गर्वा नाच आयोजन क्षेत्रों में गर्वा कार्यक्रम समापन के बाद गर्भपात नर्सिंग होंम में गर्भपात की दर तीन सौ से पाँच सौ प्रतिशत तक बढ जाती है। क्या इसमें भी किसी विदेशी/पश्चिमी संस्कृति का हाथ है? और क्या इसके लिये अकेली स्त्री ही जिम्मेदार होती है? पुरुष का इसमें कोई दोष नहीं है?

सेक्स वर्कर की बात पर हो हल्ला मचाने वालों से पूछना जरूरी है कि- क्या भारत के अतीत में सेक्स वर्कर नहीं रही/रहे हैं? क्या बिना किसी आयोजन के सेक्स वर्कर अपना व्यवसाय नहीं करती/करते हैं? कुछ पूर्व न्यायाधीशों सहित अनेक सामाजिक कार्यकर्ताओं का तो स्पष्ट तौर पर यहाँ तक मानना है कि सेक्स व्यवसाय को कानूनी मान्यता मिल जाने पर ही पुरुषों के लिये सुरक्षित सेक्स की उपलब्धता को सुनिश्चित करने की दिशा में कुछ ठोस कदम उठाये जा सकते हैं। अन्यथा इस देश में सेक्स व्यवसाय फलता-फूलता तो रहेगा, लेकिन सुरक्षित कभी नहीं हो सकता। जहाँ तक मीडिया की ओर से पश्चिमी देशों के अन्धानुकरण का सवाल है, तो इसमें यह भी विचारणीय है कि हमें पश्चिम की वो सब बातें तो उचित और सहज-स्वीकार्य लगती हैं, जिनसे हमें सुख-सुविधाएँ, आराम और धन प्राप्त होता है, लेकिन पश्चिम की जिन बातों से हमारी कथित पवित्र संस्कृति को खतरा नजर आता है। या ये कहो कि संस्कृति के नाम पर दुकान चलाने वालों के स्वार्थों को खतरा नजर आने लगता है तो वे सब बातें बुरी, बल्कि बहुत बुरी लगने लगती हैं। इसी प्रकार से जब भी पश्चिम की ओर से कोई मानवकल्याणकारी खोज की जाती है तो हम कहाँ-कहाँ से आडे-टेडे तर्क/कुतर्क ढँूढ लाते हैं और सिद्ध करने में जुट जाते हैं कि पश्चिम की ओर से जो कुछ आज खोजा गया रहा है, वह तो हमारे वेद-पुराणों के अनुसार हजारों वर्षों पहले ही हमारे पास मौजूद था। क्या यह हमारा दौहरा और नाटकीय चरित्र नहीं है? मुद्दा ये है कि इस प्रकार के (राष्ट्रमण्डल खलों के) आयोजनों के समय को छोड कर सामान्य आम दिनों में भारत में सेक्स वर्कर्स का धन्धा क्या बन्द रहता है? मन्दा अवश्य रहता होगा, लेकिन धन्धा तो 365 दिन चलता ही रहता है।

जब राष्ट्रमण्डल खेलों के आयोजन से पूर्व किये जा रहे हर प्रकार के निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार का धन्धा जोरों पर है, सैलानियों के लिये हर प्रकार की उपभोग की वस्तुओं का धन्धा जोरों पर चलने वाला है तो सेक्स वर्कर्स बेचारी/बेचारे क्यों इतने बडे अवसर से वंचित रहें? उनका धन्धा क्यों मन्दा रहे? सच्चाई यह है कि हममें से अधिकतर आदर्शवादी होने या दिखने का केवल नाटकभर करते हैं। इसी नाटक को अंजाम देने के लिये हममें से अनेक लोग, अनेक प्रकार के विवाद तक खडे कर देते हैं। जबकि सच्चाई से हम सभी वाकिफ हैं। हम यदि किसी छोटे से शहर में भी रहते हैं तो भी पश्चिमी सभ्यता की खोजों के बिना 24 घण्टे सामान्य जीवन जीना असम्भव हो जायेगा? इसलिये क्या तो पश्चिमी और क्या पूर्वी, अब तो सारा संसार एक गाँव बन चुका है। ऐसे में कोई भी किसी भी देश की संस्कृति को फैलने या लुप्त होने से रोक नहीं सकता! क्या इण्टरनैट, हवाई जहाज, कम्प्यूटर, पैक्ट फूट, पैण्ट-शर्ट, फटी-जींस, स्कर्ट आदि इस देश की संस्कृति है? जब हम सब कुछ, बल्कि 50 प्रतिशत से अधिक पश्चिमी तरीके से जीवन जी रहे हैं, तो अकारण पूर्वाग्रहों को लेकर ढोंगी बनने से क्या लाभ है, बल्कि हमें पश्चिमी और पूर्वी की सीमा को पाटकर वैश्विक सोच को ही विकसित करना चाहिये? जिससे न तो किसी हो हीन भावना का शिकार होना पडे और न हीं किसी को अहंकार पैदा हो। न ही मीडिया या समाज की भावनाओं को भडकाकर रोटी सेंकने वालों को ऐसे अवसर मिलें। अब मीडिया द्वारा उठाये जा रहे मुद्दे की बात पर आते हैं कि जहाँ (भारत में) नारी की पूजा की जाती है, उस महान राष्ट्र भारत में स्त्री को स्वयं सरकार द्वारा भोग की वस्तु बनाकर पेश किया जाना कहाँ तक उचित है? या कहाँ तक नैतिक है? पहली बात तो सरकार द्वारा यह सब किया जा रहा है, यह विश्वसनीय ही नहीं लगता, दूसरे ऐसी खबरें फैलाने वालों का कर्त्तव्य है कि वे अपने विचारों को या पूर्वाग्रहों को दूसरों के मुःह में डालकर पुख्ता बनाने का घिनौना कृत्य करने से पूर्व पाठकों/दर्शकों की भावनाओं के बारे में भी सोचें।

जहाँ तक नारी या स्त्री की पूजा की जाने की बात है तो पहली बात तो ये कि नारी की इस देश में कहीं भी न तो पूजा की जाती है, न की जाती थी। केवल नारी प्रतिमा दुर्गा देवी, कालिका देवी आदि अनेकों नामों से देवियों के रूप में पूजा अवश्य की जाती रही है। मनु महाराज के जिस एक श्लोक (यत्र नार्यस्त पूज्यंते रमन्ते तत्र देवताः) के आधार पर नारी की पूजा की बात की जाती रहती है, लेकिन उन्हीं मनुमहाराज की एवं अन्य अनेक धर्मशास्त्रियों/धर्मग्रन्थ लेखकों की बातों को हम क्यों भुला देते हैं? इनको भी जान लेना चाहिये :- मनुस्मृति : ९/३- स्त्री सदा किसी न किसी के अधीन रहती है, क्योंकि वह स्वतन्त्रता के योग्य नहीं है। मनुस्मृति : ९/११- स्त्री को घर के सारे कार्य सुपुर्द कर देने चाहिये, जिससे कि वह घर से बाहर ही नहीं निकल सके। मनुस्मृति : ९/१५- स्त्रियाँ स्वभाव से ही पर पुरुषों पर रीझने वाली, चंचल और अस्थिर अनुराग वाली होती हैं। मनुस्मृति : ९/४५- पति चाहे स्त्री को बेच दे या उसका परित्याग कर दे, किन्तु वह उसकी पत्नी ही कहलायेगी। प्रजापति द्वारा स्थापित यही सनातन धर्म है। मनुस्मृति : ९/७७- जो स्त्री अपने आलसी, नशा करने वाले अथवा रोगग्रस्त पति की आज्ञा का पालन नहीं करे, उसे वस्त्राभूषण उतार कर (अर्थात्‌ निर्वस्त्र करके) तीन माह के लिये अलग कर देना चाहिये। आठवीं सदी के कथित महान हिन्दू दार्शनिक शंकराचार्य के विचार भी स्त्रियों के बारे में जान लें :- "नारी नरक का द्वार है।" तुलसी ने तो नारी की जमकर आलोचना की है, कबीर जैसे सन्त भी नारी का विरोध करने से नहीं चूके :- नारी की झाईं परत, अंधा होत भुजंग। कबिरा तिन की क्या गति, नित नारी के संग॥ अब आप अर्थशास्त्र के जन्मदाता कहे जाने वाले कौटिल्य (चाणक्य) के स्त्री के बारे में प्रकट विचारों का अवलोकन करें, जो उन्होंने चाणक्यनीतिदर्पण में प्रकट किये हैं :- चाणक्यनीतिदर्पण : १०/४- स्त्रियाँ कौन सा दुष्कर्म नहीं कर सकती? चाणक्यनीतिदर्पण : २/१- झूठ, दुस्साहस, कपट, मूर्खता, लालच, अपवित्रता और निर्दयता स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्यनीतिदर्पण : १६/२- स्त्रियाँ एक (पुरुष) के साथ बात करती हुई, दूसरे (पुरुष) की ओर देख रही होती हैं और दिल में किसी तीसरे (पुरुष) का चिन्तन हो रहा होता है। इन्हें (स्त्रियों को) किसी एक से प्यार नहीं होता।

पंचतन्त्र की प्रसिद्ध कथाओं में शामिल श्रृंगारशतक के ७६ वें पर्व में स्त्री के बारे में लिखा है कि- "स्त्री संशयों का भंवर, उद्दण्डता का घर, उचित अनुचित काम (सम्भोग) की शौकीन, बुराईयों की जड, कपटों का भण्डार और अविश्वास की पात्र होती है। महापुरुषों को सब बुराईयों से भरपूर स्त्री से दूर रहना चाहिये। न जाने धर्म का संहार करने के लिये स्त्री की रचना किसने कर दी!" मेरा तो ऐसा अनुभव है कि इस देश के कथित धर्मग्रन्थों और आदर्शों की दुहाई देने वाले पुरुष प्रधान समाज और धर्मशास्त्रियों ने अपने नियन्त्रण में बंधी हुई स्त्री को दो ही नाम दिये हैं, या तो दासी (जिसमें भोग्या और कुल्टा नाम भी समाहित हैं) जो स्त्री की हकीकत बना दी गयी है, या देवी जो हकीकत नहीं, स्त्री को बरगलाये रखने के लिये दी गयी काल्पनिक उपमा मात्र हैं। स्त्री को देवी मानने या पूजा करने की बात बो बहुत बडी है, पुरुष द्वारा नारी को अपने बराबर, अपना दोस्त, अपना मित्र तक माना जाना भारतीय समाज में निषिद्ध माना जाता रहा है? जब भी दो विषमलिंगी समाज द्वारा निर्धारित ऐसे स्वघोषित खोखले आदर्शवादी मानदण्डों पर खरे नहीं उतर पाते हैं, जिन्हें भारत के इतिहास में हर कालखण्ड में समर्थ लोगों द्वारा हजारों बार तोडा गया है तो भी 21वीं सदी में भी केवल नारी को ही पुरुष की दासी या कुल्टा क्यों माना जाता है? पुरुष के लिये भी तो कुछ उपमाएँ गढी जानी चाहिये! भारत में नारी की पूजा की जाती है, इस झूठ को हम कब तक ढोते रहना चाहते हैं? जहाँ तक वर्तमान सरकार द्वारा राष्ट्रमण्डल खेलों के आयोजन के दौरान सेक्स परोसे जाने की बात पर किसी को आपत्ति है तो कथित हिन्दू धर्म की रक्षक पार्टी की सरकार के समय गर्वा नाच (डांडिया डांस) में शामिल लडकियों को गर्भनिरोधक मुफ्त में बांटे जाने पर तो इस देश के हिन्दू धर्म के कथित ठेकेदारों को तो मुःह दिखाने का जगह ही नहीं मिलनी चाहिये, लेकिन किसी ने एक शब्द तक नहीं बोला। आखिर क्यों हम बेफालतू की बातों में सामयिक मुद्दों को शामिल करके अपनी आलोचना का केन्द्र केवल सरकारों को या विदेशी संस्कृतियों को ही बनाना चाहते हैं? हम स्वयं की ओलाचना क्यों नहीं कर सकते? आत्मालोचना के बिना कुछ नहीं हो सकता। जो अपेक्षा हम दूसरों से करते हैं, क्या उसी प्रकार की अपेक्षाएँ अन्य लोग हमसे नहीं करते हैं? कितना अच्छा हो कि हम हर सुधार या परिवर्तन की शुरुआत अपने आप से करें? कितना अच्छा हो कि हम जो कुछ भी कहें, उससे पूर्व अपने आप से पूछें कि क्या इस बात को मैं अपने आचरण से प्रमाणित करने में सफल हो सकता हँू? शायद नहीं और यहीं से हमारा दोगलेपन का दौहरा चरित्र प्रकट होने लगता है। मुखौटे लगाकर जीने की हमारी कथित आदर्शवादी सोच को हम अपने खोखले संस्कारों से ऐसे ही सींचने की शुरूआत करने लगते हैं।

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Sanjay on 11 August, 2010 19:06;59
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uapr ka 4 para tak alekh achha laga. lekin purno ka udaharn ka maza nahi aaya...
manusmirti mady youg ki rachna hain. tab ki bat ke anusar aaj ke samaj ka vishleshan nahi kya ja sakta hin.
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Lalita Garg on 11 August, 2010 23:01;38
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भाई संजय जी मुझे तो इस लेख में कहीं भी ऐसा पढने को नहीं मिला जैसा कि आप निष्कर्ष निकाल रहे हैं। लेखक ने आज की नारी या आज के समाज के बारे में मनुसमृति को लेकर एक शब्द भी नहीं लिखा है। टिप्पणियाँ ईमानदारी से और खबर/रचना को पढने के बाद की जानी चाहिये। अन्यथा पाठक की टिप्पणी लेखक और उसकी रचना के साथ न्याय नहीं कर पाती हैं। आपको किसी से सहमत या असहमत होने का पूरा-पूरा हक है, लेकिन किसी के मु:ह में शब्द डालने का कोई हक नहीं है। इस लेख के लेखक इस बात को सिद्ध करने में सफल रहे हैं कि भारत में जिन मनु जी के एक वाक्य के आधार पर नारी की पूजा की बात कही जाती है, वह असत्य और मनगढन्थ होने के साथ-साथ नारी को धोखा देने वाली है। इसलिये मध्ययुग की रचना के आधार पर आज के समाज का विश्लेषण करने पर लेखक का भी उद्देश्य नहीं लगता है, बल्कि जो लोग नारी पूजा के नाम पर सेक्र्स वर्कर्स की बात को बढा-चढा कर खबरें बनाकर बेच रहे हैं और भारत में नारियों की पूजा की बात कर रहे हैं, वे जरूर मध्ययुग की एक पंक्ति को हजारों सालों से बेचते आ रहे हैं। इस लेख को केवल पुरुष या पति बनकर नहीं समझा जा सकता। इसे समझने के लिये सिर्फ मानव बनना होगा। जो किसी पुरुष के लिये सम्भव नहीं है तो कम से कम एक पिता, एक भाई या और कुछ बनकर समझें। तब आपको इसमें सच्चाई दिखाई दे सकेगी। धन्यवाद।
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Jeetu Goyal on 11 August, 2010 23:12;41
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श्री निरंकुश जी, अब आप विस्फोट.कॉम पर भी प्रकट हो गये। स्वागत और बधाई। लगता है कि अब तो इस साइट पर भी आते-जाते रहना प‹डेगा। अभी तक आपको अन्य साइट पर ही पढते रहे हैं। इस साइट पर आपका ये पहला लेख पढने को मिला है। शानदार प्रस्तुति के लिये बधाई। आपकी कुछ पंक्तियाँ इतनी अच्छी लगी हैं कि उन्हें दौहराने की इच्छा हो रही है -


"जो स्वयं नैतिक मानदण्डों पर खरे नहीं हैं, उन्हें दूसरों से नैतिक या सांस्कृतिक मानदण्डों पर खरे नहीं उतरने पर कोसने का या आलोचना करने का कोई हक नहीं होना चाहिये, लेकिन मीडिया का कोई क्या कर सकता है? जब चाहे, जिसकी, जैसे चाहे वैसे आलोचना या प्रशंसा या चरणवन्दना करने का हक तो केवल मीडिया के ही पास है!"



"जब भारत के एक हिस्से नवरात्रों के दौरान युवा अविवाहित लडकियों एवं औरतों के द्वारा गरबा नाच (डांडिया डांस) में माँ दुर्गा की भक्ति के पवित्र उद्देश्य से भाग लिया जाता है, उस दौरान स्वयं सरकार द्वारा गर्वा नाच में भाग लेने वाली अविवाहित लडकियाँ गर्भवति नहीं हों, इस उद्देश्य से गर्भनिरोधक गोलियाँ/साधन मुफ्त में बांटे जाते हैं। इस सबके बावजूद भी यदि स्थानीय मीडिया की बात पर विश्वास किया जाये तो गर्वा नाच आयोजन क्षेत्रों में गर्वा कार्यक्रम समापन के बाद गर्भपात नर्सिंग होंम में गर्भपात की दर तीन सौ से पाँच सौ प्रतिशत तक बढ जाती है। क्या इसमें भी किसी विदेशी/पश्चिमी संस्कृति का हाथ है? और क्या इसके लिये अकेली स्त्री ही जिम्मेदार होती है? पुरुष का इसमें कोई दोष नहीं है?"




"जब भी दो विषमलिंगी समाज द्वारा निर्धारित ऐसे स्वघोषित खोखले आदर्शवादी मानदण्डों पर खरे नहीं उतर पाते हैं, जिन्हें भारत के इतिहास में हर कालखण्ड में समर्थ लोगों द्वारा हजारों बार तोडा गया है तो भी 21वीं सदी में भी केवल नारी को ही पुरुष की दासी या कुल्टा क्यों माना जाता है? पुरुष के लिये भी तो कुछ उपमाएँ गढी जानी चाहिये! भारत में नारी की पूजा की जाती है, इस झूठ को हम कब तक ढोते रहना चाहते हैं?"


"जो अपेक्षा हम दूसरों से करते हैं, क्या उसी प्रकार की अपेक्षाएँ अन्य लोग हमसे नहीं करते हैं? कितना अच्छा हो कि हम हर सुधार या परिवर्तन की शुरुआत अपने आप से करें? कितना अच्छा हो कि हम जो कुछ भी कहें, उससे पूर्व अपने आप से पूछें कि क्या इस बात को मैं अपने आचरण से प्रमाणित करने में सफल हो सकता हँू? शायद नहीं और यहीं से हमारा दोगलेपन का दौहरा चरित्र प्रकट होने लगता है। मुखौटे लगाकर जीने की हमारी कथित आदर्शवादी सोच को हम अपने खोखले संस्कारों से ऐसे ही सींचने की शुरूआत करने लगते हैं।"
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Vijay Dubey on 12 August, 2010 10:13;35
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Nirankush ji Aapne nimn laain men jo gehree baat likhi hai, uska main samrthan karta hun aur iski pransha bhi karta hun.

सच्चाई यह है कि हममें से अधिकतर आदर्शवादी होने या दिखने का केवल नाटकभर करते हैं। इसी नाटक को अंजाम देने के लिये हममें से अनेक लोग, अनेक प्रकार के विवाद तक खडे कर देते हैं। जबकि सच्चाई से हम सभी वाकिफ हैं। हम यदि किसी छोटे से शहर में भी रहते हैं तो भी पश्चिमी सभ्यता की खोजों के बिना 24 घण्टे सामान्य जीवन जीना असम्भव हो जायेगा? इसलिये क्या तो पश्चिमी और क्या पूर्वी, अब तो सारा संसार एक गाँव बन चुका है। ऐसे में कोई भी किसी भी देश की संस्कृति को फैलने या लुप्त होने से रोक नहीं सकता! क्या इण्टरनैट, हवाई जहाज, कम्प्यूटर, पैक्ट फूट, पैण्ट-शर्ट, फटी-जींस, स्कर्ट आदि इस देश की संस्कृति है? जब हम सब कुछ, बल्कि 50 प्रतिशत से अधिक पश्चिमी तरीके से जीवन जी रहे हैं, तो अकारण पूर्वाग्रहों को लेकर ढोंगी बनने से क्या लाभ है, बल्कि हमें पश्चिमी और पूर्वी की सीमा को पाटकर वैश्विक सोच को ही विकसित करना चाहिये? जिससे न तो किसी हो हीन भावना का शिकार होना पडे और न हीं किसी को अहंकार पैदा हो। न ही मीडिया या समाज की भावनाओं को भडकाकर रोटी सेंकने वालों को ऐसे अवसर मिलें।

Asha hai ki aapke lekh padhne ko milte rahenge.

Note : Editor
visfot.com

Aapne is lekh men sheershak ke saath Dr. purshotam meena nirankuss ka naam diya hai, jabki right side men auther info men kuchh alag likha ha, krapya yaddi yah sahi nahin hai to ise ya to theek karen ya fir iska matlab samjhaven,

ise aap bi dekhen :
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Gladson Dungdung
कभी खुद अपने परिवार का विस्थापन देख चुके ग्लैडसन आदिवासी संघर्ष के प्रतीक बनते जा रहे हैं. ग्लैडसन डुंगडुंग न केवल आदिवासी वनवासी हितों के लिए कलम चलाते हैं बल्कि सक्रिय रूप से संघर्ष भी करते हैं. झारखण्ड इंडिजनस पीपुल्स फोरम के संयोजक ग्लैडसन हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में विभिन्न अखबारों, पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए लिखते हैं. उनकी किताब उलगुलान का सौदा काफी चर्चित रही है.
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सामी नहीं, कांग्रेस के मुंह पर कालिख
कहने के लिए भले ही छत्तीसगढ़ कांग्रेस में केंद्रीय राज्य मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंके जाने का मुद्दा शांत होता दिख रहा हो लेकिन इसकी गूंज अभी लंबे समय तक सुनाई देगी। हकीकत यह है कि यहां कांग्रेस की गुटबाजी को आलाकमान अपना पूरा दम लगाकर भी शांत नहीं कर सकता। प्रभारी के रूप में सामी की यहां यह दूसरी बार फजीहत हुई है। मंगलवार को पीसीसी प्रतिनिधियों की बैठक में जब महज एक लाइन का प्रस्ताव पारित करवाने के लिए सामी यहां पहुंचे थे तो कांग्रेस भवन के बाहर ही उन पर काली स्याही फेंकी गई जो उनके चेहरे और कपड़े पर होते हुए उनके साथ कार से उतरे शहर कांग्रेस अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल पर भी पड़े।...
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अब देखिए राजनीति का कॉमनवेल्थ
कॉमनवेल्थ घोटाले की कड़ी से कड़ी जुडऩे लगी। पहले दिन बीजेपी नेता सुधांशु मित्तल निशाने पर रहे, तो दूसरे दिन खेल गांव बनाने वाली कंपनी एम्मार-एमजीएफ का खेल बिगड़ गया। डीडीए के पास जमा 183 करोड़ की बैंक गारंटी जब्ती का नोटिस जारी हो गया। पर अभी तो सिर्फ ठेका लेने वाली कंपनियों पर शिकंजा कसा। यक्ष प्रश्न, ठेका देने वाले नौकरशाहों-नेताओं ने कितना खाया, इसकी परतें कब उधड़ेंगी? अब ठेकेदारों पर कार्रवाई में तेजी दिखाने से क्या होगा? ठेकेदार तो अपना टेंडर भरते। यह तो देने वाले पर निर्भर, किस कंपनी को ठेका दे। सो सवाल, ठेका देते वक्त नौकरशाहों-नेताओं ने होश क्यों गंवाया?...
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अब शुरू हुआ असली खेल
कॉमनवेल्थ खेलों के लिए लगाये गये टेन्ट, तंबू कनात उखड़ गये हैं. लेकिन असली खेल उसके बाद शुरू हुआ है. भारतीय जनता पार्टी बनाम कांग्रेस के इस खेल में राजनीति का स्वर्ण पदक कौन हासिल करेगा यह कहना मुश्किल है लेकिन जो खुलासे होंगे वे यह साबित कर देंगे कि खेल भारतीय राजनीति में पर्दे के पीछे असली समाजवाद कायम है. अगर भाजपा की सरकार में कांग्रेसी सुरेश कलमाड़ी कामनवेल्थ खेलों के लिए अगुआ बने रहते हैं तो कांग्रेस की सरकार में आठ सौ करोड़ का ठेका भाजपा के हितैषी सुधांशु मित्तल को मिल जाता है. ...
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बताओ भला, सीएजी शीला और कलमाड़ी का क्या बिगाड़ लेगी?
कॉमनवेल्थ के आयोजक सफलता की खुमारी में हैं तो देश की जनता विजयादशमी के जश्न में डूबी है, ऐसे में रामायण के एक प्रसंग का जिक्र लाजिमी होगा। जब भगवान राम लंका पर फतह कर अयोध्या लौटे। राज्याभिषेक हो गया तब सिर्फ एक धोबी की टिप्पणी सुन राम ने अग्नि परीक्षा दे चुकी सीता को तज दिया था। पर कॉमनवेल्थ के आयोजकों पर न जाने कितने आरोप लग चुके, फिर भी किसी ठोस कार्रवाई की उम्मीद बेमानी। पहले भी जांच हुई, रपटे आईं लेकिन उन्हीं शीला दीक्षित ने सीएजी को ठेंगा दिखा दिया जिनके खिलाफ अब कामनवेल्थ खेलों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने की बात कही जा रही है....
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काश हर मस्जिद की खिडकी मंदिर में खुलती
6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचा ढहाया गया, तब मैं जवान हो रहा था। बारहवीं में था। पिताजी उन दिनों बुलंदशहर में बतौर अध्यापक तैनात थे। हम सब उनके साथ ही रह रहे थे। दंगे भडक चुके थे। हमने छत पर चढकर दूर मकानों से उठती लपटों की आंच महसूस की थी। मौत के खौफ से बिलबिलाते लोगों की चीखें सुनी थीं। हैवानियत का नंगा नाच देखा था। 'जयश्री राम' और 'अल्लाह ओ अकबर' के नारों में भले ही ईश्वर और अल्लाह का नाम हो, लेकिन तब उन्हें सुनकर रीढ़ में बर्फ-सी जम जाती थी।...
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ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
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आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
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