मानवतावादी मकसद के लिए मैदान में
सुधीर गंडोत्रा के कांधे पर लटका झोला उनके प्रचार अभियान का ब्रह्मास्त्र है. उनके पास न तो अखबार और टीवी में भारी भरकम विज्ञापन देने के लिए धनबल है और न ही मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए बाहुबल. फिर भी वे पंद्रहवीं लोकसभा के लिए नई दिल्ली से मैदान में हैं. जहां जाते हैं झोले से निकालकर एक आठ पेज का मेमोरन्डम थमा देते हैं जिसमें उनकी पार्टी की अपील भी है और यह सीख भी कि अच्छे लोग हमारी संसद में क्यों पहुंचने चाहिए. हमने जानना चाहा कि एक लाईन में आपको बताना हो कि आप चुनाव क्यों लड़ रहे हैं तो क्या कहेंगे?
उन्होंने कहा "हम अंदर और बाहर दोनों तरह की हिंसा का अंत चाहते हैं." वे केवल कहते ही नहीं है. लंबी तकरीर के जरिए मिलनेवालों को समझाते भी हैं और एक छोटा सा पैंपलेट थमा देते हैं जिसमें आंतरिक हिंसा से निजात पाने की कुछ यौगिक विधियां सचित्र समझाई गयी हैं.
नई दिल्ली सीट से कांग्रेस के अजय माकन और भाजपा के विजय गोयल मैदान में हैं. लड़ाई कांटे की है. ऐसे में सुधीर गंडोत्रा के मैदान में आने का मकसद क्या है? शायद वे जानते हैं कि जीतना मुश्किल है लेकिन उनका लक्ष्य बड़ी राजनीति है. वे कहते हैं- "हमारी पार्टी हार-जीत के खेल से अलग इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी इसलिए कर रही है क्योंकि हम पार्टी का संदेश "मानवतावाद" लोगों के बीच ले जाना चाहते हैं." सुधीर गंडोत्रा पहली बार यह काम नहीं कर रहे हैं. रामराज्य परिषद जैसी पार्टियां पहले भी यही कहते हुए लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा लेती रही हैं कि वे अपना विचार लोगों के बीच ले जाना चाहती है. लेकिन समय के साथ विचार का विस्तार तो हुआ नहीं उन पार्टियों का खात्मा जरूर हो गया. सुधीर गंडोत्रा की पार्टी ह्यूमनिस्ट पार्टी है और उसका विस्तार देश और राज्यों की सीमाओं से परे संपूर्ण मानव समाज है.
ह्यूमनिस्ट पार्टी की स्थापनाः 1960 के दशक में अर्जेंटीना के कुछ युवकों को लगा कि दुनिया में हिंसा बहुत तेजी से बढ़ रही है. यह हिंसा अंदर और बाहर दोनों जगह बढ़ रही है. इस हिंसा में मनुष्य के मन में छिपा लालच है. इस लालच का विस्तार राष्ट्र-राज्यों के बीच भी है. इसलिए आंतरिक लालच जब समूहगत स्वरूप धारण कर लेती है तो वाह्य युद्ध का वातावरण तैयार करती है. ह्युमनिस्ट पार्टी इस वाह्य हिंसा को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल होकर निपटना चाहती है. सुधीर गंडोत्रा पार्टी के भारत में महासचिव हैं. इसलिए उन्होंने खुद तय किया कि पहले वे खुद मैदान में उतरेंगे. हालांकि वे कहते हैं कि अच्छी राजनीति की बातें करनेवाले वक्त आने पर खुद सबसे अधिक राजनीति से दूर भागते हैं. फिर भी देश के कुछ लोकसभा सीटों पर इस बार उनकी पार्टी के प्रत्याशी मैदान में जोर आजमा रहे हैं.
सुधीर बताते हैं कि दुनियाभर के 80 देशों में ह्यूमनिस्ट पार्टी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सा ले रही है. 1983 से ह्यूमनिस्ट पार्टी भारत में सक्रिय है और आज इस पार्टी के एक लाख के करीब सक्रिय सदस्य हैं. भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया को दुनिया की श्रेष्ठतम लोकतांत्रिक विधियों में से एक माननेवाले सुधीर बताते हैं कि अमेरिका जैसे तथाकथित आधुनिक देश में भी पार्टी बनाना इतना आसान नहीं है जितना भारत में. अमेरिका में किसी भी राजनीतिक दल के गठन के लिए कम से कम 10 लाख नागरिकों के हस्ताक्षर का शपथपत्र दाखिल करना अनिवार्य होता है जबकि भारत में कोई भी व्यक्ति बहुत सामान्य सी प्रक्रिया पूरी करके राजनीतिक दल बना सकता है और देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में हिस्सेदारी कर सकता है. वे कहते हैं भारत में राजनीतिक प्रक्रिया नहीं बल्कि राजनीतिक दलों की कार्यप्रणाली में सुधार और पारदर्शिता लाने की जरूरत है. राजनीतिक दलों के ऊपर किसी प्रकार का कोई खास अंकुश नहीं होता. इसलिए उनके व्यवहार में मनमानी साफ दिखती है. सुधीर मानते हैं कि अगर राजनीतिक दलों के ऊपर कुछ आचार संहिता लागू हो जाए तो देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया ज्यादा जनवादी हो जाएगी.
एक तरफ जहां देश में पूंजीपति, बाहुबली और प्रभावशाली लोग भारत के आमचुनाव में चर्चा के केन्द्र में है वहीं सुधीर गंडोत्रा जैसे लोग भी हैं जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मानवतावादी मकसद से सक्रिय हैं. वे राजनीति को भले मकसद के लिए इस्तेमाल करना चाहते हैं और राजनीतिक प्रक्रिया में हर खासो-आम को शामिल करके इसे जनापेक्षी बनाने की कोशिश कर रहे हैं. निश्चित है कि उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती से अधिक नहीं होगी लेकिन वे भी तुरंत कोई व्यापक परिवर्तन देखने की उम्मीद भी नहीं कर रहे हैं. वे मानते हैं कि विकल्प होना चाहिए और हमें अपनी बात लोगों के सामने रखनी चाहिए. मानना न मानना यह लोगों के ऊपर छोड़ देना चाहिए. सुधीर मानते हैं कि आंतरिक हिंसा से निपटने के सबसे बेहतर उपाय भारत में ही विकसित हुए हैं. एक दिन जरूर आयेगा जब भारत ही पूरी दुनिया को वाह्य हिंसा और युद्धोन्माद से निपटने का रास्ता दिखाएगा, वह भी बहुत ही लोकतांत्रिक तरीके से. गंडोत्रा की अच्छी सी मंशा जरूर पूरी हो.
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