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मीडिया की महामारी के बीच पत्रकारिता का जनाजा

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भारत में प्रेस को संविधान का चौथा खंभा होने का दर्जा हासिल है। प्रेस हमारे यहां आजादी का एक पर्याय भी है। देश जब गुलाम था उस दौर से ही आजादी का सपना देखने वाले लोगों ने प्रेस को साथी बनाया। अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता को मान देने वाले इस मुल्‍क में प्रेस को अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के माध्‍यम होने का गौरव हासिल है। कुछ साल पहले जब भारत मे मीडिया का फैशन शुरू नहीं हुआ था उस दौर तक प्रेस एक सम्‍मानजनक कर्तव्‍य हुआ करता था। इससे वे लोग जुड़ते थे जो सरोकारों से लबरेज होते थे। कम से कम शुरू शुरू में तो प्रेस से जुड़ने वाले लोगों के मन में अब भी यही होता है। ये बात दीगर है कि अब चमक दमक और ताकत का पर्याय भी प्रेस है, लेकिन पहले प्रेस संजीदा विषय था सरोकारों वाला पेशा था।

मीडिया की महामारी फैलने के बाद अब यह धंधे में तब्‍दील हो रही है। खुद सरोकारों का गाना गाने वाले भी इसे इन हालातों में पहुंचाने के लिए जिम्‍मेदार हैं। अब आज की तारीख में मीडिया ने प्रेस को हाशिये पर ला खड़ा कर दिया है।मिशन तो दूर की बात है, प्रोफेशन का दावा करने वाले मीडिया ने प्रोफेशनल नैतिकता भी खत्‍म कर दी है। ये मीडिया ही है जो इन दिनों पहले स्‍वर्ग की सीढ़ियां खोजने का दावा कर रहा था, जिसने आधे नर शरीर वाला और आधे जानवर के शरीर वाला प्राणी ढूंढ लिया, ये मीडिया का प्रोफेश्‍नलिज्‍म ही होगा कि इंटरनेट से वीडियो डाउनलोड कर उसमें फेरबदल कर एक सम्‍मानित संप्रदाय के धर्मगुरू को तालिबानी नेता की शादी में शामिल होने का पूरा झूठा वीडियो दिखा दिया। ये भी मीडिया ही है जिसने उमा खुरान का फर्जी स्‍टिंग आपरेशन कर सनसनी और चिंता फैला दी थी, मीडिया ही तो है जिसने एक अमेरिका में पालिसी विश्‍लेषक और लेक्‍चरर को अमेरिकी जासूस बता दिया। मीडिया ही तो है जो असर वाली बातें उछालता है। इन दिनों इस मुल्‍क में प्रेस की जमीन पर मीडिया पत्रकारों की फसल से मुनाफा काट रहा है।

असल में भारत में समाचार माध्‍यमों और मीडिया के बीच के बारीक अंतर को समझा ही नहीं गया। विश्‍व में समाचार एक ऐसी कॉमोडिटी है जिसकी सबसे ज्‍यादा मांग होती है।रायटर जैसी समाचार एजेंसी का विकास भी स्‍टॉक एक्‍सचेंज के समाचार प्रसारित करने वाली एजेंसी के बतौर हुआ था। आज ये दुनिया की प्रतिष्‍ठित समाचार एजेंसी है। समाचारों की इतनी मांग होने के पीछे एक सीधा सा कारण मनुष्‍य के जिज्ञासु होने की प्रवृत्‍ति भी है। ऐसा भी कह सकते हैं कि इसे जानबूझ कर अनदेखा किया गया। भारत में आजादी की लड़ाई में प्रेस का योगदान कोई बिसरा नहीं सकता है। महात्‍मा गाँधी, तिलक, नेहरू जैसे नेताओं ने प्रेस का सहारा लिया। उस दौर में अगर सस्‍ते माध्‍यम से अधिकतम लोगों तक अपनी बात पहुंचानी होती थी तो एक सहारा प्रेस का ही होता था। प्रेस का असर भी था।अब भी प्रेस का जादू बरकरार है लेकिन अब परिदृश्‍य बदल चुका है। हमारे मुल्‍क में समाचार माध्‍यमों ने मनोरंजन का जिस खूबसूरती से घालमेल किया है उससे कम से कम यही बात सामने आती है कि यहां मीडिया ने अतिक्रमण किया है। प्रेस की जमीन छीन ली गई है। प्रेस ने जिस यकीन को स्‍थापित किया था मीडिया ने उस पर चमक दमक वाली शीशे की इमारतें खड़ी कर दी हैं। मीडिया ताकतवर हो गया क्‍योंकि उसके पीछे प्रेस की छवि थी, उसके साथ प्रेस द्वारा कमाया लोगों का वो विश्‍वास है जिसे प्रेस ने कर्तव्‍यपरायण हो पाला पोसा है। प्रेस ने लोगों के यकीन को ईमानदारी से सींचा है और शायद यही कारण है कि मीडिया इस विश्‍वास के चलते फायदे की फसल काट रहा है।

हिंदुस्‍तान की तकदीर बहुत हद तक प्रेस ने बदली है। हमारे यहां आजादी की लड़ाई लड़ने वाले लोगों ने प्रेस को हथियार बनाया। इसे क्रांति और एकता के लिए इस्‍तेमाल किया। यहीं कहा गया कि जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो। यहां प्रेस की एक महान परंपरा रही है।प्रेस ने जन जागरण का काम किया है। आज भी लोगों पर अखबार की खबर असर करती है।अखबार भले ही रंगीन हो गए हों, भले ही तमाम अखबारों के इंटरनेट संस्‍करण शुरू हो गए हों, लेकिन अखबारों अक्षर अब भी काले हैं और पेज अब भी सफेद हैं। अखबारों की खबरें अब भी भरोसा जगाती हैं कि अगर कहीं कुछ काला है तो सामने आएगा। प्रेस ने खींचतान कर यह परंपरा जारी रखी है। प्रेस ने पैसा बनाया तो है लेकिन मेहनत भी की है। अब भी लोगों के भीतर प्रेस के लिए आदर सम्‍मान है। आज अगर कोई कहता है कि वो मीडिया हाउस में काम करता है, अच्‍छा पैसा कमाता है, खुद की कार, गाड़ी, बंग्‍ले की सुविधाएं अगर उसके पास हैं, तो वो आज भी गाड़ी पर प्रेस लिखना ही पसंद करता है। लोग अब भी प्रेस पर यकीन रखते हैं। अगर ऐसा नहीं होता तो अखबार शायद बंद ही हो चुके होते। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

भारत के बारे में कहा जाता है कि ये तमाशबीन लोगों का मुल्‍क है। एक बार एक वरिष्‍ठ पत्रकार की टिप्‍पणी भी इस बारे में पढ़ी थी कि यहां किसी चौराहे पर कोई प्‍लास्‍टिक का टुकड़ा रख दीजिए और एक टकटकी लगाकर उसे देखिए। चंद पलों में ही आपके इर्दगिर्द एक मजमा लग जाएगा। यह एकदम सटीक बात है लेकिन इससे हमारे मन के भीतर छिपी उत्‍सुक्‍ता के स्‍तर का पता भी चलता है। यही बात हमारे मीडिया घरानों ने बहुत पहले समझ ली थी। उसी दूरदृष्‍टि का फायदा उनको अब तक मिल रहा है। लेकिन वक्‍त के साथ साथ उन्‍होंने अपने आप को बदला नहीं। उनकी यह सोच वक्‍त के साथ साथ और मजबूत होती गई कि वे जो दुनिया को बताएंगे दुनिया उसे ही अंतिम सत्‍य मान लेगी। लेकिन प्रेस को मीडिया में बदलने वाले लोगों ने यह बात कभी स्‍वीकारी नहीं। वे मीडिया को तरहीज देते रहते हैं क्‍योंकि मीडिया से उनको फायदा होता है। अगर ऐसा नहीं हुआ होता तो मीडिया के मालिकान सिर्फ मीडिया ही चला रहे होते। दुर्भाग्‍य से आज वे लोग भी अच्‍छे खासे मीडिया संस्‍थानों के मालिक हैं जो काले कारनामों के लिए कुख्‍यात हैं। राजनेता, बिल्‍डर्स, ठेकेदार सबने मीडिया को बतौर हथियार हथिया लिया है। यहां इस कथन से कतई यह तात्‍पर्य नहीं है कि इन सब पेशों से जुड़े लोग पत्रकारिता संस्‍थान नहीं चला सकते हैं, बल्‍कि अच्‍छा चला सकते हैं लेकिन क्‍या सिर्फ यही चला सकते हैं। ये सब प्रेस के नाम पर हो रहा है। मीडिया के हितों के लिए प्रेस का इस्‍तेमाल हो रहा है, और प्रेस से जुड़े लोग ही ऐसा कर रहे हैं। अब भी अगर प्रेस में कोई नौसिखिया नौजवान कुछ सीखने, कर गुजरने की गरज से जाता है, तो उस्‍ताद पत्रकार शोखियां बघारते हैं, बड़े सब्‍जबाग दिखाते हैं,लेकिन कुछ ही दिनों में असलियत सामने आ जाती है, तो प्रशिक्षु की धारणाएं ध्‍वस्‍त हो जाती हैं। उसे विकसित होने ही नहीं देते।

लेकिन गौर करने वाली बात यह भी है कि आखिर हर वक्‍त सरोकारों का दम भरने वाले मीडिया संस्‍थानों को क्‍या आवश्‍यकता हो सकती है कि वे रियल ईस्‍टेट क्षेत्र में भी व्‍यापार विस्‍तार करें। और अगर करें तो फिर खुलकर करें। सरोकारों की बात कर दुनिया को कब तक अंधेरे में रखा जा सकता है। और किसलिए।क्‍या सिर्फ फायदे के लिए। क्‍यों हिंदुस्‍तान में चुनावी चैनल खुलने की परंपरा शुरू हुई। सब जानते हैं, मीडिया के वे लोग भी जो अंदरखाने में हैं और वे भी जो मंचासीन हो मीडिया के सरोकारों पर लंबे चौड़ें भाषण दिया करते हैं। मंच से उतरते ही उनके सारे सरोकार काफूर हो जाते हैं। प्रेस की ताकत और मीडिया की दमक का फायदा इन लोगों ने बहुत उठाया है।और इनकी ही हरकतों के कारण प्रेस की छवि दागदार हुई है। आज कोई अभिभावक अपने बच्‍चे को मीडिया में तो भेजना चाहेगा, लेकिन पत्रकार नहीं बनाना चाहेगा। यह इसीका नतीजा है।एक दौर था जब बुद्धिमान लोग इस पेशे में आते थ, एक विजन के साथ कि कुछ करेंगे, आज पत्रकार जंहा तहां मार खाते दिखाई देते हैं।पैसे लेकर खबरें लिखने का धंधा फल फूल रहा है। पूरे पेज के पेज बुक करा लिए जाते हैं।विज्ञापन ही छापने हैं तो समाचार का सहारा क्‍यों। इसलिए क्‍योंकि उन्‍हें पता है कि समाचार की मांग ज्‍यादा है। समाचार के नाम पर कुछ भी बेचा जा सकता है।

हमारे देश में पत्रकारिता के लोगों ने ही प्रेस को मीडिया की चमक दमक से छिपा दिया है। कई लोग पत्रकारिता में ऐसे भी हैं जो महज दशक भर पहले टूटी चप्‍पलों में फिरा करते थे और आज संस्‍थानों में मालिक की हैसियत रखते हैं। प्रेस की इसी तकदीर बदलने वाली ताकत का हमारे यहां गलत फादया उठाया गया है। यहां मीडिया हाउसों ने सरासर दगाबाजी की है। प्रेस के विश्‍वास की बदौलत कमाई गई अकूत संपत्‍तियों को मीडिया के धंधों में लगाया गया। असल में मीडिया का काम समाचार कभी रहा ही नहीं। ये मीडिया ही था जिसने इन्‍फारमेशन को इन्‍फोटेनमेंट में बदला। और जब नुक्‍सान हुआ तो मंदी का रोना शुरू कर दिया। अब जब पत्रकारों पर ही बन आई है तो उनके स्‍वर मुखर हुए हैं। इधन नए मीडिया ने भी जबरदस्‍त दस्‍तक दर्ज कराई है। लाखों हजारों ब्‍लॉगर बिना किसी पैसे के लालच के स्‍वतंत्रता से अभिव्‍यक्‍ति दे रहे हैं। और लोग उन्‍हें सराह भी रहे हैं।

लेकिन अब भी बदस्‍तूर प्रेस की छवि कायम है। हां लोगों का मीडिया पर से भरोसा उठा है, पर असल में हमारे यहां अब भी जनमानस मीडिया को प्रेस नहीं समझता है,यही बात प्रेस के पक्ष में है। उसे फिर से अपनी जमीन तलाशनी होगी और अपनी जमीन से मीडिया को खदेड़ना होगा। प्रेस को थोड़ा सा कुछ करने की जरूरत है। वे लोग जो मीडिया की करनी का रोना रो रहे हैं, जो सरोकारों की बातें करते फिरते हैं, वे भी जो मीडिया से उम्‍मीद रखते हैं, इन सबको इस दिशा में प्रयास भी करना चाहिए कि प्रेस और मीडिया का स्‍वतंत्र विकास हो, एक दूसरे के पूरक बनें लेकिन दोनों के कामकाज का घालमेल न हो। प्रेस मनोरंजन का साधन नहीं बने और मीडिया इन्‍फोटेनमेंट की शक्‍ल में खबर परोसने का दावा नहीं करे। समाचार और सूचनाओं के सम्‍मिश्रण बनाए जाने को भी तत्‍काल रोका जाना चाहिए। ऐसी रीतियों को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए।शायद इस तरह के प्रयोगों से ये चौथा खंभा ढहने से रूक जाए। शायद ऐसा हो सके तो इसकी ताकत से फायदे की फसल कोई और न काटे।शायद प्रेस की धुंधली पड़ती चमक फिर से रौशन हो जाए, और इस रौशनी में नौजवान फिर से नहाना पसंद करें।

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कपिल on 29 April, 2009 12:14;44
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संदीप भाई, मार्के की बात कही है। मुद्दे पर बारीक नजर है आपकी। इस मामले में गंभीरता से सोचने वाले लोगों के बीच विचारों का आदान-प्रदान जरूरी है। Kapilwrting@gmail.com
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कुलदीप शर्मा on 01 May, 2009 12:00;57
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बिलकुल सही कहा है.
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