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कश्मीरी आवाम से अहिंसा की उम्मीद क्यों?

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कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग के रूप में शामिल वाला पूरे भारत की ओर से कश्मीर को क्या मिला है? वहां कश्मीर घाटी की हिंसा में मरने स्थानीय लोगों की खबरों हमें नहीं झकझोरती हैं। देश ने केवल यह दावा किया की कश्मीर हमारा है। लेकिन इस दावे के बाद भी पूरा कश्मीर उपेक्षित हो गया। भूख तो पशु भी बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन उपेक्षा नहीं। फिर भला एक पूरी समुदाय उपेक्षित हो तो उसे अहिंसक होने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

कश्मीर में हिंसा की आग धधक पड़ी है। तरह-तरह की चर्चाओं का दौरा जारी है। कोई राजनीतिक असफलता की बात कह रहा है तो कोई पड़ोसी देश पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई की प्रायोजित रणनीति। हालत जो भी हो, पर इस हिंसा से साबित हो गया है कि कश्मीर की वर्तमान लाकतांत्रित सरकार वहां की जनता की आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाई। अलगाववाद की स्थिति पर काबू पाने के लिए केंद्र सरकार भी विफल रही। इन तमाम चर्चाओं के बीच एक महत्वपूर्ण बात छूट रही है।

आईएसआई की गतिविधियों से सभी वाकिफ है। सरकार ने सेना की तैनाती कर इस पर अंकुश लगाने का भी कार्य किया। दूसरी ओर गत एक दशक में कश्मीर की चिंगारी भड़कने की मुख्य वजह क्या थी। अभी तक काबुल से पत्थर फेंकने की घटनाएं आ रही थी। अब भारत में भी हो गई। कहने वाले कह रहे है कि पड़ोसी राज्यों ने जनता को पत्थरबाजी के लिए उकसाया। उसके लिए जनता को पैसे भी उपलब्ध कराये गए। पर इसमें संदेह है। पैसे के लालच में एक व्यक्ति जान जोखिम में डालने की सोच सकता है, लेकिन अमन की चाह रखने वाला पूरा समाज ऐसा नहीं कर सकता है। ईमानदारी से सोच और विचार करने की जरूरत है। कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग करने वाला पूरे भारत की ओर से कश्मीर को क्या मिला है। वहां कश्मीर घाटी की हिंसा में मरने स्थानीय लोगों की खबरों हमें नहीं झकझोरती हैं।  गत दो दशक के समय पर विचार करें। उदारदवाद की हवा जहां-जहां गई, स्थिर समाज सचेत हुआ। सरकार ने इस दौरान ढेरों तरक्की के दावे किये। पर विचार करने वाली बात यह है कि उदारवाद की यह हवा कश्मीर की घाटी में विकास की

संतोषजनक गर्माहट पैदा नहीं कर सकी। कश्मीर को केंद्र सरकार ने सेना के अलावा क्या दिया है? जिनती स्थिति सेना के माध्यम से कश्मीर को अपने नियंत्रण में लेने की रही, उतनी ही दृढ़ता वहां बाजार को पहुंचाने में नहीं रही। आप माने या न माने। आज हर समाज में बाजार जीने की बुनियादी जरूरत बन गई है। भले ही इस के रूप अलग-अलग क्यों न हो। लेकिन देश के पिछड़े इलाकों में जहां-जहां बाजार पहुंचा, वहां थोड़ी-बहुत समृद्धि जरूर आई है। विदर्भ में किसानों ने आत्महत्या की। खबरे राष्ट्रीय स्तर पर आईं। पर किसानों की उपज को अच्छा मूल्य देने वाला बाजार वहां भी नहीं पहुंच पाया। ठीक इसी तरह से कश्मीर के होने वाले उत्पादन को हाथों हाथ लेने के लिए बाजार बनाने में सरकार असफल दिख रही है। पर्यटन का व्यवसाय एक सीजन में चलता है। लेकिन इससे उन्हीं लोगों को ज्यादा लाभ है जो झील के आसपास हैं और उनकी अपनी नाव हैं या फिर पर्यटक स्थलों पर जिनकी दुकानें हैं।

बेहतरीन सेव उत्पादन के मामले में कश्मीर अव्वल रहा है। पर वहां के  सेव को वहीं बेचने के लिए बाजार उपलब्ध नहीं है। बिचौलिये उनका मुनाफा खाते रहे हैं। कश्मीर के गर्म कपड़ों के क्या कहने, पर जब वे देश के विभिन्न हिस्सों में प्रदर्शनी के लिए जाते हैं, तो तिब्बती शरणार्थियों के गर्म कपड़े उन पर भारी पड़ जाते हैं। ऐसी बात नहीं है कि इन चीजों के उत्पादों को प्रोत्साहन के लिए कोई सरकारी पहल नहीं हुआ है। लेकिन जो पहल हुआ है, वह औपचारिक रूप से। उसकी गति बेहद सुस्त है। इसका लाभ भी एक खास वर्ग तक सीमित हो कर रह गया है।

करीब तीन-चार साल पूर्व पाकिस्तान और भारत के बीच साफ्टा नाम की एक संधि हुई। इस संधि के माध्यम से 773 ऐसी वस्तुओं को सूचीबद्ध किया गया है जिसे पाकिस्तान भारत से निर्यात करेगा। इसमें कई ऐसी चीजे शामिल थीं, जिनका उत्पादन कश्मीर में होता है और उसकी पाकिस्तान में बेहद मांग है। पर कश्मीर की आग में यह संधि जल गई। यह व्यापार दोनों देशों की आपसी राजनीति की ऊपर था। कारण चाहे जो भी हो, समाज की मांग के दवाब में कश्मीर में बाजार ने पांव पसारने की कोशिश भी की, तो सरकारी संरक्षण के कारण उसे प्रोत्साहन नहीं मिला।

गत एक दशक में कश्मीर में बेरोजगारों की एक बड़ी फौज खड़ी हो गई है। पारंपरागत बंदिशों से कश्मीरी समाज की बहुसंख्यक महिलाएं उच्च शिक्षित नहीं हो पाई। महिलाएं भी बेकार हैं। सरकार इनके हाथों में उनके हुनर लायक संतोषजनक काम देने में नाकाम रही। लेकिन इसके लिए केवल राज्य सरकार को ही दोष नहीं दिया जा सकता है। स्थिति की नाजुकता को देखते हुए कश्मीर की जनता में अपना विश्वास बहाल करने के लिए केंद्र सरकार को भी समय-समय पर ताक-झांक करते रहना चाहिए था।

लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। लिहाजा, सत्ता की राजनीति को बनाये रखने में कश्मीर के युवा, युवति व महिलाएं आक्रोशित होकर हाथ में पत्थर नहीं उठाते तो क्या करते। दरअसल इस मामले को पूरी तरह से संवेदनशील होकर सोचने की जरूरत है। क्या हम अपने ही घर में पुलिस या सैन्य बलों के साये में रहना पसंद करेंगे? यदि हम ऐसा पंसद नहीं कर सकते हैं तो कश्मीरी भला कैसे करेंगे। यदि यह सुरक्षा साया जरूरी भी था तो जनता की की बदहाली दूर करने और उनमें विश्वास बहाल करने के लिए सैन्य बलों को संरक्षण में ही विकास और रोजगार के ढेरों कार्य हो सकते थे। पर ऐसा हुआ नहीं। सरकार चाहे राज्य की रही हो या केंद्र की। सभी ने केवल इसे भारत का अभिन्न अंग होने का दावा किया। देश के दूसरे राज्यों की जनता ने भी ऐसा ही दावा किया। लेकिन इस दावे के बाद भी पूरा कश्मीर उपेक्षित हो गया। भूख तो पशु भी बर्दाश्त कर सकते हैं, लेकिन उपेक्षा नहीं। फिर भला एक पूरी समुदाय उपेक्षित हो तो उसे अहिंसक होने की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

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dharmendra on 12 August, 2010 19:37;10
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बढ़िया है भैया. लगे रहिये .
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मुकुल शुक्ल on 12 August, 2010 21:00;15
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आपका लेख असली समस्या को नहीं उभारता | कश्मीरी आवाम के दिल में आज भी भारतीय होने का एहसास नहीं है तो उसका सबसे बड़ा कारण है धारा 370 | साथ ही कश्मीरी ही नहीं भारत के आम मुसलमान के मन में भी भारत के लिए कोई आदर नहीं है | भारत से मुसलमान को सुविधाए तो चाहिए पर जब समाज को कुछ देने की बारी आती है तब मुसलमान देता है आतंकवाद और पाकिस्तान का साथ | एक तरफ़ा उम्मीद रखने से हमेशा स्थिति बिगडती ही है पर हमारी सरकार बिगड़ती हुई परिस्थिति को अपनी वोट बैंक की राजनीति के चलते नियंत्रित नहीं कर पा रही है | मुसलमानों में आत्मघाती प्रवृत्ति बहुत आम है इसीलिए पाकिस्तान बंगलादेश और अफगानिस्तान आज जल रहा है और जिसकी लपटों की दहक भारत को भी झुलसा रही है | कश्मीरियों को मासूम बताना भी एक आत्मघाती प्रवृत्ति है क्योंकि कश्मीर में आज से बीस साल पहले सब कुछ था जिसे कश्मीरियों ने खुद अपने हाथो से बर्बाद कर डाला है |
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अनिल सिन्हा on 12 August, 2010 21:36;16
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माननीय मुकुल जी
सबसे पहली बात आप मुसलमानों को अविश्वसनीय कह कर, कश्मीर की स्वतंत्रता संघर्ष को पुष्ट कर रहे हैं।
दूसरी बात एक मुसलमान की गलती से पूरे समाज को दागदार न बनायें। यदि इस कौम में अविश्वास की भावना है तो इसे विश्वासी बनाने के लिए सरकार ने क्या किया? नफरत की बीज तो 1947 से ही पड़े हैं। इसके बाद भी हिंदू-मुस्लिम सदभाव की अनेक मिशाल है।
दरअसल सच कड़वा होता है। इस तरह की हकीकत कोई लिखता कहां है। हालांकि लेख पढ़ कर लगता है कि लेखक को और जानकारी की जरूरत थी। लेकिन मुद्दा सही उठाया गया है।
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shailendra kumar on 12 August, 2010 23:41;38
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कश्मीर ही क्यों उत्तर प्रदेश भी भारत में क्यों होना चाहिए और पूर्वांचल और बुंदेलखंड भी इसमें क्यों होने चाहिए भारत सरकार और राज्य सरकारों ने हमें दिया ही क्या है
कृपया पूर्वांचल और बुंदेलखंड को भी भारत से अलग करने का रास्ता बताएं मैं भी आजाद होना चाहता हूँ
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Dr pawan on 13 August, 2010 13:09;17
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aap shayad economics nahi jante kashmir par sarkar 5o sallo me kitna kharach chuki h itna kisi bhi state par nahi ye ladai sirf religion ki h or 16 crore muslims k liye india ka constitution problem nahi karta to 50 lakh kashmir k musalmano ko kya dikkat h ye will power ki kami hai or kuch b nahi nehru gandhi ki galtiya hum pay kar rahe h jinko congress aage bada rhi h, inka ilaz ek hi h ki pure kashmir ko khali karakar kewal army ko de do or in desh drhio ko india k kisi or hill station par faink do ya fir inko pak bhej do jaha inko taliban ka swagat milega, centre ne kabhi chaha hi nahi ki iska samadan ho 10 din operation nahi pura kashmir shant ho jayega jaise jagmohan ne 1990 me kiya tha koi separatist nahi dikhega
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अब्दुल हमीद on 13 August, 2010 16:04;26
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संजय स्वदेश जी से इस तरह के सतही लेखन की उम्मीद कतई नहीं थी. उन्होंने पूछा है कि देश ने कश्मीर को दिया ही क्या है? शायद उन्हें पता नहीं कि जवाहर लाल नेहरू के ज़माने से लेकर आज तक की सरकारों ने कश्मीर को दिया ही दिया है. छह आने किलो बासमती चावल से लेकर तमाम सहूलियतें और सुविधाएं दी हैं, बाकी भारत का पेट काट काट कर. कशमीरियों को मुफ़्त का खाने और पत्थर चलाने की आदत पड गई है. मुफ़्तखोर लोग लतखोर तो होंगे ही ना? धरती का स्वर्ग कश्मीर था. वहां का फ़लता फ़ूलता पर्यटन उद्योग स्विट्ज़रलैंड को भी मात करता था. हर दूसरी तीसरी हिंदी फ़िल्म में कश्मीर नज़र आता था. क्या देश ने किसी और राज्य को इतना सर आंखों पर चढाया कभी? और इस स्वर्ग को नर्क किसने बनाया? आप जैसे बुद्धीजीवियों ने, जिन्हें आतंकवाद की जड में इस्लाम नज़र नहीं आता, बाकी सब कुछ दिखता है. जय है आपकी.
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संजय स्वदेश on 13 August, 2010 16:40;34
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अब्दुल हामिद जी।
लेख सतही लगा, भविष्य में सुधार करूंगा।
पर इस लेख के माध्यम से मेरा कहना यही है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराने और विकास के मामले में सरकार ने किया किया? छह आने किलो बासमती चावल उपलब्ध कराना उपलब्धि नहीं है। जिस तरह से भिखारियों को भीख देने से उनकी गरीबी दूर नहीं होती है, ठीक उसी तरह से कश्मीर समस्या सुविधाएं उपलब्ध कराने से नहीं दूर होगी। स्थानीय स्तर पर रोजगार और विकास जरूरी है। वहां बाजार के जाने का माहौल बना दिया जाए तो शायद कुछ बात बन सके।
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shailendra kumar on 13 August, 2010 17:42;26
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कृपया करके बुद्धिजीवी लोग मेरे उपरोक्त सवालों का भी समाधान दे
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schs on 14 August, 2010 00:04;36
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जरूरी जानकारी होना नहीं, पत्रकार होना है। ज्यादातर पत्रकार इस गलतफहमी में जीते हैं कि उन्हें हर विषय पर लिखने का हक है, जानकारी हो या नहीं। लेखक को पहले धारा 370 को समझना चाहिये और उसके बाद बाजार की फितरत को। बाजार को शांति और सुरक्षा चाहिये। पूंजीनिवेश के लिये जमीन चाहिये। बिना इसके वहां लंगर तो लगाये जा सकते हैं, व्यापार नहीं किया जा सकता। आप जैसे बुद्धिजीवियों को प्रेरणा देने और सरकार को उन पर अमल करने की पूरी स्वतंत्रता है। बाजार ऐसी मूर्खताओं पर भरोसा नहीं करता। उसे खामखयाली नहीं, नकद मुनाफा चाहिये।
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image संजय स्वदेश किरोडीमल कॉलेज स्नातकोत्तर के बाद केंद्रीय हिंदी संस्थान दिल्ली से पत्रकारिता में डिप्लोमा। दैनिक हिंदुस्तान, नवभारत टाईम्स, सहारा समय, दैनिक भास्कर में काम. कई पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन के साथ स्थानीय जनअभियानों से जुड़े हैं। sanjayinmedia@rediffmail.com
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