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बिहारियों का मानवाधिकार भी नहीं होता क्या?

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इस देश में बिहार के लोगों की दशा दलितों और महिलाओं से भी बुरी हो गयी है. चूंकि आज के समय में दलितों के पक्ष में बोलने वाले गैर दलित अच्छी संख्या में हैं, महिलाओं के पक्ष में बोलने वाले स्त्री विमर्शी पुरूषों की संख्या भी कम नहीं है, मगर बिहार के लोगों के हक की बात करें ऐसे गैर बिहारी विरले हैं।

पीटना और गाली सुनना मानोें बिहार के पीछड़े और गरीब तबके के लोगों की नीयति बन गई है. नेपाल में मधेशी के नाम पर, झारखंड में डोमिशाइल के नाम पर, असम मेंं हिन्दीभाषी के नाम पर, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में बिहारी के नाम पर, महाराष्ट्र, चेन्नई, हैदराबाद, बैंगलुरू तक में उत्तर भारतीय के नाम पर जिस एक वर्ग के लोग लगातार प्रतािड़त होते हैं, वह बिहार के लोग हैं। उत्तरांचल हों या जम्मू, दिल्ली का मैट्रो हो या हैदराबाद की ऊंची इमारते। यदि यहां किसी दुर्घटना में मजदूर मरते हैं तो उनमें मरने वाले ज्यादातर मजदूर बिहारी होते हैं।

यह बात वास्तव में शर्मनाक है कि महाराष्ट्र जैसे जागरूक राज्य में एक दर्जन भी मराठी सामाजिक कार्यकर्ता महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के विरोध में सामने नहीं आए। एक फादर स्टेन्स की हत्या होती है तो दुनियाभर के मानवाधिकारवादी इकट्ठे हो जाते हैं। कहां गए इस बार वे सारे लोग? क्या किसी भी मराठी मानुष को यह सब गलत नहीं लगा? मीडिया में ऐसे लोग क्यों नहीं आए? या फिर मान लिया जाए कि बिहार में जो पैदा हुआ है, उसका कोई मानवाधिकार नहीं है। मेधा पाटेकर का बयान हर छोटी-बड़ी घटना पर सुनने-पढ़ने को मिल ही जाता है। वह नन्दीग्राम में विशेष आर्थिक क्षेत्र की बात से लेकर बिहार में बाढ़ तक हर जगह मौजूद होती हैं। इस बार उत्तर भारतीय भगाओ दंगे के समय वह मुम्बई में ही थीं ऐसे समय में उन्होंने आगे बढ़कर क्यों नहीं कहा कि यह बिहार के लोग किसी दूसरी भूमि के पुत्र नहीं है। यह सभी लोग इसी भारत भूमि की संतान हैं। मेधा हर जगह अन्याय के खिलाफ खड़ी होती हैं, फिर यह अन्याय उनसे कैसे देखा गया? अगर वह इसका विरोध करती तो लोग उनकी बात को महत्व देते चूंकि वह खुद मराठी हैं। जो लोग राज के बहकावे में हाथों में हथियार उठाए थे, हो सकता था कि मेधा के कहने पर उनका हृदय परिवर्तन होता। बहुत बड़ी मराठी आबादी पर मेधा का प्रभाव पड़ता ही, साथ ही उनके बयान से देशभर में एक सकारात्मक संदेश जाता।

ऐसा नहीं है बिहार या उत्तर भारतीयों के लिए यह नफरत एकदम से अभी उभर के आई है। अस्सी के दशक में महाराष्ट्र के जाने-माने विचारक और मराठी दैनिक लोकसत्ता के संपादक रहे माधव गड़करी ने सवाल उठाया था कि क्यों समृद्ध राज्यों का पैसा गरीब राज्यों में जाए? क्यों केन्द्र से पैसों का बंटवारा गरीबी के आधार पर हो? इन्हीं सवाालों को बाद में चन्द्रबाबू नायडू ने भी उठाया था.

अब तक हम क्षेत्रवाद के जिस जहर को बीमारी मानकर उसे काटने का मंत्र तलाश रहे हैं, वह वास्तव में लक्षण मात्र है। बीमारी बिहारी या उत्तर भारतीय होना नहीं है। बीमारी है खुद को श्रेष्ठ मानने की समझ। कुछ-कुछ उसी तरह जिस तरह एक ब्राम्हमण, भूमिहार या ठाकुर परिवार में पैदा होना किसी के श्रेष्ठ होने की गारंटी मानी जाती रही है। कुछ उसी तरह जैसे गोरा होना इस बात की जमानत है कि वह कालों से श्रेष्ठ है. अब देखिए ना पश्चिमी देशों में `बिहारी´ की तरह एक गाली है पाकी। जिससे वहां रहने वाला हर भारतीय अमूमन परिचित होता है। वैसे ही जैसे बिहार से निकल कर दूसरे राज्यों में जाने वाले हर यादव, बनिया, ब्राम्हमण भूमिहार राजपूत कायस्थ मुसलमान सिख क्रििष्चयन सभी का एक ही परिचय है- बिहारी। इसमें कोई जात-पात-भेद-भाव नहीं किया जाता। इसी प्रकार पिष्चमी देषों में हर भारतीय पाकी है। वहां दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, बिहार, केरल, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु नहीं देखा जाता। जिस तरह महाराष्ट्र में सभी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग भैया हैं। उसी प्रकार पश्चिमी देशों में हर भारतीय पाकी है।

यह बात कहते हुए मुझे संकोच नहीं है कि भारत के अंदर बिहारियों की वही हालत है, जैसी हालत दुनियाभर भारतीयों की है। कॉल सेन्टर में काम करने वालों से पूछिए उन्हें भारतीय होने की वजह कितनी जिल्लत झेलनी पड़ती है। वह दर्द इस देश में एक बिहारी होने के दर्द से कम नहीं है। दूसरे देशों में काम करने वाले भारतीयों से पूछिए, किस तरह उन्हें नीची नजर से देखा जाता है। इस सब उस समय जब हर देश के लोग भारतीयों के श्रम और दिमाग का लोहा मान रहे हैं। बिहार के लोगों की मेहनती प्रवृति के मुरीद हर राज्य के लोग हैं। वे लोग भी जो बिहारियों का विरोध करते हैं। या उन्हें पसंद नहीं करते।

मेरे कई परिचित बिहार वाले हैं, जो अब अपने परिचय में बिहार का जिक्र नहीं करते। वे खुद को राजस्थानी, मध्य प्रदेश का या फिर दिल्ली वाला बताते हैं। कई दोस्तों ने अपने ऑरकुट प्रोफाइल में खुद को दक्षिण भारतीय बताया है। अपनी पहचान से कटकर किसी को नए पहचान के साथ नई जिन्दगी की शुरूआत करनी पडे़ तो मैं इसे ठीक नहीं समझता। लेकिन उसके दर्द को आप उनकी जगह पर खड़े हुए बिना नहीं समझ सकते। यह कुछ-कुछ उसी तरह का परिवर्तन है जिस प्रकार एक दलित व्यक्ति जब दलित से बौद्ध बन जाता है तो उसे आम समाज में स्वीकृति मिल जाती है। इसी प्रकार एक बिहारी के तौर अपना परिचय देना कई बिहारवासियों के लिए बहुत तकलीफदेह होता है। कोई बिहार का व्यक्ति यदि तर्कपूर्ण बातों से सामने वाले की बोलती बंद कर दे तो उसके मनोबल को गिराने के लिए एक शब्द `बिहारी´ ही काफी है। यह शब्द आज देशभर में उसी तरह इस्तेमाल में लाया जाता है, जिस तरह कभी नीची जातियों के लिए जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया जाता था। आज उन शब्दों के साथ उन्हें बुलाने पर कोर्ट की तरफ से हरिजन एक्ट का प्रावधान है। लेकिन बिहारी शब्द चलन में है। लोकल ट्रेनों से लेकर सार्वजनिक बस तक में आप गाली की तरह इस्तेमाल होने वाले इस शब्द को आसानी से सुन सकते हैं। इस शब्द को गाली की तरह इस्तेमाल करने वालों पर किसी तरह की धारा भी नहीं लग सकती है क्योंकि भाई साहब बिहार में जो पैदा हुआ है उसे बिहारी नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे?

आज बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश के लोग मुख्य धारा में आए इसके लिए जरूरत है, स्त्री विमर्श और दलित विमर्श जैसे किसी सशक्त विमर्श की। आज विमर्श का लाभ स्त्री-दलित दोनों समाज को मिला ही है। क्यों ना इसी तर्ज पर एक पूरबिया विमर्श की शुरूआत हो। पूरब में रहने वाले समाज की हालत भी इस देश में दलितों और महिलाओं से बेहतर नहीं है।

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Hindustani on 03 November, 2008 18:13;18
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क्या कहे मित्र.. इन बातों को सुन कर, टीवी पर देखा कर मन रोने को आता...
आज देश में हो रही इन घटनाओ के सामने स्वयं को बहुत बेबस और लाचार महसूस करता हूँ .
आज के नेताओ को तो बस अपने वोट से मतलब है मगर कल जब हमारी आने वाली पीढी हमसे पूछेगी कि जब ये सब हो रहा था तो हमने क्या किया ?
हमने इसे क्यूँ नहीं रोका तो हम क्या जवाब देंगे. दिल में तो आता हैं कि इन नेताओ का खून कर दूँ मगर अपनी जिम्मेदारियों के कारण विवश हूँ.
आज सरकार सवयम नेताओ के बल पर बनती है हमारे वोट की शक्ति बस कहने मात्र रह गई हैं

एक विवश नागरिक
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purushottam on 03 November, 2008 19:21;51
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महाराष्ट्र या तमाम जगहों पर बिहार के लोगों के साथ जो सुलूक हो रहा है, हो सकता है इससे उन लोगों की आँखें खुले जो सिर्फ़ अपने वोट बैंक की चिंता में घुलते रहते हैं। राज ठाकरे से हिसाब वक़्त लेगा, लेकिन बिहार के नेताओं से भी सवाल होना चाहिए कि गन्दी, जात-पांत की सियासत भूलकर गरीब लोगों के भले की क्यों नहीं सोचते। ऐसा क्यों होता है कि अच्छी पढ़ाई से लेकर अच्छी नौकरी के लिए ही नहीं दो जून की रोटी के लिए भी बिहार के लोगों को दूसरे प्रदेशों का रुख करना पड़ता है? देश में कहीं भी नौकरी करने की बात और है पर परदेस तो परदेस ही होता है। बिहार के लोगों को बिहार में ही महाराष्ट्र, दिल्ली , लुधियाना या जालंधर की तरह ही रोजगार के अवसर क्यों नहीं मिलने चाहिए। किसी ठाकरे को लानत भेजने के साथ हमें लालू, नीतिश, पासवान जैसे नेताओं से सवाल भी करने चाहिए-पिछडों की राजनीति कर्णधार आप लोग बिहार के भले की कब सोचेंगें? कोशिश करें कि मुंबई जैसी स्थितियों का सामना करने को बिहार के किसी व्यक्ति को मजबूर न होना पड़े।
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rajesh roy on 03 November, 2008 19:32;03
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Bahut achha Anshu bhai. good article] keep it this spirit forever.
rajesh roy
reporter, i next ranchi
09470415544.
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दीपक on 03 November, 2008 20:05;15
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आपकी बात से सहमत हुँ !मगर बिहार की स्थिती ऐसी है कि आप बिहार के अंदर भी खुश नही रह सकते वहा भी यादव भुमिहार मे बिहार बटा हुआ है ।नेता गुण्डागर्दी और भ्रष्टाचार मे लिप्त है ।और अगर आप बिहार से बाहर आते है तो यह नाम आपको खुश नही रहने देता । एक सोचनीय प्रश्न है यह !!

नर्मदा बचाने से ज्यादा जरुरी है कि मानवता को बचाया जायें ॥
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सुरेश चिपलूनकर on 03 November, 2008 20:53;05
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एक व्यापक सर्वे करवाया जाये मराठी और बिहारी लोगों के बीच, जिसमें मराठियों से सवाल किया जाये कि क्या आप बाल ठाकरे को "हीरो" मानते हैं? और बिहारियों से सवाल किया जाये कि क्या आप "लालू" को हीरो मानते हैं? इस सर्वे के रिजल्ट ही बहुत कुछ कह देंगे… यदि मराठी लोग बाल-राज ठाकरे को अपना हीरो मानते तो उन्हें मुख्यमंत्री-रेलमंत्री बनवाते… यह मूलतः मराठी-बिहारी संस्कृति और सामाजिक व्यवहार का अन्तर है… इसे समझिये…
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Sadashiv Tripathi on 06 November, 2008 01:32;38
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Aashish kumar ne bahut achchha sawal uthaya hai. Medha patekar ki chuppi unka bhi dohra charitra ujagar karti hai. Ham Aap ki es bat se sahmat hai ki Aaj Purbia bimarsh suroo honi hi chahie.
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siddharth on 13 November, 2009 23:08;55
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hum khud v kahin na kahin iske liye jimmeddar hain .jab v hum apne ko hero banana chahte hain to bihar k crime ko haroism ki tarah prastut karte hain.pahle khud bihar ki tarif karien kal jamana v tarif karega .iske ujle paksh ko dikhiye aur jai bihar boliye

ek bihari
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image आशीष कुमार बेतिया से पढ़ना शुरू किया और दिल्ली आकर पत्रकारिता की पढ़ाई पढ़ ली. दसवीं कक्षा पहुंचने तक आधा दर्जन स्कूलों को नाप चुके आशीष कुमार 'अंशु' आजकल एक घुमंतू पत्रकार के तौर पर देश को नाप रहे हैं. लिखते-पढ़ते स्कूली छात्रों के साथ मिलकर मीडिया स्कैन भी निकालते हैं और सोपानस्टेप के लिए घूमते-फिरते कार्यरत भी हैं.
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