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हिंदी बोलकर प्रधानमंत्री पद की दावेदारी

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नवीन पटनायक हिंदी बोलते हैं। अच्छी बोलते हैं। ये कोई और नहीं खुद नवीन पटनायक बताना चाहते हैं। ऐन चुनाव के दौरान नवीन बाबू समाचार चैनल के पत्रकार को बुलाकर हिंदी में इंटरव्यू दिया है। इंटरव्यू के दौरान पत्रकार जब कभी पटनायक के हिंदी ज्ञान पर शक करता। सवाल अंग्रेजी में पूछता है,तो उड़ीसा के मुख्यमंत्री खालिस हिंदी में जवाब देते। नवीन पटनायक उड़ीसा के वो मुख्यमंत्री हैं जिसने उड़िया नहीं बोल पाने के तोहमत से निपटने की कभी फिक्र नहीं की। इसलिए भी जानना जरूरी लग रहा है कि आखिर क्या वजह है कि चुनाव परिणाम से पहले वो बता देने की मुद्रा में हैं कि गैर हिंदी प्रदेश का होने के बावजूद उनकी हिंदी अच्छी है।

ये कूटनीति है। और पटनायक ने इस कूटनीति को किसी स्कूल में नहीं बल्कि भारतीय राजनीति के दिग्गज नेता बीजू पटनायक के वारिश होने के नाते मां के पेट से सीखी है। घोषित तौर पर हिंदी में दिए पहले इंटरव्यू के दौरान भी नवीन पटनायक बात बात में जोर देकर कहते हैं कि वो प्रधानमंत्री नहीं बनना चाहते हैं। वो उड़ीसा की जनता की उम्मीदों पर खरे उतरकर खुश हैं।

पहली बार लग रहा है कि अहिंदी प्रदेश के नेता हिंदी ज्ञान बघारने की मुद्रा में हैं। नवीन पटनायक अकेले नहीं हैं। तमिल राजनीति में श्रीलंका मसले पर करुणानिधि से बाजी मारने पर उतारू जयललिता ने तो प्रचार की शुरूआत में ही दिल्ली में हिंदी बोलकर सबको हिला दिया। पत्रकारों से बातचीत में तमिलनाडु की अम्मा ने बता दिया कि वो ना सिर्फ हिंदी जानती है बल्कि एक दौर में उन्होंने बालीवुड की नायिका बनने का सपना पाला था और सपने को पूरा करने के लिए हिंदी को साध लिया था। जयललिता तो जयललिता तमिलनाडु में पिछड़ों की दमदार राजनीति करने वाले पीएमके जैसे दल के नेता राष्ट्रीय छवि हासिल करने के लिए हिंदी ज्ञान का इजहार कर रहे हैं। स्वास्थ्य मंत्री अंबुमणि रामदास की बिटिया के हिंदी वाद विवाद प्रतियोगिता में अव्वल आने की बात को दिल्ली के प्रेस कांफ्रेंस में बड़े अभिमान के साथ बताया गया।

केरल के काम्युनिस्ट भी अब पश्चिम बंगाल के काम्युनिस्टों को दिल्ली की राजनीति में पछाड़ने के लिए हिंदी को बेलौस तरीके से अपना रहे हैं। काम्युनिस्ट धुरी के दिग्गज सीताराम येचुरी और प्रकाश करात को मिसाल के तौर पर न भी लें तो माकपा कवर करने वाले पत्रकार बता सकते हैं कि हाल के बरसों में केरल के काम्युनिस्टों में हिंदी को आसानी से अपना लेने की चाहत बढ़ी है। हिंदी विरोधी होने का दुराग्रह धराशायी होता दिख रहा है।

गौर करें तो 15 वीं लोकसभा चुनाव के वक्त फिजां में हिंदी पक्षधर होने की शहद सी घुली है। हिंदी विरोधी होने के दुराग्रह से उपर उठकर अच्छी हिंदी बोलकर दावेदारी पेश की जा रही है। नार्थ ईस्ट में अंग्रेजी को हिंदी से बेहतर अपनाने की राजनीति तक प्रभावित हो रही है। पीके संगमा तो हिंदी बोलते ही थे लेकिन उन्होने हाल में बेतक्कलुफी के साथ जताना शुरु किया है कि उनके बच्चे उनसे बेहतर हिंदी बोलते हैं और हिंदी बोलते हुए राजनीति करते हैं। सुदूर पूर्वोत्तर में संगमा की लकीर पर कई राजनेता चल रहे हैं। असम में तो इस चुनाव में असम गण परिषद के नेता बीजेपी के साथ हिंदी में जमकर बोलते दिखे और नजारा पेश किया कि वक्त बदल रहा है।

गुजरात को हिंदी विरोध तो महात्मा गांधी ने ही काफुर कर दिया था। मगर महाराष्ट्र के नेता वाई व्ही चव्हाण के दिनों से मानते रहे हैं कि उनकी कमजोर हिंदी मराठी प्रधानमंत्री बनने की राह का सबसे बड़ा पत्थर है। शरद पवार ने हिंदी को प्रफुल्ल पटेल की तर्ज पर मांजने की शुरूआत तो दो दशक भर पहले ही कर दी थी। अब सगर्व बताते हैं कि सुप्रिया सुले को उनसे अच्छी हिंदी आती है।

तेलंगाना आंदोलन ने तो तेलगू बिट्टा भर होने से बात नहीं बनने की बात तो पहले ही बता दी थी। इस बार के चुनाव में चंद्रबाबू नायडू ने रह रहकर हिंदी बात कर जता दिया है कि वो देवगौड़ा नहीं हैं। मौका मिला तो वो बेहतर हिंदी बोलते हुए प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन जाएंगे। अंग्रेजी भी कन्नड में बोलने वाले पूर्व प्रधानमंत्री देवगौड़ा की ओर से लगातार बताया जा रहा है कि कुमारस्वामी और उनके परिवार के कई लोग हिंदी बोल लेते हैं।

हिंदी की सर्वग्राह्यता को लेकर कितना खुश हुआ जाए कितना नहीं ये तो पता नहीं लेकिन राजनीति के आईने से ये खेल 15 वीं लोकसभा चुनाव के वक्त पैदा हुआ खास माहौल है। ये पहला चुनाव है जो सांसद के बजाय प्रधानमंत्री के दावेदारों का चुनाव लग रहा है। राहुल गांधी से लेकर शरद पवार, मायावती से लेकर प्रकाश करात, बुद्धदेब भट्टाचार्य से लेकर सीताराम येचुरी, नवीन पटनायक से लेकर ममता बनर्जी, लालू यादव से लेकर रामविलास पासवान, नीतिश कुमार से लेकर जयललिता,चंद्रबाबू नायडू से लेकर रामदास तक हर राजनेता खुद के भाग्य से छींका टुटने की उम्मीद लगाए है। उम्मीद के मुताबिक ही प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए बने चक्रव्युह को तोड़ने की रणनीति बना रहा है।

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Aarfa on 13 May, 2009 01:23;39
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sir netao ko sudharne ka sab se accha tarika hai aap ka...
aap lekh accha hai... hindi to hamari pechahan hai phir iss se parapan ku... agar janta ka dil jeetna hai to hidi ko apnao...
varna english bolne walo ko deshniklala de do...
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parshuram (Fire on orkut) on 13 May, 2009 13:09;28
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after so many days or even years, we are reading some positive writup. it is good start. thanks Bharat mata that now after 61 years we can speak in one lanagage called hindi.
regards to writer of this writup.
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RAJKUMAR SINGH on 14 May, 2009 11:58;29
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bazarvad hai bhayee . sab cheej hindee me bechee ja rahee hai .vote mangane ko hindi,chalana english.aur apne bachche ko padhana angrejee .
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