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आजाद कर दो कश्मीर

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अगर कश्मीरी हिंदुस्तान में नहीं रहना चाहते तो उन्हें यह अनुभव कर लेने दिया जाना चाहिये कि वे जंगी और आर्थिक समस्याओं से घिरे अस्थिर पाकिस्तान में रह लें या फिर नेपाल या बांग्लादेश की तरह आजाद रहकर तय तक लें कि प्रगति के दौर में वह कहां तक जा पाते हैं. हालांकि इस देश ने अपने किसी वासी को यह तय करने का मौका नहीं दिया कि वह देश में रहना चाहता है या नहीं मगर अगर कश्मीर खुद को थोड़ा अलग महसूस कर रहा है तो उसे मौका दिया जाना चाहिये. बनिस्पत उसे हर साल दसियों हजार करोड़ के स्पेशल पैकेज दिये जायें और उसमें अपनी हजारों फौजों को मौत से मुकाबला करने के लिये ढकेल दिया जाय.

हमारे प्रधानमंत्री ने कश्मीर की स्वायत्ता पर बहस का मुद्दा उछाल दिया है. उनके हिसाब से इस बहस की तपिश में झुलस का कश्मीर का हालिया विवाद ठंडा पड़ जायेगा और जो नौजवान इन दिनों पत्थरबाजी में मशगूल हैं वे इस बात को भूल कर इस बहस में भिड़ जायेंगे कि क्या स्वायत्ता कश्मीर की समस्याओं का हल है, या इसका हल क्या है, भारतीय हुकूमत को इस जलते हुए प्रदेश के जख्मों पर मरहम लगाने के लिये आखिर क्या करना चाहिये, बगैरह-बगैरह. हालांकि देश के तथाकथित प्रगतिशील तबके ने एक स्वर में प्रधानमंत्री जी के इस प्रगतिशील बयान का स्वागत कर डाला, मगर घाटी के विद्रोही और युवा शायद इससे भी बड़ी बारगेनिंग करना चाहते हैं और उन्होंने एक सेंटीमेंटल बयान दे मारा है कि सवाल न तो स्वायत्तता का है और न ही किसी पैकेज का सवाल इस बात का है कि कश्मीर के दर्द को लोग समझें. मगर इस लोकतांत्रिक और प्रगतिशील बयार के बीच मैं पूछना चाहता हूं कि आखिर कश्मीर को इतना भाव क्यों दिया जा रहा है या जाता रहा है..

यहां मैं स्पष्ट कर दूं कि यह आलेख न तो पंडित दीनदयाल जी के विचारों से प्रभावित होकर लिखा जा रहा है न हीं इसके पीछे कश्मीरी हिंन्दुओं से साथ हुए अत्याचार की दुखद स्मृतियां. एक सामान्य भारतीय नागरिक के तौर पर यह सवाल अपने मन में लिये मैं कई सालों से मंथन कर रहा हूं और आज आपके सामने पेश करने की जहमत उठा रहा हूं कि आखिर कश्मीर को इतना भाव क्यों दिया जा रहा है. आखिर कश्मीर या कश्मीरियों की समस्या क्या है ? मुझे कश्मीरवासी इस बात के लिये माफ करेंगे कि इतने हंगामे के बावजूद मैं आज तक समझ नहीं पाया कि उनकी समस्या क्या है और वह हम सामान्य हिंदुस्तानियों से किस तरह भिन्न है ? आखिर वे किस बात का रोना इतने दिनों से रोते आ रहे हैं और किस बात के लिये बरसों से एक दूसरे का खुन बहाते आ रहे हैं ? अपनी समझ के मुताबिक इस बात के जो कारण मुझे लगता हैं, मैं उन पर अपनी बात करने की कोशिश कर रहा हूं.

समस्या - कश्मीर भारत में शामिल नहीं होना चाहता था, उसे जबरन भारत में शामिल कराया गया. कभी उसकी राय नहीं ली गई.
जवाब- क्या बिहार, यूपी, मध्यप्रदेश, कर्नाटक आदि राज्य भारत में शामिल होना चाहते थे? उन्हें किस आधार पर भारत में शामिल कराया गया ? क्या इस बात के लिये कोई जनमत सर्वेक्षण हुआ? क्या जूनागढ़, हैदराबाद और दूसरे कई रियासतों ने भारत में शामिल होने से इनकार नहीं किया था? क्या इसके बावजूद उन्हें हिंदुस्तान में शामिल नहीं कराया गया? क्या नगालैंड भारत में शामिल होने के खिलाफ नहीं रहा है? क्या उसका दोष सिर्फ इतना है कि वह मुस्लिम नहीं है?

कहा जा सकता है कि जम्मू-कश्मीर की मुस्लिम आबादी के कारण वह स्वभाविक रूप से पाकिस्तान में शामिल हो सकता है. मगर आजादी के वक्त कश्मीर की जनता ने कभी पाकिस्तान में मिलने के वैसी उत्कंठा का प्रदर्शन नहीं किया जैसा हैदराबाद की जनता ने पाकिस्तान में नहीं मिलने के लिये किया था. दरअसल बंटवारे के वक्त अधिकांश राज्यों के अस्तित्व का फैसला इसी तरह बिना किसी जगह की जनता की राय पूछे अपनी मरजी से कर लिया. अधिकांश फैसले तो माउंटबेटेन के डायनिंग टेबुल पर हुए और जो फैसले वहां नहीं हुए उसे सरदार पटेल ने तोपों के निशाने पर करा लिया. और आज इनमें से अधिकांश राज्य अमन चैन की जिंदगी जी रहे हैं और प्रगति के पथ पर अग्रसर हैं.

कश्मीरवासी जिस ऐतिहासिक संदर्भ का जिक्र कर करके इतने सालों से बारूद के साये में अपने जीवन को तबाह कर रहे हैं. वह एक कंफ्यूजन है, जिसके मुताबिक कश्मीर को लगता है कि वह पाक मुल्क पाकिस्तान का हिस्सा हो सकता था. वह एक आजाद मुल्क भी हो सकता था. यह कंफ्यूजन उन्हें अपने ही प्रांत के कश्मीरी हिंदू पंडित नेहरू की ढुलमुल नीति से सौगात में मिली है. वे अपनी तुलना न तो हैदराबाद से करते हैं जहां इस भ्रम के खत्म होने के कारण दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है और न ही लाइन आफ कंट्रोल के उस पर बसे कश्मीर के अपने लोगों से जो एक तथाकथित पाक मुल्क में कई दशक पिछड़ी जिंदगी जी रहे हैं.

दरअसल नेहरू जी ने कश्मीर से संदर्भ में जो जटिलता पैदा की है वह न देश के लिये हितकर साबित हुआ और न ही कश्मीर के लिये. हैरत की बात यह है कि देश के किसी दूसरे नेता ने इसमें सुधार लाने की कोशिश भी नहीं की और न ही यह समझने की कोशिश की कि धारा 370 और स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं है.

धारा 370 और स्वायत्तता निश्चित तौर पर कश्मीर को दिये जाने वाले लालच के फंदे हैं. जैसे कोई मर्द अपनी खूबसूरत बेगम को तोहफे देता है कि वह उस पर मेहरबान रहे और उसकी दूसरी औरतें जो उतनी खूबसूरत नहीं होती वह दाने-दाने के लिये मोहताज रहती हैं जैसे कि बिहार... बिहार से अलगाववाद की मांग नहीं उठती इसलिये सरकार उसे उसका हक तक नहीं देना चाहती और कश्मीर पर अरबों-खरबों लुटाती है कि वह उससे अलग न हो जाये. कश्मीर आखिर हिंदुस्तान की मजबूरी क्यों है ? साथ रहना है रहे न रहना है न रहे. क्या अब हिंदुस्तान उस स्थित में नहीं पहुंच गया है कि लोग खुद तय करें कि वे साथ रहना चाहते हैं या अलग? मुझे लगता है कि अगर कश्मीर की जनता को यह तय करने दिया जाएगा तो वह खुद ही पाकिस्तान के बदले हिंदुस्तान को चुनेगी. मगर जनमत सर्वेक्षण के खौफ में भारत बार-बार कश्मीर को राजनीतिक और आर्थिक प्रलोभनों की सौगात देता रहा है जो देश के दूसरे हिस्से के लोगों के लिये खतरनाक ट्रेंड है.

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bhaskar on 15 August, 2010 11:57;36
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Bhaai Pushyamitra.. aapke bebak vicharo ka samman karta hu...lekin ye bhi jodna chahunga ki jinko bharat ke jhande se badbu ati ho, ve log jaha chahe waha jaa kar reh sakte hein... kashmir ghati sirf waha ke pattharbaaz aihsaanfaramosh zihadi maansikta walo ki nahi hai...yeh is desh ki hai...aur sabse badi baat ye ki kashmir kisi ka ghulaam nahi hai jise aazad karne ki zarurat hai..
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Psudo on 15 August, 2010 13:14;29
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This Kashmir issue is coming up because they know MMS is the weakest PM. If they dont what they want they might never. Also i suspect that since now that America wants to move out of Afghanistan. It wants to buy Pakistani Millatry support , Knowing that MMS acts more or less like an American agent there is atmosphere is being through our media. Tell me why media doesn't cover agitations in Manipur that much? I really wonder what future kashmiri people see with Pakistan. If they became Independent they would like oth1er Nepal where China would control them. Enjoy kahmiri's
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vivek on 16 August, 2010 09:32;39
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क्यों नहीं वो सारे कश्मीरी भारत छोड़कर पाकिस्तान चले जाते हैं जो भारत में नहीं रहना चाहते हैं उनको सरकार उनकी चल अचल संपत्ति की कीमत हाथ में थमा दे और कह दे के सीमाए खुली हैं जहा चाहो वहा जाओ और पाकिस्तान को अपने उन कश्मीरी भाइयो का इस्तकबाल करना चाहिए ऐसा भारत बिभाजन के वकत हो चूका है और यदि पाकिस्तान चाहे तो बदले में पाकिस्तानी हिन्दुओ को इसी प्रकार भारत भेज दे
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एक पुराना भाजपाई on 16 August, 2010 09:43;36
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लेख पर आपत्ति है. कश्मीर को अलग करने की दलील ही बहुत मूर्खतापूर्ण है. अगर कोई देश में नहीं रहना चाहता तो उसको सामान बांधकर बाहर जाने के लिए कह दो. और कोई वार्ता नहीं किसी कीमत पर नहीं.

जय महाराष्ट्र
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Arjun Sharma on 16 August, 2010 14:07;09
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Main Pushyamitra se sehmat hoon.ek baar unhe aazadi ka swad bhi dikha hi diya jaye.Janaab nehru ji ne jo shanti ke kabootar udaye the ve abhi tak kashmir tak nahin pahunche. yadi hisaab lagaya jaye to 62 saal main is desh ne jitna paisa jitni inaayten kashmir ko di hain, utne se sesh bharat ko kamse kam bharat ka swarg jaroor banaya ja sakta tha
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Abdul Rashid (Journalist) on 16 August, 2010 16:00;14
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सच का सामना करना सीखो पहली बात कश्मीर हिंदुस्तान का अंग नहीं वह एक देश है जिसका विलय हिंदुस्तान में हुआ था.ऐसे में आप कश्मीरी को उसके अपने ही देश से निकलने की बात कह कर मुर्खता का परिचय दे रहे हैं.रही बात कश्मीर को आजाद करने की तो क्या चंद लोगों के हंगामें को मान लिया जाय की यह वहां की अवाम की आवाज है. यदि ऐसा करेंगे तो क्या फिर नक्सली की बात मन लें इसतरह तो हम देश का बटवारा करलेंगे.क्या आज हममें इतनी भी क्षमता नहीं के हम अपने देश के समस्याओं का निदान कर सके.क्या हम जो दुनिया का शक्तिशाली देश बन्ने का ख्वाब देखते है वह क्या दिव्या स्वप्न है नहीं ऐसा हरगिज नहीं है यह मात्र उनलोगों की कल्पना या सोंच हो सकती है जिन्हें अपने देश पे गर्व न हो.हाँ आज देश में ऐसे लोग ज्यादा हल्ला करते हैं न सुनिए तो अभद्र शब्द बोल कर या उन्मादी शब्द बोलकर लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करते है यह तो शुक्र है ये लोग जंगे आजादी के वक्त नहीं थे नहीं तो जब क़ुरबानी देने की बात आती शायद यह पिछले सफ में भी नहीं नजर आते.
आजादी के ६३वी वर्ष गांठ पे आप सबको हार्दिक बधाई
सप्रेम अब्दुल रशीद
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vivek on 17 August, 2010 11:13;17
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अबे बेब्कुफ़ कश्मीर कभी भी भारत से अलग देश नहीं रहा बल्कि वो एक राज्य था जैसे के हिंदुस्तान के अधिकांश भागो पर राजाओ और रजवाडो का शाशन था उसी प्रकार कश्मीर पर महाराजा हरी सिंह का शाशन था
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Singrauli.Patrika on 17 August, 2010 14:29;01
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देखा रशीद जी यह है अभद्रता का नमूना.ये वह लोग हैं जो भारत की गरिमा बढ़ाने का बीड़ा उठा रखा है.आप की कही बात सत्य प्रतिशत सत्य है आपके लिखने के बाद भी यह व्यक्ति अपना परिचय दे रहा है. लगता है महोदय ने पी एच डी किया है तभी ऐसे शब्द इनके शब्द कोष में है. इनको देश का प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो सारा संसार गली गलोजमाय हो जाए.शायद अपने शहर के नामी होंगे
हम तो हिन्दुश्तानी है लेकिन हमें ऎसी भाषा नहीं आती.और कितने प्रकार की अभद्र शैली आपको आती है कृपया करके एक लेख प्रकाशित करे. शायद आपको राष्ट्रपति अवार्ड मिल जाए.
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सलीम अख्तर सिद्दीकी on 17 August, 2010 15:34;41
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इस विवेक को पाकिस्तान भेजो इसका दिमाग वहीँ सही होगा. पता नहीं क्या क्या कहता रहता है. इस आदमी का विवेक से कोई ताल्लुक नहीं, नाम विवेक रख लिया. इसको में कई बार समझा चूका हूँ लेकिन पता नहीं ये किस मिट्टी का बना, जब बोलेगा उल्टा ही बोलेगा.
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vivek on 17 August, 2010 16:04;40
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Salim miya bata sakte ho kaun si itihas ki kitab me likha hai ki kashmir ek swatantra desh tha. Aur sabhi kathit dharmnirpeksh dekh le ki sabhi musalmano ke man me kashmir ko lekar kya chal raha hai
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image Pushya Mitra मूलतः बिहार के पूर्णिया जिले का वासी. माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से जनसंचार स्नातक. नवभारत, अमर उजाला, हिंदुस्तान अखबार और लोकायत पत्रिका और अंग भारत में कार्य. वर्तमान में प्रभात खबर में कार्यरत. सामाजिक मुद्दों से जुडाव. राजनीति और हार्डकोर खबरों पर टिपण्णी लिखना पसंद.
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