आखिरकार शराब से हार गये गांधी
आजादी के आंदोलन में गांधी जी को दानस्वरूप घड़िया, कपड़ा, गहना सबकुछ मिलता था. अब गांधी इन सामानों को लेकर क्या करते? वे इन सामानों की नीलामी करते थे. ऐसी ही एक नीलामी गांधी ने दिल्ली में लगाई थी. उस नीलामी में प्रत्यक्षदर्शी लक्ष्मीचंद जैन कहते हैं "गांधी जी वहां नीलामी कर रहे थे. गांधी जी खड़े हुए. घड़ी की बोली लगी १० रूपये. लेकिन बोली छूटी १५ रूपये पर. मैं तो उस समय बच्चा था. कुछ समझ में नहीं आता था. पर आज भी वह दृश्य मेरी आंखों में मौजूद है कि कैसे एक जलसे में गांधी ने अपना बाजार पैदा कर लिया था."
आज कोई सत्तर साल बाद एक बाजार और पैदा हुआ. एक नीलामी हुई दिल्ली से बहुत दूर न्यूयार्क में. वहां नीलामी करनेवाले गांधी नहीं थे बल्कि गांधी खुद नीलाम हो रहे थे. उनका चश्मा, चप्पल, जेब घड़ी, एक प्लेट और कटोरा नीलाम हुए और इस बार जिसने गांधी का सामान खरीदा वह कोई और नहीं बल्कि देश के सबसे बड़े शराब के कारोबारी विजय माल्या हैं. मीडिया ही नहीं सरकार भी तहे दिल से माल्या का शुक्रिया अदा कर रही है. माल्या के सवा नौ करोड़ न होते तो शायद गांधी का सामान वहीं रह जाता. निश्चित रूप से यह भारत के लिए शर्म की बात होती. लेकिन शुक्र है कि भारत में शराब का अच्छा खासा कारोबार है और उस कारोबार की बदौलत ऐसे कारोबारी जो गांधी को शराब में सराबोर कर देने की हैसियत रखते हैं.
यह बात भूल जाईये कि गांधी किस प्रकार व्यापार में नैतिकता को महत्व देते थे. अब इस बात की क्या प्रासंगिकता है कि गांधी लाभ को नैतिकता से जोड़कर देखते थे. वे कहते थे "नफा हो या नुकसान व्यापार नैतिकता का साथ छोड़ नहीं सकता." लेकिन गांधी को तो हमारी व्यवस्था ने सन अड़तालीस में ही छोड़ दिया था. व्यापारिक नैतिकता को भला वह कितने दिन पकड़कर रखती? लेकिन ऐसे दुर्दिन आयेंगे कि एक शराब का कारोबारी गांधी के सामान को खरीदेगा, वह भी राष्ट्रपिता के धरोहर के नाम पर, यह तो खुद नेहरू ने भी कल्पना नहीं की होगी जिन्होंने सबसे पहले गांधीवादी सिद्धांतों को तिलांजली दी थी. लेकिन कल्पनालोक के गांधी को एक दिन तो मरना ही था. नैतिकता के उनके जीवन दर्शन को किसी न किसी दिन किसी विजय माल्या के हाथों नीलाम होना ही था. वह न्यूयार्क के उस नीलामीघर में हो गया जहां गांधी के सामान को विजय माल्या के हाथों नीलाम किया गया.
देश खुश है कि हमारे एक भारतीय ने देश का सम्मान एक गोरे के हाथ से निकालकर भारत को सौंप दिया. सरकार खुश है कि जनता खुश है. महात्मा गांधी के प्रपौत्र तुषार गांधी खुश हैं कि बापू की विरासत देश में वापस आ गयी है फिर उसके लिए भले ही पैसा किसी लिकर किंग ने खर्च किया हो. इस नीलामी के खरीदार को देखकर पता नहीं क्यों जेम्स ओटिस ज्यादा महान गांधीवादी नजर आते हैं. ओटिस और लेजर कुर्ट्ज ने भारत सरकार को एक तीन पेज का प्रस्ताव भेजा था. प्रस्ताव में कहा गया था कि अगर भारत सरकार अपने रक्षा बजट में कटौती करते हुए गरीबों के उत्थान और स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च बढ़ाती है और दुनिया के ७८ देशों में गांधीवादी शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए प्रयास करती है तो वे इस नीलामी को रोक सकते हैं. प्रस्ताव तीन पेज का है और आखिर पेज पर विस्तार से यह बताया गया है कि आज दुिनया में कैसे गांधी के अहिंसा दर्शन की जरूरत बढ़ गयी है. भारत सरकार ने प्रस्ताव नहीं माना. भारत सरकार ने जो माना वह यह कि विजय माल्या भारत के प्रतिनिधि के तौर पर न्यूयार्क की नीलामी में भाग ले रहे हैं जिसका झटपट माल्या ने खण्डन भी कर दिया.
यह कितनी बड़ी त्रासदी है नैतिकता का जीवनभर दामन थामे रहनेवाले बापू ने अपने बेटे हरिभाई का त्याग इसलिए कर दिया था क्योंकि वो भी एक शराबी हो चुका था तो दूसरी तरफ बापू की विरासत हासिल करने के लिए एक लिकर किंग को देश की इज्जत बचानी पड़ी. शायद हमारे देश में सुनील मित्तल, अंबानी, अजीम प्रेमजी, एलएन मित्तल, के पी सिंह और नारायणमूर्ति जैसे व्यापारी सिर्फ फोर्ब्स पत्रिका में आने के लिए बचे हैं. उनकी दौलत सिर्फ जमीन खरीदने, व्यापार बढ़ाने तक सिमटी हुई है, ऐसे मौकों पर भी उनकी पूंजी का एक छोटा सा हिस्सा सामने नहीं आता जब देश का स्वाभिमान और बापू की विरासत दांव पर लगी हो.
अब बापू का कटोरा और चश्मा विजय माल्या की देन है. विजय माल्या ही बताएं कि उस कटोरे का उपयोग अब कैसे होगा? उस चश्मे से वे अब हमें क्या दिखाएंगे? क्या वह जिसे वे अपने फाईवस्टार क्रूज पर देखते दिखाते हैं? माल्या ने बापू की जिस घड़ी को नीलामी में खरीदा है वह उस समय बापू के पास थी जब नाथूराम गोड्से ने उन्हें गोली मारी थी. काश उस समय गोड्से चौथी गोली उस घड़ी में मार देता ताकि समय वहीं ठहर जाता और आज देश को यह दिन तो नहीं देखना पड़ता. कौन जाने गांधी के दूध का कटोरा कल किंगफिशर की बोतल के साथ रखी नजर आये.
(रजत अमरनाथ स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
Title :
Body
- सुदर्शन का (कु) दर्शन
- सीआईए नहीं केजीबी एजंट कहिए जनाब
- सोनिया का सच जान बेकाबू क्यों होते हो?
- नये निजाम के दामन पर है ज्यादा बड़ा दाग
- अजमेर चार्जशीट और संघी उछल-कूद
- अपने होने पर ही हैरान
- भद्दा और बेदम रहा संघ का विरोध प्रदर्शन
- एनसीपी के 'दादा' का दांव
- पीएमओ वाले पृथ्वीराज
- गोली लगने के बाद क्या गांधी ने कहा था- हे राम ?



del.icio.us
Digg
अच्छे लेख के लिए साधुवाद।
आलोक कुमार
माल्या गांधी जी को प्रेम कर सकता है. अगर चंपारण का डाकू गांधी का शिष्य हो सकता है तो माल्या क्यों नहीं? लेकिन क्या गांधी की शरण में जाने के बाद माल्या शराब का कारोबार बंद कर देगा? क्या वह व्यापार में नैतिकता के उस आचरण को लागू करेगा जिसकी दुहाई गांधी जी देते थे.
पता नहीं क्यों, जब जब यह याद आ रहा है कि गांधी के सामान को खरीदने के लिए एक शराब व्यापारी ने दांव लगाया तो बड़ी तकलीफ हो रही है. कांग्रेस की पांच साल की सरकार ने अपना सब काम धो दिया. क्या सरकार ओटिस के प्रस्ताव को मान लेते तो कितना पैसा खर्च होता. सरकार ने उनका प्रस्ताव क्यों नहीं माना? माल्या को गांधी का सामान खरीदने ही क्यों दिया?
सरकार जल्दी ही माल्या को उसका पैसा वापस कर दे तो शायद कांग्रेस का कुछ पाप धुल जाए. कांग्रेसियों गांधी की ताबूत में यह आखिरी कील ठोंककर साबित कर दिया कि गांधीवाद के असली यही लोग हैं.
Six decades after his death once again Mohan Das Karam Chand Gandhi is in the lime light. This time for his memorabilia. The glamour struck world needs new doses of excitement every minute and Gandhi did oblige, this time by reaching the Bazar. "Will he cleanse the Bazar?" is a question in my mind. Also, for a self proclaimed 'untouchable', it must be a sad moment that while things 'touched' by him in ordinary course of life command millions of world's charmed currency, and on the other hand the ideals practiced and propagated by him lie in oblivion as proverbial 'untouchables'. Also, there is more 'untouchability' practiced in the highest quarters of glamour world, but that's another story.
Although Mohan Das Karam Chand did break British Salt Law as a protest, through out his life he was a picture perfect law abiding citizen. He always gave due respect to the Judges and Courts and regarded them as supreme authorities. And it is no wonder that many of the Courts and High Courts are located on 'Mahatma Gandhi Marg/s' as it were a tribute to his spirit of upholding rule of law. And it must be a jolt of sorts to the memory of such a man when a minister of Government of India went on to announce on a television channel, "Though the Government of India is restrained by a court order to participate in such auctions, we have been able to procure the items through the services of an intermediary (read broker or agent)." For a young Barrister Gandhi such an act would have been an unthinkable contempt of court. If we are trying to show the incident as a measure of a Nation's capabilities to act then why don't we follow the spirit along with the letter of the law and leave a good example for others to follow, just a Gandhi would have done.
भाई मेरे कुछ अच्छा हो रहा है तो उसका स्वागत करो ना कि झिझालेदर।
http://www.janadesh.in/InnerPage.aspx?Story_ID=115
Or agar bapu ke saman ki chinta thi aapko to apne nilami se pahle lekh likh kar desh walo ko chanda ekattha karne ki prerna kyun nahi di...
Vivek
Post your comment