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एक शेरनी सौ लंगूर - चिकमगलूर-चिकमगलूर

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कांग्रेस को आगामी लोकसभा चुनाव में ‘जय हो’ में अपनी विजय दिखाई पड़ रही है। स्लमडाग मिलेनियर का आस्कर लेप चढ़ा यह गाना मशहूर क्या हुआ कि कांग्रेस ने उसे अपने हाथ की भाग्य रेखा समझ लिया। उसमें उसे अपनी मुक्ति का रास्ता दिखाई पड़ा। हरेक चुनाव उत्सव में कोई न कोई नारा रंग पकड़ता है। हालांकि यह गाना पहले ही लोगों की जुबान पर चढ़ा था जो पूरी दुनिया को एक झटके में नाप गया। लेकिन यह नारा चुनावी वोटिंग मशीन में कांग्रेस की बटन दबा पाएगा यह समय बताएगा।

कांग्रेस के मुकाबले भाजपा ने मजबूत नेता, निर्णायक सरकार का जैसा गंभीर नारा दिया। उसके नेता है लालकृष्ण आडवाणी। जाहिर है। ‘शाइनिंग इंडिया’ और ‘फील गुड’ से जली भाजपा ने छाछ फूंक कर और अपने नेता के व्यक्तित्व के हिसाब से नारा बांधा। विज्ञापन व तकनीक के युग ने हरेक क्षेत्र में दस्तक दी है। राजनीतिक तामझाम भी उससे अछूती नहीं रहा। पिछले लोकसभा चुनाव में विज्ञापन एजेंसियों की सलाह पर भाजपा ने इंडिया शाइनिंग और फील गुड की पूछ पकड़ कर जनता के बीच गई तो जनता ने उससे राम-राम कर ली। यह नारा चुनाव के बीच में ही दम तोड़ गया था।

भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी कई बार अफसोस जता चुके हैं कि वह नारा गलत था जो भाजपा और भारत की छवि के प्रतिकूल था। समझा जाता है कि कुछ वरिष्ठ पत्रकारों ने चुनाव के कवर करने के दरम्यान तबके प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से पूछा कि इंडिया शाइनिंग कहीं नहीं दिखी, जमीनी नेता वाजपेयी का सहज जवाब था कि भले ही कहीं शाइनिंग न दिखे पर उनकी पार्टी के दक्षिण के एक नेता के मस्तक पर शाइनिंग ही शाइनिंग है।

तकनीक चुनावी रणनीति तय कर रही है। संदेश से लेकर प्रचार-प्रसार सब उसके सहारे। लेकिन नारों की अनदेखी नहीं की जा सकती क्योंकि चुनावी फड़ फाइट से ही लड़ा जाता है। नारा उसकी धुरी बनता है। कई बार यह अपना अनोखा असर दिखाता है और देखते-देखते संजीवनी का काम करने लगता है। वहीं कई बार इंडिया से निकले इंडिया शाइनिंग सरीखा नारा उन तंग गलियों में नहीं पहुंच पाता जहां भारत बसता है। इस चुनाव में कांग्रेस इंडिया शाइनिंग की तर्ज पर जनता को जय हो में रंगना चाह रही है।

वहीं यह कहने वाले राजनीतिक पंडितों की कमी नहीं कि जय हो- बेरोजगारी, जय हो-गरीबी, जय हो-असुरक्षा, जय हो सोनिया-राहुल के चाटुकारों की। लेकिन कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनुसंघवी ने जब स्लमडाग मिलेनियर को आस्कर मिलने पर इसे अपनी सरकार की उपलब्धि बताया तो उनको क्या मालूम कि यूरोपीय देशों में इंडियन को इंडियन डाग कहा जाने लगा है। सोनिया की यूपीए की यह समुद्र पार उपलब्धि है। इसी कांग्रेस के दिवंगत नेता व मशहूर साहित्यकार श्रीकांत वर्मा 1971 में तबकी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने गए। गांधी बैठक में थी और वर्मा को इंतजार करने को कहा गया। चुनावी बिगुल बज चुका था। इंतजार के क्षणों में वर्मा को बौद्धिक तेजा पनपा और उन्होंने एक कागज के टुकड़े पर लिखा कि ‘वे कहते हैं कि इंदिरा को हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ’। यह नारा उस समय के विपक्षी महागठबंधन के इंदिरा हटाओ, देश बचाओ पर भारी पड़ा। कांग्रेस ने उनको पछाड़ दिया था।

आपातकाल के दरम्यान और उसके हटने के बाद एक नारा जनता की जुंबा पर चढ़ गया ‘सिंहासन खाली करो की जनता आती है’। राष्ट्रकवि रामाधारी सिंह दिनकर की कविता की इस लाइन ने 18 जनवरी 1977 को प्रयाग में महाकुंभ में जोश भर दिया था। इस दिन आपातकाल हटाने की घोषणा हुई थी। दिनकर की यह लाइन ऐसी चली की नई नवेली जनता पार्टी ने कांग्रेस को ट्रैक से उतार दिया। जनता शब्द जनता पार्टी और नारा दोनों में था। इंदिरा का सिंहासन डोल गया और उस पर जनता पार्टी ने कब्जा किया। मोरारजी देसाई बने देश के प्रधानमंत्री। कुछ समय में जनता पार्टी जनता के हवाले हो गई।

1980 में कांग्रेस ने विपक्ष के ‘इंदिरा हटाओ, देश बचाओ’ को उलटकर जोर लगाया कि ‘इंदिरा लाओ, देश बचाओ’। इसने जादू का काम किया। इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बन गई। लेकिन उसके पहले 1979 में गांधी के लिए कर्नाटक के कांग्रेस सासंद वीरेंद्र पाटिल ने अपनी चिकमंगलूर सीट छोड़ दी। उपचुनाव में कांग्रेसियों का नारा था, ‘एक शेरनी सौ लंगूर - चिकमंगलूर-चिकमंगलूर’। लेकिन यह नारा चिकमंगलूर से निकलकर देश भर में छाया गया। उसके बाद 1985 के चुनाव में इंदिरा की हत्या के कारण कोई नारा नहीं था और राजीव गांधी ने प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई। लेकिन उनके शासन में बोफोर्स कांड को लेकर जब वीपी सिंह जनता के बीच निकले तब यह नारा खूब चला कि राजा नहीं फकीर है जनता की तकदीर है। फकीर ने राजीव को सत्ता से बेदखल कर दिया और ‘जय श्री राम’ ने फकीर को राजनीति में फकीर बना दिया। जय श्री राम ने भारतीय जनता पार्टी को देश की केंद्रीय राजनीति में स्थापित कर दिया और 1998 में केंद्र में उसकी अगुवाई में पहली बार सही मायने में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी जिसके नेता थे अटल बिहारी वाजपेयी। कहा जा सकता है कि अटल का नाम अटल से बड़ा है। नारा लगता था ‘सब पर अटल बिहारी, अबकी बारी अटल बिहारी’। भाजपा का एक नारा और चला कि ‘सबको परखा बार-बार, हमको परखो एक बार’। लेकिन यह नारा किसी ऐजेंसियों से नहीं आए थे, इसलिए जनता को दिलों को आसानी से छूते और आसन्न प्रभाव दिखाते। लेकिन भाजपा पर तकनीक और एजेंसियों का जादू चढ़ने लगा और उसकी शाइनिंग में भारत कहीं खो गया। इसलिए पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का नारा काफी सहज था। ‘कांग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ’

आपातकाल से पहले समाजवादियों से ज्यादा भय इंदिरा गांधी को भाजपा की पूर्ववर्ती जनसंघ से लगता था। समाजवादियों के बारे में सबकी तरह उनका भी ख्याल था कि समाजवादी बिछड़ने के लिए मिलते और मिलने के लिए बिछड़ते हैं। तब जनसंघ का चुनाव चिन्ह दीपक होता था। कांग्रेस का नारा था कि ‘इस दीपक में तेल नहीं, सरकार चलाना खेल नहीं’। कई चुनावों तक दीपक बुझा ही रहा। दीपक का स्थान बाद में कमल ने लिया जिसे राम ने खिला दिया। आंदोलनों के दौर में समाजवादियों की यह चिंघाड़ यदाकदा जनता को हिलाने की कोशिश करती थी कि ‘जिंदा कौमे पांच साल इंतजार नहीं करती’। लेकिन आंदोलनों के दौर का एक महत्वपूर्ण राम जन्मभूमि आंदोलन जिसको वाजपेयी राष्ट्रीय भावनाओं का प्रकटीकरण कहते रहे हैं, ने सही मायने में देश की तस्वीर बदल दी। ‘बच्चा-बच्चा राम का जन्मभूमि के काम का’, ‘कल्याण सिंह कल्याण करो, मंदिर का निर्माण करो’ के सहारे दक्षिणपंथी अरसे तक जनता को राम नाम की घुट्टी पिलाते रहे।

समाजवाद-दक्षिणपंथ-वैचारिक स्तर पर दीवालिया कांग्रेस की राजनीति में कांशीराम को भूला नहीं जा सकता। कई प्रयोगों के बाद बसपा बनी तो उत्तर प्रदेश उसका केंद्रीय अखाड़ा बना। बसपा का नारा था ‘तिलक-तराजू और तलवार, इनको मारो जूते चार’। दलितों को एकजुट करने में यह सफल रहा। लेकिन कांशीराम की उत्तराधिकारी व बसपा सुप्रीमो मायावती ने बहुजन को सर्वजन कर दिया। नारा लगा कि ‘हाथी नहीं गणेश हैं- ब्रह्मा विष्णु महेश है’। अयोध्या में विवादित ढांचा गिरने के बाद मुलायम और काशीराम के मिलने पर नारा था ‘मिले मुलायम-कांशीराम, हवा हो गए जय श्री राम’

उत्तर प्रदेश में भाजपा सत्ता से बेदखल हो गई और उसके बाद कभी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर सकी। लेकिन वक्त के फेर में मुलायम और बसपा में बाद में इतनी दूरी बढ़ी कि भाजपा इन दोनों के बीच डोलती रही। पिछले साल उत्तर प्रदेश के चुनाव में मायावती ने मुलायम के खिलाफ इस नारा के साथ मोर्चा खोला कि ‘चढ़ गुंडन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर’। इसने कमाल का प्रभाव डाला और बसपा ने उत्तर प्रदेश में अपने दम पर सरकार बना ली। लेकिन वही मायावती एक-एक कर माफियाओं को अपनी पार्टी में ला रही हैं। आवाज आ रही हैं ‘पत्थर रख लो छाती पर गुंडा चढ़ गए हाथी पर’। लेकिन बसपा जैसी पार्टियों के नारे किसी एजेंसियों से नहीं निकलते, इसलिए उनकी मारक छमता ज्यादा होती है। उनके चिंतक ही कोई खेल करते हैं जिससे माया को माया मिल जाती है। जो दिल्ली पहुंचता है वह ‘सत्यमेव जयते’ के नीचे देश सेवा की शपथ लेता है। इस सत्यमेव जयते को स्थापित करने में पंडित मदन मोहन मालवीय ने जबर्दस्त भूमिका निभाई थी।

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