सरकारी पप्पूओं को कौन जगाएगा?
सरकार की चिंता है कि मतदान का प्रतिशत कम हो रहा है इसलिए दिल्ली में इस बार खास तौर पर मतदान करने के लिए चुनाव आयोग ने विज्ञापन अभियान चलाया. गैर-सरकारी संगठनों के अलावा मीडिया ने भी इस बारे में जागरूकता फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. लेकिन यह क्या? उत्साह से लबालब मतदाता जब पोलिंग बूथ पर पहुंचा तो नाम ही गायब. दिल्ली और दिल्ली से सटे गाजियाबाद के इलाकों में एक जैसी परेशानी से मतदाताओं को दो-चार होना पड़ा. कहीं मतदाता सूची से नाम ही गायब तो कहीं गलत और गलत पता. निश्चित रूप से यह कमाल सरकारी पप्पूओं का है. आम मतदाता को पप्पू न बनने की सलाह देनेवाली सरकारें अपने ही महकमें के पप्पूओं को कब जगाएगी जो मतदान के लिए सारी पूर्व तैयारी करते हैं?
इस लेखक के पास 05 जनवरी 2005 को जारी मतदाता पहचान पत्र है लेकिन वोट डालना संभव नहीं हुआ क्योंकि तमाम प्रयासों के बावजूद मतदाता सूची में नाम नहीं ढूंढ़ा जा सका। वह भी तब जब पिछले विधानसभा और नगरपालिका चुनावों में मतदान किया था और वैशाली में ग्यारह मंजिल की एक बिल्डिंग में सात साल पहले खरीदे गए अपने फ्लैट में लगातार रह रहा हूं। लेकिन मतदाता सूची का पुनरीक्षण करने वालों को इस बार यह बिल्डिंग नहीं मिली और इसके तमाम अधिवासियों का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया।
मतदान के कम प्रतिशत पर लोग हमेशा से चिन्ता जताते आए हैं. पर लगता है कि इसका एक बड़ा कारण कहीं न कहीं मतदाता सूची का पूरी तरह व्यवस्थित नहीं होना है। गाजिबायाद के मुकाबले दिल्ली की मतदाता सूची काफी व्यवस्थित है पर वहां भी नाम ढूंढ़ना आसान नहीं है। पटपड़गंज का जो हिस्सा आई.पी. एक्सटेंशन के नाम से बसाया गया है उसका नाम मतदाता सूची में नहीं है और यह पटपड़गंज में ही शामिल किया गया है। इसी तरह, दिल्ली का ही शेखसराय नाम का मोहल्ला बुधवार को सर्च करने पर नहीं मिला। गनीमत यह है कि दिल्ली की मतदाता सूची नेट पर है और आप थोड़ा समय लगाकर अपना नाम ढूंढ़ कर वोट डाल सकते हैं। पर गाजियाबाद तो शायद हिन्दुस्तान के सबसे पिछड़े चुनाव क्षेत्रों में है। मतदाता सूची तो नहीं ही मिली। चुनाव से संबंधित सामान्य जानकारी भी सरकारी वेबसाइट पर नहीं है। जो फोन नंबर मिले वे सब गलत थे।
गाजियाबाद रहने आने से पहले दिल्ली समेत जहां कहीं भी मतदाता सूची में नाम रहा और मतदान केंद्र पर गया वहां मतदान अधिकारी उस पर्ची की मांग जरूर करते हैं जो भिन्न उम्मीदवार मतदाताओं की सुविधा के लिए बंटवाते हैं। जाहिर है, यह व्यवस्था सरकारी नहीं है पर सुविधा के लिए इसकी मांग की जाती है और इसका प्रचलन है। सवाल यह है कोई मतदाता किसी उम्मीदवार की यह सेवा क्यों ले। और न ले तो मतदाता सूची में अपना नाम कैसे ढूंढ़े। कायदे से मतदाता सूची मतदान से काफी पहले जनता के लिए सार्वजनिक और सुविधाजनक रूप से (इंटरनेट समेत) उपलब्ध होनी चाहिए और उसके बाद लोगों को समय व मौका दिया जाना चाहिए कि वे अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन और आवश्यक प्रयास करें। नियम पूरा करने के लिए यह सब अभी भी होता है पर औपचारिकता के लिए ही।
अभी हालत यह है कि आपको वोट देने के लिए तो छुट्टी मिलती है पर वोटिंग लिस्ट में नाम शामिल कराने के लिए कोई छुट्टी नहीं मिलती जबकि यह काम अपेक्षाकृत काफी मुश्किल और जटिल है। मतदाता सूची में नाम शामिल करना आसान किए जाने की भी जरूरत है और यह काम छुट्टी के दिन तथा कार्य समय के बाद भी हो सके इसकी भी व्यवस्था की जानी चाहिए। अभी यह काम आप किसी कार्य दिवस को ही कर सकते हैं। अब कहा जा रहा है कि लोग-बाग छुट्टी होने के बावजूद वोट देने निकलने की जहमत नहीं उठाते। अगर ऐसा है तो क्या कोई अपना नाम मतदाता सूची में शामिल कराने की जहमत उठाएगा। और जब मतदाता सूची में नाम ही नहीं होगा (और हो तो ढूंढ़ने पर भी न मिले) तो कौन वोट दे पाएगा।
लोग मतदान करें इसके लिए बहुत जरूरी है कि लोगों को बताया जाए कि उन्हें वोट देने कहां जाना है और मतदाता सूची में उनका नाम कहां है। अभी यह काम सरकारी स्तर पर नहीं होता है और उम्मीदवार अपने खर्च पर करते हैं। लेकिन गाजियाबाद के वैशाली क्षेत्र की मतदाता सूची ऐसी है कि किसी भी पार्टी के उम्मीदवार सभी मतदाताओं को ढूंढ़कर उनतक पर्ची नहीं पहुंचा पाते हैं और मतदाता अपना नाम ढ़ूंढ़ते एक मतदान केंद्र से दूसरे के चक्कर लगाते रहते हैं। उसपर हर चुनाव में मतदान केंद्र बदल जाए और नाम अपने आप हट जाएं या शामिल कर लिए जाएं तो क्या कहने। मतदाता सूची तैयार करने का काम पूरे हिन्दुस्तान में एक ही तरीके से होता है। गांवों में अगर बीएलओ (बूथ लेवल अफसर) मुखिया अथवा तहसीलदार या किसी अन्य के घर पर बैठकर आस-पास के सभी घरों के लोगों के नाम जान सकता है और बताने वाले पर भरोसा करके उन्हें शामिल भी कर सकता है तो शहरों की बहुमंजिली इमारतों और कई इमारतों वाले अपार्टमेंट कांपलेक्स में यह बिल्कुल संभव नहीं है। यहां तो लोग पड़ोसी को नहीं जानते उसके पूरे परिवार को क्या जानेंगे। ऐसे में क्या उसी बीएलओ के लिए उतने ही पैसे, समय या सुविधा में घर-घर जाकर सबके नाम देखना तय करना और मतदाता सूची में शामिल करना संभव है। यहां कोई मुखिया नहीं होता जिसकी दिलचस्पी इस तरह के कामों में होगी।
दिल्ली, फरीदाबाद, गुड़गांव और गाजियाबाद के साथ-साथ देश के कई अन्य शहरों में स्थिति अलग है और वहां दूसरी व्यवस्था करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, हैदराबाद में मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए ड्रॉप बॉक्स की सुविधा उल्लेखनीय है। ऐसा दूसरे शहरों में भी किया जाना चाहिए। इसी तरह, सभी इमारतों और पॉश कहे जा सकने वाले मोहल्लों में रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन है जिसकी सहायता ली जा सकती है। लाखों रुपए खर्च करके बनाए जाने वाले मतदाताओं के परिचय पत्र का क्या मतलब अगर वे मतदान के ही काम नहीं आएं। और अगर कोई काम रेजीडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन कम खर्च में ज्यादा जिम्मेदारी से कर सकता है तो उसके लिए बीएलओ की क्या जरूरत।
सरकार में बैठे आला अफसर अगर नागरिकों को पप्पू बनने से बचने के लिए मतदान केन्द्र तक खींचकर लाते हैं तो जरा अपने महकमें को भी पप्पू बनने से बचाएं ताकि जब मतदाता पोलिंग बूथ तक आये तो कम से कम वोट देकर शुकून से घर वापस जाए. (anuvaadmail@gmail.com)
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