हो गयी है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
आदरणीय प्रधानमंत्री जी व बताए जा रहे भावी प्रधानमंत्री महोदय, जय हिंद। आप लोग अपने अपने क्षेत्र के वो विशिष्ठ नागरिक हैं जो कई शिखर छू चुके हैं। इत्तफाक की बात ये भी है कि आप दोनों महानुभावों के साथ किसी का वैचारिक मतभेद जैसा भी हो पर आप दोनों का ही सार्वजनिक जीवन बेहद पाक साफ रहा है, कोयले जैसे राजनीति के प्रोफेशन में होते हुए भी आपके दामन पर कहीं भी कालिख नहीं है।
इस पत्र का विषय चुनावी दौर में चल रहे समीकरणों व जनता की उम्मीदों व भावनाओं से जुड़ा हुआ है। महोदय आप भी देख रहे होंगे और महसूस भी हो रहा होगा कि 15 वीं लोकसभा के चुनावी दौर में मतदाता का उद्वेलित रुझान किसी को भी देखने को नहीं मिल रहा। मतदाताओं की खामोशी के अर्थ जो भी निकालें पर सच्चाई ये है कि पिछले 62 साल से व्यक्ति बदलते बदलते जनता दुखी, निराश और हताश हो चुकी है। पंडित नेहरु से लेकर सरदार मनमोहन सिंह तक जितने भी प्रधानमंत्री रहे उनमें से किसी भी माई के लाल ने ये हिम्मत नहीं दिखाई कि चल रही गली सड़ी व्यवस्था को बदलने के लिए कोई क्रांतिकारी कदम उठाए जाएं। यही कारण है कि कभी किसी मुद्दे, कभी किसी लहर व कभी किसी व्यक्तित्व से प्रभावित होकर भारत का मतदाता नए युग की आशा लिए मतदान करता रहा है पर उसे सिवाए सत्ता में चेहरे बदलने के अलावा कुछ भी हासिल नहीं हो सका।
अंग्रेज़ों ने 1857 की क्रांति की विफलता के बाद जिस प्रकार के कायदे कानून व व्यवस्था बनाई थी वो केवल और केवल अंग्रेज़ (यानि सत्ताधारी) को ही सूट करती थी। उस व्यवस्था का मूल सिद्धांत केवल एक ही था कि गुलामों को दबा कर कैसे रखा जाए। यदि आप पुलिस मैनुअल पढ़ने की जहमत उठाएं तो आपको पता चलेगा कि कि अंग्रेज़ों ने तो पुलिस का डिज़ाईन ही ऐसा किया था कि गुलाम हिंदुस्तानियों की पिटाई के लिए बनाई गई ये फोर्स निमर्म, बेरहम, भ्रष्ट हो व अनुशासन के नाम पर केवल वही हुक्म सुने जो स्टेट चाहती हो। आज पुलिस से जनता को जितनी शिकायतें हैं उसका निराकरण करने के नाम पर किसी का तबादला या किसी को सस्पैंड कर देना उस पेड़ के पत्तों की रोजाना धुलाई व पालिश करने जैसा काम है जिसकी असली कमी उसकी जड़ों में है। क्या कभी हमारे देश की पुलिस ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, दुबई जैसी पुलिस बन सकती है? सवाल व्यवस्था से जुड़ा है जिसमें करोड़ों हिंदोस्तानियों का गहरा दर्द जुड़ा हुआ है।
अंग्रेज़ों ने कर नियमावली (टैक्स स्ट्रक्चर) बेहद जटिल व कड़ा बनाया था। लेकिन जानबूझकर उसमें दस चोर रास्ते छोड़ दिये गए थे। हर रास्ते पर तैनात किए अधिकारी को ये हुक्म था कि टैक्स चोरी की सुरंग से निकलते सेठ साहुकार लोगों की तरफ देख कर पीठ फेर ली जाए। सेठ को मानसिक तौर पर पहले चोर बनाओ फिर जिमखाना जैसे क्लब खोल कर उसमें प्राईवेट सदस्यों को सदस्यता देकर उनके साथ जान पहचान व पारिवारिक रिश्ते बढ़ाओ। इस सारी प्रक्रिया का लब्बो लुआब यह था कि यदि फिर से क्रांतिकारी सिर उठाएं तो उन्हें वित्तीय पोषण न मिल सके. क्रांतिकारियों को आर्थिक मदद करनेवाले लोगों को सरकार का दोस्त बना दिया जाए ताकि क्रांतिकारियों को सेठ साहुकार इस डर से मदद न दें कि कहीं उनके सरकार से रिश्ते खराब न हो जाएं। वो व्यवस्था आज भी कायम है। कुत्ता और चोर मिल चुके हैं, इंसाफ का रोजाना खून हो रहा है, आपसे आशा है कि इस तरफ भी ध्यान देंगे।
अंग्रेज़ों ने जो न्याय व्यवस्था रची थी वह हमारी पंचायत प्रणाली पर आधारित न्याय प्रणाली को तहस नहस करने के लिए थी जिसके हर कोने में स्टेट की कील ठोक दी गयी थी ताकि स्टेट जो चाहे वही फैसला हो। उस वक्त लिखी गई दंड संहिता में से मात्र दो उदाहरण ही आपकी आंखें खोलने के लिए काफी होंगी क्योंकि खीर का स्वाद तो एक चम्मच से भी पता चल जाता है। हमारे देश में यदि कोई व्यक्ति किसी जिंदा व्यक्ति को गाड़ी से कुचल कर उसकी जान भी ले ले तो गाड़ी के चालक को थाने में ही जमानत मिल जाती है, दूसरी तरफ किसी के घर में बिना उसकी अनुमति के घुस कर घूर कर देख लेने मात्र से ही धारा 452 लगती है जिसकी जमानत के लिए बड़े बड़े लोगों को लोहे के चने चबाने पड़ते हैं। इसका कारण भी जान लें। जब ये कानून लिखा गया था तब हिंदुस्तानियों के पास गाड़ी नहीं हुआ करती थी। ये कानून इसलिए बनाया गया था कि यदि किसी गोरे साहिब की गाड़ी के नीचे आकर कोई ब्लडी इंडियन कुचल कर मारा जाए तो साहिब बहादुर को जमानत लेने में तकलीफ न हो। इसी तरह अंग्रेजों को ही ये आशंका थी कि कहीं हिंदुस्तानी हज़ूम बना कर उनके घरों में न आ घुसें इसलिए 452 लिख दी गई। इस प्रकार एक-एक धारा की गहराई में जाएंगे तो पता चलेगा कि कैसे भारतीय गुलामों को इंसाफ के लिए दर-दर भटकने को मज़बूर करने वाले कानून बनाए गए हैं? कैसे न्याय की हत्या के लिए या फिर अपनी मर्जी का न्याय दिलाने के लिए मुख्यमंत्री के दफ्तर से वाया एडवोकेट जनरल होते हुए हाईकोर्ट को जज से स्थानीय जज व सरकारी वकील जैसी व्यवस्था काम कर रही है। जेलों में बंद नब्बे फीसदी निर्दोष कानून की मार झेल रहे हैं और इस देश में कदम कदम पर इंसाफ की हत्या हो रही है।
सरकार योजना बनाती है कि फलां इलाके को विकसित किया जाएगा। पर बिना किसी व्यवस्थागत योजना के पहले सड़कें बन जाती हैं, फिर सीवरेज वाले उन्हें तोड़ने आ जाते हैं, सीवरेज तो डलता नहीं सड़क भी जाती लगती है, फिर कभी टेलीफोन वाले तो कभी वाटर सप्लाई वाले आ धमकते हैं। क्या हमारे मुल्क में ये संभव नहीं कि विकास की राह पर चलने वाले किसी क्षेत्र को तरतीबवार बुनियादी सुविधाएं एक ही किस्त में उपलब्ध करवाई जा सकें? क्या बासठ साल की आज़ादी के बावजूद हमारा तंत्र इस हद तक जनता की सुविधाओं के प्रति क्रूर व उदासीन है जिसे दूर करने की तरफ किसी की नज़र ही नहीं गई?
सरकारी अस्पताल में सुविधाएं कैसी होती हैं, ये बताने की जरूरत नहीं है पर गंभीर मामलों में सरकारी डाक्टर की रिपोर्ट को ही सही मानने वाला कानून व उसके कर्णधार ये नहीं जानते कि आधा मरा व्यक्ति सरकारी अस्पताल की प्रक्रिया में फंस कर पूरा ही मर जाता है। क्या सरकार जिन लाखों प्राइवेट डाक्टरों को डाक्टर होने का प्रमाण पत्र देती है उनमें इतनी योग्यता भी नहीं मानती कि आपराधिक मामले में घायल लोगों की वो जांच करने में भी अक्षम है? इस व्यवस्था के चलते सरकारी अस्पताल बूचड़खाने बन चुके हैं व सरकारी डाक्टर कसाई।
शिक्षा का जहां तक सवाल है, इस देश में निजी शिक्षा का तंत्र दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है पर सरकारी शिक्षा गटर में गिरती जा रही है। उपर से स्थानीय सरकारों का ये हाल है कि साल में पांच महीने सरकारी अध्यापकों की ड्यूटी कभी वोट बनाने व कभी वोटर कार्ड बनवाने में लगाए रखी जाती है। क्या सरकार जो करोड़ों रुपए शिक्षा के नाम पर खर्च कर रही है उसके बजाए वो पैसा सीधे तौर पर ही यदि गरीब परिवारों में बांट दिया जाए तो शायद गरीब के परिवार से एक के बजाए दो बच्चे स्तरीय शिक्षा ग्रहण कर सकें।
महोदय बड़ी हैरानी की बात है कि जनता को गले गले तक हलकान करने वाले ये मुद्दे कभी भी चुनावी मुद्दे नहीं बन पाते क्योंकि आपस में लाख विरोधाभासों के बावजूद सारे राजनीतिक दल जानते हैं कि व्यवस्था का मुद्दा उठाया तो जनता जाग जाएगी तथा फिर सरकार की सत्ता व विरोधियों को मज़ा चखाने वाली स्टेट की ताकत हाथ से जाती रहेगी। यही कारण है कि जनता लगातार पिस रही है। जनता का लोकतंत्र पर से विश्वास उठता जा रहा है। आपसी बातचीत में लोग किसी सुभाष चंद्र बोस या भगत सिंह की शासक के तौर पर कल्पना करते हैं। इसीलिए वोट प्रतिशत लगातार गिरता जा रहा है। बहुत हो चुका। जिन्होंने मलाई खानी थी उनके घर भर चुके हैं। अब तो भारत की जनता को इस दुराचारी व जालिम व्यवस्था से छुटकारा दिला कर मानवीय व्यवस्था बनवाने का वादा भी करें और कर के भी दिखाएं
आशा की अंतिम उम्मीद पर खड़ा एक हिंदुस्तानी
अर्जुन शर्मा, जालंधर, पंजाब
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