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अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद

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बढ़ते पैमाने पर इसके साक्ष्य सामने आ रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर एस एस) से जुड़े लोगों का आतंकवादी हमलों में हाथ रहा है। इन हालात में आर एस एस इस पुराने सूत्र पर चल रहा लगता है कि हमला ही सबसे अच्छा बचाव है। उसने 10 नवंबर को देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान किया है। इन कार्रवाइयों में संघ के शीर्ष नेताओं के शामिल होने की बात कही जा रही है। बहरहाल, इसकी चर्चा हम जरा बाद में करेंगे।

मीडिया की रिपोर्टें बताती हैं कि 11 अक्टूबर 2007 को अजमेर शरीफ दरगाह में जो आतंकवादी बम विस्फोट हुआ था, उसके लिए जिम्मेदार लोगों में इंद्रेश कुमार अकेले ही नहीं हैं जो आर एस एस से जुड़े हुए हैं। वास्तव में इंद्रेश कुमार का नाम इस मामले में दायर की गयी चार्जशीट में तो आया है, लेकिन उन्हें अभियुक्त नहीं बनाया गया है। दूसरी ओर, राजस्थान आतंक-निरोधक दस्ते (ए टी एस) ने 22 अक्टूबर 2010 को जो चार्जशीट दायर की है उसमें जो पांच अभियुक्त नामजद किए गए हैं उनमें पूरे चार आर एस एस से जुड़े बताए जाते हैं। इनके अलावा एक छठा नाम और है, जिस इस षडयंत्र में केंद्रीय भूमिका के बावजूद, इस बीच मारे जाने के चलते अभियुक्त नहीं बनाया जा सका है। यह शख्श भी आर एस एस से ही जुड़ा हुआ था।

8 सितंबर 2008 के मालेगांव के आतंकवादी बम विस्फोट के कुछ ही सप्ताह बाद, महाराष्ट्र ए टी एस ने इस कांड के सिलसिले में एक साध्वी तथा एक सेवारत सैन्य अधिकारी समेत, ग्यारह लोगों को आरोपित किया था। हाल के दौर में यह पहला ही मौका था जब राष्ट्रविरोधी आतंकवादी गतिविधियों के लिए दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी संगठनों के इतने सारे लोगों को पकड़ा गया था। उसके बाद से अजमेर बमकांड की सी बी आइ तथा राजस्थान ए टी एस की जांच के आधार पर ही मौजूदा चार्जशीट दायर की गयी है। जांच के क्रम में अजमेर बम विस्फोट के सूत्र, 18 मई 2007 को हैदराबाद में मक्का मस्जिद में हुए आतंकवादी बम विस्फोट से भी जुड़ते नजर आए हैं। संदेह यह भी है कि इन आतंकवादी हमलों के सूत्र दिल्ली-लाहौर समझौता एक्सप्रैस में 18 फरवरी 2007 को हुए बम विस्फोट तक भी फैले हो सकते हैं।

उक्त मालेगांव बम विस्फोट के कुछ ही अर्सा बाद, 13 अक्टूबर 2008 को हुई राष्टï्रीय एकता परिषद की बैठक में अपने हस्तक्षेप में सी पी आइ (एम) ने सरकार का ध्यान इस तथ्य की ओर खींचा था कि, ''पिछले कुछ वर्षों में पुलिस की जांच में देश के विभिन्न हिस्सों में हुए बम विस्फोटों में बजरंग दल या आर एस एस के अन्य संगठनों की संलिप्तता दर्ज की गयी है--2003 में महाराष्ट्र में परभणी, जालना तथा जलगांव जिलों में; 2005 में उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में; 2006 में नांदेड़ में; 2008 की जनवरी में तिरुनेलवेली में तिनकाशी में आर एस एस के कार्यालय में बम विस्फोट में; 2008 के अगस्त में कानपुर में, आदि आदि।'' सी पी आइ (एम) ने सरकार से आग्रह किया था कि इन सभी घटनाओं की पूरी जांच करायी जाए और दोषियों को पकड़ा जाए।

मालेगांव बमकांड के सिलसिले में गिरफ्तारियां होने पर शुरू में आर एस एस ने अपनी जानी-पहचानी शैली में गिरफ्तार होने वालों से कोई भी संबंध होने से ही इंकार कर दिया था। आर एस एस के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, एम जी वैद्य ने उस समय मीडिया से कहा था: ''हो सकता है कि उन्होंने संघ की विचारधारा से प्रेरणा हासिल की हो, लेकिन वे संघ के सक्रिय सदस्य नहीं थे।" वैसे संघ के पकड़े जाने पर अपने लोगों से इस तरह पल्ला झाडऩे में नया कुछ नहीं है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद, नाथूराम गोडसे के संबंध में भी तो उसने ठीक यही कहा था। यह दूसरी बात है कि गोडसे के भाई ने बाद में बाकायदा मीडिया के सामने एक सार्वजनिक बयान देकर यह दर्ज कराया था कि सारे के सारे गोडसे भाई आर एस एस के सदस्य थे। उस समय भी कुछ और लोग भी यह कहते थे कि हिंदू तत्ववाद के हाशिए के कुछ तत्व ही हैं जो, हिंदुत्व के मूल मुद्दों पर समझौता करने की राजनीतिक कार्यनीति से विक्षुब्ध होकर, इस तरह की आतंकवादी हरकतों का सहारा ले रहे हैं। उन्हीं के सुर में सुर मिलाकर आर एस एस के कुछ अन्य नेता भी मीडिया के सामने यह मानने के लिए तो तैयार हो गए हैं कि हो सकता है कि कुछ 'पथभ्रष्ट्र तत्व' हिंसा व आतंक के रास्ते पर चल पड़े हों। फिर भी वे इसका आग्रह करते हैं कि उनके पूरे संगठन को ऐसे तत्वों के रंग में रंगकर नहीं देखा जा सकता है। यह भी महात्मा गांधी की हत्या के मुकद्दमे के समय आर एस एस द्वारा अपनाए गए रुख की पुनरावृत्ति को ही दिखाता है। इसी तरह की दलील के सहारे आर एस एस ने उस समय यह मुद्रा अपनायी थी कि, ''आतंकवाद से सख्ती से निपटा जाना चाहिए।"

बहहरहाल, अब जबकि अजमेर विस्फोट के मामले में चार्जशीट तैयार कर पेश की जा चुकी है और आतंकी हमलों के साथ संघ से जुड़े लोगों के रिश्ते अच्छी तरह उजागर किए जा चुके हैं, आर एस एस ने सुर बदलकर इन आतंकवादी गतिविधियों के साथ अपने लोगों के जोड़े जाने के खिलाफ देशव्यापी विरोध कार्रवाइयों का आह्वान कर दिया है। 31 अक्टूबर को महाराष्ट्र में जलगांव में आर एस एस के अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की जो तीन दिवसीय बैठक संपन्न हुई उसी में इन कार्रवाइयों का आह्वान किया गया है। आर एस एस के सरसंघचालक लखनऊ में इस कार्रवाई में हिस्सा लेंगे और महासचिव, हैदराबाद में। संघ के महासचिव ने धमकी के स्वर में इसी सिलसिले में यह भी कहा था कि  आर एस एस के इस तरह आतंकवाद के साथ जोड़े जाने पर ''हिंदू समुदाय नाराज" है और ''राष्ट्रवादी" आर एस एस को बदनाम करने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी! साफ है कि इन विरोध कार्रवाइयों का मकसद यही है कि सरकारों तथा जांच एजेंसियों पर इसके लिए दबाव डाला जाए कि जांच के अपने कदम आगे नहीं बढ़ाएं।

हमने बार-बार यह कहा है और एक बार फिर कहते हैं कि आतंकवाद शुद्घ रूप से राष्ट्रविरोधी होता है और इसलिए देश को उसे जरा भी बर्दाश्त नहीं करना चाहिए। आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता है। आतंकवाद के सभी रंग एक-दूसरे के लिए खाद-पानी जुटाने का ही काम करते हैं और इस तरह एक-दूसरे को मजबूत करते हैं तथा देश की एकता व अखंडता को कमजोर करने का ही काम करते हैं। इसलिए, देश के हित में यह बहुत ही जरूरी है कि मौजूदा छान-बीन को बिना किसी रोक-टोक के आगे बढ़ाया जाए और इस क्रम में जो भी व्यक्ति और संगठन दोषी पाए जाते हैं, उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।   

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शैलेन्द्र कुमार on 11 November, 2010 19:12;01
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संजय जी कृपया कॉपी पेस्ट की आदत छोड़ दे अगर करना ही चाहते है तो ऐसी खबरों को विस्फोट नेटवर्क न्यूज़ के रूप में प्रकाशित किया करें ये एक तरह से पाठकों के साथ धोखा है क्योंकि जब हमारी टिप्पणियां लेखक तक पहुचेंगी ही नहीं तो लेखक को संबोधित करके टिप्पणी करने का कोई फायदा नहीं क्योंकि मीडिया के इस माध्यम में ये जरूरी है
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संजय तिवारी on 11 November, 2010 21:55;29
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आपको यह किसने बता दिया कि यह लेख कापी पेस्ट है. यहां उन्हीं लेखकों के लेख प्रकाशित किये जाते हैं जो या तो हमें भेजते हैं या फिर जिनका लेख प्रकाशित होने के बाद उन्हें सूचना पहुंच जाती है.

सीता का यह लेख हमें भेजा गया है, और संभवत: उनके लेख आगे भी प्रकाशित होते रहेंगे. कोई संदेह?
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prashant mehrishi on 11 November, 2010 22:57;29
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सीता राम जी पर कतई संदेह नहीं है ये तो हमारे शुभ चिन्तक हैं ये कोम्मुनिस्ट पार्टी को जड़ से मिटाकर ही दम लेंगे सपने मैं भी संघ दिखाई दे रहा है आजकल . अरे कुछ शर्म है तो पिच्च्ली सर्कार को दिए गए समर्थन के लिए देश से माफ़ी मांगो और २ G स्पेक्ट्रुम , आदर्श सोसाइटी , कोम्मोंवेल्थ गेम्स , घोटालो के बारे मैं सोचो जिसका पैसा लेकर सोनिया जी कभी भी इटली जा सकती हैं , संघ कही नहीं जा रहा ये यही इसी मिटटी मैं अपनी भारत माँ की गोद मैं उछाल कूद करता रहेगा .
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अंध-विरोध और अंध-समर्थन ही आजकल फैशन बन गया है ,कोई भी संस्था हो उसे भारतीय संविधान और न्यायपालिका की मर्यादा तो करनी ही होगी .केंद्र में बाजपेयी जी के नेतृत्व में छह साल सरकार रही तब संघ ने "सडको"पर धरने -प्रदर्शन क्यों नहीं किये ? क्या तब सारी जाँच एजेंसिया निष्पाप,धवल,उज्जवल और पवित्र थी ?
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dharamkaram on 12 November, 2010 16:22;00
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येचुरी जी, बिल्कुल सही कह रहे हो। कामरेड हो, इससे कम कहोगे ही क्या। कामरेड का मतलब तो अब सब जानते हैं। इस देश को-देशभक्तों को-राष्ट्रधर्म को जो घिनौनी गालियां दे-निरपेक्षता के लबादे में धर्मांतरण करवाए और कठमुल्लेपन को फैलाने में सहयोग करे, वही पक्का कामरेड है। नाम सीताराम रखा है, न सीता को जान पाए न राम को। मैं संघी नहीं हूं, यह बता दूं, किंतु जानता हूं उसके बारे में। संघ ने आजन्म वनवास ले रखा है राम की तरह। देशहित में-लोकहित में संघ के स्वयंसेवक बिना किसी लोभ-लाभ के विनतभाव से संलग्न हैं। संघ सेवाभावी है, समर्पित है राष्ट्र के लिए। उसने ​तुम्हारी साजिशों पर नजर रखी है। संघ जानता है कि भारतीय कामरेड चीन के नुमाइंदे भर हैं। ये कामरेड ​इस देश को तोड़ना चाहते हैं, चीन के दलाल हैं ये। मार्क्स और लेनिन तो बहाना हैं, इन्हें खून पीने की लत है। संघ यह भी जानता है कि ईसामसीह की करुणामूर्ति इस देश के आदिवासी क्षेत्रों में विचर रही है। गरीबों को नोटों के बलपर ईसाई बनाया जा रहा है। संघ ने फैसला किया कि वह भ्रमित लोगों को जगाएगा और जगा रहा है। रोटी के चक्कर में धर्म से विमुख हो चुके असंख्य जन पुनः रास्ते पर आए हैं। संघ ने राष्ट्रीय एवं प्राक्रतिक आपदाओं के क्षण सेवा की जो मिसाल स्थापित की है, वह अनूठी है। तुम्हें समझ नहीं आएगा। लोगों ने संघ को हाथोहाथ लिया-संघ से उपजी भाजपा को भी। किंतु, तुम जैसों से देखा नहीं जा रहा था। आतंकवादी मरें तो तुम्हें तकलीफ होती है। नक्सली तुम्हारे माई-बाप बने रहते हैं। माओ की हत्यारी प्रणाली तुम्हें भाती है। सो शांति-संगठन तुमसे देखा नहीं गया। कुरेद-कुरेदकर उसे लहूलुहान कर दिया। भगवाब्रिगेड कहा-सांप्रदायिक कहा-हिंदू कहकर गाली दी। इतने पर बात नहीं बनी तो आतंकवादी कहने पर भी उतर आए। सिमी से उसकी तुलना होने लगी। अच्छा किया। तुम अपने मकसद में कामयाब रहे। कुछ दिन और जिओगे-राजनीति करोगे-माल बटोरोगे, किंतु तुम लोगों को इतनी भी समझ न आई कि इस देश को क्या दे जाओगे। क्या होगा आने वाली पीढ़ी का-इस देश का-यहां के लोगों का। संघ को मुसलमानों से कभी शिकायत नहीं रही, परंतु राष्ट्रध्वंसकों को यह सम्मान नहीं देता। तुमने अब इस्लामिक आतंकवाद की राह आसान कर दी है। ​अब आतंक को पनाह भी मिल सकेगी सत्ता के चौबारे में। रही बात, इंद्रेश और साध्वी प्रज्ञा की तो देखते जाइए। सत्य सामने आना ही है। ​
​अंत में-सीताराम के लिए याद दिलाना चाहूंगा-​
​विनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।​
​बोले राम सकोप तब भय बिनु होय न प्रीति।।​
सीमा के बाद सहनशक्ति नपुंसकता है, और कुछ नहीं।
धर्मनिरपेक्षता के नाम पर देश की वैभवशाली विरासत से खिलवाड़ सहा नहीं जाएगा। वोट के लिए आतंक को प्रोत्साहन भी असह्य है, फिर चाहे कांग्रेस करे-चाहे वाममोर्चा और सपा।
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Krishna Baraskar on 12 November, 2010 20:42;05
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जब लगी पिछवाड़े आग बीच सड़क पर भोकन लागे

पूर्व संघ चालक कुप सी सुदर्शन की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी पर की गयी टिप्पणी से कांग्रेस में ऐसा जवार उठ गया मानो किसीने उनपर सीधे आक्रमण ही कर दिया हो। कांग्रेस के भिन्न-भिन्न नेता ऐसे बयान दे रहे है जैसे कोई अंडरवर्ल्ड का माफिया देता है। उनकी धमकियों में से एक ''कानून की धमकीÓÓसे ऐसा महसूस होता है जैसे की कानून उनके घर की बपौती हो वो चाहे जो भी मनमुताबिक झूट बोले उनका कोई कुछ नहीं कर सकता लेकिन उनके खिलाफ कोई कुछ नहीं कह सकता क्योंकि उनके पास कानून है।
सोचा जाय तो देश के इतने बड़े संयमित और अनुशासित परिवार ''संघÓÓ के पूर्व संघ चालक ऐसे बिना मतलब तो कोई टिप्पणी नहीं कर सकते! निश्चय ही उनकी टिप्पणी में कोइ तथ्य छिपा है और उनके पास अपनी टिप्पणी को सिद्ध करने हेतु प्रमाण उपलब्ध होंगे ही। दूसरा कारण ये हो सकता है कि उन्होने निश्चय ही कांग्रेस को यह एहसास कराने की कोशीष की होगी कि जब खुद के खिलाफ कोई गलत बात बोले तो कैसा मेहसूस होता है।
संघ के खिलाफ ना जाने कांग्रेस कब से झूठे और मनघड़ंत आरोप लगाकर देश के आम नागरिको को बहका रही है, ताकि उसकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा पूरी हो सके। अपने मिथ्या आरोपों में कांग्रेस के कुछ नेता संघ कि कट्टरता कि तुलना सिम्मी से करते है पर अभी के दो गर्मागर्म मुद्दो ने यह तथ्य सामने ला दिया कि असल में आतंकवादी संगठन सिम्मी का समकक्ष है कौन? संघ पर लगे झूठे आरोपो के जवाब में ''संघÓÓ की प्रतिक्रिया और ''कांग्रेसÓÓ की पूछ में जानबूझकर (टेस्ट के लिए) लगाई गई आग के जवाब में कांग्रेस की प्रतिक्रिया पर यदि गौर किया जाय तो बात स्वत: ही स्पष्ठ हो जाती है। संघ के खिलाफ लगे झूठे आरोपो के खिलाफ संघ ही नहीं अपितु देश की संपूर्ण जनता ने अपने संयमित विरोध प्रदर्शन के द्वारा अपनी बात रखी। जबकि कांग्रेस अपने खिलाफ लगे जरा से आरोप से बिलख पड़ी और सीधे रोड पर आ गई, हिंसात्मक आंदोलन पर उतारू हो गई। उनके वरिष्ठ नेता तो सीधे धमकी देने पर उतारू हो गये। जैसे की हमारे प्रदेश में ही ले लीजिए ''कांग्रेस प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी ने धमकी दी है कि ऐसे बयान से कांग्रेसी बौखला गये तो गंभीर परिणाम होंगे।'' ''महासचिव दिगविजय सिंह ने अपने खुद के चरित्र पर नजर डालने के बजाय संघ के चरित्र को निम्न करार दे दिया।ÓÓ वहीं ''कांग्रेस अध्यक्ष सुरेश पचोरी श्री सुदर्शन जी के मानसिक संतुलन खोने की बात कहते हुए भारतीय संस्कृति और भारतीय परम्परा की दुहाई देते हुए मर्यादित भाषा के प्रयोग की बात करते हुए अपने हिंसावादी नेताओं की हिंसक धमकिया और हिंसाओं को भूल जाते है।'' इस तरह के बयान से आप खुद ही अंदाजा लगा लीजिए की आतंकवादी संगठन कौन है?
मैं तो बस इतना ही टिप्पणी करूंगा की दूसरों की झोपडिय़ों में चिंगारी लगाने वालो की जब लगी पिछवाड़े आग तो बीच सड़क पर भोकन लागे।
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image Seetaram Yechuri हैदराबाद के ब्राह्मण कुल में पैदा हुए सीताराम येचुरी भारत में कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ चेहरों में एक बन गये हैं. सेंट स्टीफेन और जेएनयू से शिक्षा. 1974 में एसएफआई में सक्रिय और बाद में सीपीआईएम से जुड़े. 1984 में सीपीआई सेन्ट्रल कमेटी में शामिल हुए. वर्तमान में सीपीआई (एम) पोलित ब्यूरो के मेम्बर और ऐसे सक्रिय राजनीतिज्ञ जिनसे मिलने की तमन्ना बराक ओबामा भी रखते हों.
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ऐसे आदमी का सियासत में क्या काम?
कहां इकबाल,गालिब व फैज का शौक और कहां सियासत! जो भी हो पर पंजाब के कमजोर आर्थिक पक्ष व सियासत की गफलत में पंजाब के पूर्व वित्त मंत्री (निलंबन के दूसरे दिन उन्हें पूर्व भी कर दिया गया है) मनप्रीत सिंह बादल पंजाब के उन अहम से मारे सियासतदानों से बिल्कुल अलग है जो सियासतदान गनमैनों के लाव लश्कर के बिना चलना अपनी तौहीन समझते हैं।...
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आरटीआई का दिल है इंटरनेट
इन्टरनेट आरटीआई का दिल है, यह बात किसी आईटी प्रोफेसनल या इन्टरनेट सर्विस प्रोवाइडर द्वारा अथवा ईमेल सेवा प्रदाता कंपनी ने नहीं कही, बल्कि ऐसे शख्स श्री वजाहत हबीबुल्लाह ने कही, जो केन्द्रीय सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त रहे हैं। जिस कार्यक्रम में मुख्य सूचना आयुक्त ने दिल की बात दिल से जोड़कर कही, उस कार्यक्रम में मैं भी मौजूद था। मैंने कार्यक्रम में आये भारत के विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों व अन्य देशों से आये विषय विशेषज्ञों से आरटीआई को इन्टरनेट के जरिए प्रोत्साहित करने की बात कही।...
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